जाति व्यवस्था को जानने के लिए भू-संबंधों की सही समझ जरूरी है – विलास सोनवणे

प्रसिद्ध सत्यशोधक-मार्क्सवादी विचारक विलास सोनवणे का निधन बीते 4 अगस्त, 2021 को हो गया। हम उनका एक संबोधन प्रकाशित कर रहे हैं जो उन्होंने जनवादी लेखक संघ (जलेस) द्वारा दिनांक 2-4 अक्टूबर, 2015 को ‘आंबेडकरवाद और मार्क्सवाद : पारस्परिकता के धरातल’ विषय पर बांदा में एक तीन दिवसीय आयोजित कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा था।

प्रसिद्ध सत्यशोधक-मार्क्सवादी विचारक विलास सोनवणे का निधन बीते 4 अगस्त, 2021 को हो गया। हम उनका एक संबोधन प्रकाशित कर रहे हैं, जो उन्होंने जनवादी लेखक संघ (जलेस) द्वारा दिनांक 2-4 अक्टूबर, 2015 को ‘आंबेडकरवाद और मार्क्सवाद : पारस्परिकता के धरातल’ विषय पर बांदा, उत्तर प्रदेश में एक तीन दिवसीय आयोजित कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा था। इसमें 4 अक्टूबर, 2015 को ‘जाति उन्मूलन और जाति आधारित राजनीति’ विषय पर विलास जी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत भारतीय इतिहास के बारे में मार्क्सवादी विद्वानों की समझ पर सवाल उठाते हुए की। उन्होंने कहा कि जाति को समझने के बाद ही उसके उन्मूलन के बारे में सार्थक ढंग से सोचा जा सकता है। उनके इस संबोधन को प्रस्तुत कर रहे हैं प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी  


आंबेडकरवाद और मार्क्सवाद : पारस्परिकता के धरातल

  • विलास सोनवणे

कॉमरेड डांगे की पहली किताब ‘फ्रॉम प्रिमिटिव कम्युनिज्म टू स्लेवरी’ से ही भ्रांति की बुनियाद पड़ती है। इसमें जाति को अधिरचना के रूप में देखा गया है। वामपंथ के सभी घटकों और दलों– सीपीएम, सीपीआइ, एमएल, माओवादी में इस मुद्दे पर मतैक्य है। तथ्य यह है कि भारत में अंग्रेजों के आने से पहले भूमि पर स्थाई स्वामित्व था ही नहीं! परमानेंट लैंड सेटलमेंट अंग्रेजों की देन है। मराठी और फारसी दस्तावेजों के आधार पर लिखी गई फूको जोआ की किताब ‘मेडिवल डक्कन’ देखनी चाहिए। यह डांगे के फ्रेम के अंदर की किताब नहीं है। असली बात यह है कि जब तक आप भू-संबंधों को नहीं समझते तब तक जाति व्यवस्था को नहीं समझ सकते। महाराष्ट्र में वतनदारी प्रथा थी। जमीन वतनदारों को मिली। दक्कन में नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी आदि नदियों के मैदान हैं। उत्तर भारत में गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, सतलज आदि नदियों के। अब गंगा ब्रह्मपुत्र आदि नदियों के बड़े मैदान हैं तो यहाँ बड़े जानवर चर सकते हैं, पाले जा सकते हैं। दक्कन में छोटे मैदान हैं तो वहां भेड़ें ही चर सकती हैं। लंबी घास वाले इलाके में यादव हैं तो छोटी घास में गड़ेरिया। यह जातियों का भौतिक आधार है। कम्युनिस्ट पार्टियों को मैटेरियल बेस की समझ नहीं है। उनकी उत्पादन व्यवस्था की समझ यूरोसेंट्रिक है। यूरोप-उन्मुखी दृष्टि से भारतीय वास्तविकता नहीं समझी जा सकती।

विनय पिटक में ‘वेतन’ शब्द आता है। सुत्त पिटक में भी वेतन शब्द है। दिग्घ निकाय में भी यह शब्द मिलता है। अगर यहाँ ढाई हज़ार साल पहले वेतन की संकल्पना थी और उसे जाने बगैर यदि सिद्धांत गढ़ा जाएगा तो उसमें खोट होगा ही। समझ में यह खोट खीझ पैदा करती है। यह कार्यशाला इसी खीझ के कारण है। इसके पीछे एक अपराध बोध है। ‘काव्यात्मक न्याय’– पोयटिक जस्टिस देखिए कि जाति का सवाल उठाने के कारण मुझे सीपीएम से निकाला गया था। कामरेड शरद पाटील को भी। वे ‘सोशल साइंटिस्ट’ में इस विषय पर लेखमाला दे रहे थे। उनका चौथा लेख नहीं छपा। सवाल उठाने का दंड मिला। प्रकाश करात और सुभाषिणी अली इसके साक्षी हैं। 

विलास सोनवणे (1 मई, 1952 – 4 अगस्त, 2021)

किसानी की प्रक्रिया समझिए। जातियों की एक शृंखला है– लोहार, सुतार, चमार, जाटव, मातंग। इसमें छठी जाति किसान है। चमड़ा कमाने (प्रोसेस करने) वाले एक चमार होते हैं, उससे वस्तु बनाने वाले दूसरे, अर्थात् जाटव। जब तक चमड़ा कसा नहीं जाएगा तब तक हल बनेगा नहीं। किर्लोस्कर ने लोहे के हल (फाल) बनाए। उससे पहले लकड़ी के हल चलते थे। पानी की उपलब्धता या स्रोत के हिसाब से किसान भी अलग-अलग हैं। माली, कुर्मी को पानी की प्राप्ति सुनिश्चित है। गढ़वी बरसाती पानी पर निर्भर होते हैं। रजनी पामदत्त की किताब ‘इंडिया टुडे’ पॉलिटिकल इकॉनमी, इतिहास की विवेचना करती है। यह डांगे की किताब का आधार है। इस किताब में खेती की उक्त प्रक्रिया का जिक्र तक नहीं है। ‘डिवीज़न ऑफ़ लेबर’ पर कार्ल मार्क्स ने ‘दास कैपिटल’ में इस पर 3-4 पन्ने खर्च किए हैं। वे बताते हैं कि यूरोप और एशिया के उत्पादन संबंध भिन्न-भिन्न हैं। इसे मार्क्सवादियों ने नकार दिया। यह मानकर कि यह सेकंडरी इमैजिनेशन है। रजनी पामदत्त, जो कभी भारत आए ही नहीं, उनका लिखा फर्स्ट हैंड है! 

भारत की मार्क्सवादी पार्टियों पर किसका कब्ज़ा रहता आया है? ब्राह्मण, कायस्थ, सारस्वत का। महाराष्ट्र की स्टेट कमेटी में 50 लोग थे। इनमें 24 इसी जाति के थे। स्टडी क्लास लेने का अधिकार सिर्फ उनका होता था। मनुष्य के ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया प्रकृति के नियमों से जूझते हुए आगे बढ़ती है। पुष्यमित्र शुंग के समय जब बौद्धों को भगा दिया गया तो ब्राह्मणों को लगा कि उन्होंने अंतिम ज्ञान अर्जित कर लिया है। सातवीं सदी के बाद रटने की परंपरा बनी। यह अब तक चल रही है। जिन्होंने वेद रटे उन्होंने मार्क्स को भी रट लिया। अनुभवसिद्ध ज्ञान पर रट्टू ज्ञान भारी पड़ा। ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया रुक गई। अगर प्रकाश करात को अंग्रेजी नहीं आती तो क्या वे सीपीएम के महासचिव बन सकते थे? सभी कम्युनिस्ट खेमों पर यह बात लागू होती है। ब्राह्मणवादी मार्क्सवादियों के साथ दलित कैसे जुड़ सकेंगे? क्या आप कठोर आत्मालोचना के लिए तैयार हैं? सनातनी हिंदू और उदार मतवादी हिंदू-हिन्दुओं के ये दो प्रकार हैं। सारा प्रोग्रेसिव खेमा लिबरल हिंदू खेमा है। 

यह कहना कि जाति हिंदू व्यवस्था की देन है, एक मुस्लिम विरोधी बात है। जाति सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक संरचना है। उसका धर्म से क्या लेना-देना? जाति प्रथा को हिंदू धर्म की देन बताना बड़ी भूल है। आंबेडकर ने भी यही भूल की। इस भूल-गलती के साथ आप पारस्परिक धरातल बनाने चले हैं। यह धरातल कैसे बनेगा? मुसलमान सिद्धांत में जाति भले न मानते हों, व्यवहार में जाति है। भरपूर। सर सैयद अहमद ने कहा, मैं यह (अलीगढ़ मुस्लिम) विश्वविद्यालय छोटी जातियों के लिए नहीं, राजा जाति के लिए बनवा रहा हूं। कम्युनिस्ट फोल्ड में आने वाले प्रायः सभी ब्राह्मण-मुस्लिम थे। 

बाबरी मस्जिद के गिरने तक यूपी और बिहार के मुस्लिम इलाकों से कम्युनिस्ट जीतते थे। बाद में क्या हुआ आप जानते हैं। टेक्सटाइल इंडस्ट्री थी। कई शहरों में। वहां यूनियनें थीं। इंडस्ट्री टूटी। कम्युनिस्ट अंसारी, कम्युनिस्ट यादव, कम्युनिस्ट कुर्मी अलग हो गए। ‘मुझे क्या दिया?’ ऐसा प्रश्न करने लगे। यह चिंता का और चिंतन का विषय है कि कम्युनिस्ट होने के बाद कोई यादव, कोई कुर्मी कैसे बन जाता है! जाति प्रथा हिंदू धर्म का हिस्सा है, यह समझ एंटी मुस्लिम है। 1991 में जब मैंने मुस्लिम मराठी लेखकों को इकट्ठा करना शुरू किया तो पाया कि वहां भीतरी जातिवाद कितना है। उनमें इंटरकास्ट मैरिज नहीं होती। इसी तरह केरल के थंगल ईसाई और सीरियन ईसाई अपने को ब्राह्मण मानते हैं और दूसरी जातियों से दूरी बना कर रखते हैं।

कम्युनिस्ट धर्म को क्या मानते हैं? विचारधारा या सामाजिक संरचना? अभी इसे लेकर भ्रम की स्थिति है। धर्म एक विचारधारा है। पूंजीवाद के उदय से पहले। पूंजीवाद ने इसका इस्तेमाल किया। तेल की खोज के बाद एशिया में जो बदलाव हुए हैं, उसे ध्यान में रखना चाहिए। जाति व्यवस्था को पहला धक्का प्लासी के युद्ध (1757) से लगा। 1818 तक अंग्रेजों का सारे भारत पर कब्ज़ा हो चुका था। उत्पादन के केंद्र में अब तक मनुष्य था। अंग्रेजों ने प्रकृति-मानव केंद्रित व्यवस्था तोड़ी और बाजार को केंद्र में लाने का काम किया। परस्पर संबंधों के आधार पर बनी व्यवस्था टूटनी प्रारंभ हो गई। जहाँ पूँजी पहुंची वहां बाजार केंद्रित व्यवस्था आ गई। इससे मनुष्य के अंदर बेगानेपन की भावना आ गई। मार्क्स ने इसे सिद्धांत का रूप दिया। भारत में इस बेगानेपन को समझने वाला पहला व्यक्ति ज्योतिबा फुले था। ‘किसान का कोड़ा’ और ‘गुलामगिरी’ में यह दर्ज है। बेगानेपन और वर्ग निर्माण में गहरा रिश्ता है। अब तक जो वतनदार थे वे वेतनदार होने शुरू हो गए। साहूकार नाम का वर्ग पैदा हुआ। परमानेंट सेटलमेंट एक्ट से पहली बार जमीन निजी संपत्ति हो गई। फुले ने जाति प्रथा के खिलाफ लड़ाई की। डेक्कन लॉर्ड्स के नाम से नया विद्रोह हुआ। इसमें साहूकारों के बही खाते जलाने का अभियान छेड़ा गया। इस वर्ग संघर्ष को नेतृत्व देने का काम फुले ने किया। इस बात को कोई कम्युनिस्ट याद नहीं करता। फुले ने फार्मूला दिया– त्रिवर्ण विरुद्ध स्त्री शूद्रातिशूद्र। आंबेडकर ने इसे बदल दिया और सवर्ण विरुद्ध अवर्ण कहा। यह सही फार्मुलेशन नहीं है। वास्तव में मार्क्स और फुले को मिलाना आसान है। आंबेडकर को कैसे मिलाएंगे? आंबेडकर का सारा जोर वेलफेयर स्टेट पर है। एक बार कल्याणकारी राज्य ख़त्म तो आंबेडकर भी अप्रासंगिक। आप लोगों का मकसद वेलफेयर स्टेट है क्या?

खेती का संकट और जाति का विद्रोह आपस में जुड़े हुए हैं। हार्दिक पटेल का पाटीदार आंदोलन देख लीजिए। अभी खेती पर जो संकट आया है यह उसी का परिणाम है। हार्दिक का दावा है कि पाटीदारों की संख्या सत्ताईस करोड़ है। इतनी संख्या तो गुजरात राज्य की ही नहीं है! सब पाटीदारों को मिलाकर हार्दिक बोल रहे हैं। इनमें गुजरात, मालवा के पटेल हैं, महाराष्ट्र के कुणबी हैं, यूपी, हरियाणा, पंजाब के जाट-गुज्जर हैं। गन्ना-दूध-कपास यानि नगदी फसल उत्पादक जातियां हैं ये। इन पर संकट है। खेती पर ऐसा ही संकट बारहवीं सदी में आया था। भक्ति आंदोलन के समय आया था। फुले के समय आया था। बुद्ध के समय भी आया यह जब रोहिणी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर शाक्य कोलिय गणों के बीच लड़ाई छिड़ी थी। बुद्ध को अपना घर छोड़ना पड़ा था। फुले के बाद गांधी ने इस संकट को समझा। उन्होंने पहली बार किसानों को इतने बड़े पैमाने पर संगठित किया। फुले ने जिस बेगानेपन पर हाथ रखा था उसे गांधी ने मुद्दा बनाया। पूँजीवाद से आए बेगानेपन से मुठभेड़ की। कम्युनिस्ट उस समय क्या कर रहे थे? वे तब ‘थ्योरी ऑफ़ एलियनेशन’ पढ़ रहे थे। मार्क्सवादी चूक गए। गांधी उनसे आगे निकल गए। गांधी टेक्सटाइल से जुड़ी सारी जातियों को समेटते हैं। आप वेतन पाने वालों को समेटते हैं। बेगानेपन से तो आपको लड़ना था!! विकसित पूंजीवाद ने नारा दिया कि खेती में भविष्य नहीं है। 2013 में भूमि अधिग्रहण बिल बना। जो जमीन पहले आजीविका थी वह अब कमोडिटी हो गई। कमोडिटी होते ही सारी जमीन गुजरात से चली गई। धनंजयराव गाडगिल की किताब ‘बिजनेस कम्युनिटीज इन इंडिया’ देखिए। यह किताब भारत की बनिया जाति पर है। यह संदेश लोगों तक गया कि जब तक आप अपनी जाति को संगठित नहीं करते तब तक सौदा नहीं कर सकते। 1991 के बाद जाति आधारित पार्टियां बनीं। इनका संबंध वैश्वीकरण से है, ‘विकास’ से है। जब तक आप इन जातियों को संगठित नहीं करेंगे, इस स्थिति से नहीं टकराएंगे तब तक कोई रास्ता नहीं मिलेगा।

(प्रस्तुति : प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी, संपादन : नवल/अनिल)


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