जननायक कर्पूरी ठाकुर को जैसा मैंने देखा : अब्दुल बारी सिद्दीकी (पहला भाग)

कर्पूरी ठाकुर को आरक्षण विरोधी तब मां-बहन लगाकर गालियां उनके सामने तक दे देते थे, जब वे बिहार के मुख्यमंत्री थे। लेकिन आप आश्चर्य करेंगे कि कर्पूरी ठाकुर प्रतिक्रियावादी नहीं थे और जब कभी हम पूछते तो उनका जवाब यही होता था कि उन्हें गालियां देनेवाले ऊंची जातियों के लोग स्वभाविक तौर पर गालियां दे रहे हैं। स्मरण कर रहे हैं अब्दुल बारी सिद्दीकी

जननायक कर्पूरी ठाकुर (24 जनवरी, 1924 – 17 फरवरी, 1988) पर विशेष

बिहार सरकार के पूर्व मंत्री अब्दुल बारी सिद्दीकी वर्तमान में राजद के वरिष्ठ नेता हैं। वे उन नेताओं में हैं, जो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के बेहद नजदीक रहे। कर्पूरी ठाकुर का जीवन कैसा था और अपने जीवन में उन्होंने किस तरह का उच्च राजनीतिक मानदंड स्थापित किया था, इसे सिद्दीकी जी ने फारवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार से दूरभाष के जरिए विस्तार से बताया है। प्रस्तुत है इस लंबी बातचीत की पहली कड़ी

ऐसे थे जननायक कर्पूरी ठाकुर

  • अब्दुलबारी सिद्दीकी

भारतीय समाज में जातिभेद कोई नई बात नहीं रही है। आज कुछ स्थिति एक हदतक ठीक हुई है। इसके पीछे एक बड़ी वजह है आरक्षण का लागू होना। लेकिन आरक्षण की यह लड़ाई इतनी आसान नहीं थी। उन दिनों जब कर्पूरी ठाकुर ने मुंगेरीलाल कमीशन की अनुशंसाओं को लागू किया था तब तो बिल्कुल भी नहीं। आरक्षण विरोधी कर्पूरी ठाकुर को तब मां-बहन लगाकर गालियां उनके सामने तक दे देते थे, जब वे बिहार के मुख्यमंत्री थे। लेकिन आप आश्चर्य करेंगे कि कर्पूरी ठाकुर प्रतिक्रियावादी नहीं थे और जब कभी हम पूछते तो उनका जवाब यही होता था कि उन्हें गालियां देनेवाले ऊंची जातियों के लोग स्वभाविक तौर पर गालियां दे रहे हैं। हालांकि ऐसी ही गालियां लालू प्रसाद को भी मिलीं जब मंडल कमीशन के तहत ओबीसी आरक्षण को बिहार में लागू किया जा रहा था, लेकिन तब गालियां देनेवालों की इतनी हिम्मत नहीं होती थी। वह गालियां देने से पहले इधर-उधर देख जरूर लेता था कि कोई यादव जाति का आदमी सुन तो नहीं रहा है। कर्पूरी ठाकुर एक कमजोर जाति के थे।

तो ऐसे थे जननायक। अपने धुन के पक्के। कभी भी अपनी प्रतिबद्धताओं से पीछे नहीं हटनेवाले। उनसे मेरा संपर्क तक हुआ जब देश में आपातकाल लागू था और जननायक भूमिगत होकर नेपाल में रह रहे थे। उन दिनों मैं जयप्रकाश नारायण द्वारा गठित छात्र संगठन से जुड़ा था और पटना में आंदोलन में सक्रिय था। उन दिनों की बात ही अलग थी। रामविलास पासवान भी तब भूमिगत होकर नेपाल में ही रह रहे थे। एक दिन कर्पूरी जी ने पासवान जी को झिड़कते हुए कहा कि आप लौट जाइए और पटना में अब्दुलबारी सिद्दीकी से मिलिए। मैं इस बात का जिक्र इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यह बताना चाहता हूं कि जो बड़े नेता होते हैं, वे लोगों के कामों पर पर तब निगाह रखते थे। तब कर्पूरी जी से मेरा कोई खास परिचय भी नहीं था। बस प्रणाम-पाती (औपचारिक अभिवादन) कर लेता था। लेकिन कर्पूरी जी आंदोलन में मेरे काम के बारे में जानते थे। उनके निर्देश पर रामविलास पासवान जब नेपाल से पटना आए तो हमलोगों ने मिलकर आंदोलन में काम किया। तब हम सबकी स्थिति ऐसी ही होती थी। पैसे की बड़ी कड़की रहती थी। तो हमलोग आपस में ही चंदा करके काम चलाते थे।

चंदा भी कमाल का होता था। किसी की जेब से चार आने मिलते तो किसी की जेब आठ आने या बहुत हुआ तो एक-दो रुपए। उन दिनों इंदिरा गांधी हुकूमत द्वारा सस्ती रोटी की दुकानें खोली गयी थीं। तब हम चार-पांच लोग मिलकर दो रुपए की रोटियां और आलू की तरकारी खरीद कर खाते। रामविलास जी और मैं तब एक साथ ही रहते, खाते और काम करते थे। पटना में हम गिरफ्तार भी एक ही साथ हुए। हुआ यह था कि गांधी पीस फाउंडेशन के कार्यालय परिसर में ही भवेश चंद्र जी का आवास था। वह सर्वोदयी थे। उनके ही घर में मीटिंग रखी गयी थी। लेकिन इसकी सूचना लीक हो गयी थी और हमारे वहां पहुंचने के पहले ही पुलिस वहां पहुंच गयी थी। तो जैसे ही हम पहुंचे, पुलिस ने हमारा स्वागत करते हुए कहा कि आइए चलते हैं।

खैर, हम जेल में रहे। रामविलास जी भी रहे। बाद में जब जेल से बाहर निकला तब एक दिन कर्पूरी जी का निर्देश मिला कि बनारस आना है। बनारस में ही बैठक आहूत थी। उस मीटिंग में गिने-चुने लोग बुलाए गए थे। उनमें जहानाबाद वाले डॉ. विनयन थे। वह अलग दूसरे रास्ते से गए थे। और हम यानी मैं, नरेंद्र सिंह, अशोक कुमार सिंह, मुंशीलाल राय, जमशेदपुर के विजय सिंह और देवेंद्र यादव ट्रेन के अलग-अलग कोचों में बैठकर गए थे। एक सच्चिदानंद सिंह थे। वे कर्पूरी जी के मंत्रिमंडल में सिंचाई मंत्री भी थे। वे बड़े नेता थे। अभी जगदानंद सिंह जो कि राजद के प्रदेश अध्यक्ष हैं, उनके चचेरे बड़े भाई थे। सच्चिंदानंद बाबू के समधी थे रामेश्वर सिंह। सोनरपुरा नामक गांव (ठीक से याद नहीं) था, जहां उनका मकान था। मीटिंग वहीं होनी थी। हम किसी तरह वहां पहुंचे। कर्पूरी जी सड़क किनारे ही बैठे हुए थे सिर मुंडवाकर। देह पर केवल एक धोती (लुंगी तरह लपेटकर) और बांह तक वाला कुरता। पहली नजर में हममें से कोई उन्हें पहचान नहीं पाया। फिर हमें लगा कि जो बैठे हैं, शायद कर्पूरी जी ही हैं। लेकिन हममें से एक ने कहा कि यदि कर्पूरी जी होते तो सड़क पर ऐसे ही थोड़े बैठे रहते। 

युवाओं के साथ जननायक कर्पूरी ठाकुर

खैर, रामेश्वर जी के यहां ही कर्पूरी जी के साथ हमारी मीटिंग हुई। मीटिंग में कुछ कार्यक्रम बना। मीटिंग खत्म होने के बाद कर्पूरी जी ने पटना वापस जाने से पहले हमलोगों को मिलने का निर्देश दिया। तब कर्पूरी जी एक जगह टिककर नहीं रहते थे। मुझे नाम याद नहीं है लेकिन वे बनारस के जिला कांग्रेस के अध्यक्ष थे, कर्पूरी जी उनके यहां ही रूके हुए थे। रामेश्वर सिंह कर्पूरी जी से हमलोगों को मिलवाते ही नहीं थे। तब हमलोग थोड़ा सा सख्त हुए तब उन्होंने हमें मिलवाया। फिर हम उनसे मिलकर पटना वापस लौटे।

इस प्रकार से कर्पूरी जी से मैं प्रत्यक्ष संपर्क में आया। हालांकि उनके प्रति आकर्षण बहुत पहले से था कि वे गरीब-गुरबों के नेता हैं। मैं स्वयं बहुत गरीब परिवार से आता था। मेरे पिता एक चपरासी थे और हमारा जीवन भी अभाव में गुजरा। तो हमारे बीच जो जुड़ाव था वह प्राकृतिक जुड़ाव था। और जुड़ाव भी ऐसा रहा कि जबतक उनका निधन नहीं हो गया, हम जुड़े रहे।

एक वाकया और याद आ रहा है जब कर्पूरी जी ने मेरे पहले चुनाव के दौरान मेरे पक्ष में प्रचार करने के दौरान मुझे हक्का-बक्का कर दिया था। दरअसल, 1977 में जब आपातकाल खत्म हुआ और चुनाव की तैयारी की जा रही थी। तब चुनाव आज के जैसे नहीं होता था। पहले तो टिकट बाद में अनाउंस होता था और आदमी नामांकन पत्र पहले जमा कर देता था। पार्टी का सिंबल व अन्य दस्तावेज स्क्रुटिनी के दिन तक जमा किया जा सकता था। अब तो सबकुछ नामांकन के साथ ही जमा करना पड़ता है। कर्पूरी जी के सहयोगियों में हुकुमदेव नारायण यादव भी थे। कर्पूरी जी ने उनसे मेरा जिक्र किया था। सच कहूं तो उन दिनों टिकट का कोई आकर्षण था ही नहीं। हम तब आज की राजनीतिक पीढ़ी की सोच वाले नहीं थे। हम जो लोग थे – छात्र संघर्ष समिति वाले, वाहिनी वाले, जेपी के विचारों को मानने वाले, बहुत सारे साथी – चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे। जब मैं कर्पूरी जी से जुड़ा तो मेरे साथियों ने मुझसे कहा भी कि क्या तुम लोकदल में चले गए हो। मैंने उनसे कहा कि जहां कर्पूरी जी रहेंगे, वहीं रहूंगा। 

तब हुकुमदेव नारायण यादव ने अपनी भाषा में मुझसे कहा कि “कर्पूरी जी कहलखून हे तीन जगह में से तू चुनाव लड़। चाहे केवटी, चाहे पंडौल और फिर चाहे बिहारशरीफ से।” तो आप यह देखिए कि केवटी से मुझे चुनाव लड़ने के लिए 1977 में कहा गया। तब पार्टी के लोगों ने तीन जगहों में से किसी एक क्षेत्र से चुनाव लड़ने को कहा। उन दिनों मेरी उम्र भी बहुत कम थी। मैं जाति-धर्म को न तो बहुत समझता था और ना ही अहमियत देता था। लेकिन पार्टी के बड़े नेता सब समझते थे। केवटी, पंडौल और बिहारशरीफ में मुसलमान अच्छी संख्या में हैं। इसके अलावा केवटी और पंडौल में यादव जाति के मतदाताओं की संख्या भी निर्णायक है। तो उस समय कर्पूरी जी सब समझते थे। मैं चुनाव नहीं लड़ना चाहता था। मैं तो चाहता था कि मेरे एक चाचा जो कि जिला परिषद के अध्यक्ष भी रह चुके थे, वे चुनाव लड़ें। लेकिन उनका कहना था कि उनको टिकट नहीं मिलेगा। चूंकि मैं कर्पूरी जी से जुड़ा था तो टिकट मुझे ही मिलता। लेकिन चाचा ने कहा कि बहेड़ा से चुनाव लड़ना ठीक रहेगा। बहेड़ा उस समय परिसीमन के बाद नया विधानसभा क्षेत्र बना था।

मैंने हुकुमदेव बाबू को कहा कि मैं तीनों जगहों में से कहीं भी चुनाव नहीं लड़ूंगा। मुझे देना है तो बहेड़ा से टिकट दे दिजीए। लेकिन बहेड़ा उन दिनों बहुत कठिन विधानसभा क्षेत्र था। वहां ब्राह्मण जाति के मतदाताओं की संख्या अधिक है और वहां हरिनाथ मिश्र जो कि विधानसभा के अध्यक्ष रहे थे और वे कभी चुनाव नहीं हारे थे, वह भी चुनाव लड़ रहे थे। इसी कारण से कर्पूरी जी और हुकुमदेव नारायण यादव जो कि मेरे शुभचिंतकों में थे, नहीं चाहते थे कि मैं बहेड़ा से चुनाव लड़ूं, क्योंकि वहां हार का खतरा था। लेकिन मैंने साफ कह दिया कि मैं चुनाव लड‍़ूंगा भी तो केवल बहेड़ा से और बाकी तीनों जगहों से आप किसी और को टिकट दे दें। बाद में पार्टी ने यही किया। केवटी से दुर्गादास राठौड़, पंडौल से सियाराम यादव और बिहारशरीफ से डॉ. साबरी को। दुर्गादास राठौड़ आरएसएस के थे और हुकुमदेव नारायण यादव का उनसे नजदीकीपना था। लेकिन वे मेरे भी शुभचिंतक थे। वे चाहते थे कि मैं बहेड़ा से चुनाव न लड़ूं ताकि मैं हार ना जाऊं। 

मेरे चाचा नामांकन हेतु मेरे दस्तावेज वगैरह तैयार करके रखे हुए थे। लेकिन टिकट की घोषणा नहीं हुई थी। तो उस समय टीवी का युग था नहीं। टेलीप्रिंटर का युग था। पीटीआई में एक ब्यूरो प्रमुख थे मंटू दादा। वे नये लड़कों को प्रोत्साहित करते रहते थे। तो एकदम अंतिम दिन तक हम रात के बारह बजे तक मंटू दादा के दफतर में बैठे रहे कि मेरी उम्मीदवारी से जुड़ी खबर आएगी। लेकिन खबर नहीं आयी। मेरा एक साथी था– हरिनारायण चौधरी। वह भी छह-सात महीने तक जेल में रहा था। उसने मजाक में मुझे गाली देते हुए कहा कि तुम्हें बहेड़ा से चुनाव लड़ना है तो जाकर नामांकन भर दो। पार्टी को टिकट देनी होगी तो दे देगी। उस समय की स्थिति भी अजीब थी। पास में बहेड़ा जाने के लिए पैसा नहीं था। मेरा एक दोस्त था और सिर्फ इसी कारण से उसकी इज्जत मैं आज भी करता हूं कि उसने मुझे न केवल दो सौ रुपए दिए बल्कि भोर में चार बजे मुझे स्टीमर तक छोड़ गया। तब पटना में गंगा नदी पर सड़क पुल नहीं था। स्टीमर ही एकमात्र जरिया था। फिर किसी तरह पहुंचा तब वहां मेरे चाचा दस्तावेजों के साथ खड़े थे और मैंने दरभंगा शहर समाहरणालय में नामांकन पत्र जमा किया। उस समय तो मेरे चेहरे पर दाढ़ी आयी ही थी और मूंछ भी हल्की ही थी। तब बड़ी खलबली मची थी वहां के ब्राह्मणों के बीच कि कौन है जो पटना से आया है और हरिनाथ मिश्र के खिलाफ चुनाव लड़ेगा। उन्होंने पूछा भी कि मैं कैसे आ गया पटना से यहां चुनाव लड़ने। मैंने उन्हें बताया कि मेरा घर यही दरभंगा में है, अलीनगर में। मैंने नामांकन कर दिया है। अगर टिकट मिल गया तो लड‍़ूंगा और नहीं मिला तो पार्टी (लोक दल) जिसको टिकट देगी, उसके लिए प्रचार करूंगा।

खैर, चुनाव की बात करूं तो उसका अनुभव भी शानदार था। यह मेरा पहला चुनाव था। राजनीति का दायां-बायां कुछ भी नहीं जानता था। पहले एक-डेढ़ महीने तक प्रचार का मौका मिलता था। पहले बीस दिनों तक तो मैं साइकिल से प्रचार करता रहा। और छात्र संघर्ष वाहिनी आदि के पंद्रह-बीस साथियों ने मेरी बड़ी मदद की। सबने गांव-गांव जाकर मेरे पक्ष में प्रचार किया। तब एक आदमी जिससे मेरा रिश्ता आज भी इस वजह से अच्छा है जबकि वे अभी भाजपा में हैं कि उन दिनों उनके पास चमचमाती हुई एकदम नई राजदूत मोटरसाइकिल थी, मुझे चुनाव प्रचार के लिए दे दिया। चुनाव प्रचार के अंतिम सप्ताह में जाकर एक खटारा जीप भाड़े पर लिया था। आज की पीढ़ी को शायद ही यकीन होगा कि चुनाव प्रचार में कुल छह हजार रुपए ही खर्च हुए थे। ये पैसे लोगों ने चंदा में दिया और सोलह सौ रुपए कर्पूरी जी ने भिजवाया था। हालांकि पार्टी की ओर से भी कुछ पैसे दिए गए थे, लेकिन पता नहीं कोई रख लिया था या क्या किया था। 

इसी चुनाव के दौरान कर्पूरी जी के साथ मेरी पहली पब्लिक मीटिंग हुई। तब वे दिवंगत डॉ. महावीर प्रसाद जो कि बिहार सरकार में मंत्री भी रहे थे और दूसरे तेजनारायण यादव थे, वे भी मंत्री रहे थे। एक घनश्यामपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे और दूसरे बहेड़ी विधानसभा क्षेत्र से। तो कर्पूरी जी उनके ही प्रचार में जा रहे थे। उन दोनों को ही कर्पूरी जी ने कार्यक्रम दिया था। मेरे बहेड़ा विधानसभा क्षेत्र में प्रचार के लिए उन्होंने कार्यक्रम नहीं दिया था। तब एक पुराने साेशलिस्ट थे, स्वतंत्रता सेनानी भी थे, गंगा प्रसाद यादव (अब जीवित नहीं हैं और आजीवन मेरे साथ जुड़े रहे) उन्होंने मदद की। उन दिनों एक बल्लू कमटी की चाय और पकौड़ी की दुकान थी। बहुत छोटी दुकान थी। बल्लू कमटी भी पुराने सोशलिस्ट थे। कर्पूरी जी जब भी उस रास्ते से गुजरते थे, उनकी दुकान में बैठकर चाय पीते और पकौड़ी खाते थे। तो जब कर्पूरी जी वहां रूके तब गंगा बाबू और बल्लू कमटी आदि ने उनसे कहा कि इतने बड़े स्टॉलवर्ट नेता (हरिनाथ मिश्र) के खिलाफ आपने एक लड़के को खड़ा कर दिया और आपका यहां कोई कार्यक्रम भी नहीं दे रहे हैं। तब कर्पूरी जी ने कहा कि मैं शाम में छह बजे लौटने के क्रम में यहां एक कार्यक्रम करूंगा। आपलोग तैयारी करिए। तब मैं चुनाव प्रचार के लिए गांव में था। लोगों ने मुझ तक खबर पहुंचायी कि कर्पूरी जी ने शाम में छह बजे का वक्त दिया है। आप चले आइए। उस समय शाम के छह बजे कार्यक्रम का माहौल नहीं होता था। लेकिन जब लोगों ने कहा तब चला गया। वहां जो कर्पूरी जी ने भाषण दिया था, मुझे आज भी शब्दश: याद है और आजीवन रहेगा।

मैं कर्पूरी जी के पीछे था। कर्पूरी जी ने भाषण देना शुरू किया– “अपने जो हरिनाथ मिश्रा जी हैं, बहुत ही कर्मठ और बहुत ईमानदार नेता हैं।” मुझे लगा कि कर्पूरी जी मेरा चुनाव प्रचार करने आए हैं या मेरा मुखालफत करने। लेकिन अगले ही वाक्य में उन्होंने कहा– “भले ही हरिनाथ बाबू बहुत ईमानदार हैं, दृढ़ हैं, लेकिन हमने जिस लड़के को यहां से टिकट दिया है, वह कम उम्र में उनसे कम कर्मठ और कम ईमानदार नहीं है।” तब मेरी जान में जान आयी। उन्होंने आगे कहा– “आपलोग इस लड़के को जिताइए। यह लड़का असेट बनेगा। मैं डंके की चोट पर कहता हूं कि ईमानदारी में यह हरिनाथ बाबू से एक पैसा कम नहीं होगा। यह लड़का बहुत आगे जाएगा।”

इतना कहकर कर्पूरी जी चले गए।

क्रमश: जारी

(प्रस्तुति : नवल किशोर कुमार, संपादन : अनिल)

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