वर्ण, धर्म, जाति और सियासत

बाबा नानक की बाणी और समानता का उनका फलसफा गुरु गोविद सिंह के काल में एक समाज में तब्दील हुआ, जिसमें जातिपाति का कोई स्थान नहीं था और जिसमें मर्द और औरत बराबर थे। यह फलसफा सियासत को धर्म का इस्तेमाल करने से रोकता है। परंतु, सिक्ख समुदाय के अन्दर जातियों पर आधारित डेरों का उभारना, पंथ में सियासत की घुसपैठ की ओर इंगित करता है। पढ़ें, रौनकी राम का यह आलेख

[यह लेख इंसान को इंसान ना मानने वाले जातपात के सामाजिक बंधनों के हजारों वर्षों (तीस से ज्यादा सदियों) के इतिहास पर केन्द्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे धर्म ने सियासत का और सियासत ने धर्म का इस्तेमाल किया। पहले वर्ण बने और फिर विभिन्न जातियां बनीं। इसमें तेरह सौ वर्ष लग गए। धर्मशास्त्रों का साफ़ कहना है कि जो भी अपने हाथ से श्रम करता है, वह शूद्र है। जातपात की सामाजिक बुराई आज भी हमारे समाज में मौजूद है]

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में धर्म का अहम स्थान है। धर्म के साथ जाति और सियासत का जुड़ाव इसे समझने में कठिनाई पैदा करता है। असल में जाति और धर्म आपस में इस तरह जुड़े हुए हैं कि सामान्य अर्थ में वे एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं। धर्म का संबंध मनुष्य के जीवन जीने के तरीके से ना जोड़कर उसके सामाजिक स्तर और उसकी दुनियावी हैसियत के साथ जोड़ा जाता है। धर्म और जाति मिल कर सियासत को जिस तरह प्रभावित करते हैं, उसे देखकर यह निर्णय करना मुश्किल हो जाता है कि धर्म और जाति, सियासत का धर्मिकरण / जातिकरण करते हैं या फिर सियासत, धर्म और जाति का राजनीतिकरण करती है। धर्म और जाति के उपासक अपनी अंदरूनी कमजोरियों को अक्सर सियासत के सिर मढ़ते हैं और सियासतदान यह कहते नहीं थकते कि धर्म और जाति एक दानव की तरह उनकी राह में रोड़े अटकाती है। धर्म, जाति और सियासत को अगर-अलग समझने की कोशिश किसी ठोस नतीजे पर पहुँचने में मददगार साबित नहीं होती क्योंकि इन तीनों का आपस में इस तरह घालमेल हो चुका है कि इन्हें अलग-अलग समझने पर इनके असली स्वरूप को हम समझ ही नहीं पाते। (कोठारी 1985)

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