सुजाता पारमीता की कहानी, उनकी बेटी की ज़ुबानी

सुजाता पारमीता ने अपने अधिकारों के लिए अपने घर के अंदर संघर्ष किया और समाज के दमित वर्गों की लड़ाई भी लड़ी। उनके अनेक पहलों में शामिल थी ‘आह्वान’ रंग समूह की स्थापना, जिसे उन्होंने दिल्ली में सिक्ख-विरोधी दंगों की पृष्ठभूमि में गठित किया था, बता रहीं हैं उनकी पुत्री जुन्हाई सिंह

मेरी मां सुजाता पारमीता सासाराम, बिहार के डी.के. बैसंत्री और नागपुर, महाराष्ट्र की कौशल्या बैसंत्री की पुत्री थीं। मेरे नाना डी.के. बैसंत्री सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पत्र सूचना कार्यालय में उप प्रमुख सूचना अधिकारी थे और मेरी नानी, कौशल्या बैसंत्री, महिला अधिकार कार्यकर्ता और जानीमानी लेखिका थीं। मेरी नानी बौद्ध थीं और इसलिए उन्होंने मेरी मां का नाम सुजाता रखा था। मेरी मां उनके माता-पिता की चौथी संतान थीं। तीन लड़कों के बाद मेरी मां का जन्म हुआ था। एक पड़ोसी ने मेरी नानी को कह दिया कि तीन लड़कों के बाद लड़की का जन्म अपशकुन होता है। कुछ ही दिनों बाद मेरी नानी का सबसे बड़ा लड़का काल के गाल में समा गया। मेरी नानी अपने पहले बच्चे की मौत को कभी स्वीकार न कर सकीं। यहीं से मेरी मां की यातना से भरी यात्रा की शुरुआत हुई। मेरी नानी आजीवन अपने बच्चे की मौत के लिए मेरी मां को ज़िम्मेदार ठहराती रहीं।

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