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दलित राजनीति में सामाजिक सरोकारों के उखड़ते पांव

सामाजिक परिवर्तन का नारा बामसेफ के मंचों पर तो दिखाई दिया करता था, लेकिन डीएस-फोर (दलित शोषित संघर्ष समिति) तक आते-आते उन बुद्धिजीवियों को अलविदा कह दिया गया, जो सामाजिक सरोकारों के कारण ही बाबू कांशीराम के नेतृत्व में काम करने को जुड़े थे। बता रहे हैं द्वारका भारती

विश्लेषण

माना जाता है कि दलित राजनीति का पर्याय ही सामाजिक मुद्दे हैं। यही धारणा मार्क्सवादी विचारधारा से पनपी राजनीति में भी देखी जाती रही थी। इन अर्थों में देखा जाये तो दलित राजनीति की सबसे बड़ी त्रासदी भी यही रही है कि वह जिन सामाजिक सरोकारों के पीठ पर सवार होकर सत्ता तक पहुंचती रही है, उन्हीं सामाजिक सरोकारों को अनदेखा किये जाने से ही, सत्ताच्युत भी होती रही है।

दलित राजनीति के इतिहास की बात करें तो वह इतना पुराना तो नहीं, लेकिन आज तक उसने इतना उतराव-चढ़ाव देखे हैं कि उसे बिल्कुल भी नया-नवेला भी नहीं कहा जा सकता। डॉ. आंबेडकर से लेकर कांशीराम-मायावती तक के इस सफर ने बहुत से झंझावातों को अपनी पीठ पर झेला है। यह एक कटु-सत्य भी है कि लगभग सात दशकों तक की इस पुरानी राजनीति ने दलितों को जो दिया है, वह सिर्फ यही है कि आंबेडकर को छोड़ कर दलित नेताओं ने दलितों के नाम पर सिर्फ राजनीति ही की है, या राजनीति में खुद की पहचान बनाकर गैर-दलित राजनीति में अपना स्थान बनाने की कवायद को ही निबाहा है।

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लेखक के बारे में

द्वारका भारती

24 मार्च, 1949 को पंजाब के होशियारपुर जिले के दलित परिवार में जन्मे तथा मैट्रिक तक पढ़े द्वारका भारती ने कुछ दिनों के लिए सरकारी नौकरी करने के बाद इराक और जार्डन में श्रमिक के रूप में काम किया। स्वदेश वापसी के बाद होशियारपुर में उन्होंने जूते बनाने के घरेलू पेशे को अपनाया है। इन्होंने पंजाबी से हिंदी में अनुवाद का सराहनीय कार्य किया है तथा हिंदी में दलितों के हक-हुकूक और संस्कृति आदि विषयों पर लेखन किया है। इनके आलेख हिंदी और पंजाबी के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। इनकी प्रकाशित कृतियों में इनकी आत्मकथा “मोची : एक मोची का अदबी जिंदगीनामा” चर्चा में रही है

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