सुंदरलाल टाकभौरे : आंबेडकरी विचारधारा के अग्रणी मशालची

काफी समय बाद नागपुर विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में जाना हुआ तो ज्ञात हुआ कि टाकभौरे जी आंबेडकरी विचारों को लेकर पीएचडी कर रहे है। हालांकि उनकी पीएचडी पूरी नहीं हो पाई। लेकिन यह देख कर आश्चर्य होता है कि एक 70-80 साल का बुजुर्ग इस उम्र में भी पढ़ाई कर रहा है। स्मरण कर रहे हैं संजीव खुदशाह

संस्मरण

बीते 7 जनवरी, 2022 को वरिष्ठ दलित लेखिका सुशीला टाकभौरे का एक संदेश प्राप्त हुआ। संदेश स्तब्ध कर देने वाला था। उन्होंने अपने संदेश में लिखा था– “श्री सुंदरलाल जी टाकभौरे का दुःखद निधन दिनांक 07/01/2022 को हो गया है। उनका अंतिम संस्कार आज दिनांक 08/01/2022 शनिवार को किया जायेगा। श्रीमती सुशीला जी टाकभौरे (पत्नी), श्री शरद टाकभौरे (पुत्र) व समस्त टाकभौरे परिवार”। उनके निधन की खबर ने देश भर के आंबेडकरी विचारधारा को माननेवालों को दुखी कर दिया। 

संपादक और लेखक सुंदरलाल से पहली बार मेरी मुलाकात सन् 2006 में पहली बार नेकडोर के एक कार्यक्रम के दौरान दिल्‍ली में हुई। उन्हीं दिनों मेरी किताब ‘सफाई कामगार समुदाय’ प्रकाशित हुई थी। वहां देश भर से दलित लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता आये हुए थे। कार्यक्रम के बीच-बीच में एक दूसरे से मुलाकात, परिचय का दौर चल रहा था। ऐसे ही एक सत्र के बाद सुन्‍दरलाल टाकभौरे से मेरी मुलाकात हुई। वे बिहार के मोतीलाल आनंद के साथ थे। उन्होंने पूछा कि आप कौन है? कहां से आये हैं? तो मैंने जवाब दिया कि “जी, मैं संजीव खुदशाह बिलासपुर से आया हूं।” फिर मोतीलाल आनंद ने कहा “क्‍या आपका कोई कार्ड या परिचय पत्र है?” उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि ‘सफाई कामगार समुदाय’ जैसी किताब का लेखक मै ही हूं। उस समय मैं नौजवान था और जीन्स-टीशर्ट पहनता था। मैंने अपना परिचय पत्र दिखाया तो उन्हें यकीन हुआ कि मैं ही संजीव खुदशाह हूं। फिर हम सब एक किनारे जा कर बात करने लगे।

हालांकि टाकभौरे जी के नाम से मैं पहले से ही परिचित था, क्योंकि उनकी पत्नी प्रसिद्ध दलित साहित्यकार सुशीला टाकभौरे मेरी किताब ‘सफाई कामगार समुदाय’ के लोकार्पण कार्यक्रम में रायपुर आ चुकी थीं। टाकभौरे जी पहले तो किताब की बात करने लगे फिर सामाजिक मुद्दों पर आ गये। कहने लगे कि हमारा समाज आंबेडकरी आंदोलन से दूर है, उन्हें आंदोलन से जोड़ने के लिए कुछ करना होगा। इस तरह सुन्‍दरलाल टाकभौरे और मोतीलाल आनंद से परिचय बढ़ता गया।

सुंदरलाल टाकभौरे की तस्वीर

तीन दिन तक हुए इस कार्यक्रम में एक सत्र सफाई कामगारों पर था, जिसमें वक्ता के रूप में एडवोकेट भगवान दास, सुन्‍दरलाल टाकभौरे के अलावा मैं भी शामिल हुआ। इसी कार्यक्रम में मैंने देखा कि इतनी उम्र हो जाने के बावजूद उनके अंदर दलित समाज के लिए कुछ करने का जज्बा जोर मार रहा था। वे प्रतिदिन शाम को विभिन्न लोगों के साथ बैठके करते, संगठित होने की बात करते। मुझे साथ जरूर रखते। वे कहते कि नौजवनों को समाज के काम के लिए आगे आना चाहिए। कई बैठकों के बाद राकेश बहादुर के यहां कालका, हरियाणा में बैठक लेकर एक नया संगठन बनाने का निर्णय हुआ, जो सफाई कामगारों के हितों के लिए काम करेगा।

इस प्रकार सुन्‍दरलाल टाकभौरे जी के साथ मुलाकात का दौर शुरू हो गया। बुजुर्ग हो जाने के कारण बोलते-बोलते वे भूल जाते व विषयांतर हो जाते, जिसका बाद में वे खेद भी व्यक्त करते। उन्‍हेी के जरिए डिफेंस कालोनी, दिल्ली में रमणिका गुप्ता के साथ परिचय हुआ।

टाकभौरे जी सफाई कामगार समाज की जागृति के लिए हमेशा चिंतित रहते थे। वे कुछ न कुछ योजना बनाते रहते थे। उन्होंने अपनी पत्नी सुशीला टाकभौरे के साथ मिलकर ‘जाग‍ बिरादर’ नाम की मासिक पत्रिका भी आरंभ की थी, जो वाल्मीकि, सुदर्शन, मखियार आदि सफाई कामगार समाज पर केन्द्रित होती थी।

काफी समय बाद नागपुर विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में जाना हुआ तो ज्ञात हुआ कि टाकभौरे जी आंबेडकरी विचारों को लेकर पीएचडी कर रहे है। हालांकि उनकी पीएचडी पूरी नहीं हो पाई। लेकिन यह देख कर आश्चर्य होता है कि एक 70-80 साल का बुजुर्ग इस उम्र में भी पढ़ाई कर रहा है। वे वामन मेश्राम के गुट वाले बामसेफ से अंत तक जुड़े रहे। एक बार वे रायपुर में बामसेफ से जुड़े कार्यक्रम में आये थे। उन्होंने वामन मेश्राम से मेरी मुलाकात करवाई थी। इसी समय उन्होंने बताया कि वे ‘इतिहास संदेश’ नाम से पत्रिका निकाल रहे है। मुझे भी इससे जोड़ने की बात कही।

वे लगातार प्रेरित करते कि मैं ‘इतिहास संदेश’ के लिए लेख लिखूं। कई लेख मैंने लिखे भी। वे लेख का विषय तो बताते ही साथ-साथ उनका संदर्भ सामग्री भी उपलब्ध कराते या बताते कि कहां मिलेगी। ‘इतिहास संदेश’ एक रिसर्च जर्नल पत्रिका थी। उसमें नपे तुले लेख ही प्रकाशित किये जाते थे। उन्हीं की प्रेरणा से मैने ‘सुदर्शन समाज का इतिहास’ शीर्षक लेख लिखा। ज्यादातर लोगों ने इस लेख की प्रशंसा की। वहीं उनलोगों ने आपत्ति व्यक्त की, जिनकी रोजी-रोटी इस लेख से खतरे में आ गई थी। टाकभौरे जी का कहना था कि समाज के लोगों ने तो डॉ आंबेडकर तक को जलील करने से नही छोड़ा, तो हम आमजन किस खेत की मूली हैं। समाज सुधार के लिए यदि उन्हें कड़वी गोली की जरूरत पड़े तो भी उसे देनी चाहिए। वे कहते थे की यदि समाज से तारीफ पाना है तो उनके बहाव में बहते चले जाओं। गलत को सही कहो तो वे खुश रहेंगे। लेकिन यदि समाज को मिशन की ओर ले जाना है तो कुछ खतरे उठाने ही होंगे।

इसी बीच सुशीला टाकभौरे की आत्मकथा ‘शिकंजे का दर्द’ प्रकाशित इुई, जिसमें सुशीला जी ने अपने पति पर कई आरोप लगाए थे। इसके बाद दोनों पति-पत्नी के बीच की तल्खियत जगजाहिर हो गई। लेकिन सुंदरलाल जी को कभी आरोप-प्रत्‍यारोप करते या सफाई देते नहीं देखा गया। आत्मकथा की चर्चा से सुंदरलाल जी काफी असहज हो जाते थे। बावजूद इसके उन्होंने लेखन, पढ़ाई, संपादन का काम नहीं छोड़ा, और जोश से करते रहे। यूट्यूब चैनल डीएमए इंडिया को दिये गये एक साक्षात्कार में बताते है कि उन्होंने ‘जाग बिरादर’ नाम की पत्रिका का पुन: प्रकाशन शुरू किया है, जिसके संपादन एवं सहयोग की जिम्मेदारी नागपुर के हरीश जानोरकर को दी है। 

किन्ही कारणों से ‘इतिहास संदेश’ का प्रकाशन रूक गया था। इस पत्रिका में लिखी गई उनकी सम्पादकीय टिप्पणी बेहद महत्‍वपूर्ण होती थी। प्रूफ से लेकर संयोजन तक उत्‍कृष्‍ट होते थे, जो इसे नई ऊंचाइयों तक ले गये।

आज वे हमारे बीच नहीं हैं। एक जीवट एवं सुलझे हुऐ व्यक्ति को हमने खो दिया। उनके जाने के बाद उनका काम पड़ा हुआ है। उन्‍होने बताया था कि वे कुछ किताबों पर काम कर रहे है। वह भी अधूरी होंगी। उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि उनके कामों को प्रकाशित किया जाय और आगे बढाया जाय।

(संपादन : नवल/अनिल)


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