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बुद्ध को जैसे आंबेडकर ने देखा

डॉ. आंबेडकर की दृष्टि में दलितों की सामाजिक उपेक्षा और अवमानना को ख़त्म करने हेतु जिस सामाजिक और वैचारिक बदलाव की आवश्यकता है, वह बौद्ध धर्म में ही संभव है। मनुवाद का विकल्प बौद्ध धर्म ही बन सकता है। बता रहे हैं स्वदेश कुमार सिन्हा

“किसी वस्तु या विचार को इसलिए सही न मानो कि वे तुम्हारी परंपरा से मिले हैं या तुम्हारे गुरुजन ऐसा कहते हैं या फिर उन पवित्र धर्मग्रंथों में लिखा है, जिनका तुम बहुत आदर करते हो। किसी भी विचार को अपनी तर्क, बुद्धि और विवेक पर कसो। जो तुम्हें  सही लगे और सबके हित में हो, उसे ही मानो और अमल करो।”

-गौतम बुद्ध 

आमतौर पर आधुनिकता का संबंध यूरोप के पुनर्जागरण के साथ-साथ पूंजीवाद के आगमन से बताया जाता है। यूरोपीय पुनर्जागरण या रिनेसां का संबंध तर्क, विचार और विवेक से था, जिसका केंद्र इटली में था, जिसमें कला, साहित्य, शिल्प, स्थापत्य और विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। हर जगह पुरानी सामंती मूल्य-मान्यताओं को चुनौती दी गई तथा तर्क, बुद्धि और विवेक की बात की गई। बाद में हम इसका प्रभाव यूरोप में ‘मार्टिन लूथर’ और ‘काल्विन’ के धर्म सुधार आंदोलनों में देख सकते हैं तथा इसका चरमोत्कर्ष 1779 की फ्रांस की राज्य क्रांति थी, जिसमें सबसे पहले फ्रांस में सामंती सत्ता को उखाड़ फेंका गया और दुनिया में पहली बार स्वाधीनता और जनवाद की बात की गई। यह क्रांति राजतंत्र के साथ-साथ चर्च की निरंकुशता के भी ख़िलाफ़ थी। इस क्रांति के विचारक रूसो, वाल्तेयर और दिदरो थे। ऐसा माना जाता है कि तर्क, बुद्धि और विवेक की अवधारणा दुनिया में यहीं से शुरू हुई, लेकिन जब हम गौतम बुद्ध के विचारों को देखते हैं तो क्या ऐसा नहीं लगता है कि तर्क, बुद्धि और विवेक; जो मूलतः आधुनिकता के स्रोत हैं, उनके बारे में गौतम बुद्ध ने करीब ढाई हज़ार वर्ष पहले ही कहा था। 

बुद्ध के आधुनिकता के ये विचार क्या एक व्यापक समाज परिवर्तन के अंग बन सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर हम आंबेडकर के बौद्ध धर्म संबंधी विचारों से समझ सकते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के संघर्ष में अपने आंदोलन के दैरान व सत्ता हस्तांतरण के प्रश्न पर प्रमुख नेतृत्व का अंग्रेज़ों के साथ संवाद, भावी समाज अथवा देश निर्माण के स्वरूप का प्रश्न तथा विकास संबंधी सवर्ण मानसिकता के अनुभव ने आंबेडकर को इस निष्कर्ष पर पहुंचा दिया था कि वे मानने लगे थे कि मात्र राजनीतिक स्वाधीनता से इस देश की श्रमजीवी जनता को सामाजिक और वैचारिक स्वाधीनता नहीं दिलाई जा सकती है। 

उनकी दृष्टि में भारतीय समाज जिन सामंती अंतर्विरोधों से सीढ़ीनुमा स्तरीय भेद वाली सामाजिक संरचना की विसंगतियों और वर्णीय श्रेष्ठता वाली मानसिकता से ग्रस्त है, उसमें पशु से बदतर जीवन जीने को अभिशप्त दलितों को जातीय दमन, उत्पीड़न और अत्याचारों से पूर्ण मुक्ति नहीं दिलाई जा सकती। कानून और संविधान से इतर यदि जीवन, विचार, समाज और व्यवस्था में भी स्वाधीनता लानी है, तो सामाजिक स्तर पर जहां जातिवादी जकड़न ख़त्म करना जरूरी है, वहीं वैचारिक स्तर पर वर्णाश्रम व्यवस्था; जिस तत्त्वमीमांसीय बुनियाद को अपने गर्भ में आत्मसात किए हुए है, उसके जनविरोधी चरित्र को उजागर कर ख़ारिज़ करना अपरिहार्य है। अपने विचार और कर्म में डॉ. आंबेडकर ने लगातार यह दिखाने और बताने का प्रयास किया कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था को वैचारिक और भौतिक मज़बूती प्रदान करने वाली आदर्श आचार संहिता ‘मनुस्मृति’ वस्तुत: दलितों की दासता का दस्तावेज है।

वर्ष 1956 में नागपुर में बौद्ध धम्म स्वीकार करते डॉ. आंबेडकर व उनकी पत्नी सविता आंबेडकर

डॉ. आंबेडकर ने कहा कि हिंदू धर्म के आदर्श और यथार्थ में पाई जाने वाली अमानवीय स्थितियों से आत्मसंघर्ष की अभिव्यक्ति हिंदू धर्म के नकार से हुई है। वे हिंदू धर्म के विकल्प के रूप में एक ऐसे श्रेष्ठ धर्म की तलाश करते रहे, जो अस्पृश्यों को ‘मानव’ होने का वैचारिक आधार दे सके। सिक्ख, ईसाई और इस्लाम आदि धर्मों के प्रति सम्मोहन के बावजूद आंबेडकर को दलितों की पूर्ण मुक्ति बौद्ध धर्म में ही दिखाई दी। उनकी दृष्टि में दलितों की सामाजिक उपेक्षा और अवमानना को ख़त्म करने हेतु जिस सामाजिक और वैचारिक बदलाव की आवश्यकता है, वह बौद्ध धर्म में ही संभव है। मनुवाद का विकल्प बौद्ध धर्म ही बन सकता है। अपनी इस समझ को व्यवहारिक रूप देते हुए डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को सार्वजनिक रूप से ग्रहण कर लिया।

वास्तव में बुद्ध का दर्शन समाजवादी जीवन मूल्यों का पक्षपोषक है। वे एक महान प्रजातांत्रिक समाज के मार्गदर्शक थे। एक व्यवहारवादी, मानवतावादी, अनुभववादी और प्राकृतिक दार्शनिक के रूप में उनके चिंतन के केंद्र में मनुष्य एवं उसकी समस्याएं थीं। वे अपने चारों ओर छाई हुई मरणशीलता, रुग्णता और अपंगता को लेकर उद्वेलित थे। वे मानते थे कि मानव जीवन की मूल समस्याएं, उनके कारण और उनसे मुक्ति का उपाय इसी दुनिया में है। संभवत: बुद्ध पहले प्रयोगधर्मी दार्शनिक थे, जिन्होंने मानव जीवन की कठोर वास्तविकताओं की इतनी गहनता और समग्रता के साथ व्याख्या की। यही कारण है कि आंबेडकर को बुद्ध में एक बेहतर समाज रचना की एक समग्र दृष्टि दिखाई देती है और वे कहते हैं कि– “व्यक्ति की गरिमा और मानवीय मूल्यों में विश्वास बुद्ध को आम व्यक्ति के वैचारिक स्वातंत्र्य और सामाजिक स्वाधीनता का हिस्सा बना देती है।” 

एक बार बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद ने उनसे पूछा कि “जीवन क्या है और मृत्यु के बाद क्या होता है?” जवाब में बुद्ध ने कहा कि जिस प्रकार जंगल में दो लकड़ियों के रगड़ जाने से चिंगारी पैदा होती है, वह कहां से आती है और कहां चली जाती है? किसी को नहीं पता। उसी प्रकार बुद्धिमान मनुष्य इन अनावश्यक विषयों पर चिंतन नहीं करते कि यह जीवन कहां से आया और कहां चला गया, बल्कि वे कर्म करते हैं। इस तरह के आधुनिक भौतिकवादी विचारों से संपूर्ण बौद्ध दर्शन भरा पड़ा है। हम देख सकते हैं कि बुद्ध के दर्शन में अनेकानेक ऐसी मानवतावादी एवं वैज्ञानिक दृष्टि और सिद्धांत थे, जो कुंठित जनता की सृजनात्मक क्षमता को प्रेरणा प्रदान कर रहे थे। उनकी प्रतिस्थापनाओं ने जनता में एक नई चेतना, आत्मविश्वास और क्रियाशीलता की स्फूर्ति पैदा की। 

कोई भी क्रांतिकारी विचार जब धर्म में बदल जाता है तब उसके मूल विचारों का क्षरण हो जाता है। सभी धर्मों की तरह बौद्ध धर्म के साथ भी यही हुआ। यह धर्म हीनयान, महायान और वज्रयान जैसे तीन शाखाओं में बँट गया। इसमें भी अनेक देवी-देवताओं का प्रवेश हुआ। लंका-वर्मा जैसे देशों में बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग दूसरे धर्मों के लोगों पर अत्याचार तक करने लगे। इन सबके बावज़ूद गौतम बुद्ध के क्रांतिकारी और आधुनिक विचार आज केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अशांति और हिंसा से भरी पूरी दुनिया में महत्वपूर्ण हैं।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

स्वदेश कुमार सिन्हा

लेखक स्वदेश कुमार सिन्हा (जन्म : 1 जून 1964) ऑथर्स प्राइड पब्लिशर, नई दिल्ली के हिन्दी संपादक हैं। साथ वे सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक विषयों के स्वतंत्र लेखक व अनुवादक भी हैं

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