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हिंदू राष्ट्र की स्थापना न हो कॉलेजियम के विरोध का उद्देश्य, न्यायालयों में प्रतिनिधित्वता आवश्यक

डॉ. मोहन गोपाल ने पांच महिला न्यायाधीशों की तस्वीर का उदाहरण दिया, जिसे कैप्शन के साथ प्रचारित किया जा रहा था। उनका कहना था कि “सत्ता पक्ष के लोग इसमें पांच महिलाओं को देखते हैं और मैं केवल पांच ब्राह्मणों को देखता हूं, जो विविधता की कमी की ओर संकेत करता है।” पढ़ें, स्वदेश कुमार सिन्हा का यह आलेख

पिछले दिनों देश में कुछ ऐसी घटनाएं और बातें हुईं, जिससे लोगों की यह आशंका वास्तविकता में तब्दील होती जा रही है कि लोकतंत्र खतरे में है। लोगों को यह लगने लगा है कि मौजूदा केंद्र सरकार कार्यपालिका, स्वायत्त संवैधानिक संस्थाएं यथा चुनाव आयोग की तरह न्यायपालिका को भी अपने क़ब्ज़े में लेने को आतुर है। वह संसद के जरिए संवैधानिक प्रावधानों में फेरबदल कर लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र कोहिंदू राष्ट्रमें बदलना चाहती है। इसके लिए अभी उसके निशाने पर देश की न्यायपालिका है ताकि वह उससे मनमाने फैसले करवा सके।

इसकी एक झलक इस दौर में सुप्रीम कोर्ट द्वारा कुछ दिए गए फ़ैसलों में मिलती भी है चाहे वह रामजन्म भूमिबाबरी मस्जिद विवाद का फ़ैसला हो या गरीब सवर्णों को आरक्षण संबंधी फ़ैसला।यह देखने की बात है कि सरकार के पक्ष में दिए गए इन फ़ैसलों के बाद इनमें से एक न्यायाधीश को राज्यसभा की सदस्यता दे दी जाती है तथा दूसरे को राज्यपाल बना दिया जाता है। 

जाहिर तौर पर यह कोई संयोग नहीं है। हालांकि न्यायपालिका में आयी इस गिरावट के इतर एक दूसरा पक्ष यह भी है कि आज के दौर में भी अनेक न्यायाधीश न्यायपालिका में सरकारी हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ डटकर खड़े भी हैं। 

पिछले दिनों एक मीडिया संस्थान द्वारा आयोजित कार्यक्रम में केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने जजों को लगभग धमकाते हुए कहा किकुछ सेवानिवृत्त जज भारत विरोधी गैंग के साथ हैं। वे विरोधी दलों की भूमिका निभा रहे हैं।उन्होंने चेतावनी दी किऐसे भारत विरोधी लोगों को भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी। उनके ऊपर कानून के अनुसार कार्यवाही की जाएगी।” उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग न्यायालयों में चले जाते हैं तथा न्यायिक प्रक्रिया में बदलाव और हस्तक्षेप की बात कहते हैं। कुछ जज रिटायरमेंट के बाद एक्टिविज्म कर रहे हैं तथा देशविरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं।” 

सवाल है कि सेवानिवृत्त जजों पर कानूनी कार्यवाही करने का अर्थ यह है कि अब राजनेताओं की तरह उनके घरों पर भी ईडी और सीबीआई द्वारा छापेमारी की जा सकती है? आख़िर यह क्यों हुआ कि केंद्रीय कानून मंत्री को जजों को सीधेसीधे धमकाना पड़ गया? किरेन रिजिजू के पहले एनडीए के शासनकाल में ही रविशंकर प्रसाद और अरुण जेटली कानून मंत्री थे, लेकिन ऐसी नौबत कभी नहीं आई। अगर थोड़ी गहराई में जाएं तो सारी बातें स्पष्ट हो जाती हैं। 

ध्यातव्य है कि 1993 से देश के उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलेजियम के तहत होती है। इस प्रणाली में छह जजों का एक पैनल होता है, जिसमें सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश भी होते हैं। इसमें क्षेत्रीय विविधता के साथसाथ विभिन्न जातियों तथा धर्मों के उचित प्रतिनिधित्व की कोशिश की जाती है। वर्तमान केंद्र सरकार इस प्रणाली को समाप्त कर सीधे न्यायाधीशों की नियुक्ति करना चाहती है। 

इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नागवार गुजरनेवाली कुछ टिप्पणियां की है। मसलन, मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के संदर्भ में उसने कहा कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का अधिकार केवल सरकार के हाथ में नहीं है। इसके लिए कमेटी बनाई जानी चाहिए, जिसमें सरकार और विपक्ष के प्रतिनिधि हों तथा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश भी हों। केंद्र सरकार ने हालांकि सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का विरोध भी किया, लेकिन कोर्ट ने उसकी एक न सुनी।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा बिलकिस बानो के अपराधियों को रिहा करने संबंधी गुजरात सरकार के फैसले को चुनौती दिये जाने संबंधी याचिका की सुनवाई की पहल किया जाना भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। वहीं एक महत्वपूर्ण मामला जजों की नियुक्ति का था, जिसमें कॉलेजियम ने कुछ जजों का नाम केंद्र सरकार के पास भेजा था, जिसे सरकार ने ख़ारिज़ कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से ख़ारिज़ करने का आधार पूछा और स्वयं ही उन खुफिया रपटों को भी सार्वजनिक कर दिया, जिनके आधार पर नियुक्तियां ख़ारिज़ की गई थीं। 

डॉ. मोहन गोपाल, सुप्रीम कोर्ट व किरेन रिजिजू

एक मामला हिडनवर्ग रिपोर्ट का भी है। यह मामला अडाणी समूह के कथित घोटालों की जांच से जुड़ा था। इसके दायरे में सिक्यूरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) की भूमिका भी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक कमेटी का गठन किया है। 

सवाल उठता है कि क्या ये सब मामले ही मुख्य कारण हैं, जिनकी वजह से न्यायपालिका सरकार की आंखों में कांटे की तरह चुभ रहे हैं? 

एक सवाल यह भी है कि क्या केंद्र सरकार अपने हिंदूवादी एजेंडों को लागू करने के लिए भले संविधान की जगह मनुस्मृति लागू न करे लेकिन वर्तमान संविधान के कुछ प्रारूपों में ऐसी छेड़छाड़ करने जा रही है, जो उसके एजेंडे के अनुरूप हो? 

इस संबंध में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति व प्रसिद्ध कानूनविद डाॅ. मोहन गोपाल कहते हैं कि आज ऐसे न्यायाधीशों की संख्या बढ़ रही है, जो कानून के स्रोत को संविधान की अपेक्षा धर्म को मानते हैं। बीते दिनों एक कार्यक्रम में डाॅ. गोपाल ने कहा कि यह सरकार की हिंदू राष्ट्र स्थापित करने की रणनीति का एक अंग है। उन्होंने आगे बताया कि 2004 से अब तक यूपीए और एनडीए काल में 101 जज नियुक्त हुए, जिसमें 56 जज यूपीए काल में और 55 जज एनडीए काल में नियुक्त किए गए। 

उन्होंने कहा कि “मैंने पाया कि यूपीए के कार्यकाल में ऐसे छह न्यायाधीश ऐसे थे, जिन्हें हम मोटे तौर पर संविधानवादी न्यायाधीश कह सकते हैं – मतलब यह कि वे संविधान की सर्वोच्चता में विश्वास रखते थे। मैं उन्हें उदारवादी या प्रगतिशील नहीं कहूंगा – मैं उन्हें केवल संविधानवादी कहूंगा, जो पूरी दृढ़ता से, पूरी गहराई से यह मानते थे कि केवल और केवल संविधान ही उनके निर्णयों की कसौटी हो। मैं ऐसे केवल छह न्यायाधीश ही ढूंढ पाया, जिनके बारे में मैं अपने दिल पर हाथ रखकर यह कह सकता था कि अगर मेरे द्वारा दायर कोई प्रकरण उनके समक्ष प्रस्तुत हो तो वे उस पर जो निर्णय सुनाएंगे – चाहे वह मेरे पक्ष में हो या मेरे खिलाफ – वह केवल संविधान की उनकी समझ पर आधारित होगा और संविधान के अतिरिक्त किसी भी अन्य कानून से प्रभावित नहीं होगा। ऐसे जजों की संख्या एनडीए शासनकाल में नौ हो गई। क्यों? इसलिए नहीं क्योंकि एनडीए सरकार ऐसे व्यक्तियों को न्यायाधीश बनाने में रूचि रखती थी, जिनकी संविधान में निष्ठा असंदिग्ध हो। बल्कि वास्तविकता इसके ठीक उलट है …परंतु यह इसलिए हुआ क्योंकि कॉलेजियम ने सरकार की कार्यवाहियों का प्रतिरोध किया….दूसरी तरफ अगर आप यह देखें कि ऐसे कितने न्यायाधीश हैं, जो संविधान के बाहर जाकर सनातन धर्म या वेदों या प्राचीन भारतीय विधिक सिद्धांतों को अपने निर्णय का आधार बनाते हैं … और यह इसलिए नहीं, क्योंकि वे सरकार के प्रभाव में हैं या सेवानिवृत्ति के बाद कोई पद पाने के इच्छुक हैं – बल्कि इसलिए क्योंकि वे सचमुच वेदों आदि को संविधान से ऊपर मानते हैं, तो कम से कम उनके लिखित निर्णयों के आधार पर मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि इनमें से किसी की भी नियुक्ति यूपीए सरकार द्वारा की गई थी। वर्ष 2014 में एनडीए के सत्ता में आने के बाद ऐसे नौ जज नियुक्त किए गए, जिनमें से पांच अभी भी कार्यरत हैं, जो अपने निर्णयों में यह स्पष्टतः इंगित कर चुके हैं कि वे संविधान के बाहर जा सकते हैं, जैसा कि, उदाहरण के लिए, अयोध्या मामले में हुआ। कुछ जजों ने संविधान से बाहर जाकर अपना निर्णय सुनाया। तो इस प्रकार ऐसे जजों, जो परंपरावादी हैं या धर्म से प्रेरित हैं और जो धर्म, न कि संविधान को कानून का स्त्रोत मानते हैं, ऐसे जजों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है।”   

डॉ. मोहन गोपाल के अनुसार, एनडीए के शासन के दौरान इस तरह के न्यायाधीशों की संख्या तेजी से बढ़ी, जो यह मानते हैं कि कानून का स्रोत संविधान होकर वेद या धार्मिक ग्रंथ हैं। उन्होंने आगे कहा कि, “यह प्रयास उस रणनीति का पहला चरण है, जिसमें 2047 तक हिंदू राष्ट्र स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।उन्होंने संभावना व्यक्त की कि इस लक्ष्य का उद्देश्य संविधान की एक हिन्दू दस्तावेज रूप में व्याख्या करना है। इसका पहला चरण है संविधान से परे ऐसे न्यायाधीशों की नियुक्ति करना, जो संविधान के प्रावधानों की धार्मिक दृष्टि से व्याख्या कर सकें। एक उदाहरण हिज़ाब विवाद के फ़ैसले का भी है, जहां दो न्यायाधीशों में एक न्यायाधीश ने कहा कि संविधान धर्मनिरपेक्ष नहीं, बल्कि पंथनिरपेक्ष है। उन्होंने कहा कि धर्म संविधान पर लागू होता है तथा संवैधानिक कानून ही धर्म है और धर्म से उनका तात्पर्य सनातन धर्म है। हमें कानून को लागू करने में धर्म का भी ध्यान रखना चाहिए।” इस तुलना के आधार पर दावा किया कि सरकारी स्कूलों में पूजा करना स्वीकार्य हो सकता है, क्योंकि यह धर्म का हिस्सा है, लेकिन हिज़ाब स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि यह धर्म में नहीं है। न्यायाधीशों ने अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए उच्च न्यायालय के एक जज का उदाहरण दिया, जिसने ख़ास वैदिक स्त्रोतों का उल्लेख करते हुए कहा था कि यह भी कानून के विशेष प्रावधानों का स्रोत है।”

जब यह क़दम अगले 24 सालों में पूरा हो जाएगा, तब भारत में संविधान के अंतर्गत एक हिंदू धर्म पर आधारित शासन की स्थापना होगी, जिसे सुप्रीम कोर्ट में भी मान्यता प्राप्त होगी। इस संदर्भ में डॉ. गोपाल का कहना था किकॉलेजियम इस ख़तरे से अनजान नहीं है तथा इसके ख़िलाफ़ कुछ प्रतिरोध की कोशिशें भी कर रहा है। उन्होंने एक और महत्वपूर्ण तथ्य की ओर इशारा किया। सुप्रीम कोर्ट में विविधता की कमी के बारे में अपनी चिंता व्यक्त की। विविधता की कमी प्रतिनिधित्व की कमी होती है और यह एक बड़े ख़तरे का कारण बनती है। उनका तर्क है कि हमारी संवैधानिक परियोजनाएं और दृष्टिकोण इस देश को चलाने वाले अभिजात्य वर्ग के दृष्टिकोण से मेल नहीं खातीं, क्योंकि अधिकांश शक्तियां केवल चार समुदाय के हाथ में ही हैं और संविधान को छोड़कर इसे रोकने वाला कोई नहीं है। हमारा संविधान लोकतंत्र, समानता, स्वतंत्रता, मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्षता के साथ सीधेसीधे अभिजात्य दृष्टिकोण को चुनौती देता है। आज जब हम सुप्रीम कोर्ट की सामाजिक संरचना को देखते हैं, तो हम पाते हैं कि इसे बिना किसी विविधता के संरक्षित किया गया है। यह स्वीकार करते हुए कि सामाजिक और लैंगिक दृष्टिकोण से न्यायपालिका में विविधता लाने में प्रगति ज़रूर हुई है, लेकिन अभी भी प्रतिनिधित्व की कमी बनी हुई है।” 

डॉ. गोपाल ने पांच महिला न्यायाधीशों की तस्वीर का उदाहरण दिया, जिसे कैप्शन के साथ प्रचारित किया जा रहा था। उनका कहना था कि “सत्ता पक्ष के लोग इसमें पांच महिलाओं को देखते हैं और मैं केवल पांच ब्राह्मणों को देखता हूं, जो विविधता की कमी की ओर संकेत करता है। आज जब सरकार संविधान को नष्ट करने तथा एक धार्मिक शासन की स्थापना करने के लिए न्यायपालिका का उपयोग करने के लिए एक क़दम आगे बढ़ रही है, ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट में सामाजिक विविधता की बहुत ज़रूरत है तथा वर्तमान सरकार, जिसका मिशन वर्तमान लोकतंत्र को हटाकर एक धार्मिक शासन को लाना है, उसे न्यायपालिका की नियुक्ति में कोई भी भूमिका देना ख़तरनाक होगा।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

स्वदेश कुमार सिन्हा

लेखक स्वदेश कुमार सिन्हा (जन्म : 1 जून 1964) ऑथर्स प्राइड पब्लिशर, नई दिल्ली के हिन्दी संपादक हैं। साथ वे सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक विषयों के स्वतंत्र लेखक व अनुवादक भी हैं

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