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जातिगत जनगणना पर चुप्पी बीमार होने पर भी डाक्टरी जांच से इंकार के माफिक : ज्यां द्रेज़

भारत को सबसे अधिक असमान वाले देशों में से एक बताने वाली वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब की ताज़ा रपट की पृष्ठभूमि में जानेमाने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज से ईमेल के जरिए किया गया यह साक्षात्कार

वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब, पेरिस ने हाल ही में वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट-2022 का प्रकाशन किया है। इसके निदेशकों में थॉमस पिकेटी सहित अनेक शीर्ष अर्थशास्त्री शामिल हैं। इसने आय और सम्पत्ति वितरण, कुल आय में महिलाओं की हिस्सेदारी और कार्बन फुटप्रिंट के आधार पर भारत में व्याप्त असमानता की चिंतनीय गंभीरता को सामने रखा है। अर्थशास्त्री प्रो. ज्यां द्रेज़, अपनी यात्राओं के ज़रिये भारत के ग्रामीण इलाकों से अच्छी तरह परिचित हैं। उन्होंने भारतीय समाज और यहां के सार्वजनिक संस्थानों की कार्यप्रणाली का व्यापक अध्ययन किया है। संप्रति वे रांची विश्वविद्यालय, रांची में विजिटिंग प्रोफेसर और दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में ऑनररी प्रोफेसर हैं। फारवर्ड प्रेस के साथ एक ईमेल साक्षात्कार में उन्होंने भारत में व्याप्त आर्थिक असमानता के पीछे के सामाजिक यथार्थ पर बात की।   

वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब की रपट के अनुसार, भारत दुनिया के सबसे असमान देशों में से एक है। क्या आप इससे सहमत हैं?

निश्चित रूप से। बल्कि अगर आप आर्थिक असमानताओं के साथ-साथ सामाजिक असमानताओं का भी संज्ञान लें तो भारत शायद दुनिया का सबसे असमान देश होगा। रपट का फोकस संपत्ति और आय की असमानताओं पर है, परन्तु भारत में गंभीर जातिगत और लैंगिक असमानताएं भी हैं। वर्गीय, जातिगत और लैंगिक असमानताएं एक-दूसरे को मजबूती देतीं हैं। इसका नतीजा है एक अत्यंत दमनकारी समाज, जिसकी कोई और मिसाल पूरी दुनिया में मिलना मुश्किल है। 

अगर हम 1995 से लेकर अब तक भारत में संपत्ति के वितरण संबंधित आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि शीर्ष के 10 प्रतिशत लोगों की संपत्ति में तेजी से वृद्धि और नीचे के 50 प्रतिशत की संपत्ति में कमी का सिलसिला 2007 से शुरू हुआ। आपने 2005 में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दिया था। तब क्या आपको ऐसा लग रहा था कि आने वाले वर्षों में सरकारी नीतियों के चलते, संपत्ति के असमान वितरण में तेजी से बढ़ोत्तरी होगी

मुझे नहीं लगता कि आंकड़े इतने सटीक हैं कि हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सकें कि 2007 के आसपास कोई मोड़ आया। हां, परन्तु हम कुछ हद तक विश्वासपूर्वक यह ज़रूर कह सकते हैं कि आर्थिक उदारीकरण के बाद से, आर्थिक असमानता में तेजी से वृद्धि शुरू हुई। सन् 2005 तक यह पूरी तरह साफ़ हो चुका था कि उदारीकरण से आर्थिक असमानता बढी है, परन्तु राष्ट्रीय सलाहकार परिषद से मेरे इस्तीफे का इससे कोई संबंध नहीं था।

वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब की रपट उन सामाजिक असमानताओं की बात ही नहीं करती, जो आर्थिक असमानताओं के कारण और आधार हैं? क्या यह सत्य को अनदेखा करना नहीं है  

देखिये, रपट प्रकट रूप से आर्थिक असमानता के माप-तौल पर आधारित है। रपट के लेखक उस क्षेत्र की बात कर रहे हैं, जिसके वे विशेषज्ञ हैं। यह ठीक है। परन्तु अगर हमें असमानता को उसके सभी आयामों में समझना है तो यह साफ़ है कि हमें रपट के सीमित फोकस से आगे बढ़कर विचार करना होगा और जब हम यह करेंगे तब जाति व्यवस्था एक कारक के रूप में हमारे सामने होगा। 

क्या आपको लगता है कि जाति जनगणना होनी चाहिए ताकि आर्थिक असमानता कम करने के लिए कदम उठाते समय इस बात का ख्याल रखा जा सके कि इस असमानता का एक कारण जाति प्रथा भी है?

मुझे लगता है कि जाति जनगणना से हमें भारतीय समाज में जाति की व्यापक भूमिका को समझने में मदद मिलेगी और इस संंबंध में कुछ करने में भी। उदाहरण के लिए, हमें यह समझ में आएगा कि आज भी सत्ता और प्रभाव वाले पदों और संस्थाओं पर विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के लोगों का कब्ज़ा है। इससे हमें यह भी पता चलेगा कि आरक्षण की नीतियों का प्रभाव पड़ा है या नहीं, और यदि हां तो किस हद तक। जाति जनगणना पर चुप्पी ऐसी ही है, जैसे बीमार होने पर भी डाक्टरी जांच से इंकार करना।

प्रो. ज्यां द्रेज

क्या आपको ऐसा लगता है कि आज के भारत में आर्थिक असमानता, वर्णाश्रम धर्म के सिद्धातों के अनुरूप है? तो क्या इसकी वजह यह कि वर्णाश्रम धर्म के तरफदार आज सत्ता में हैं?

मैं तो यही कहूँगा कि वर्णाश्रम धर्म, गहरी असमानता के प्रति हमें सहिष्णु बनाता है। यह असमानता कई अलग-अलग स्वरूपों में प्रकट होती है। इसमें शामिल हैं– आर्थिक असमानता, पितृसत्तात्मकता और जाति प्रथा। भारत के सभी सत्ताधारी वर्णाश्रम धर्म के पैरोकर नहीं हैं। परन्तु मुझे ऐसा लगता है कि वर्णाश्रम धर्म, वर्तमान सत्ताधारी पार्टी की विचारधारा, हिंदुत्व, का अभिन्न अंग है। गोलवलकर ने साफ़ शब्दों में लिखा था कि वर्ण और आश्रम, समाज के हिन्दू ढांचे की विशेषताएं हैं। हिंदुत्व आन्दोलन के सबसे ताज़ा शुभंकर योगी आदित्यनाथ ने चार साल पहले, एनडीटीवी के साथ एक साक्षात्कार में जाति प्रथा की प्रशंसा की थी। अगर नरमपंथी हिन्दू राष्ट्रवादी, वर्णाश्रम धर्म के विरोध में हैं, तो वे आगे आएं और यह कहें। 

भारत में कुल अर्जित आय में महिलाओं का हिस्सा केवल 18 प्रतिशत है, जो दुनिया के देशों में सबसे कम में से एक और एशिया के औसत से कम है। आंबेडकर ने पितृसत्तात्मकता और जाति के अंतर्संबंध के बारे में जो कहा था, उसके संदर्भ में इसके असमानता पर प्रभाव को आप किस रूप में देखते हैं?

भारत में महिलाओं के दमन का एक प्रमुख कारण है– पुरुषों, विशेषकर उनके पतियों पर उनकी आर्थिक निर्भरता। यह निर्भरता संपत्ति, रोजगार, शिक्षा एवं सामाजिक सहायता तक उनकी पहुंच की कमी में प्रतिबिंबित होती है। यह आश्चर्य का विषय नहीं है कि भारतीय पुरुष महिलाओं को ऐसे काम करने देने के प्रति अनिच्छुक हैं, जिनसे आय का सृजन होता है, क्योंकि इससे महिलाओं को कुछ हद तक आजादी हासिल होगी और उन्हें पुरुषों के अधीन रखना थोड़ा मुश्किल हो जाएगा। जातिप्रथा के प्रभाव के चलते भी पुरुष महिलाओं को अपने अधीन रखना चाहते हैं, विशेषकर विशेषाधिकार प्राप्त जातियों में, क्योंकि स्वतंत्र महिला जाति की शुद्धता और एकता के लिए खतरा बन जाती है। परंतु महिलाओं ने इस स्थिति को बदलने के लिए कमर कस ली है और हम यह आशा कर सकते हैं कि उनका यह मुक्ति संघर्ष भारतीय समाज में सकारात्मक परिवर्तनों का वाहक बनेगा। 

(अनुवादः अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल)  


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लेखक के बारे में

अनिल वर्गीज

अनिल वर्गीज फारवर्ड प्रेस के प्रधान संपादक हैं

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