जिंदा होने का मानदंड प्रस्तुत करतीं एन.के. नंदा की कविताएं

इस संग्रह में कवि बार-बार आदिवासियों की ओर देखता हैं, उनकी जिंदगी में झांकता है, उनके दुखों को अपनाता हैं, उनके संघर्षों के इतिहास को याद करता हैं और आज के दौर में जनविरोधी सत्ता द्वारा उनके खिलाफ किए जा रहे अत्याचारों से व्याकुल होता है। पढ़ें, एन. के. नंदा के पहले काव्य संग्रह ‘जिंदा आदमी’ में संकलित डॉ. सिद्धार्थ की भूमिका का अंश

[वामपंथी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानेवाले नंदा कुमार नंदा बिहार विधान सभा के पूर्व सदस्य हैं। आंदोलन के उनके साथी उन्हें नंदा जी कहकर संबोधित करते हैं। करीब साढ़े तीन दशक के अपने वामपंथी जीवन को उन्होंने अपनी कविताओं के जरिए अभिव्यक्त की है। प्रस्तुत भूमिका उनके पहले कविता संग्रह ‘जिंदा आदमी’ (प्रकाशक कीकट प्रकाशन, पटना) से है, जिसके लेखक डॉ. सिद्धार्थ हैं। यहां हम उनकी सहमति से इस भूमिका का अंश प्रकाशित कर रहे हैं।]

यही तो फर्क़ है
मुर्दा और जिंदा आदमी में
मुर्दा सपना नहीं देखता
और, जिंदा आदमी
सपनों को मरने नहीं देता है

एन. के. नंदा की उपरोक्त काव्य पंक्तियां, उनके व्यक्तित्व का सार हैं। जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही, अपने जीवन को क्रांति के लिए समर्पित करने वाले नंदा जी अपने ताप-तेवर में आज भी क्रांतिकारी भावना और चेतना से लैस व्यक्तित्व हैं। उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा जेल की सलाखों के बीच गुजारा है और एक बड़ा हिस्सा भूमिगत क्रांतिकारी के रूप में। भारतीय समाज में आमूल-चूल परिवर्तन उनका सबसे बड़ा सपना रहा है। शोषण-उत्पीड़न और अन्याय का कोई भी रूप उन्हें स्वीकार नहीं हैं, चाहे वे दुनिया के किसी कोने में हो रहा हो। न्याय, समता, बंधुता और संसाधनों का समान बंटवारा उनकी आंखों में बसा सबसे सुनहरा सपना है। वे लोकतांत्रिक समाजवादी भारत का स्वप्न देखते हुए बड़े हुए और आज उसी सपने के लिए किसी न किसी रूप में संघर्षरत हैं। ‘जिंदा आदमी’ शीर्षक उनका कविता संग्रह उनकी क्रांतिकारी भावना और चेतना की भाषायिक अभिव्यक्ति है।

इस संग्रह में कुल 57 कविताएं हैं। एन. के. नंदा मूल रूप से कवि नहीं है और ना ही साहित्य की दुनिया में रचे-बसे साहित्यकार हैं। उनकी कविताएं उनकी क्रांतिकारी भावनाओं और चेतना की सहज-सरल अभिव्यक्ति हैं। बिना किसी भाषायी सजावट और बुनावट को उन्होंने अपनी भावनाओं को जस का तस रख दिया है। अपनी एक कविता में वे स्वयं को जनता का कवि कहते हैं–

 मैं जनता का कवि हूं
 सत्ता का चारण नहीं
 मैं अंधेर में
 मशाल जलाता हूं
 और विप्लव राग गाता हूंं

नंदा जी कविता को सत्ता से टकराने का हथियार मानते हैं। वे ‘कवि और तानाशाह’ शीर्षक कविता में लिखते हैं–

 जब कवि की कविता
 हथियार बन जाती है
 और सत्ता से टकराती है
 तब देश रणभूमि में तब्दील हो जाता है

वहीं कविताओं के बारे में उनकी राय है–

हर युग में
कविता जिंदा रहती है
और तानाशाह की मौत होती है

एन. के. नंदा और उनके पहले काव्य संग्रह का आवरण पृष्ठ

कवि रूप में भी नंदा जी क्रांति की मशाल को ही थामें रहते हैं, अपनी कविता को गूंगों का गीत और वंचितों के सपनों के रूप में अभिव्यक्त करते हैं– 

 उसकी कविता
 अंधेरे में मशाल बन जाती है
 और गूंगों के होठों पर गीत
 उसके सपने
 वंचितों के सपने बन जाते हैं

नंदा जी कवि को सबसे सचेत नागरिक के रूप में देखते हैं, जो अतीत और वर्तमान को बखूबी आत्मसात किए हुए, बेहतर भविष्य का सपना देखता है– 

 कवि त्रिकालदर्शी होता है
 उसकी आंखों में
 अतीत और वर्तमान होता है
 और होते हैं, भविष्य के सुनहले सपनें

नंदा जी की काव्य संवेदना के दायरे में सबसे अधिक आदिवासी, दलित, मजदूर और महिलाएं आती हैं। हमारे देश में मजदूरों की क्या हालात है, इसको बयान करती उनकी एक मार्मिक कविता ‘रोटी के लिए’ है, जिसमें एक मजदूर की जिंदगी का पूरा बयान है, विशेषकर कोरोना काल में पलायन का शिकार हुए मजूदरों की जिंदगी की दास्तान है–

 वह रोटी के लिए निकला था
 अपने घर से दूर
 सैकड़ों मील दूर
 अनजान राहें
 अनजान शहर
 अनजान लोग

 x x x 

 वह नहीं पहुंचा
 अपने गांव (वापस)
 नहीं ला सका
 मुनिया के लिए
 फ्राक और जूती
 मां के लिए साड़ी
 और पत्नी के लिए चूड़ियां
 नहीं बनवा सका
 बूढ़े पिता का नया चश्मा

इस संग्रह में कवि बार-बार आदिवासियों की ओर देखता हैं, उनकी जिंदगी में झांकता है, उनके दुखों को अपनाता हैं, उनके संघर्षों के इतिहास को याद करता हैं और आज के दौर में जनविरोधी सत्ता द्वारा उनके खिलाफ किए जा रहे अत्याचारों से व्याकुल होता है– 

 सुदूर जंगलों में
 जहां रहते हैं
 लोहे की तरह मजबूत काले आदिवासी
 जहां छिपी हैं, जमीन के नीचे
 वेशकीमती खानें

एन. के. नंदा जड़ और एकांगी दृष्टि वाले क्रांतिकारी-वामपंथी नहीं हैं, उन्हें तथ्य का अच्छी तरह अहसास है कि भारत में वर्ग-जाति एक दूसरे इस कदर घुले-मिले हैं कि जाति को छोड़कर निरपेक्ष तरीके से वर्ग की बात करना एकांगी होना है और जाने-अनजाने वर्चस्वशाली जातियों-वर्गों के पक्ष में खड़ा हो जाना हैं। इसलिए अपने नायकों के रूप में भगत सिंह के साथ शंबूक, एकलव्य और राजा बलि आदि को भी याद करते हैं, तो शोषकों-उत्पीड़कों के नायक के रूप में दशरथ पुत्र राम को भी चिन्हित करते हैं। ‘इतिहास का स्वर्णकाल कविता’ में वे लिखते हैं–

 एक थे, हमारे पुरखे-राजा बलि
 महाबली, न्यायी और महादानी

 x x x x x

 ले लिया छल से एकलब्य का अंगूठा
 तुम्हारा ही ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’
 काट लिया निहत्थे तपस्वी का गरदन 

नंदा जी मेहनतकशों और दलित-बहुजनों के इतिहास को गौरवशाली इतिहास मानते हैं–

 हमारा गौरवशाली इतिहास है
 आत्मसमर्पण न करना
 और वीरता के साथ लड़ते रहने का
 और वर्तमान भी ऐसा ही है
 हम लड़ रहे हैं, लड़ेंगे
 और एक दिन जीतेंगे 

इस कविता संग्रह के कविताएं सत्ता से, शासकों से, समाज से और समाज के कर्णधारों से एक बाद एक सवाल करती हैं। जहां कवि सत्ताधारियों से सवाल करता है, वहीं वह समाज में बदलाव की चाहत रखने वाले लोगों से भी सवाल करता है और उन्हें भी कघटरे में खड़ा करता है। कवि ललकारते हुए कहता है– 

 जिंदा हो
 जिंदा होने का सबूत दो
 जिंदा आदमी
 प्यार करता है, अपने वतन से
 वतन की मिट्टी से, हवा और पानी से
 वह प्यार करता है
 पेड़ों, नदियों और जंगलों से
 वह प्यार करता है
 आसमान में उड़ते परिंदों से
 और उन्मुक्त उड़ान भरती बेटियों से

सपना, संघर्ष और जीत की उम्मीद और अन्याय का प्रतिवाद एवं प्रतिरोध इस कविता संग्रह के बीज शब्द हैं, जो बार-बार आतें हैं, जो कवि के क्रांतिकारी व्यक्तित्व का सबूत भी हैं और मानदंड भी।

(संपादन : नवल/अनिल)


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