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दलित-बहुजन आंदोलनों का परिणाम है राहुल गांधी का सामाजिक न्याय संबंधी आह्वान

राहुल गांधी ने सामाजिक न्याय, समानुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर ‘जितनी आबादी, उतना हक’ का आह्वान किया है। उन्होंने जातिगत जनगणना के महत्व को न केवल रेखांकित किया है, बल्कि इसकी मांग भी की है। इस बारे में बता रहे हैं विद्या भूषण रावत

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कर्नाटक में अपनी पार्टी के चुनाव अभियान की शुरुआत करते हुए कहा कि यदि नरेंद्र मोदी की सरकार वाकई में पिछड़े वर्ग की हितैषी है, जैसा कि वह दावा करती है, तो वह पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के समय किये गए जाति आधारित आर्थिक सामाजिक जनगणना के आंकड़े क्यों नहीं जारी कर रही है। यदि सरकार को यह पता ही नहीं होगा कि देश में सभी समुदायों की आबादी कितनी है, तो वह उनके कल्याण के लिए योजनाएं कैसे बनाएगी। राहुल गांधी ने कहा कि यदि हम सत्ता और संपदा पर अधिकारों की बात करना चाहते हैं तो हमे पता होना चाहिए कि देश की आबादी और संसाधनों पर किन जातियों की कितनी भागीदारी है। 

दरअसल उन्होंने आगे बढ़ कर कहा कि सरकार 50 फीसदी आरक्षण की सीमा को खत्म करे ताकि विभिन्न जातियों के लोगों को उनकी आबादी के अनुसार भागीदारी मिले। इस प्रकार कांग्रेस ने अब यह नारा दिया है– ‘जितनी आबादी, उतना हक’। 

निश्चित तौर पर राहुल गांधी का यह वक्तव्य स्वागतयोग्य है। इसकी दो वजहें हैं। पहली यह कि उन्होंने यह अचानक से नहीं कहा है और दूसरी यह कि इतने वर्षों में पहली बार कांग्रेस पार्टी अब इस मुद्दे पर खुलकर पक्ष ले रही है, जिसके बारे में वह असमंजस की स्थिति में रहती थी।

मूल बात यह है कि लोकतंत्र में पार्टियों को अपने वोट बैंक की चिंता पहले रहती है और कांग्रेस ब्राह्मण वर्ग के प्रति मोह को तो कभी त्याग नहीं पाई और नतीजा यह हुआ कि पार्टी उत्तर प्रदेश और बिहार में रसातल में चली गई। न तो पार्टी को ब्राह्मण वर्ग के लोगों ने वोट दिया और ना ही वह कभी दलित-पिछड़ों का विश्वास जीत सकी। 

कांग्रेस के समक्ष दुविधा की यह स्थिति नई नहीं है और कम-से-कम तीस वर्षों से अधिक पुरानी है जबसे देश में मंडल कमीशन की अनुशंसाएं लागू हुईं। 

वर्ष 1990 में जब केंद्र में तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन की अनुशंसा को लागू करने का निर्णय लिया तब कांग्रेस ने उसका संसद में विरोध किया था। वहीं आरएसएस ने इसका खुलकर विरोध तो नहीं किया, लेकिन राम मंदिर का आंदोलन खड़ा कर उसमे पिछड़े वर्ग के नेताओ की भारी भरकम भागीदारी निश्चित कर आने वाली राजनीति को अपने पक्ष में करने की मुहिम तेज कर दी। 

आम जनता ने नौकरियों की चिंता न कर नेताओं की भागीदारी पर खुशी जाहिर की और हिंदुत्व की राजनीति के जरिए ओबीसी के हितों की अनदेखी ओबीसी नेताओ के द्वारा ही की गई। इनमें कल्याण सिंह और उमा भारती चंद उदाहरण हैं।

बीते दिनों राहुल गांधी से मिलने पहुंचे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के साथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे व अन्य

कई बार यह सवाल उठता है कि मंडल कमीशन की अनुशंसा लागू किये जाने के बाद यदि कांग्रेस वी.पी. सिंह सरकार को गिरने से बचा लेती तो आज देश का नक्शा ही दूसरा होता और खुद कांग्रेस को भी उस दौर में वंचित समुदायों के नए नेता मिल जाते। लेकिन बाद के दौर में भी कांग्रेस ने इन बातों पर ध्यान नहीं दिया। पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में बनी कांग्रेस सरकार ने तो मंडल आयोग की अनुशंसा कि सरकारी नौकरियों में ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण मिले, को खत्म करने की पूरी तैयारी की और निजीकरण के एजेंडे पर चलना शुरू किया। 

डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के पहले व दूसरे कार्यकाल के दौरान भी कांग्रेस सामाजिक न्याय और निजीकरण के सवालों पर पूरी तरह से विभाजित थी। सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी का एक धड़ा अधिकारों पर आधारित कानूनों की बात कर रहा था और इसके नतीजे में सूचना का अधिकार कानून, वन अधिकार कानून, महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, भोजन का अधिकार, सफाई कामगारों से संबंधित कानून, भूमि अधिग्रहण कानूनों में बदलाव आदि आए। लेकिन हकीकत यह भी है कि पार्टी और सरकार में इन्हें लेकर अंतर्विरोध था। पार्टी के कई शक्तिशाली नेता आर्थिक उदारीकरण के एजेंडे को न केवल जोर-शोर से चलाना चाहते थे, अपितु उसका श्रेय भी खुद को देना चाहते थे। 

इस तरह कांग्रेस में यह दोहरा खेल चल रहा था। इसका मतलब यह कि वह ‘हर एक को खुश रखने की राजनीति कर रही थी। लेकिन क्या यह संभव है कि बिना न्याय के सभी लोग खुश हो जाएंगे? 

दरअसल कांग्रेस में उदारीकरण पर जोर देने वाली लॉबी ने भूमि अधिग्रहण के लिए स्पेशल इकोनॉमिक जोन जैसी योजना के जरिए देश के विभिन्न स्थानों को निजी कंपनियों को सौंपा और इसके फलस्वरूप देश भर में दलितों, आदिवासियों और किसानों का विरोध शुरू हुआ। नतीजा यह हुआ कि 2011 के आते आते कांग्रेस को पता चल चुका था कि उसके पांव तले जमीन खिसक चुकी है। 

निजी कंपनियों को लाभ देने के लिए भूमि अधिग्रहण योजना के विरुद्ध आंदोलन ने ही ममता बनर्जी को बंगाल में सत्तासीन कराया, लेकिन जब तक कांग्रेस यह समझ पाती, बहुत देर हो चुकी थी। हालांकि अंतिम दो वर्षों में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने अनेक कानूनों के जरिए जनता को संदेश देने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। लोगों को कांग्रेस पर हमेशा से शक रहा कि वह कभी भी सामाजिक न्याय के प्रति वैसे प्रतिबद्ध नहीं थी, जैसे डॉ. आंबेडकर या पेरियार रहे थे। 

2014 में सत्ता से बाहर आते ही कांग्रेस में बहुत खींचतान हुई और राहुल गांधी पार्टी के नेता पद के लिए कभी भी स्वीकार्य नहीं थे। पार्टी लगातार हार रही थी और उसके वरिष्ठ नेता भी राहुल को नेतृत्वकर्ता के योग्य नहीं समझते थे। 2019 से पहले राहुल पार्टी के अध्यक्ष बने और फिर उन्होंने पार्टी को अपने अनुसार चलाने का प्रयास किया। लेकिन पुराने नेताओं ने उन्हें विफल साबित करने में कोई कमी नहीं की। आम चुनावों से पहले तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जीत का श्रेय भी राहुल को नहीं दिया गया। फिर तो आम चुनावों में इन राज्यों में भी कांग्रेस कुछ खास नहीं कर पाई। राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। 

अनेक लोगों को लगा कि वह नाटक कर रहे हैं और कुछ समय बाद इस्तीफा वापस ले लेंगे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। 

हाल में राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा ने उनकी लोकप्रियता को साबित किया और उनकी सोच को जनता के सामने रख दिया। इस यात्रा में राहुल के बहुत से वक्तव्य मानीखेज हैं। जैसे आदिवासियों के सवाल पर उन्होंने कहा कि देश के संसाधनों पर प्रथम अधिकार आदिवासियों का है और यह भी कि वे ही इस देश के मूलनिवासी हैं। 

कर्नाटक के कोलार में 2019 के उनके भाषण को लेकर भाजपा के एक नेता ने गुजरात में उनके ऊपर जो मानहानि का मुकदमा किया था, जिसके चलते राहुल गांधी को दो वर्ष की सजा हुई और लोकसभा अध्यक्ष ने त्वरित कार्यवाही करते हुए उनकी सदस्यता रद्द कर दी। जब यह हो रहा था तब भाजपा के नेताओं ने उनके ऊपर पिछड़ा विरोधी होने का आरोप लगाया। इन्हीं प्रश्नों का उत्तर देते हुए राहुल गांधी ने अनेक वाजिब सवाल भी उठाए हैं। मसलन, उन्होंने कहा यदि नरेंद्र मोदी पिछड़ों के सबसे बड़े शुभचिंतक हैं तो बताएं कि उन्होंने पिछले नौ वर्षों में उनके लिए क्या-क्या किया हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि अभी तक विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों में सचिव स्तर के अधिकारियों में पिछड़े वर्ग के कितने अधिकारी हैं। राहुल गांधी के बाद कांग्रेस इस बात को जोर-शोर से उठा रही है कि आईआईटी और अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 2021-22 में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षित 70 फीसदी से ज्यादा पद खाली क्यों रहे गए थे। उत्तर भारत में बहुजन विमर्श के अधिकांश विशेषज्ञ दक्षिण या पूरब की क्षेत्रीय पार्टियों को दलित-पिछड़ों की पार्टियां समझते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि तमिलनाडु की डीएमके को छोड़ दें तो दक्षिण की किसी भी क्षेत्रीय पार्टी का रिकार्ड आरक्षण या दलित-आदिवासी प्रश्न पर कांग्रेस से बेहतर नहीं रहा है। दक्षिण में कांग्रेस ने बड़ी संख्या में इन समुदायों के नेता दिए हैं। चाहे वह देवगौड़ा का जनता दल (सेक्यूलर) हो या के. चंद्रशेखर राव की पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) या एन.टी. रामाराव की पार्टी तेलुगुदेशम या फिर जगनमोहन रेड्डी की पार्टी, सभी का मुख्य आधार ताकतवर जातियां हैं। इनके एजेंडे में ओबीसी का सवाल या दलितों का सवाल कभी भी नहीं रहा है। तमिलनाडु में डीएमके चूंकि पेरियार के आंदोलन से उपजी पार्टी रही है, इसलिए आरक्षण, प्रतिनिधित्व और पिछड़े वर्ग के हितों का प्रश्न उसके लिए महत्वपूर्ण है।

राहुल गांधी ने कोलार में पिछड़े वर्ग के लिए अपने नए नारे ‘जितनी आबादी, उतना हक’ से न केवल आनुपातिक प्रणाली के पक्ष में बात रखी है, अपितु जातिगत जनगणना के सवाल को भी दोबारा से मजबूती प्रदान कर दी हैं। वैसे इस प्रश्न पर डीएमके की मुहिम में राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी और अन्य दल भी साथ हैं। लेकिन अब कांग्रेस के खुलकर साथ आने से इस मुद्दे को एक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य मिलेगा और जनता को भी इसे समझने में अब परेशानी नहीं होगी। राहुल गांधी ने 50 फीसदी आरक्षण की सीमा को खत्म करने की बात कही हैं और यह उनका एक महत्वपूर्ण कथन है। यह मांग लंबे समय से की जाती रही है। उनका यह कहना कि जातीय जनगणना हर वर्ग को सही प्रतिनिधित्व देने का उपक्रम है। शायद अब कांग्रेस के कार्यक्रमों की दिशा बदले। जो लोग राहुल गांधी को लंबे समय से देख रहे हैं, उन्हें उनमें अब ईमानदारी देखने को मिले। 

बहरहाल, जातिगत जनगणना, आरक्षण, समानुपातिक आरक्षण की सीमा बढ़ाए जाने जैसे मुद्दे चाहे कांग्रेस सवाल उठाए या नहीं उठाए, ये मुद्दे हमेशा से सामाजिक न्याय के केंद्र में रहे हैं। सबसे पहले डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था– पिछड़ा पावै सौ में साठ। फिर बिहार लेनिन जगदेव प्रसाद ने नारा दिया– नब्बे पर दस का शासन, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा। कालांतर में कांशीराम ने कहा– जितनी जिसकी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी। 

अब ये सवाल बेहद मजबूती से उभरे हैं और यदि कांग्रेस को अब यह समझ में आ रही है तो समझ लीजिए कि यह बहुजन आंदोलन की बड़ी सफलता है। यह संकेत दे रही है कि आने वाले समय में बहुजन विचारधारा ही देश की मुख्यधारा बनेगी और उनके हितों की अनदेखी करने वाला कोई भी नेता या पार्टी सत्ता में नहीं टिक पाएगा। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्या भूषण रावत

विद्या भूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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