पहले सुप्रीम कोर्ट समझे यह तथ्य, तब करे सवाल कि आरक्षण कब तक

हाल ही में आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणी कि कितनी पीढ़ियों तक जारी रहेगा आरक्षण, के संदर्भ में कांचा इलैया शेपर्ड का पक्ष

विश्वविद्यालयों में आरक्षण : शूद्र परिप्रेक्ष्य से इतिहास पर दृष्टिपात 

सुविख्यात दलित अध्येता गोपाल गुरु, जो इन दिनों द इकनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली के संपादक हैं, ने एक समय लिखा था कि “भारतीय समाज विज्ञान, सैद्धांतिक ब्राह्मणों और प्रयोगसिद्ध शूद्रों के बीच की घातक खाई का प्रतिनिधित्व करता है” (2002)। परंतु उनके इस अन्यथा उपयोगी लेख में शूद्रों पर कोई ख़ास चर्चा नहीं है। वे मुख्यतः दलितों से जुड़े मुद्दों पर बात करते हैं। वे यह नहीं बताते कि शूद्रों के मुद्दे पर वे इतिहास को कैसे देखते हैं। हो सकता है कि उन्होंने सोच-समझकर ऐसा किया हो। चूंकि वे भारत के सबसे प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से एक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू) में पढ़ाते थे, इसलिए उन्होंने जानते-बूझते दोधारी भाषा का उपयोग किया। जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय, जो देश के सर्वश्रेष्ठ उच्च शिक्षा केन्द्रों के रूप में जाने जाते थे, में सामाजिक विज्ञानों के अध्ययन-अध्यापन में पश्चिमी सैद्धांतिक अवधारणाओं पर तो खूब चर्चा होती थी, परंतु प्राचीन और मध्यकालीन भारत की वैचारिक धाराओं के गंभीर विश्लेषण से बचा जाता था। ये विश्वविद्यालय एक ढांचे के भीतर ही रहते थे। यह ढांचा मुख्य रूप से धर्मनिरपेक्षता, मार्क्सवाद, बहुवाद, आधुनिकतावाद और उत्तर-आधुनिकतावाद के स्तंभों पर खड़ा था। 

सन् 1980 और 1990 के दशकों में इन विश्वविद्यालयों के शिक्षकों ने फ्रांसीसी दार्शनिकों मिशेल फूको और जेक देरिदा की शब्दावली का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। क्रमशः उत्तर-संरचनावाद (पोस्ट-स्ट्रक्चरलिज्म) और विखंडन (डीकंस्ट्रक्शन) के सिद्धांत, इन पुरोधाओं की भाषा संस्कृत की तरह है – जो केवल ब्राह्मणों के देवों को समझ में आती है उनके आसपास के लोगों को नहीं। कई भारतीय प्राध्यापक, पुजारियों की तरह इन सिद्धांतों को रटने लगे और नतीजे के रूप में, हिंदुत्ववादियों के लिए उन पर राष्ट्रद्रोही का लेबल चस्पा करना बहुत आसान हो गया। 

उस दौर को हम उत्तर-औपनिवेशिक, वामपंथी-उदारवादी दौर कह सकते हैं। उस दौर में शूद्र, दलित और आदिवासी युवाओं को प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में मुश्किल से नौकरियां मिल पाती थीं, क्योंकि वे पश्चिम में शिक्षा प्राप्त वामपंथी उदारवादियों को अपनी योग्यता के संबंध में संतुष्ट नहीं कर पाते थे। भारत के शिक्षित वर्ग ने शूद्र, दलित और आदिवासी लोगों के इतिहास, उत्पादन विधियों और उनके मानवतावादी सांस्कृतिक मानकों पर केन्द्रित सैद्धांतिक विमर्श विकसित करने का कभी प्रयास ही नहीं किया। 

इसी वर्ग ने समुचित अर्हता प्राप्त शूद्र, दलित और आदिवासी उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित कर केंद्रीय विश्वविद्यालयों और संस्थानों में बड़ी संख्या में आरक्षित पदों को खाली रखा। विभाग चाहे कोई भी हो, वामपंथी-उदारवादियों की अध्यक्षता वाली चयन समितियां लगभग हमेशा ही एक निष्कर्ष पर पहुंचती थीं – ‘उम्मीदवार योग्य नहीं पाया गया’। नतीजा यह हुआ कि देश के श्रेष्ठतम विश्वविद्यालयों से पीएचडी उपाधि धारक शूद्र, दलित और आदिवासी उम्मीदवारों को अपने गांवों में लौट कर महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) को अपनी आजीविका का साधन बनाना पड़ा। कड़ी मेहनत से जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय सहित अन्य संस्थाओं से हासिल की गयी उनकी पीएचडी उपाधियां ‘मनरेगा श्रम विश्वविद्यालय’ में किसी काम की नहीं थीं। द्विज युवाओं को सरकारी और निजी संस्थानों में ऊंचे वेतन पर नौकरियां मिलतीं रहीं। आखिर वे जन्म से योग्य थे और कई विदेशी विश्वविद्यालयों के डिग्रीधारी थे। जाहिर है कि दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे किसानों के बच्चों के लिए सबसे उपयुक्त काम है खेतों में ट्रैक्टर चलाना। 

एससी, एसटी व ओबीसी के अधिकारों को लेकर प्रदर्शन करती एक महिला

द्विज पंडितों ने कभी यह स्वीकार नहीं किया कि दलितवाद, शूद्रवाद और ब्राह्मणवाद भी सामाजिक विज्ञान का हिस्सा हो सकते हैं और इनके अध्ययन के ज़रिए प्राचीन और आधुनिक भारत के सामाजिक, आध्यात्मिक और राजनैतिक विचारों व संस्थाओं को समझा जा सकता है। एक वर्ग के रूप में ऋग्वैदिक काल से ही शूद्र अस्तित्व में थे, परंतु हमारे समाज विज्ञानियों के दिमाग में कभी यह आया ही नहीं कि भारतीय समाज को समझने के लिए देशज अवधारणाएं भी उपयोगी हो सकतीं हैं। 

सन् 2014 के आम चुनाव के नतीजे घोषित होने के साथ ही वामपंथी-उदारवादी बुद्धिवीवियों का दौर समाप्त हो गया। आज के भारत के बौद्धिक विमर्श को हम उत्तर-वामपंथी-उदारवादी कह सकते हैं। इस दौर में संस्कृत और वेदों का बोलबाला होगा और सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों और संस्थानों में द्विज (ब्राह्मण, बनिया, कायस्थ, खत्री और क्षत्रिय) युवाओं को नौकरियों मिलने का सिलसिला जारी रहेगा। इस दौर में भी कृषक युवाओं की इतिहास की समझ को अकादमिक क्षेत्रों में कोई महत्व नहीं दिया जाएगा। यही कारण है कि जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं में जाट, गुज्जर, कुर्मी, यादव और अन्य दलित व ओबीसी युवाओं को अध्यापकीय पदों पर नियुक्ति नहीं मिलेंगीं – न तो आरक्षित कोटे में और ना ही सामान्य कोटे में। हाल में स्थापित निजी विश्वविद्यालयों जैसे अशोका और ओपी जिंदल में एक मिश्रित बौद्धिक वातावरण रहेगा। इन संस्थानों में चूंकि आरक्षण की व्यवस्था नहीं है, इसलिए वे हार्वर्ड की विचारधारा पर चलते रहेंगे परंतु इस विचारधारा पर हिंदुत्व की छाप रहेगी। हिन्दुत्ववादी शक्तियों को इससे कोई परेशानी नहीं होगी क्योंकि ‘वैश्विक हिंदू’ नेटवर्क, जो द्विजों द्वारा संचालित है, के परिवारों के बच्चे इन्हीं विश्वविद्यालयों में पढ़ कर वैश्विक और भारतीय बाज़ार में रोज़गार पाने की योग्यता हासिल करेंगे। दिल्ली की सीमा पर घेरा डाले शूद्र किसानों को भी द्विजों के राष्ट्रवाद में कोई खोट नज़र नहीं आया और ना ही उन्होंने उसे चुनौती दी। 

उत्तर-औपनिवेशिक भारत में वामपंथी-उदारवादी द्विज बुद्धिजीवियों को ब्राह्मणवाद से कभी कोई परेशानी नहीं हुई। देश के अग्रणी विश्वविद्यालयों में शिक्षण और लेखन में प्राचीन भारत की किसी भी अन्य सामाजिक-आध्यात्मिक अथवा सैद्धांतिक धारा को स्थान नहीं मिल सका। उन्होंने तो महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में राजनैतिक चिंतक के रूप में गौतम बुद्ध तक को जगह नहीं दी। वे वेदों, उपनिषदों और मनु और कौटिल्य के दर्शन से संतुष्ट और प्रसन्न थे। उन्होंने जाति और उन सिद्धांतों, जो जाति की संस्था का आधार माने जाते हैं, पर चुप्पी साधे रखी। उन्होंने शूद्रवाद और ब्राह्मणवाद के बीच अतीत में हुए संघर्षों के बारे में जानने का कभी प्रयास नहीं किया उन्होंने यह समझने की कोशिश नहीं की कि इन दोनों वादों के प्रकृति और उत्पादन के संबंध में विचारों में किस तरह का विरोधाभास था। शूद्रों और दलितों के संबंध में उनके और वर्तमान हिंदुत्ववादियों के बौद्धिक विमर्श एक से थी। दोनों शूद्रों और दलितों के विरोधी थे। एकमात्र अंतर यह था कि वामपंथी-उदारवादी, हिंदुत्ववादी साम्प्रदायिकता के खिलाफ थे। 

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इन विश्वविद्यालयों से एक भी ऐसा शूद्र बुद्धिजीवी नहीं निकला जो उन्हें चुनौती दे सके। आंबेडकर ने बहुत पहले – 1946 में – एक किताब लिखी थी जिसका शीर्षक था “हू वर द शूद्रज”। उनके बाद के बुद्धिजीवी, दलितों की मुक्ति और शूद्रों की ब्रह्मा के पैर से उत्पन्न होने के दर्जे से आज़ादी के अंतर्संबंध को नहीं समझ सके। जो शूद्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में काम कर रहे थे, वे भी इस दर्जे से मुक्त नहीं थे। समतावादी समाज के निर्माण के लिए उनकी मुक्ति भी आवश्यक है। 

शायद ही कोई समाज विज्ञानी यह समझ सका कि उत्पादक शूद्रों और ब्राह्मणवाद के प्राधान्य को एक साथ देखे बगैर बौद्ध धर्म के उदय के पूर्व के काल के समाजों के उत्पादक संबंधों को नहीं समझा जा सकता – अर्थात वैदिक काल, महाकाव्यों के काल और पुराणों के काल के उत्पादक संबंधों को। ब्राह्मणवादी संस्कृत साहित्य उत्पादन की चर्चा ही नहीं करता क्योंकि उस काल में उत्पादन को एक प्रदूषणकारी गतिविधि समझा जाता था जो शूद्रों के लिए ही उपयुक्त थी। यह साहित्य केवल ब्राह्मण ऋषियों और क्षत्रिय राजाओं की बात करता है। खाद्यान्न का उत्पादन करने वाले शूद्र इससे गायब हैं। ऋग्वेद के काल के पूर्व की हड़प्पा की सभ्यता के निर्माता शूद्र थे और उन्होंने ही सभ्यता के मामले में भारत को चीन, मिस्र, इजराइल और यूनान से ऊंचे दर्जे पर स्थापित किया। हड़प्पा की सभ्यता में न जाति थी और ना ही वर्ण। 

जैसा कि आंबेडकर स्वयं स्वीकार करते हैं, अछूत प्रथा को एक सामाजिक रूढि के रूप में संस्थागत स्वरुप भारत से बौद्ध धर्म को निर्वासित करने की प्रक्रिया के दौरान दिया गया। आंबेडकर के अनुसार, ब्राह्मणवाद के विरुद्ध संघर्ष करने वाले पूर्व बौद्धों को अछूत घोषित कर दिया गया। अछूत प्रथा के अस्तित्व में आने के एक हज़ार साल पहले से शूद्र गुलाम थे और दमन और क्रूरता के शिकार थे। उत्पादक शूद्रों को वैदिक और उत्तर-वैदिक कालों में अपमान और दमन का सामना करना पड़ा। अछूत प्रथा के उभरने के बाद उन्हें लगा कि वे अछूतों से श्रेष्ठ हैं। समकालीन जाति/वर्ण व्यवस्था भी हमें बताती है कि शूद्रों व दलितों की गुलामी और दमन की व्यवस्था एक दूसरे के समानांतर चलती रही। 

वेदों में देवी/देवताओं की परिकल्पना भी उत्पादन-विरोधी थी। इसके विपरीत, शूद्रों में देवी/देवताओं की परिकल्पना उत्पादन से जुडी हुई थी और उत्पादक आचार और आध्यात्मिक संस्कृति का अभिन्न अंग थी। अगर शूद्र भी उसी उत्पादन-विरोधी आध्यात्मिक विचारधारा पर आधारित जीवन जीने लगते और ब्राह्मणवादी उत्पादन-विरोधी आचार-व्यवहार को अपना लेते तो एक राष्ट्र के रूप में भारत का अस्तित्व बचता ही नहीं। उस स्थिति में खेती और शिल्पकारी से संबंधित सभी कार्यों को त्याग दिया जाता। यहां तक कि चार्वाक और लोकायत वैचारिक परम्पराएं भी शूद्रों की विचारधारा और उनकी सामाजिक, आध्यात्मिक और राजनैतिक सोच को प्रतिबिंबित नहीं करतीं। चार्वाक और लोकायत वैचारिक परम्पराओं में भी उत्पादन से जुड़ा विमर्श नहीं है। द्विज पृष्ठभूमि से आने वाले साम्यवादी अध्येताओं ने वैदिक और चार्वाक परम्पराओं में क्रमशः आस्तिकता और नास्तिकता के अंतर पर तो विचार किया, परंतु यह देखने का कष्ट नहीं किया कि शूद्र और वैदिक विचारधाराओं में उत्पादन के मसले पर किस तरह के विरोधाभास हैं। राष्ट्रों का निर्माण उत्पादन प्रणालियों और उत्पादन प्रक्रिया से उद्भूत संस्कृतियों से होता है – अन्य किसी तरीके से नहीं। 

भारतीय अथवा पश्चिमी विश्वविद्यालयों में पढ़े अनेक राजनैतिक चिंतक यह नहीं समझ सके कि पूर्व-वैदिक काल में हड़प्पा की सभ्यता के निर्माण और वैदिक पशुपालक व्यवस्था के उभार के बीच करीब 1500 सालों का अंतर था। उस काल में आज के शूद्र, दलित और आदिवासी, भारत के मूलनिवासी थे। वे कुछ नस्लीय परिवर्तनों के साथ भारतीय-अफ़्रीकी थे। वैदिक काल में आर्य ब्राह्मणों ने उन्हें शूद्र का दर्जा दे दिया। आर्य ब्राह्मणवाद ने चार वर्णों की व्यवस्था स्थापित की और ऋग्वेद ने संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप के निवासियों को चार श्रेणियों में विभाजित कर दिया – शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण। ऋग्वेद के पूर्व के काल में भारतीय उपमहाद्वीप में किसी उत्पादन-विरोधी और कृषि-विरोधी वैचारिक परंपरा का अस्तित्व नहीं था। सभी लोग जंगली जानवरों और मछलियों का शिकार करते थे और खेती भी करते थे। उन्होंने कई गांव और नगर बसाये जिनमें शामिल थे हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा आदि। यह चीन के सभ्यता के इस स्तर पर पहुंचने से बहुत पहले की बात है। अत्यधिक उन्नत प्राचीन तकनीकों के इस्तेमाल से उन्नत शहरों का निर्माण, एक उन्नत कृषि व्यवस्था और शहरों के आसपास उन्नत ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बिना संभव नहीं था। ध्यान रहे कि जो तकनीकी इस्तेमाल की गयी थी, वह तत्कालीन चीन, इजराइल, मिस्र और यूनान में इस्तेमाल की जा रही तकनीकी से बहुत उन्नत थी। प्राचीन यूनान के विपरीत, प्राचीन भारत के शहर पृथक नहीं थे। वे गांवों का विस्तार थे – जैसा कि आज के भारत में है। इसमें कोई शक नहीं कि इस पूर्व-आर्य और पूर्व-वैदिक सभ्यता के निर्माता, आज के शूद्र, दलित, आदिवासियों के पूर्वज थे। 

भारतीय विश्वविद्यालयों में प्राचीन यूनानी नगर-राज्यों और उनमें मालिकों और गुलामों के रिश्तों के बारे में अध्ययन को प्राथमिकता दी गई – प्राचीन भारत में शूद्रों और ब्राह्मणों के बीच के सभ्यागत टकराव और उसके पूर्व हड़प्पा की सभ्यता के निर्माण के अध्ययन को नहीं। राजनैतिक दर्शन के नाम पर हमें प्राचीन यूरोप के बारे में पढ़ाया गया, प्राचीन भारत के बारे में नहीं। क्यों? वह इसलिए क्योंकि प्राचीन भारत के बारे में पढ़ाने का अर्थ होता जाति व्यवस्था के उदय पर गंभीर शोध करना और शूद्रों की गुलामी के बारे में जानना। 

वर्तमान भाजपा सरकार अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवादी पैकेज के तहत वेदों, पुराणों और महाकाव्यों के इतिहास पर फोकस करना चाह रही है जबकि आवश्यकता इस बात की है कि हम पूर्व-वैदिक हड़प्पा की सभ्यता का गंभीरता से अध्ययन करें। 

हिंदुत्ववादी इतिहास में ब्राह्मण ऋषियों के पथ प्रदर्शन में चलने वाले ब्राह्मण और क्षत्रिय राजाओं को राष्ट्र निर्माता बताया जाता है। इसमें न तो शूद्र उत्पादकों के लिए जगह है, न उन वैश्यों के लिए जो खेती की काम की देखभाल करते थे और ना ही बुद्ध के काल के पूर्व के वस्तु-विनिमय केन्द्रों के लिए। वे भारतीय राष्ट्र को एक ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत करेंगे जो पौराणिक कथाओं से विकसित हुआ – उत्पादक गतिविधियों ने नहीं। खाद्यान्न पैदा करने वाले किसान, शिल्पकार, दलित और आदिवासी इस इतिहास से ऐसे गायब होंगे, मानो वे रहे ही ना हों। 

वे भारत में मुसलमानों और ईसाईयों के इतिहास के साथ-साथ, शूद्रों, दलितों और आदिवासियों के इतिहास को भी गायब कर देना चाहते हैं। पाठ्यक्रमों में शूद्रों, दलितों, आदिवासियों के इतिहास को शामिल न किये जाने से वामपंथी-उदारवादी द्विज बुद्धिजीवियों को कोई आपत्ति नहीं है। हाँ, वे अल्पसंख्यकों के इतिहास की बात ज़रूर करेंगे क्योंकि इससे उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार आंदोलन में जगह मिल सकती है। शूद्र व ओबीसी की चर्चा न होना इसलिए भी मुद्दा नहीं बनता क्योंकि उन्हें हिंदू बताया जाता है। द्विजों के इतिहास को भारत का इतिहास बना दिया जाता है। 

शूद्रों, दलितों और आदिवासियों के मुद्दे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कहीं नहीं हैं। दलितों पर तो फिर भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कुछ चर्चा होती है क्योंकि उन पर कई अध्ययन हो चुके हैं और इसलिए भी क्योंकि वे अमानवीय अछूत प्रथा के शिकार रहे हैं। और इस प्रथा के कारण अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय राज्य को शर्मिंदा भी होना पड़ता है। इसलिए वे दलितों के लिए आरक्षण का तो समर्थन करते हैं, परंतु वे यह स्वीकार नहीं करते कि भारत में एक समय शूद्र भी गुलाम थे। शूद्रों के प्रश्न, बौद्धिक विमर्श का हिस्सा इसलिए भी नहीं हैं क्योंकि शूद्रों में आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा से उपजने वाली उस बौद्धिक उर्जा का अभाव है जो उन्हें किसी भी क्षेत्र में द्विजों के एकाधिकार को चुनौती देने के काबिल बना सकती थी। और यह स्थिति तो उस समय थी जब शैक्षणिक संस्थानों पर वामपंथी और उदारवादी बुद्धिजीवियों का कब्ज़ा था। अब तो हिंदुत्ववादी बुद्धिजीवियों का राज है और वे और योजनाबद्ध तरीके से शूद्रों से जुड़े मुद्दों को दबाएंगे। यह बात अलग है कि वे हरी घास में सफ़ेद सांप की तरह आसानी से देखे जा सकते हैं। परंतु चूंकि हिंदुत्ववादी शक्तियां सत्ता में हैं, इसलिए शैक्षणिक संस्थाओं – विशेषकर विश्वविद्यालयों – में ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के नाम पर शूद्र-विरोधी बौद्धिकता को बढ़ावा दिया जाएगा। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर द्विज इतिहास को भारत का इतिहास बना दिया जाएगा। खाद्यान्न उत्पादन और शूद्रों की सभ्यतागत विरासत की कोई कीमत ही नहीं होगी। 

हिंदू मंदिरों पर ब्राह्मणों का नियंत्रण ऋग्वेद के काल से 21वीं सदी तक बिना किसी बाधा के बना रहा है। परंतु प्रधानमंत्री और राजगुरु के रूप में राज्य पर ब्राह्मणों के नियंत्रण की शुरुआत, कौटिल्य के मौर्य दरबार में प्रधानमंत्री और राजगुरु बनने के साथ हुई। चंद्रगुप्त मौर्य शूद्र था, परंतु राजतिलक की प्रक्रिया में उसे क्षत्रिय का दर्जा दे दिया गया और इस तरह उसे आम उत्पादक शूद्रों से अलग कर दिया गया। तब से लेकर 1947 तक यही चलता रहा। राज्य चाहे छोटा हो या बड़ा, वह ब्राह्मणवाद के चंगुल में ही रहा। 

ब्रिटिश काल में भी देश में अनेक ऐसी रियासतें थीं, जिनके शासक तो शूद्र थे, परंतु जिनके नियंता प्रधानमंत्री अथवा मुख्य पुजारी के रूप में ब्राह्मण थे। इन शूद्र शासकों को एक ब्राह्मणवादी अनुष्ठान में क्षत्रिय का दर्जा दे दिया जाता था। बड़ौदा के महाराज ने भले ही आंबेडकर को उच्च शिक्षा पाने के लिए विदेश भेजा हो, परंतु जब वे लौट कर भारत आए तो महाराज उन्हें बड़ौदा शहर में रहने के लिए एक मकान तक नहीं दिलवा सके। इसी तरह मैसूर के शासक और कोल्हापुर के राजा शाहू महाराज (छत्रपति शिवाजी के प्रपौत्र) को ब्राह्मणों के खिलाफ होते हुए भी उनकी सत्ता के आगे झुकना पड़ा। शूद्र समुदाय के शासकों ने आध्यात्मिक मामलों में ब्राह्मण पुजारियों के अधिकारों को कभी चुनौती नहीं दी। उन्होंने अपनी स्वायत्तता पर कभी जोर नहीं दिया। इससे शूद्र चेतना का विकास बाधित हुआ। 

आध्यात्मिक रूप से वे हमेशा ब्राह्मणों के गुलाम और उनके अधीन बने रहे। कई महत्वपूर्ण मामलों में राज्य का शासक भी ब्राह्मण का गुलाम रहता था। यही कारण है कि शूद्र शासक न तो शिक्षा हासिल कर सके और ना ही ज्ञान। आज भी शूद्रों की मन में ब्राह्मणों का डर समाया हुआ है। यह भारत की इतिहास के एक बड़ी गुत्थी है। सभी शूद्र मुख्यमंत्री और मंत्री, ब्राह्मण पंडितों के आध्यात्मिक नियंत्रण में रहते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से शूद्र कभी स्वतंत्र क्यों नहीं बन सके? हिंदू देवों ने कैसे और क्यों उन्हें आध्यात्मिक स्वाधीनता हासिल नहीं करने दी? 

कौटिल्य से लेकर जवाहरलाल नेहरू तक, ब्राह्मण प्रधानमंत्री की परंपरा अक्षुण्ण बनी रही। सरदार वल्लभ भाई पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री इसलिए नहीं बन सके क्योंकि वे शूद्र थे। स्वतंत्र भारत का पहला प्रधानमंत्री ब्राह्मण के अलावा कौन हो सकता था? यह सिद्धांत भारत के खाद्यान्न उत्पादकों का अपमान था। इस तरह, हिंदू मंदिर और राज्य दोनों ब्राह्मणों की संपत्ति बन गए। शूद्रों ने इस परंपरा के खिलाफ कभी विद्रोह नहीं किया। किसी शूद्र शासक ने यह मूलभूत प्रश्न नहीं पूछा कि आखिर क्या कारण है कि किसी हिंदू मंदिर का मुख्य पुजारी कोई शूद्र नहीं हो सकता? आखिर क्या कारण है कि ब्राह्मण खेत नहीं जोत सकते, अनाज का उत्पादन नहीं कर सकते? अगर ये प्रश्न पूछे जाते तो शूद्रों की गुलामी और अधीनता की समस्या का समाधान हो जाता। 

शूद्रों की गुलामी का मुद्दा, दलितों से भी जुड़ा हुआ है। अगर शूद्रों को पुजारी बनने का अधिकार हासिल हो जाता तो उन्हें राज्य को अपने हिसाब से चलने का हक़ भी मिल जाता। इन प्रश्नों का समाधान हो जाने के बाद, अछूत प्रथा का निवारण अपने आप सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाता। आध्यात्मिक प्रणाली का प्रजातांत्रिकरण, असमानता और अछूत प्रथा की समस्याओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण मसलों का समाधान कर देता।

आज भी ब्राह्मण, हिन्दुओं में आध्यात्मिक प्रजातंत्र के मूल प्रश्न से बच रहे हैं। शूद्रों में न तो इतना आत्मसम्मान है और ना ही आलोचनात्मक चिंतन करने की क्षमता कि वे इस प्रश्न जोर दे सकें। इस स्थिति का प्रभाव, शूद्रों की आधुनिक शिक्षा पर भी पड़ा है। एक आम शूद्र अंग्रेजी शिक्षा से उतना ही डरता है जितना वह संस्कृत की शिक्षा से डरता था। यही वह मूल कारण है जिसके चलते तुलनात्मक रूप से बेहतर आर्थिक स्थिति वाले शूद्र समुदायों जैसे जाट, यादव, गुज्जर, पटेल, मराठा इत्यादि के सदस्य भी प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों और संस्थानों में नहीं पाए जाते हैं।

लिखित दर्शन से शूद्र डरते हैं। ऋग्वेद लिखने के बाद से ब्राह्मणों ने उन्हें डरा दिया और यह डर आज भी उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है। अब समय आ गया कि शूद्र केंद्रीय विश्वविद्यालयों पर हल्ला बोल दें। उन्हें सभी विभागों में अध्यापकीय पदों पर काबिज़ होना होगा और इन विभागों का कार्यकुशल संचालन करना सीखना होगा। द्विज युवकों को ट्रैक्टर चलाना चाहिए और खेतों में अनाज उगाना चाहिए। इसी परिवर्तन में उस प्रश्न का जवाब निहित है, जिसे भारतीय अदालतें बार-बार पूछ रहीं हैं। आखिर कितनी पीढ़ियों तक आरक्षण जारी रहेगा। इस प्रश्न का जवाब, एक प्रतिप्रश्न से दिया जा सकता है। आखिर कितनी पीढ़ियों तक शूद्र, दलित और आदिवासी खेत जोत कर अनाज उगाते रहेंगे? शूद्रों और द्विजों को आपस में अपनी भूमिकाएं बदल लेनी चाहिए। तब आरक्षण समाप्त किया जा सकता है। 

(यह लेख मूलतः Countercurrents.org में ‘शूद्रास एंड सेंट्रल यूनिवर्सिटीज’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था. यहाँ हम लेखक की अनुमति से इसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित कर रहे हैं) 

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल)


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