जाबिर हुसेन : जमीन से जुड़े विमर्शकार

बिहार की राजनीति और साहित्य से जाबिर हुसेन का रिश्ता वर्षों पुराना है। ऐतिहासिक बिहार आंदोलन में उन्होंने भूमिगत रहकर पत्रकारिता की। अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे। कर्पूरी ठाकुर मंत्रीमंडल में स्वास्थ्य मंत्री रहे। उनके बारे में बता रहे हैं युवा साहित्यकार अरुण नारायण

बीते 5 जून, 2021 को जाबिर हुसेन का जन्मदिन था। उन्हें बधाई देने की कल्पना मात्र से सिहरन हो आई। पत्नी, भाई और साले के निधन से उनके परिवार पर दुखों का जो पहाड़ टूटा है, ऐसे में जन्मदिन का हर्ष व्यक्त किया भी नहीं जा सकता, लेकिन ऐसे हालात में उनके दुखों का साझीदार तो हुआ ही जा सकता है। देखते-देखते 76वें साल में वे प्रवेश कर गए लेकिन किसी लघु पत्रिका के न तो उनपर कोई अंक निकले, न उनके योगदान को लेकर एकाध कोई लेख ही। उनके जैसी शख्सियतों के साथ इस तरह की उपेक्षा हिंदी समाज में पहली बार बरती गई हो ऐसी बात नहीं, यह बर्ताव तथाकथित हिंदी समाज की प्रगतिशील धारा द्वारा हर दौर में सायास बरती जाती रही है। इसका मूल कारण इन जगहों पर काबिज बर्चस्व प्राप्त जातियों का जातिवादी प्रभुत्व रहा है जो इस तरह के किसी भी बदलाव के वाहक रहे लोगों की उपेक्षा को अंजाम देती रही है। ऐसे में यह सहज ही समझा जा सकता है कि जो व्यक्ति राजनीति से साहित्य तक की मुख्यधारा में अव्वल दर्जे की जन पक्षधर भूमिकाओं में रहा उसकी उपेक्षा क्यों की गई। यह हिंदी की घोर यथास्थितिवादी स्थितियों की ओर संकेत करनेवाली घटना है। 

बिहार की राजनीति और साहित्य से जाबिर हुसेन का रिश्ता वर्षों पुराना है। ऐतिहासिक बिहार आंदोलन में उन्होंने भूमिगत रहकर पत्रकारिता की। अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे। कर्पूरी ठाकुर मंत्रीमंडल में स्वास्थ्य मंत्री रहे। अल्पसंख्यक आयोग को वैधानिक दर्जा दिलाया। बिहार विधान परिषद् के दो अवधि तक सभापति रहे और 2006 में राज्यसभा के सदस्य बने। इन संस्थाओं में अपनी उपस्थिति से उन्होंने उसकी गरिमा बढ़ाई। एक जनपक्षधर नेता और लेखक का जो जरूरी और आवश्यक कार्यभार होना चाहिए, वह उन्होंने अपने राजनीतिक और लेखकीय जीवन में संभव कर दिखाया। 

जीवन यात्रा 

जाबिर हुसेन का जन्म 5 जून, 1945 को गया शहर के करीमगंज मुहल्ले में हुआ। इनकी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा चाईबासा, खूटी (रांची) और सासाराम से हुई। बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से इन्होंने अंग्रेजी में बी.ए. और एम.ए. की शिक्षा पाई। कॉलेज की सावधिक परीक्षाओं में उन्होंने अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू में हमेशा अधिकतम अंक हासिल किया। एम.ए. के बाद वे आर.डी.एंड.डी.जे. कॉलेज, मुंगेर में अंग्रेजी के प्राध्यापक हो गए। उनमें लिखने और सामाजिक राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहने की अभिरुचि छात्र जीवन से ही थी। तब वे छात्र जीवन में ही थे जब बीड़ी मजदूरों और कामगारों पर लिखी उनकी रपटें और कविताएं सज्जाद जहीर द्वारा संपादित मशहूर रिसालों में छपने लगी थीं। 

’बिहार आंदोलन’ में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। आपातकाल में ‘मीसा’ के तहत नजरबंद हुए और विश्वविद्यालय सेवा से निलंबन तक का दंश झेला। बाद में वे पटना के कॉलेज ऑफ कॉमर्स में अंग्रेजी के प्रोफेसर बने। 

राजनीतिक यात्रा

बिहार में राजनतिक परिवर्तन के दो बड़े सूत्रधार कर्पूरी ठाकुर और लालू प्रसाद की सरकार में वे शामिल रहे और वहां अपनी उपस्थिति से राजनीति में व्याप्त कुलीनता और यथास्थ्तिि की वाहक बनी अभिजन राजनीति को जनता के निकष पर उतारने का हर संभव प्रयास किया। 1977 में वे जनता पार्टी के टिकट पर मुंगेर विधान सभा क्षेत्र से सर्वाधिक मतों से निर्वाचित हुए और 1977 से 1979 तक वे कर्पूरी ठाकुर के मुख्यमंत्रीत्व काल में स्वास्थ्य मंत्री रहे। इस पद पर रहते हुए उन्होंने बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा का विस्तार किया और देशी चिकित्सा के विकास पर विशेष बल दिया। अक्टूबर 1990 से मार्च 1995 तक वे बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष रहे। इस अवधि में उन्होंने राज्य के विभिन्न धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यक जातियों की समस्याओं पर गहरा चिंतन मनन किया और उनके निदान के लिए व्यावहारिक अनुशंसाएं कीं। उनके ही प्रयत्नों से राज्य में पहली बार अल्पसंख्यक कल्याण विभाग का गठन किया गया। बांग्ला शरणार्थियों, दंगा प्रभावित परिवारों, बंधुआ मजदूरों एवं बाल श्रमिकों की समस्या के निदान के लिए की गई उनकी कोशिशें उन्हें जनता के एक विश्वस्त सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में खड़ा करती हैं।

साहित्यकार व राजनीतिज्ञ जाबिर हुसेन

वहीं पुलिस-सामंत गठजोड़ के खिलाफ ‘जन संघर्ष समिति’ की मार्फत उन्होंने बिहार के ग्रामीण इलाकों की पदयात्राएं कीं। उनकी कथा डायरियों में ये अनुभव बड़े तल्ख ढंग से अभिव्यक्त हुए हैं। एकता मंच, इंसानी एकता मुहिम और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) सरीखे संगठनों के माध्यम से उन्होंने राज्य में सांप्रदायिक तथा सामंती ताकतों के खिलाफ व्यवस्थित जन-कार्रवाई का भी नेतृत्व किया।

जून 1994 में वे राज्यपाल द्वारा बिहार विधान परिषद् के सदस्य मनोनीत किए गए। 5 अप्रैल, 1995 को वे बिहार विधान परिषद के कार्यकारी सभापति नियुक्त हुए। 26 जुलाई, 1996 को वे उक्त संस्थान के निर्विरोध सभापति निर्वाचित हुए। इस पद पर वे दो अवधि तक आसीन रहे। इस अवधि में उन्होंने बिहार विधान परिषद् को अपने कार्य कौशल से एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया। सभापति की हैसियत से उन्होंने संसदीय राजनीति में कई अनछुए विषयों पर व्यापक चर्चाएं चलायीं। बिहार विधान परिषद् के मंच से उन्होंने कई महत्वपूर्ण संसदीय, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक विषयों पर लोकतांत्रिक संवाद की परंपरा विकसित की। उन्होंने अविभाजित बिहार की कई ज्वलंत समस्याओं यथा झरिया भू-धसान, जादूगोड़ा रेडिएशन प्रभाव, बाल श्रमिक, जन साक्षरता, अनिवार्य शिक्षा, बाल अधिकार एवं बिहार में नदी पानी के सवाल को लेकर व्यापक विचार-विमर्श चलाया। उन्होंने विधान परिषद् में हिंदी और उर्दू प्रकाशन विभाग की स्थापना करके परिषद् की वर्षों की सड़ रही कार्यवाहियों को मुद्रित करवाया। 

साहित्य से राजनीति में आनेवाले लेखकों की बिहार में एक लंबी और समृद्ध परंपरा रही है। बुद्धिनाथ झा कैरव, कामता प्रसाद सिंह काम, दिनकर, बेनीपुरी, लक्ष्मी नारायण सुधांशु, मोहनलाल महतो वियोगी, पोद्दार रामावतार अरुण, शंकर दयाल सिंह से होते हुए यह परंपरा डाॅ. रामवचन राय और प्रेमकुमार मणि तक हमारे सामने है। इन सब में राजनीतिक हस्तक्षेप से लेकर साहित्यिक हस्तक्षेप में जो जनपक्षरता, प्रतिबद्धता जाबिर हुसेन की रही है, वह ऊंचाई इनमें शायद ही कोई छू पाएं। उन्होंने विधान परिषद के सभापति के रूप में जिस तरह की कार्य प्रणाली विकसित की, वह किसी भी राज्य के उच्च सदन के लिए नजीर हो सकती है। चाहे परिषद की वर्षों से धूल धूसरित पड़ी कार्यवाही हो, या वहां की वर्षों यथास्थितिवाद की भेंट चढ़ी काम की संस्कृति– इन सब को उन्होंने अपने कार्यकाल में कार्य संस्कृति का पर्याय बना दिया। उच्च सदन को अपने दौर के हर तरह के बौद्धिक विचारों का केंद्र बना दिया। अपने दौर के शायद ही कोई राजनीतिक, साहित्यिक, पर्यावरणविद् और नागरिक समाज को लेकर सजग रहनेवाले लोग अछूते रहे हों जिनका व्याख्यान जाबिर साहब के दौर में परिषद में न हुआ हो। उनके दौर की कमिटियां, उस दौर की सत्र की कार्यवाही हर चीज का एक मतलब था। लेकिन बिहार के अभिजन लेखक पत्रकारों ने जंगलराज के शोर में उनके सब किये धरे पर पानी फेर दिया। आनेवाली पीढ़ियां जब इन उपलब्धियों की समीक्षा करेंगी तो इन्हें कभी माफ नहीं करेंगी। उन्होंने अपने संसदीय जीवन में धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की हिमायत की और सदन में अपने सशक्त हस्तक्षेप से उसे हमेशा आम आदमी के हितों के अनुकूल बनाने की कोशिश की। 

साहित्यिक यात्रा

हिंदी और उर्दू दोनों ही भाषाओं की पत्रकारिता में किया गया उनका काम काफी महत्वपूर्ण रहा है। हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी– इन तीनों ही भाषाओं पर उनका समान अधिकार है। वे हिंदी उर्दू में समान रूप से लिखते रहे हैं। उर्दू में अपने सर्जनात्मक लेखन के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी का सम्मान मिला। हिंदी की लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं छपी हैं। उन्होंने कहानी, कविता, उपन्यास और शोध माध्यम में भी काम किया है। हिंदी में प्रकाशित उनकी महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं : ‘आलोम लाजावा’ ‘डोला बीबी का मजार’ (कहानी संग्रह), ‘एक नदी रेत भरी’, ‘रेत रेत लहू’, ‘आईना किस काम का’, ‘दो चेहरे वाली एक नदी’, ‘हिकायत-ए-शब’, ‘रेत पर गिरता है ओस’, ‘उदास कैनवस’, ‘मेघ को पानी’, ‘आधे चांद का नौहा’, ‘ओक में बूंदें’, ‘कातर आंखों ने देखा’ (कविता संग्रह), ‘ये शहर लगै मोहे बन’ (उपन्यास), ‘ध्वनिमत काफी नहीं है’, ‘अतीत का चेहरा’, ‘जो आगे हैं’ (डायरी), ‘लोगां’ (संस्मरण)  और ‘बिहार की पिछड़ी मुस्लिम आबादियां’ (विश्लेषण)। हिंदी में उनके लेखन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है उनका डायरी लेखन। मध्य बिहार और टाल क्षेत्र के रक्तरंजित यथार्थ, वहां के गांवों के सामंती उत्पीड़न को उनकी डायरियां दर्ज करती हैं। वे हमें बेचैन करती हैं। उसमें पुलिस और सामंती गठजोड़ के अत्याचारों का जघन्यतम रूप पेश किया है। उन्होंने आजादी के आंदोलन में शामिल रहे अनेक बहुजन नायकों को जिन्हें पूरी तरह भूला दिया गया था चर्चाओं के केंद्र में लाया। खासकर बतख मियां और पीर अली खां जैसे नायक उन्हीं के लेखन के बाद व्यापक चर्चाओं के केंद्र में आये। हिंदी में ‘साक्ष्य’ और संवाद’ जैसी पत्रिका उनके संपादन में लगभग एक दशक तक लगातार निकलती रही। इन पत्रिकाओं के माध्यम से अपने समय समाज के जिन व्यापक सवालों से उन्होंने मुठभेड़ किया है, उसका मूल्यांकन होना अभी शेष है। उनके द्वारा संपादित ‘साक्ष्य’ अपने विषय केंद्रित विशेषांकों के कारण हिंदी पाठकों के बीच लोकप्रिय बेहद लोकप्रिय साबित हुई। उन्होंने साक्ष्य के डेढ़ दर्जन से ज्यादा अंक निकाले और सब के सब अलग-अलग विशेषाक के रूप में। उन्होंने बिहार विधान परिषद के बाद ‘दोआबा’ नामक पत्रिका की शुरूआत की, जिसके अबतक 37 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। इस पत्रिका के माध्यम से भी उन्होंने पिछले डेढ़ दशकों से हिंदी साहित्य के व्यापक सवालों को अपने तरीके से संबोधित किया है। उर्दू मरकज की साहित्यिक पत्रिका ’तर्जुमान’ और ’उर्दूनामा’ के संपादक के रूप में उर्दू साहित्य में भी वे खासा लोकप्रिय रहे हैं। ‘दस्तावेज’ और ‘खबरनामा’ पत्रिका के संपादक के रूप में उन्होंने उर्दू समाज में खासी लोकप्रियता अर्जित की। इस भाषा में उन्होंने चालीस से भी अधिक दुर्लभ ग्रंथों का संपादन, पाठ निर्धारण एवं प्रकाशन किया है। अंग्रेजी में भी उन्होंने मौलिक सृजनात्मक लेखन किया है। उन्होंने हिन्दी और उर्दू की प्रगति के लिए विधान परिषद के माध्यम से जो कारगर हस्तक्षेप किया है, वह स्थाई महत्व का है। फणीश्वरनाथ रेणु के नाम पर पटना में जिस हिन्दी भवन को उन्होंने मूर्त किया, वह हिंदी समाज को उनकी अनुपम देन कही जाएगी। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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