स्मृतियों में बने रहेंगे रेणु साहित्य के ‘यायावर’

भारत यायावर सचमुच साहित्यिक यायावर ही थे। एक सत्य अन्वेषी यायावर के रूप में, उन्होंने उन सभी स्थानों का भ्रमण किया, जिसका संबंध रेणु से रहा। मसलन, पटना, वाराणसी, नेपाल, मुंबई, हज़ारीबाग़, पूर्णिया, कटिहार अथवा रेणु का पैतृक गांव औराही हिंगना (जिला अररिया)। स्मरण कर रहे हैं युवा समालोचक कौशल कुमार पटेल

स्मृति शेष

साहित्यकारों की जिजीविषा, साहित्य के सृजन पर ही अवलंबित होती है तथा साहित्य सृजन का ध्येय भी सतत साहित्यिक गतिविधियों में रत रहते हुए निष्काम भाव से समाज का कल्याण करना ही होता है। साहित्यसृजन के इसी परंपरा के पैरोकार रहे समकालीन हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध समालोचक भारत यायावर, जिनका निधन बीते 22 अक्टूबर, 2021 को हो गया। उन्हें फणीश्वरनाथ रेणु के जीवनीकार के रूप में जाना जाता है। साथ ही, रेणु साहित्य के संबंध में उनके विपुल लेखन ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। समसामायिक हिंदी साहित्य में प्रो. भारत यायावर एक प्रसिद्ध नाम है, जिन्होंने अपने जीवन के शुरुआती दौर में काव्य सृजन द्वारा हिंदी साहित्य में पदार्पण किया। उनके द्वारा रचित कुछ प्रमुख काव्य संग्रह हैं– ‘झेलते हुए’ (1980), ‘मै हूँ यहाँ हूँ’ (1983), ‘बेचैनी’ (1990)। कालांतर में प्रो. यायावर का झुकाव काव्य से गद्य विधा की ओर हुआ और वे एकाग्र भाव से आलोचना और संपादन आदि के कार्य में तल्लीन हुए। हालाँकि वर्ष 2004 में उन्होंने ‘हाल-बेहाल’ और 2019 में ‘कविता फिर भी मुस्कुराएगी’ काव्य संग्रह का सृजन किया। लेकिन साहित्य की दुनिया में यायावर जी को ख्याति एवं प्रतिष्ठा वर्ष 1995 में राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक ‘रेणु रचनावली’ के संपादन द्वारा मिली, जो पाठकों के बीच आज भी बेहद लोकप्रिय है। 

पाठकों को बताते चलें कि रेणु रचनावली का अनुबंध 1985 में ही हुआ और 10 वर्षों के परिश्रम से ही यह कार्य संभव हो पाया। 

भारत यायावर स्वयं बताते हैं कि कथा शिल्पी रेणु पर शोध, संपादन एवं आलोचना कर्म की शुरुआत की प्रेरणा उन्हें बाबा नागार्जुन से ही प्राप्त हुई और फिर रेणु साहित्य के अन्वेषण एवं शोध में ऐसा रत हुआ मानो सर पर रेणु का भूत सवार हो गया। बहुतों ने इसकी आलोचना भी की। कुछ सगे-संबंधियों ने रेणु को त्याग कर, मौलिक साहित्य सृजन में प्रवृत होने की सलाह तक दे डाली, लेकिन वे एकाग्र भाव से अपने साहित्य साधना में लीन रहे। बाद में ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनावली’ और ‘नामवर होने का अर्थ’ पुस्तकों का क्रमशः संपादन किया। हालांकि नामवर सिंह और भारत यायावर की नजदीकियों पर कुछ समकालीन आलोचकों ने जातिवादी होने का आरोप भी लगाया और फिर विवादों का सिलसिला भी चल पड़ा। आगे रेणु साहित्य एवं रेणु के जीवन से जुड़े कुछ प्रसंगों को लेकर भी समकालीन साहित्यकारों और आलोचकों से वैचारिक मतभेत सामने उभर कर आए। खासकर कथा शिल्पी रेणु का लतिका जी के साथ विवाह के प्रसंग को लेकर अपने निजी विचार प्रस्तुत करने को लेकर। 

कथा शिल्पी रेणु पर शोध कार्य के निबंधन के समय, महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के एसोसिएट प्रोफेसर राकेश मिश्रा ने मुझे सलाह दिया कि भारत यायवर जी से संपर्क करो और उनसे संपर्क होने के बाद बातचीत का सिलसिला निरंतर जारी रहा और जब कभी दूरभाष पर संवाद कायम होता तो वे अपने साहित्यिक अनुभव, वरिष्ठ साहित्यकारों एवं प्रकाशकों के किस्से, ख्यातिलब्ध पत्रिकाओं के संपादकों के किस्से आदि की चर्चा करते, जिनमें हास्य-विनोद के अलावा व्यंग्य का भी पुट मिला होता था। राजकमल प्रकाशन, वाणी प्रकाशन आदि से लेकर रेणु, नागार्जुन, प्रेमचंद, भुनेश्वर, राजेंद्र यादव, निर्मल वर्मा, तथा सम्पादकों में ‘पहल’ के संपादक ज्ञानरंजन और ‘लहक’ के संपादक निर्भय दिव्यांश आदि के साहित्यिक लेखों की चर्चाएं होती रहती थीं। 

भारत यायावर

भारत यायावर का युवा साहित्यकारों एवं शोधार्थियों से बेहद लगाव रहता था। इनमें रेणु पर शोध कार्य करने वाले अधिक थे कुछ नयी कविता के कवि या पुस्तकों के संपादन में लीन नए संपादक भी थे। प्रसिद्ध कवयित्री अनामिका को साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिलने पर यायावर द्वारा की गयी आलोचना पर एक खास साहित्यिक वर्ग सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ मुखर भी हुआ। कुछ पाठको ने निंदा भी की। परन्तु वे दृढ़ रहे। संत विनोबाभावे विश्वविद्यालय हज़ारीबाग़ में कार्यरत प्रो. भारत यायावर सेवानिवृति से पूर्व कुछ वर्षों से रेणु की जीवनी लिखने में व्यस्त थे, जिसके लिए उन्हें रजा फाउंडेशन द्वारा फैलोशिप भी प्रदान किया गया । यह पुस्तक हाल ही में सेतु प्रकाशन द्वारा दो खंडों में प्रकाशित हुई है। इस कार्य हेतु उन्हें वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी का साथ मिला। जनसुलभ पुस्तकालय द्वारा हाल ही में रेणु जन्मशताब्दी के उपलक्ष्य में एक चर्चा का आयोजन हुआ जिसमें भारत यायावर और रेणु साहित्य से जुड़े कुछ प्रमुख साहित्यकारों ने अपने विचार प्रस्तुत किये। 

भारत यायावर सचमुच साहित्यिक यायावर ही थे। एक सत्य अन्वेषी यायावर के रूप में, उन्होंने उन सभी स्थानों का भ्रमण किया, जिसका संबंध रेणु से रहा। मसलन, पटना, वाराणसी, नेपाल, मुंबई, हज़ारीबाग़, पूर्णिया, कटिहार अथवा रेणु का पैतृक गांव औराही हिंगना (जिला अररिया)। मकसद रहा कि वे तमाम सूचनाएं व सामग्रियां जुटा सकें जो रेणु से संबंधित थे। अभी हाल की उनकी इलाहाबाद और डेहरी-ऑन-सोन (बिहार) की यात्रा इसका उदाहरण है। 

मुझे स्मरण है कि भारत यायावर को सेवानिवृत हुए मात्र 22 दिन ही हुए थे और रेणु की जीवनी के दूसरे भाग के प्रकाशन के लिए दृढ संकल्पित थे। लेकिन काल ने हिंदी साहित्य के यायावर को हम सभी से छीन लिया।

(संपादन : नवल/अनिल)

 

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