‘दूसरी भाषा वाले नहीं लिख सकते गोंडी साहित्य, इसमें है प्रकृति से जुड़ाव व दमन के खिलाफ आक्रोश’

गोंडी भाषा व साहित्य की अध्येता उषाकिरण आत्राम के अनुसार, गोंडी साहित्य और मराठी साहित्य या दूसरे अन्य साहित्य में बहुत फर्क है। गोंडी की अपनी भाषा है। इसमें अधिकांश मौखिक साहित्य है, लेकिन वह निसर्ग के साथ ज्यादा जुड़ा हुआ है। निसर्ग यानी धरती से– प्रकृति से जुड़ा हुआ है। पढ़ें, उनका विशेष साक्षात्कार

गोंडी भाषा व साहित्य की अध्येता उषाकिरण आत्राम से साक्षात्कार

उषाकिरण आत्राम गोंडी साहित्य की चर्चित साहित्यकार हैं। वह महराष्ट्र के गढ़चिरौली में रहती हैं। इन्होंने मराठी में भी विपुल लेखन किया है। इनकी प्रकाशित रचनाओं में ‘मोट्यारिन’ (गोंडी काव्य संग्रह), ‘म्होरकी’ (मराठी काव्य), ‘अहेर’ (मराठी कहानी), ‘एक झोंका आनंदाचा’ (मराठी बालगीत), ‘गोंडवाना की महान विरांगनाएं’ (हिन्दी), ‘गोंडवाना मे कचारगढ़ : पवित्र भूमि’ और ‘अहेराचा बदला अहेर’ (मराठी नाटक) आदि शामिल हैं। फारवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार ने उनसे दूरभाष पर विशेष बातचीत की। प्रस्तुत है इस बातचीत का संपादित अंश :

आपका जन्म कब और कहां हुआ? आपकी पारिवारिक स्थिति कैसी रही?

मेरा जन्म 28 अप्रैल, 1954 को नंदौरी गांव में हुआ। पिताजी का नाम दादाजी कुशन शाह आत्राम और मेरी आई का नाम शालूबाई था। मेरे पिताजी चन्दागढ़ आत्राम राजवंश घराने के जमींदार के बेटे थे। दादाजी का नाम सुंदरशाह आत्राम था। 

आपकी पढ़ाई कहां से हुई?

मेरी सातवीं कक्षा तक की पढ़ाई नंदौरी (तालुका भद्रावती, जिला- चन्द्रपुर) गांव में ही हुई थी। उस समय हमारे गांव में हाई स्कूल नहीं था। न ही स्थायी सड़कें थीं और ना ही बसें थीं। मेरी बचपन से ही पढ़ाई की बड़ी इच्छा थी। मेरे पिताजी ने इधर-उधर से जानकारी जुटाई और चन्द्रपुर में मुझे रखकर मुझे ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई करायी। 

वहां हॉस्टल एवं कालेज की भी सुविधा थी

हां, उस डिग्री कालेज में हास्टल की सुविधा भी थी। 

आगे की पढ़ाई कैसे हुई और नौकरी करने का ख्याल कैसे आया?

मेरे जन्म से लेकर ग्रेजुएशन होने से पहले हमारे पिताजी की आर्थिक स्थिति कुछ ठीक थी। बाद में चलकर हमारे दादा एवं परिवार में जमीन को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। इससे हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गयी। मेरे दादाजी और पिताजी जमीनों को लेकर पूरी जिंदगी भर कोर्ट-कचहरी में लड़ते रहे। अंग्रेजी एवं मराठा काल में भी हमारे दादाजी के जमीनों को कब्जे में कर लिया था। बचपन में मेरी ताई बताती थी कि हमारे जमीनों को कैसे हड़प लिया गया और कैसे बेच दिया गया। मेरे पिताजी को मुझे पढ़ाने की बहुत इच्छा थी। जब मैं छोटी थी तभी मैंने उनसे कहा भी कि मुझे पढ़ना है। ग्रेजुएशन के समय घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई थी। मैंने अपना गुजारा करने के लिए पास ही के गांव के खेतों में काम भी किया। इस तरह मेरी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी हुई।

उसके बाद क्या हुआ?

उसके बाद मुझे लगा कि अब मुझे नौकरी करनी चाहिए, क्योंकि उस वक्त मेरी मां बहुत बीमार रहा करती थीं। मेरे दो भाई और हम छह बहनें थीं। मैं अपने माता-पिता की छठी संतान थी। मुझसे बड़ी दो बहनों की शादी हो गई थी। मेरे बड़े भाई का ग्यारहवीं हो गया था तब वह मिलिट्री में चला गया। मेरा दूसरा वाला भाई मेरी दूसरी दीदी के पास पढ़ने के लिए बल्लारशाह चला गया। मुझसे एक बड़ी दीदी थी, जो गांव में आठवीं क्लास पास हो गयी थीं। उनकी शादी कर दी गयी। मुझे पढ़ने की बहुत इच्छा थी। मुझे पढ़ने के लिए चन्द्रपुर में रखा गया। मैंने वहां से ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई की। लेकिन आई की बीमारी के कारण घर की आर्थिक स्थिति और भी ज्यादा खराब हो गई थी। मुझसे छोटी दो बहनें गांव में पढ़ रही थीं। मैंने उनसे कहा कि घर की स्थिति बहुत खराब है, इसलिए मुझे नौकरी करनी चाहिए ताकि आई और बाबा की मदद हो जाए। फिर मैं एटापल्ली (गढ़चिरौली) गांव में सर्विस के लिए गयी। वह ग्रामसेवक की एक छोटी-सी नौकरी थी। वहां जाकर मैंने ग्रामसेवक की नौकरी ज्वाइन की। उस समय उस गांव में जाने के लिए बसें नहीं थीं। उस समय वह गांव भी चन्द्रपुर जिला में पड़ता था। 1982 में चन्द्रपुर के दो हिस्से हो गये– एक चंद्रपुर और दूसरा गढ़चिरौली।

पहली नौकरी आपने ग्राम सेविका के रूप में किया। यह किस साल हुआ।

मेरा अप्वाइंटमेंट 1977 में हुआ था। 

उसके बाद आप शिक्षिका बनीं?

नहीं, ग्रामसेविका की नौकरी के बाद, मैं बाल विकास विभाग में आ गई। मुझे पढ़ने की इच्छा थी। एटापल्ली में जो विद्यालय था वहां दसवीं तक ही पढ़ाई होती थी। मुझे एम.ए. करना था। मेरी इच्छा थी कि मैं पीएच.डी. करूं। लेकिन उस समय आज की तरह सुविधाएं नहीं थीं। वहां जंगल था, बस नहीं आती थी, गांव में बिजली नहीं थी। यहां तक कि बाजार में आटा-चक्की तक नहीं था। बहुत सारी समस्याएं थीं। रहने के लिए आज की तरह मकान भी नहीं था। लोगों को झोपड़े में रहना पड़ता था। वहां के ग्रामसेवकों के सहयोग से मुझे भी एक झोपड़ी मिल गयी थी। पूरे परिसर में आदिवासी लोग थे। जैसे– गोंड मारिया, तुरा। वहां बड़ी आबादी गोंड मारिया लोगों की थी। करीब 89 प्रतिशत गोंड मारिया लोग थे। वहां गोंडी और तेलुगु दोनों भाषा बोलने वाले लोग थे। उस समय मुझे गोंडी भाषा नहीं आती थी, क्योंकि मैं मराठी भाषी थी। उस समय मैंने गोंडी भाषा सुनी भी नहीं थी। मेरी आई और बाबा बताते थे कि पहले हमारी भाषा गोंडी थी। चन्द्रपुर राज में पहले गोंडी भाषा में जजमेंट होता था। वही हमारी राजभाषा थी। इसलिए मुझे लगने लगा कि मुझे गोंडी भाषा सीखनी चाहिए। ताई और पिताजी की बात सुनकर मैं बहुत खुश हुई थी। मैंने ठान लिया कि कैसे भी करके मैं यह भाषा सीखूंगी। हालांकि हमारा गांव जंगल-झाड़ियों के बीच था। ऑफिस के लोग गाड़ी में बैठकर मिलने आते थे। अकेले हमलोग कहीं नहीं जाते थे। लेकिन मैं आस-पास के गांवों में जरूर जाती थी। मेरे अधिकारी अक्सर कहते थे कि “उषा! तुम जाकर नजदीक के गांव में लोगों से मिला करो।” फिर मैंने धीरे-धीरे गांव की अपनी हमउम्र लड़कियों को सहेली बना ली। उस समय मेरी उम्र 21 साल की थी। उन्हीं सहेलियों को लेकर मैं गांव जाती थी। मैं कहीं-कहीं मुकाम कर लेती यानी रूक भी जाती थी। वहां हम ढोल एवं गोकुल बजाते और गीत गाते। इस तरह मैंने धीरे-धीरे भाषा सीखने की कोशिश की। मुझे तेलुगु और गोंडी भाषा आने लगी। मैं जब इन लोगों के बीच गयी तो मैंने देखा कि वहां उनके बीच बड़े-बड़े साहूकार एवं दुकानदार लोग थे। उनकी जमीनें साहूकार छीन लेता था। साहूकार उन्हें कर्ज देकर यानी बेगारी कराता था। अपने यहां नौकरी करवाता या खेती कराता था। वह व्यक्ति जिंदगी भर उसका काम ही करता था। साहूकार लोग कहते कि तुम्हारा कर्ज खत्म ही नहीं हुआ है। फिर उसका लड़का काम करता था। उसके लड़के का लड़का भी काम करता था। उनको कभी मुक्ति नहीं मिलती थी। कर्जे के ऊपर कर्ज चढ़ता चला जाता था। कुछ भी लिखित नहीं होता था। साहूकार-दुकानदार कहता कि तुम्हारा 5 रुपया से 25 रूपया हो गया है, तो वह व्यक्ति कहता– हां साहब, हां महाराज। ऐसा करके आदिवासी लोगों की जमीन, मकान और बहुत सारी चीजों की साहूकार लोगों ने लूटपाट लिया।

उषाकिरण आत्राम, गोंडी साहित्यकार

मैंने वहां देखा कि साहूकार लोग उनको मारते भी थे। मेरे सामने ऐसी ही एक-दो घटना भी हुई थी। इस पर मेरी अपनी एक कहानी ‘बाजा’ नाम से है। साहूकार के यहां एक बाजा नाम का आदमी काम करता था। वह गूंगा था, बात नहीं कर सकता था। वह पति-पत्नी सुबह से शाम तक साहूकार के यहां काम करते थे। एक दिन बरसात में साहूकार का रेड़ा (भैंसा) मर गया। उन दिनों साहूकार लोग भैंसे से खेती करते थे। साहूकार ने बाजा को भैंसे के स्थान पर खेत में जोत दिया था। फिर उसे बहुत तेज बुखार आया। बुखार आने के बाद भी, साहूकार काम कराने के लिए उसके घर तक आ गया। साहूकार ने उसे जमीन पर पटक दिया और मारने लगा। उसने कहा कि काम पर क्यों नहीं आते। बाजा को बोलना कहां आता था। वह गूंगा था। उसकी पत्नी बोली कि उसके पति को बुखार है। साहूकार ने कहा कि उसके उपर बहुत कर्ज है। उसका कर्ज ज्यादा हो जाएगा तो कर्ज उसका बाप थोड़े ही देगा! बीमारी से ठीक होने के बाद बाजा ने देखा कि उसके बच्चे कई दिनों से भूखे हैं, घर पर अनाज का एक दाना भी नहीं है। वह कुछ चावल, ज्वार मांगने के लिए साहूकार के पास गया। उस साहूकार ने बाजा को अपने घर में बंद कर दिया। फिर उसे इतना मारा कि वह मर गया। यह घटना मेरे सामने हुई थी। लोगों ने मोर्चा निकाला। इधर-उधर से बहुत सारे लोग भी आए थे। 

यह कहां की घटना है?

यह टपली गांव की घटना है। उस पर मैंने 1980 में ‘बाजा’ नाम की कहानी लिखी है। इस घटना का जिक्र मैंने किताब में भी किया है। इस कहानी को पूना विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में भी रखा गया है। ऐसी परिस्थितियां मैंने वहां देखी। मुझे बहुत दुख हुआ कि हमारे लोगों के साथ कितना अन्याय हो रहा है! हम क्या कर सकते हैं? मेरे मन में होता था कि इनके ऊपर कुछ लिखूं। पहले भी मैं छोटी-मोटी कविताएं लिखती थीं। लेकिन मुझे वहां जाने के बाद और ज्यादा लगने लगा कि मुझे लिखना चाहिए। फिर मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मैं लगातार लिखती गयी। 

गोंड दर्शन के अध्येता रहे सुन्हेर सिंह ताराम से आपका जुड़ाव कब हुआ?

वर्ष 1985 में एक सम्मेलन में मेरी उनसे मुलाकात हुई थी। उसके बाद और तीन-चार सम्मेलनों में उनसे मुलाकात हुई। एक बार बंबई में भी मुलाकात हुई, और दूसरी अन्य जगहों पर भी मुलाकातें हुईं। उनकी इच्छा थी कि उषाकिरण ने शादी नहीं की है, इसलिए मैं उनसे शादी के लिए बोल दूं। दरअसल कई लोग थे जो हमदोनों को जानते थे। एक बार, एक परिचित ने सुन्हेर जी को कहा कि उषाकिरण ने शादी नहीं की है। उसे मांग लो। अच्छी जोड़ी जमेगी आप दोनों की। इससे पहले सुन्हेर जी की एक शादी 1977 में ही हो गई थी। लेकिन उनकी पहली पत्नी से उनका तलाक हो गया था। बाई (मेरी सास) ने बताया कि उनके घर में बहन और भाई ने मिलकर सुन्हेर जी पर चोरी का आरोप लगाकर जेल भेजवा दिया था। फिर उसके बाद उन्होंने शादी नहीं की थी। घर-बार सब छोड़कर वे अपने काम में लग गए थे। फिर सुन्हेर जी दिल्ली गये, वहां पर उन्होंने पढ़ाई की। पढ़ाई करके फिर वापस आ गये। फिर उन्होंने सामाजिक कार्य के लिए एक साहित्यिक पत्रिका ‘गोंडवाना दर्शन’ निकालना शुरू कर दिया। पत्रिका के सिलसिले में ही वे साहित्य सम्मेलनों का आयोजन करते थे। इस तरह उनसे मेरी मुलाकात हुई। 

क्या ‘गोंडवाना दर्शन’ पत्रिका उस समय भी प्रकाशित हो रही थी?

हाँ। 

आपके अंदर गोंडी भाषा में साहित्य रचने का भाव कब आया? 

मैं मराठी में कहानी लिखती थी। बाद में जब सुन्हेर सिंह ताराम जी मिल गये। उनसे मुझे आसानी हो गयी। ताराम जी अपने सम्मेलन में बोलते थे– “गोंडी हमारी प्राचीन एवं सुंदर भाषा है। उसमें मौखिक साहित्य बहुत सारा है। लेकिन उनपर किताबें नहीं हैं। इसलिए हमें गोंडी भाषा में लिखना चाहिए।” उस समय मैं मराठी में कविताएं लिखती थी। ताराम जी ने कहा कि “तुम्हारी किताब – पहली कविता संग्रह गोंडी भाषा में आनी चाहिए।” मुझे गोंडी बहुत अच्छे से नहीं आती थी, टूटी-फूटी आती थी। कंगाली ताई (चंद्रलेखा कंगाली) और मैं एक ही जगह काम करते थे। वहीं गोंडवाना में उनका प्रेस था। वहीं से हमारा ‘गोंडवाना दर्शन’ मासिक निकलता था। पूरे देश से लोग वहां आते थे और वहां चर्चा एवं सभाएं होती थीं। कंगाली ताई के पास मैं अपनी कवितायें ले गई। कंगाली ताई, ताराम जी और मैं एक सप्ताह बैठकर, मेरी गोंडी में लिखी गई पहली कविता संग्रह जो कि मेरे अनुसार बहुत अच्छी नहीं थी, उसमें संशोधन करके पठनीय बना दिया। इस प्रकार वर्ष 1993 में मेरी पहली कविता संग्रह ‘मोट्यारिन’ गोंडी भाषा में प्रकाशित हुई। 

यदि गोंडी भाषा और साहित्य की बात की जाए तो आप उसे हिंदी साहित्य एवं मराठी साहित्य से अलग कैसे पाती हैं? 

गोंडी साहित्य और मराठी साहित्य या दूसरे अन्य साहित्य में बहुत फर्क है। गोंडी की अपनी भाषा है। इसमें अधिकांश मौखिक साहित्य है, लेकिन वह निसर्ग के साथ ज्यादा जुड़ा हुआ है। निसर्ग यानी धरती से – प्रकृति से जुड़ा हुआ है। यदि गोंडी के मौखिक साहित्य को देखा जाए तो उसमें मौखिक कहानियां एवं गीत भी हैं, जो प्रकृति – धरती, आकाश, तारे, जल, जंगल, जमीन, पहाड़ियां, नदियां, पशु-पक्षी आदि से जुड़े हैं। वहां के लोगों का जीवन एवं उनके दर्द प्रकृति के साथ रहने के कारण उनसे जुड़े हुए हैं। इसलिए इनका दर्द भी वैसा ही है। उनके जंगल, जमीन एवं राजपाट उनसे छीन लिये गये, उनके इतिहास को दफनाया गया है। अभी भी उनका शोषण एवं अत्याचार हो रहा है। अभी भी उनके साहित्य में वही गम, वही दर्द एवं आक्रोश आता है। 

जैसा कि मैं मराठी वाली हूं। मराठी लोगों का जो साहित्य है, उसमें गोंड भाषियों के जितना दर्द नहीं है और प्रकृति से जो उनका जुड़ाव है, मराठी या अन्य भाषाओं के साहित्य में नहीं है। दमन के खिलाफ जो आक्रोश है और उनका उनसे जो नाता है, वह अन्य भाषा के साहित्य में नजर नहीं आता है। गैर-गोंडी भाषा के साहित्य में साधारण लोग एवं प्रेम कहानियां आदि मिलेंगी। उनका जीवन कैसा होगा, ये सब उनके साहित्य में आता है। लेकिन उनके साहित्य में हमारे साहित्य यानी गोंडी साहित्य जैसा दर्द, प्रकृति का रूप, सौंदर्य, भाषा का सौंदर्य, प्रतिमान, जीवन-व्यवहार का सौंदर्य, पशु-पक्षी, जीव-जंतु, धरती से जुड़ा हुआ प्रेम देखने को नहीं मिलता। उनकी परंपराएं, रूढ़ि, तीज-त्यौहार एवं उनका रूप औरों से बहुत अलग है। हालांकि मराठी व अन्य भाषाओं में भी अच्छा साहित्य आया है। लेकिन फिर भी उनके साहित्य और हमारे साहित्य में बहुत फर्क है। हम अपनी भाषा में इसे अचकनपना बोलते हैं, जैसाकि मैं उस समाज की हूं। मैंने उस समाज में दर्द का जो अनुभव किया है, मैं अपना दर्द उस भाषा में बराबर लिख सकती हूं। दूसरा वाला हमारे बारे में इतना लिख ही नहीं सकता! जैसे कि मेरे पेट में कल से दर्द हो रहा है और आज भी है, वो तो मैं आपको बताऊंगी लेकिन दर्द जो मुझे हो रहा है, उसके बारे में आप कहेंगे– आंटी को दर्द हो रहा है। उस दर्द की जो अनभूति मुझे होती है, उसे मैं या अपने साहित्य में लिखने वाले बराबर लिख सकते हैं। आप नहीं लिख सकेंगे। इसलिए मराठी साहित्य और अन्य साहित्य में या गोंडी साहित्य या आदिवासी साहित्य में यह फर्क है।

गोंड परंपरा में पारीकुपार लिंगो और जंगो का दर्शन सामने आता है। यह दर्शन वहां के साहित्य में कैसे आया है?

मौखिक साहित्य में यह पूरे रूप में है। उनके लोकगीत एवं बहुत सारी कहानियों में मिलता है। उनसे जो त्यौहार, जगह, गांव के नाम जुड़े हैं, पेड़, पशु-पक्षियों के साथ उनका संबंध है, वह ठिकाना भी वहीं है। जैसे कि मैं कचारगढ़ में रहती हूं। लोग कहते हैं– कचारगढ़ की प्राचीन गुफाओं में लिंगो आकर बैठा। वहां तपस्या की। बाद में 37 बच्चों को उन्होंने वहीं बंद कर दिया। फिर उन्हें 12 साल बाद निकाला। उन्हें पूरी शिक्षा-दीक्षा देकर ‘गोया मोरो गीत’ में – गोंडी भाषा का प्रचार करने के लिए, पूरे भारतवर्ष में भेजा गया। उनके मौखिक कहानियों में जो-जो गांव, नदी-नाले, पेड़ और प्रकृति कहानी से जुड़े हैं, वह सभी अभी भी वर्तमान में है। कचारगढ़ के पास ही चांद-सूरज गांव है। यहां जंगो मां का आश्रम है। जम्मू पुरो नाम का गांव अभी भी है। चांद-सूरज गांव के पहाड़ी पर हम गए भी थे। वहां लिंगो बाबा का आश्रम है। 

वर्तमान संदर्भ में या आजादी के पहले से जो जंगल के इलाके हैं, वहां पहले अंग्रेज, ब्राह्मणवादियों का कब्जा था। आज वहां जंगल के लिए, लकड़ियों एवं खनिज के लिए हिंसा होती रहती है। आये दिनों वहां कुछ न कुछ आंदोलन चलते रहते हैं। मैं पूरे गोंडवाना प्रदेश की बात कर रहा हूं। इस तरह के जो आंदोलन होते हैं, इसकी अभिव्यक्ति भी क्या गोंडी साहित्य में होती है?

हां, उसकी अभिव्यक्ति भी गोंडी साहित्य में होती है। जैसा कि गोंडवाना भू-भाग का उल्लेख आता है। गोंडवाना राजपाट में हमारे लोग वहां राज करते थे। उनके इतिहास का उल्लेख भी मिलता है। हमारी अपनी सत्ता थी। हमारा जजमेंट-कानून, न्याय पंचायत, ग्राम पंचायत, ग्राम सभा, उसके मुखिया होते थे। अभी भी उनके पूरे नाम पर, उस दायरे में ग्राम सभा चलती है। प्राचीन परंपरा में जो भी ग्राम सभाएं या गांव का मुखिया, पटेल, भूमका आदि होते थे। वे आज भी हैं।

भूमका किसे कहते हैं?

गांव के देवी-देवताओं की पूजा करने वाले को भूमका बोलते हैं। पूजा को गोंडी में गोंगो बोलते हैं। भूमका पूजा का काम करता है। जैसे खेती का मौसम आया तो धरती की पूजा करनी है। वर्षा आ गयी तो वर्षा आने के दो-चार दिन के बाद हरियाली निकलती है, हरे-हरे घासों की हरियाली की पूजा की जाती है। गांव का कोतवाल सभी लोगों को पुकारता है– आज यहां बैठना है। पूजा के लिए चर्चा करेंगे। सब लोग जाते हैं, वहां बैठते हैं। गांव का भूमका और वहां का पटेल उस पूजा का आयोजन करते हैं। बाद में जब खेतों में अनाज बोना होता है, तो फिर उस वक्त भी पुकारा होता है – सब जनों को अनाज बोने का है। फिर बीजापंडुम करते हैं – गोंडी भाषा में बीज को बीजा और उत्सव-त्यौहार को पंडुम कहते हैं – यानी सभी लोग मिलकर बीज की पूजा करते हैं। 

अन्य आदिवासी भाषायें भी हैं, जैसे हम झारखंड की बात कर लें, वहां संथाली, नागपुरी और कुड़ुख भाषा बोली जाती है। तेलंगाना में भी आदिवासी भाषायें हैं। गोंडी भाषा-साहित्य और अन्य आदिवासी भाषा-साहित्य के बीच आप क्या अंतर पाती हैं?  

नहीं, ज्यादा अंतर उनमें नहीं है, सिर्फ बोली का अंतर है। लेकिन जितने भी ट्राइब (जनजाति) हैं, वे प्रकृति/निसर्ग की पूजा करते हैं। वे पंच तत्व को मानने वाले हैं। वे मूर्तिपूजक नहीं हैं। उनके वहां मातृसत्तात्मक समाज है। धरती को मां बोलते हैं। पशु-पक्षी इनका कुल चिन्ह है। ये सभी गणों में पाया जाता है। सम-विषम यानी गोत्र में जब शादी करना होता है, तो सम-सम भाई होते हैं और विषम गोत्र वाले में शादी-विवाह कर सकते हैं। ये सब भी ट्राइब में देखने को मिलता है। अगर इतिहास में देखें तो प्राचीन काल में मातृसत्तात्मक समाज था। पौराणिक कथाओं में इसका उल्लेख भी है, यहां भी जंगो ताई, कली कंकाली मां हैं। मध्यकाल में जो रानियां-महारानियां थीं, वे सब वीरांगना हो गयीं। बहुत सारी रानियां, जो सक्षम थीं, उन्होंने 15-20 साल तक राज भी किया। वे अपने देश, अपने राज, अपनी धरती तथा अपने लोगों को बचाने के लिए लड़ी भी हैं। वहां हमें ऐसी महिलाएं देखने को मिलती हैं। मातृसत्तात्मक एवं मातृपूजक समाज होने के कारण यहां महिलाओं पर अत्याचार नहीं होता। दहेज प्रथा नहीं है। दहेज के लिए उनको कभी भी जलाते नहीं! अगर उसका पति उसको परेशान करता है तो पंचायत उनकी बात सुनती है। विधवा की उपेक्षा नहीं करते। उसको सम्मान देते हैं। वे लोग उसे विधवा मानते ही नहीं! वे उसे मातृशक्ति कहते हैं – वह कभी भी विधवा नहीं होगी। जब शादी होकर वह आती है तब वहां के लोग उसे कुल की वधु बोलते हैं। वह आदमी की औरत होकर नहीं आयी, ऐसा नहीं कहते। ऐसा सभी आदिवासी समाज में है। वह समाज विधवा बाई की दूसरी शादी भी करा देता है। यदि उसकी इच्छा होगी तो वह बोल देगी कि मुझे यह आदमी पसंद है, तो उसके साथ उसकी शादी सब जन/समाज और घर वाले मिलकर कर देते हैं। विधवा बाई का पूजा में या शादी-विवाह में बड़ा मान होता है। बुढ़िया माता हल्दी लगाते वक्त उनके पास बैठती हैं, नौरी-नौरा (दुल्हा-दुल्हन) का पूरा मान रहता है। 

वर्तमान में गोंडी भाषा के मानकीकरण का प्रयास किया जा रहा है। उस प्रक्रिया को आप किस रूप में देखती हैं? 

मानकीकरण करने के बहुत से कारण हैं। सुन्हेर सिंह ताराम जी हमेशा बोलते थे– “अभी तक हमारी गोंडी भाषा को आठवीं अनुसूची में मान्यता नहीं मिली है। शासन के तरफ से यह बात आती थी– “उनका कोई लिखित साहित्य एवं दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। उन्होंने क्या-क्या लिखा है, कितनी किताबें लिखी हैं, कुछ भी नहीं लिखा है! तो आप कैसे बोलते हैं कि ये हमारी भाषा है। फिर हम कैसे मान्यता देंगे?” यह एक बात हो गयी और दूसरी बात यह कि जब गोंडवाना भू-भाग के टुकड़े-टुकड़े होकर नये बने तब पूरे भारत में जितने भी गोंड समुदाय के लोग थे, वे गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्रपदेश, कर्नाटक में पूरा बिखर गये। बाकी जगह जो एक भू-भाग में रहने वाले थे, वहां गोंड लोगों की भाषानुसार राज्य की अलग-अलग व्यवस्था हो गयी। उन्हें बांट दिया गया। बांटने से क्या हो गया? कुछ लोग आंध्र में गये, उधर आंध्र की तेलुगु भाषा है, तो तेलुगु भाषा का उन पर ऐसा प्रभाव हो गया कि वे तेलुगु के बहुत सारे शब्द गोंडी में शामिल हो गये। जैसे पालु होता है, जिसे गोंडी में दूध बोलते हैं और तेलुगु में पालु। यानी तेलुगु शब्द गोंडी में आ गए। इस तरह से कई सारे शब्द आपको गोंडी में मिलेंगे। जैसे– इधर हिल्ले बोलते हैं, हिल्ले मतलब नहीं; उधर सिल्ले बोलते हैं। इससे शब्दों में थोड़ा-थोड़ा फर्क आ गया। इस तरह से गुजरात में गये तो गुजराती का प्रभाव हो गया, कर्नाटक वाले गये तो कन्नड़ भाषा का प्रभाव हो गया, मध्य प्रदेश में गये तो हिन्दी का प्रभाव आ गया, छत्तीसगढ़ में गये तो छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रभाव आ गया, हमारे महाराष्ट्र में आये तो मराठी भाषा का प्रभाव आ गया। इसलिए गोंडी की जो मूल भाषा थी, उसमें अन्य भाषा के शब्द घुस गये। इससे पता नहीं लगता था कि हिल्ले सही है या सिल्ले। एक बोलता था– हिल्ले, दूसरा बोलता था– सिल्ले। हिल्ले वाला बोलता कि इसका मतलब क्या होता है? वो बोलता कि ‘नहीं’ होता है, तब सिल्ले वाला बोलता कि इसका भी मतलब ‘नहीं’ होता। जब इन शब्दों का मानकीकरण किया गया, इससे एक शब्द के बहुत सारे पर्यायी शब्द हो गये। उसमें जो मुख्य शब्द पहले आएगा, उसी शब्द पर वाक्य निर्भर करेगा। इस तरह से बहुत सारे शब्दों का मानकीकरण हो गया। 

मानकीकरण होने से अलग-अलग राज्यों में दूसरी भाषा के प्रभाव से जो शब्द बने थे, जिससे मिलकर मूल भाषा बनी थी, वे गोंडी में आ गये। इस विषय पर चार साल तक कार्यशालाएं आयोजित की गयी, जिसमें आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक समेत 10-12 राज्यों के गोंडी भाषी शामिल हुए थे। इससे सभी के ध्यान में यह बात आ गई। मानकीकरण से पक्का फायदा यह हुआ कि जो मूल शब्द गुम हो गये थे या दूसरे शब्द का प्रयोग करते थे, वह न करते हुए उन शब्दों को गोंडी भाषा में वापस ले आया गया। अभी सब जगहों में एक ही शब्द का उपयोग करना अच्छा रहेगा। इससे हमारी भाषा और ज्यादा शुद्ध हुई एवं भाषा का जो बदला हुआ रूप था, वह अपने मूल रूप में आ गई। इस तरह मानकीकरण के कारण हमारी भाषा को बहुत मदद मिली है।  

गोंडी साहित्य के विस्तार एवं विकास के लिए किस तरह के साहित्य रचे जाए, इसको लेकर आप क्या सोचती हैं? फिर यह भी कि क्या हिंदी के साथ गोंडी भाषा को संबंध बनाना चाहिए ताकि विचारों का लेन-देन हो एवं इसका विस्तार हो?

हां, आपकी बात बराबर सही है, ऐसा होना चाहिए। गोंडी भाषा या अन्य आदिवासी भाषाओं में तो आप लिखेंगे! लेकिन इससे बात सीमित हो जाएगी। गोंडी बोलने वाले गोंडी भाषा में ही समझेंगे। यदि उसका अनुवाद हिंदी, इंग्लिश या अन्य भाषा में कर दिया जाए तो गोंडी भाषा का रूप, सौंदर्य, भाषा की विविधता, उसका व्याकरण एवं उसकी वैभवता क्या है? अन्य लोग भी देखकर समझ पायेंगे– गोंडी भाषा तो इतनी सुंदर है! इससे उसका मूल सौंदर्य और भी ज्यादा निखर जाएगा। इसलिए गोंडी का अन्य भाषा के साथ संबंध रखना या अनुवाद करना बहुत जरूरी है। 

(संपादन : इमामुद्दीन/अनिल)


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