दलित पैंथर : पचास साल पहले जिसने रोक दिया था सामंती तूफानों को

दलित पैंथर के बारे में कहा जाता है कि उसका नाम सुनते ही नामी गुंडे भी थर्रा उठते थे और दलित पैंथर के उभार तथा कार्यशैली के कारण स्थानीय पुलिस को भी अपनी दलितों के प्रति कार्यशैली बदलनी पड़ी। बता रहे हैं द्वारका भारती

दलित पैंथर के स्थापना की पचासवीं वर्षगांठ (29 मई, 1972) पर विशेष

अमेरिकी अश्वेतों द्वारा 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध में संचालित ब्लैक पैंथर आंदोलन से प्रेरणा लेकर भारत में उभरा दलित पैंथर जैसा आंदोलन भले ही उसकी तरह ज्यादा चर्चा न बटोर सका था, लेकिन दलित पैंथर जैसे आंदोलन को कम मारक नहीं कहा जा सकता। दलित पैंथर की उग्रता और जुझारूपन कहीं भी ब्लैक पैंथर से कमतर नहीं आंकी जा सकती। इन दोनों आंदोलनों में एक समानता यह भी है कि जिस प्रकार ब्लैक पैंथर जैसे आंदोलन के पीछे साहित्यिक-प्रेरणा का एक बहुत बड़ा हाथ था, उसी प्रकार दलित पैंथर के पीछे मराठी साहित्य तथा उसके साहित्यकारों का अहम योगदान रहा है। यदि इस आंदोलन को एक साहित्यिक आंदोलन भी कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ऊंचे-ऊंचे वैचारिक दुर्गों को ध्वस्त करती हुई साहित्यिक कृतियां दोनों आंदोलनों के सशक्त आधार रहे हैं, जिसने आमजन को उसी प्रकार प्रभावित किया, जिस प्रकार तुरही के वादन से योद्धाओं के बाजू फड़क उठते हैं और वे युद्ध के मैदान में इस प्रकार कूद जाते हैं जैसे आसमान से गिरते ओले धरती पर सफेद चादर तान देते हैं। इन अर्थों में यदि दलित पैंथर को परिभाषित किया जाये तो यह कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि मराठी के दलित साहित्य ने इस आंदोलन को उसी प्रकार संवारा, जिस प्रकार एक मां अपने बच्चे को इस आशय से लालन-पालन करती है कि बड़ा होकर वह युद्ध के मैदान को नापेगा।

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