गत 5 अक्टूबर, 2022 को अशोक विजय दशमी और धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस के मौके पर दिल्ली सरकार में कैबिनेट मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने करीब 10 हजार लोगों के साथ हिंदू धर्म के त्याग और बुद्ध धम्म ग्रहण करने के कार्यक्रम में हिस्सेदारी की। इस कार्यक्रम में 14 अक्टूबर 1956 को डॉ. आंबेडकर द्वारा हिंदू धर्म के त्याग और बौद्ध धम्म ग्रहण करने के दौरान ली गई 22 प्रतिज्ञाओं को भी दोहराया गया। राजेंद्र पाल गौतम ने भी इन प्रतिज्ञाओं को दोहराया। जैसे ही इस कार्यक्रम का वीडियो वायरल हुआ, राजेंद्र पाल गौतम भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं के निशाने पर आ गए। वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल को यह नागवार गुजरा। परिणाम यह हुआ कि गत 9 अक्टूबर, 2022 को राजेंद्र पाल गौतम से इस्तीफा ले लिया गया।
अरविंद केजरीवाल कभी खुद को कट्टर हिंदू तो कभी खुद को आंबेडकरवादी कहते फिरते हैं। बतौर उदाहरण यह कि पंजाब चुनाव से पहले केजरीवाल ने बड़े जोर-जोर से खुद को डॉ. आंबेडकर और भगत सिंह के अनुयायी के रूप में प्रस्तुत किया तथा वादा किया कि पंजाब सरकार के सरकारी दफ्तरों में डॉ. आंबेडकर और भगत सिंह की ही सिर्फ तस्वीरें लगाई जाएंगीं। उन्होंने इस वादे को पूरा भी किया और स्वयं को डॉ. आबेडकर के अनुयायी के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने तो यहां तक कहा कि वह जो कुछ भी कर रहे हैं, वह डॉ. आंबेडकर के सपने को पूरा करने के लिए ही कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ खुद को सबसे बड़े रामभक्त और कृष्णभक्त के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे। अब राजेंद्र पाल गौतम से इस्तीफा लेने के प्रकरण से केजरीवाल की हकीकत जगजाहिर हो गई है।

दरअसल, 2013 में भ्रष्टाचार के विरोध और लोकपाल की मांग को लेकर चले अन्ना हजारे आंदोलन से देश की राजनीति में दो नेताओं ने पर्दापण किया। एक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी और दूसरे अरविंद केजरीवाल। इन दोनों के राजनीतिक चरित्र में साम्यता यह है कि ये दोनों बहुरूपिया के समान राजनीतिक आचरण करते हैं। मसलन, एक नरेंद्र मोदी ने खुद को पिछड़ों, दलितों और आम आदमी (चाय बेचने वाला) के नेता के रूप में प्रस्तुत किया और हिंदुत्व का दुशाला ओढ़े रखा है। वहीं दूसरे अरविंद केजरीवाल ने झाडू प्रतीक चिन्ह के साथ खुद को भारत के गरीब आम आदमी के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया और समय-समय पर वे अलग-अलग विचारों का दुशाला ओढ़ते रहे हैं। कभी वह स्वयं को डॉ. आंबेडकर का अनुयायी कहते हैं तो कभी भगत सिंह और कभी खुद को रामभक्त हनुमान के रूप में भी प्रस्तुत करते हैं। अभी हाल में गुजरात में यह कहकर कि उनका जन्म जन्माष्टमी को कंस (असुरी शक्ति) का बध करने के लिए हुआ, उन्होंने खुद को इशारों-इशारों में कृष्ण का अवतार घोषित कर दिया।
राजेंद्र पाल गौतम द्वारा समूह में ली गयीं 22 प्रतिज्ञाओं में 8 प्रतिज्ञाएं ऐसी हैं, जो सीधे तथाकथित हिंदू धर्म (सनातन धर्म), उनके ईश्वरों, देवी-देवताओं, ब्राह्मणों की श्रेष्ठता और हिंदू कर्मकांड़ों का निषेध करती हैं। वे 8 प्रतिज्ञाएं निम्नलिखित हैं–
- मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूंगा और न ही मैं उनकी पूजा करूंगा।
- मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूंगा और न ही मैं उनकी पूजा करूंगा।
- मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूंगा और न ही मैं उनकी पूजा करूंगा।
- मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूं।
- मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे। मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूं।
- मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूंगा और न ही पिंड-दान दूंगा।
- (8वीं) मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूंगा।
- (19वीं) मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूं, जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है, क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूं।
इन 22 प्रतिज्ञाओं में पहली प्रतिज्ञा हिंदू धर्म के मुख्य त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) को खारिज कर देती है और उनकी पूजा न करने का आह्वान करती है। दूसरी प्रतिज्ञा हिंदू धर्म, आरएसएस और भाजपा के सबसे बड़े आराध्य और सांस्कृतिक पुरूष राम को चुनौती देती है, जिसे केंद्र में रखकर आरएसएस-भाजपा ने भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए अभियान चलाया और राजनीतिक विजय हासिल की। बाबरी मस्जिद का विध्वंस ही राम को भारत के शीर्ष सांस्कृतिक-धार्मिक नायक के रूप में स्थापित करने के लिए किया गया था, जहां आज भव्य राम मंदिर बन रहा है।
राजेंद्र पाल गौतम द्वारा 22 प्रतिज्ञाएं लेने के वीडियो के सामने आने और भाजपा द्वारा उनके इस्तीफे की मांग ने केजरीवाल के सामने राम और राम को खारिज करने वाले डॉ. आंबेडकर में से एक का चुनाव करने का विकल्प प्रस्तुत कर दिया। लेकिन केजरीवाल ने राम का विकल्प चुना।
निश्चित तौर पर यदि केजरीवाल राजेंद्र पाल गौतम को अपने मंत्रिमंडल में बनाए रखते, तो यह संदेश जाता कि वह राम को खारिज करने की प्रतिज्ञा के साथ खड़े हैं। लेकिन उन्होंने राजेंद्र पाल गौतम को मंत्रिमंडल से निकालकर भारत के हिंदुओं, विशेषकर ऊंची जाति के लोगों को खुला संदेश दिया कि यदि राम और आंबेडकर में चुनाव का प्रश्न आएगा तो वह राम को चुनाव करेंगे और आंबेडकर को किनारे लगा देंगे।
बहरहाल, यदि केजरीवाल आंबेडकर के साथ खड़े होते, तो उनकी खुद को कट्टर हिंदू साबित करने की कोशिश का क्या होता और उनकी रामभक्त हनुमान की छवि का क्या होता? यह कहना अतिशयोक्ति नहीं केजरीवाल में न तो इतना नैतिक बल नहीं है और न ही उनके ऐसे विचार हैं कि वे हिंदुओं, विशेषकर ऊंची जाति के लोगों को नाराज कर सकें। वजह यह कि उनकी खुद की पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी हिंदू धर्म के ऊंची जातियों से बना है। केजरीवाल के सबसे चहेते और आम आदमी पार्टी में दूसरे नंबर के नेता मनीष सिसोदिया बड़े गर्व से खुद को राजपूत कहते हैं।
डॉ. आंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाओं में छठी और आठवीं प्रतिज्ञा सीधे तौर पर ब्राह्मणों की श्रेष्ठता चुनौती देती हैं। यही वजह रही कि इन प्रतिज्ञाओं से ब्राह्मण जाति के मनोज तिवारी बिलबिला उठे और हिंदू धर्म की रक्षा के नाम पर अपनी श्रेष्ठता की रक्षा के लिए मैदान में कूद पड़े। इतना ही नहीं वे राजेंद्र पाल गौतम को मंत्रिमंडल से हटाने और उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की मांग करने लगे। फिर क्या आश्चर्य कि स्वयं को रामभक्त हनुमान कहनेवाले अरविंद केजरीवाल ने ब्राह्मणों को खुश करने के लिए शंबूक रूपी राजेंद्र पाल गौतम की बलि चढ़ा दी।
(संपादन : नवल/अनिल)
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