यूपी चुनाव : तीसरे चरण में दलितों के लिए आरक्षित सीटों का हाल

तीसरे चरण में सपा का गढ़ माने जानेवाले इलाकों में मतदान होने हैं। इसके अलावा अवध और पश्चिमी यूपी की सीटें भी शामिल हैं। इन इलाकों के आरक्षित सीटों का हाल बता रहे हैं सुशील मानव

उत्तर प्रदेश में तीसरे चरण के चुनाव के तहत 20 फरवरी को 16 जिलों कासगंज, हाथरस, फिरोजाबाद, एटा, मैनपुरी, फर्रुखाबाद, कन्नौज, इटावा, औरैया, कानपुर देहात, कानपुर नगर, जालौन, हमीरपुर, महोबा, झांसी और ललितपुर की 59 सीटों पर मतदान होगा। इनमें 15 आरक्षित सीटें हैं। जिन 59 सीटों पर चुनाव होना है, उन्हें तीन क्षेत्रों में बांटा जा सकता है– बुंदेलखंड पाठा क्षेत्र, यादव बेल्ट, और अवध प्रांत। यादव बेल्ट में 8 जिले गिने जाते हैं– फ़िरोजाबाद, मैनपुरी, एटा, इटावा, कासगंज, औरैया कन्नौज फर्रुखाबाद 

कायमगंज विधानसभा : लोहिया की कर्मभूमि में इस बार सपा और अपना दल आमने-सामने

फर्रुखाबाद जिले में 4 विधानसभा सीटें हैं– कायमगंज, अमृतपुर, फर्रुखाबाद और भोजपुर। कायमगंज आरक्षित सीट है। कुल 3,32,585 मतदाताओं वाली इस सीट पर सबसे अधिक यादव मतदाता 75 हजार हैं। लोधी 45 हजार, कुर्मी 40 हजार, वैश्य 35 हजार, मुस्लिम 35 हजार, ब्राह्मण 30 हजार, और शाक्य मतदाता 30 हजार हैं। 2017 विधानसभा चुनाव में भाजपा के अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी (सपा) के डॉ. सुरभि गंगवार को 36,525 वोटों के अंतर से चुनाव हराया था। वहीं 2012 विधानसभा चुनाव में सपा के अजीत कुमार ने भाजपा के वर्तमान विधायक अमर सिंह को 21,838 वोट से मात दी थी। जबकि इस बार अपना दल (भाजपा गठबंधन) ने सुरभि गंगवार और समाजवादी पार्टीने सर्वेश अंबेडकर को और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने दुर्गा प्रसाद को टिकट दिया है।

लोहिया की कर्मस्थली रही फर्रुखाबाद जनपद का अधिकांश क्षेत्र ग्रामीण है। यहां लोग मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर हैं। यहां आलू मुख्य फसल के रूप में उगाया जाता है और देश की बड़ी-बड़ी मंडियों से लेकर विदेश तक भेजा जाता है। पूरे जिले में कोई बड़ा उद्योग-धंधा नहीं है। फ़र्रुखाबाद में कपड़ों पर छपाई का काम मशहूर है। यहां की छपाई वाले कपड़े देश विदेश तक भेजे जाते हैं। कपड़ों पर एक विशेष प्रकार की कढ़ाई जरदोजी का काम भी बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसके अलावा शादी विवाह में महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले लहंगा साड़ी आदि यहां पर बनते हैं। ये सारे काम अधिकांश पसमांदा समाज के हाथों में है।

किशनी विधानसभा : सपा के गढ़ में सपा को चुनौती

मैनपुरी जिले में 4 विधानसभा सीटें हैं– मैनपुरी, भोगांव, किशनी और करहल। किशनी सुरक्षित विधानसभा सीट है। कुल 3,02,336 मतदाताओं वाली इस सीट को कभी भी भाजपा और बसपा ने जीत नहीं दर्ज़ की है। पिछले 27 साल से सपा का गढ़ बनी हुई इस सीट के समाजिक समीकरण की बात करें तो यहां क्षत्रिय और दलित मतदाताओं की संख्या क़रीब 42-42 हजार है। इसके बाद यादव मतदाता क़रीब 40 हजार, शाक्य मतदाता करीब 30 हजार हैं। मुस्लिम 18 हजार, ब्राह्मण 14 हजार, लोधी 12 हजार और वैश्य 9 हजार हैं।

2017 विधानसभा चुनाव में सपा के बृजेश कठेरिया (80,475 वोट) ने भाजपा के सुनील कुमार (63,946 वोट) को हराया था। इस बार यहां से कांग्रेस ने विजय नारायण सिंह, सपा ने बृजेश कठेरिया, भाजपा ने प्रिय रंजन आशू दिवाकर और बसपा ने प्रभु दयाल को टिकट दिया है। इस सीट पर जन मुद्दों की बात करें तो गांवों में पिछड़ेपन की समस्या बनी हुई है। अभी भी गांव की तमाम गलियां कच्ची हैं। इलाके में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल स्थिति में हैं।

लखनऊ में चुनाव प्रचार सामग्री दुकान की तस्वीर

जलेसर विधानसभा में फिर सपा-भाजपा आमने-सामने

एटा जिले में कुल 4 विधानसभा सीटें हैं– अलीगंज, एटा, मारहरा और जलेसर। जलेसर विधानसभा सीट सुरक्षित सीट है। 3 लाख मतदाताओं वाली जलेसर सुरक्षित सीट पर यादव और दलित मतदाता क़रीब 70 हजार, इसके बाद क्षत्रिय मतदाता 37 हजार, मुस्‍लिम 30 हजार, लोधी 25 हजार और बघेल मतदाता क़रीब 23 हजार हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के संजीव कुमार दिवाकर (81502 वोट) ने सपा के रंजीत सुमन को लगभग 20 हजार वोटों से हराया था। वहीं इसके पहले 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा के रंजीत सुमन ने बसपा उम्‍मीदवार ओम प्रकाश दलित को 22 हजार से अधिक वोटों से हराया था। इस बार भाजपा ने संजीव कुमार दिवाकर, सपा ने रंजीत सुमन और बसपा ने आकाश सिंह तथा कांग्रेस ने नीलम राज को अपना उम्मीदवार बनाया है।

दलित बहुल सीट होने के बावजूद बसपा यहां से कभी नहीं जीती। साल 2007 के विधानसभा चुनाव को छोड़ दें तो बसपा यहां दूसरे स्थान पर भी नहीं पहुंच पाती। 1990 के बाद इस सीट पर कभी सपा तो कभी भाजपा जीतती आ रही है।

औरैया में बसपा भी दावेदार

औरैया जिला में तीन विधानसभा सीटें हैं– बिधुना, दिबियापुर और औरैया। औरैया अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित सीट है। कुल 3,56,287 मतदाताओं वाली इस सीट पर सबसे अधिक जाटव मतदाता 66 हजार, ब्राह्मण मतदाता 37 हजार, मुस्लिम मतदाता 27 हजार, लोधी मतदाता 23 हजार, क्षत्रिय मतदाता 25 हजार, यादव मतदाता 16 हजार, पाल मतदाता 14 हजार हैं।

राजनीतिक अतीत की बात करें तो वर्ष 2017 में भाजपा उम्मीदवार रमेश चंद्रा (83,850 वोट) ने बसपा के भीमराव अंबेडकर (51,718) को हराया था। जबकि सपा के मदन सिंह गौतम उर्फ संतोष को 39,201 वोट ही मिल सके थे। इस बार कांग्रेस ने सरिता दोहरे, भाजपा ने गुड़िया कठेरिया औऱ सपा ने जितेंद्र दोहरे को टिकट थमाया है। इस विधानसभा में जनसमस्याओं की बात करें तो कई इलाकों में जलजमाव बड़ी समस्या है।

कन्नौज विधानसभा : योगी के विश्वासपात्र रहे पुलिस कमिश्नर असीम अरुण मैदान में

कन्नौज जिला में कुल तीन विधानसभा सीटें हैं– कन्नौज, छिबरामऊ और तिर्वा। कन्नौज अनुसूचित समुदाय के लिए आरक्षित सीट है। कुल 4 लाख मतदाताओं वाले इस विधानसभा सीट पर अनुसूचित जाति के मतदाता क़रीब 1 लाख, मुस्लिम मतदाता 65 हजार, यादव मतदाता 45 हजार, ब्राह्मण मतादता 45 हजार, कुशवाहा मतदाता 40 हजार और लोधी मतदाता 30 हजार है।

पिछली बार यानी वर्ष 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में सपा के अनिल कुमार दोहरे (99,635 मत) ने भाजपा के बनवारी लाल दोहरे (97,181 वोट) को 2454 मतों से हराया था। बसपा के अनुराग सिंह को इस चुनाव में 44,182 वोट प्राप्त हुआ था। इस बार भाजपा ने असीम अरुण, सपा ने अनिल कुमार दोहरे को अपना उम्मीदवार बनाया है। कानपुर के पूर्व पुलिस कमिश्नर असीम अरुण ने पिछले महीने नौकरी से वीआरएस लेकर भाजपा में शामिल हुए हैं। जबकि सपा उम्मीदवार पिछले तीन चुनावों से लगातार विधायक निर्वाचित होते आ रहे हैं।

टूंडला विधानसभा में कायम है खारे पानी की समस्या

फिरोज़ाबाद जिला में कुल 5 विधानसभा सीटें हैं– फिरोजाबाद, टूंडला, शिकोहाबाद, जसराना और सिरसागंज। कुल 3,71,974 मतदाताओं वाली टूंडला विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। इस सीट पर सबसे ज्यादा जाटव वोट हैं, जिनकी संख्या लगभग 65 हजार के क़रीब है। इसके अलावा यादव 40 हजार के करीब हैं। ठाकुर मतदाता 50 हजार, बघेल घनगर मतदाता 50 हजार, निषाद 20 हजार, मुस्लिम 20 हजार, कुशवाहा मतदाता 16 हजार, जाट 15 हजार, ब्राह्मण मतदाता 15 हजार, संखवार 10 हजार हैं।

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पिछली बार 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के एसपी सिंह बघेल (1,18,584 वोट) ने बसपा के राकेश बाबू (62,514 वोट) को हराया था। तीसरे नंबर पर सपा के शिव सिंह चाक को 54,888 वोट मिले थे। इस बार कांग्रेस ने योगेश दिवाकर, भाजपा ने प्रेम पाल सिंह धनगर, सपा ने राकेश बाबू और बसपा ने अमर सिंह को उम्मीदवार बनाया है।

इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या खारे पानी की है, जो कई दशकों से है, लेकिन वह समस्या अभी भी जस की तस बनी हुई है। इस इलाके के करीब 40 से 50 गांव ऐसे हैं, जहां का पानी इस कदर खारा और फ्लोराइड युक्त है। इसे पीने के बाद लोग बीमार पड़ जाते हैं। खारे पानी की समस्या चुनाव में मुद्दा भी बनती है, लेकिन आज तक उसका कोई हल नहीं हुआ।

भरथना विधानसभा में सपा-भाजपा के बीच भिड़ंत

इटावा जनपद में कुल 3 विधानसभा हैं, जिनमें जसवंत नगर, भरथना और इटावा सदर है। भरथना सुरक्षित सीट है। कुल 4,05,438 मतदाताओं वाली इस सीट के जातीय समीकरण की बात करें तो यहां सबसे ज़्यादा यादव मतदाता जिनकी संख्या 65 हजार है। इसके अलावा जाटव मतदाता 55 हजार, ब्राह्मण मतदाता 45 हजार, कुशवाहा मतदाता 25 हजार, क्षत्रिय मतदाता 22 हजार, वैश्य मतदाता 18 हजार, मुस्लिम मतदाता 15 हजार हैं। पिछल्ी बार2017 के भाजपा की सावित्री कठेरिया ने (82005 वोट) सपा प्रत्याशी कमलेश कठेरिया (80037 वोट) को लगभग 2000 वोटों से हराया था। इस बार सपा ने राघवेंद्र कुमार गौतम को और भाजपा ने सिद्घार्थ सिंह दोहरे, बसपा ने श्रीमति कमलेश आंबेडकर और कांग्रेस ने स्नेहलता को अपना उम्मीदवार बनाया है। 

यह ग्रामीण बहुल इलाका है। भरथना एक समय में व्यापारिक केंद्र हुआ करता था। लोग भरथना को औद्योगिक क्षेत्र बनाने की मांग कर रहे हैं। भरथना विधानसभा की बड़ी आबादी चंबलयमुना नदी के बीच के जंगल में निवास करती है। क्षेत्र में विकास ना होने की वजह से सड़कों का अभाव है। यहां गांव आज भी सड़क मार्ग से कई किलोमीटर दूर अंदर जंगल की तरफ बसे हुए हैं। जबकि इसी जिले में लायन सफारी और सैफई एयरपोर्ट और मेडिकल कॉलेज भी इसी जनपद में है।

सभी की नजरें हाथरस पर

बसपा शासन में 3 मई 1997 को जिला बने हाथरस में कुल 3 विधानसभा सीटें हैं– सादाबाद, सिकन्दरामऊ और हाथरस। हाथरस अनुसूचित जाति के लिये आरक्षित सीट है। इस बार सभी की निगाहें इस सीट पर है। इसकी वजह यह कि 2020 में यहां एक दलित युवती के साथ पहले बलात्कार और बाद में उसकी लाश को पुलिस द्वारा रातों-रात जला दिया गया था। इस एक घटना ने देश भर के दलित-बहुजनों को आंदोलित कर दिया था। करीब 4 लाख मतदाताओं वाली इस सीट के जातिगत समीकरण पर नज़र डालें तो यहां सबसे ज़्यादा ठाकुर मतदाता 49600, वैश्य मतदाता 42700, ब्राह्मण मतदाता 42300, जाटव मतदाता 29700, धोबी मतदाता 26900, कुशवाहा मतदाता 24700, मुस्लिम मतदाता 20200, बघेल मतदाता 15300, जाट मतदाता 15100, खोली मतदाता 9800, वाल्मीकि मतदाता 6900, नाई मतदाता 5500, कश्यप (ढीमर) मतदाता 5000, कुम्हार 4850, पंजाबी 4200, यादव 3200, खटीक मतदाता 2900, दर्जी 2300, भुजी 2100 और 6000 अन्य मतदाता हैं। 

पिछली बार 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के हरिशंकर माहौर ने बीएसपी प्रत्याशी बृजमोहन राही को 70661 मतों के बड़े अंतर से हराया था। इस बार बृजमोहन राही ने सपा उम्मीदवार के रूप में ताल ठोंका है। वहीं भाजपा ने अंजुला माहौर, कांग्रेस ने कुलदीप सिंह, बसपा ने संजीव कुमार काका को उम्मीदवार बनाया है। 

हाथरस विधानसभा में उजड़ते परंपरागत उद्योग धंधे होने के चलते बेरोज़गारी है। लोगों को इलाज के लिए अलीगढ़ अथवा आगरा जाना पड़ता है। हाथरस हींग उत्पादन के लिए मशहूर है, जिसकी मुस्लिम देशें में मांग है। लेकिन यह उद्योग भी अब संकट में है। गंदगी और पानी की समस्या आम बात है। 

बिल्हौर में बसपा-सपा के बीच मुकाबला 

कानपुर जिले में कुल 10 विधानसभा हैं– बिल्हौर, बिठूर, कल्याणपुर, गोविंद नगर, सीसामऊ, आर्य नगर, किदवई नगर, कैंट विधानसभा, महाराजपुर और घाटमपुर। इनमें बिल्हौर और घाटमपुर दो विधानसभा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। पहले बात बिल्हौर (आरक्षित) सीट की। 3 लाख 80 हजार मतदाताओं वाले बिल्हौर विधानसभा में जाटव वोटरों की संख्या लगभग 63 हजार है। इसके बाद कुर्मी मतदाता 45 हजार, ब्राह्मण मतदाता 40 हजार, पाल मतदाता 37 हजार, यादव 35 हजार, मुस्लिम 30 हजार, कोरी वोटर 29 हजार, लोधी वोटर 25 हजार और दिवाकर 22 मतदाता हैं।

पिछली बार 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के भगवती प्रसाद सागर (1,02,326 वोट) ने बसपा के कमलेश चंद्र दिवाकर (71,160 वोट) को हराया था। वहीं सपा के शिव कुमार बेरिया 60,023 मतों के साथ तीसरे स्थान पर थे। इस बार बसपा ने मधु गौतम, सपा ने रचना सिंह, कांग्रेस ने उषा रानी कोरी, भाजपा ने राहुल बच्चा सोनकर को उम्मीदवार बनाया है। ग्रामीण इलाकों में सड़क, पानी और बिजली की समस्या है। इसके अलावा बेरोज़गारी और खेती किसानी के लिए आवारा पशु भी बड़ी समस्या हैं। 

घाटमपुर में हो सकता है त्रिकोणीय मुकाबला 

घाटमपुर विधानसभा कानपुर जिले की दूसरी आरक्षित सीट है। करीब 3.25 लाख मतदाताओं वाले इस विधानसभा सीट पर 2.31 लाख पिछड़े वर्ग और अनुसूचित जाति के मतदाता हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अन्य सामान्य वर्ग के क़रीब 70 हजार मतदाता हैं। सामाजिक समीकरण की बात करें तो सबसे ज्यादा 1,08,000 दलित मतदाता हैं। इसके बाद ब्राह्मण 45,000, मुस्लिम 28,000, निषाद 22,500, ठाकुर 22,000, यादव 22,000, कुर्मी 18,000, पाल 18000, कुशवाहा 4200 और अन्य मतदाता 20,000 हैं। 

2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी कमला रानी विधायक बनीं। कोरोना संक्रमण में उनकी मौत के बाद हुए उपचुनाव में भाजपा के उपेंद्र (60405 मत) ने कांग्रेस कृपाशंकर शंखवार (36685 मत) को हराया जबकि सपा के 2012 विधायक इंद्रजीत कोरी चुनाव में चौथे स्थान पर रहे थे। उन्हें केवल 22735 मत मिले। वहीं इस बार अपना दल (भाजपा गठबंधन) ने सरोज कुरील, सपा ने भगवती सागर, कांग्रेस ने राज नारायणी, बसपा ने प्रशांत अहिरवार को उम्मीदवार बनाया है। 

रसूलाबाद विधानसभा 

कानपुर देहात में चार विधानसभा सीटें हैं– रसूलाबाद, रानियां, सिकंदरा, भोगनीपुर। रसूलाबाद आरक्षित सीट है। रसूलाबाद सीट का गठन 2012 में परिसीमन के बाद हुआ। करीब 3. 20 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर लगभग 1.10 लाख अनुसूचित जाति के मतदाता हैं। इसके बाद लोधी मतदाता 60 हजार, ब्राह्मण 27 हजार, क्षत्रिय 25 हजार, यादव 25 हजार, मुस्लिम 20 हजार, पाल 22 हजार हैं। पिछली बार यानी 2017 में भाजपा की निर्मला संखवार ने सपा के अरुण कुमारी कोरी को 33,394 वोटों से हराया था। 2022 विधानसभा चुनाव के लिये भाजपा ने पूनम संखवार, सपा ने कमलेश चंद्र दिवाकर, कांग्रेस ने मनोरमा संखवार, बसपा ने सीमा सिंह को उम्मीदवार बनाया है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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