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आजीवक दर्शन का बहुजन पक्ष (पहला भाग)

सिंधु सभ्यता से प्राप्त मुहरों और मूर्तिशिल्पों से देवी-देवताओं की जो आकृतियां सामने आई हैं, वैसी ही आकृतियां मगध और वैशाली के आसपास के गांवों की खुदाई से भी मिली हैं, जिनसे पता चलता है कि बुद्धकाल तक सिंधु संस्कृति मगध तथा उसके आसपास के क्षेत्रों तक फैल चुकी थी। ओमप्रकाश कश्यप के आलेख शृंखला का पहला भाग

आजीवक नियतिवादी थे। इस कथन पर लगभग सभी विद्वान एकमत हैं। छोटी-छोटी बातों पर खुद को दूसरों से विशिष्ट बताने वाले, आजीवकों के मामले में एकमत नजर आते हैं। पालि, प्राकृत और संस्कृत तीनों भाषाओं के ग्रंथों में आजीवकों को, एक मत से नियतिवादी घोषित किया गया है। बाशम जैसे लेखक भी अपनी पुस्तक की शुरुआत में आजीवकों को नियतिवादी ही लिखते हैं।[1] इसके लिए बाशम को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। वे तो प्रशंसा के पात्र हैं। पहली बार उन्होंने ही भारत के इस दर्शन को विशद् अन्वेषण के साथ दुनिया के सामने लाने का काम किया था। उनसे पहले हार्नले, बरुआ आदि लेखक आजीवकों के बारे में शोध की शुरुआत कर चुके थे, लेकिन उनका काम इस दर्शन पर टिप्पणीनुमा लेखों से अधिक नहीं था। बाशम ने न केवल पालि, प्राकृत और संस्कृत अपितु तमिल ग्रंथों में भी आजीवक दर्शन की पड़ताल की। उसके फलस्वरूप बुद्ध और उनके पूर्ववर्ती महान आजीवक विचारकों के बारे में जान पाए हैं। बाशम के बाद ही दुनिया-भर के लेखकों-बुद्धिजीवियों का आजीवकों के बारे में रुचि बढ़ी।

बाशम यह तो मानते हैं कि जिन-जिन ग्रंथों में आजीवकों के बारे में सामग्री प्राप्त होती है, वे सभी उनके विरोधियों द्वारा रचे गए हैं। लेकिन आजीवकों को नियतिवादी, अनिश्चिततावादी आदि कहे जाने पर वे अपनी ओर से कोई टिप्पणी नहीं करते। हम इसे उनकी मजबूरी भी मान सकते हैं। आजीवकों के बारे में जो खोजपूर्ण कार्य वे कर रहे थे, उसे मान्यता दिलाने के लिए आधार-स्रोतों के निकट रहना बहुत आवश्यक था। यदि सभी ग्रंथ आजीवकों को नियतिवादी बता रहे हों, तो वे अलग कैसे जा सकते थे! लेकिन एक ओर यह कहना कि सभी ग्रंथ आजीवकों के विरोधियों द्वारा लिखे गए हैं, सभी में उनके प्रति पूर्वाग्रह से काम लिया गया है – दूसरे उन ग्रंथों में आजीवकों के बारे में बनाई गई राय को ज्यों का त्यों मान लेना– इसे बेहतर शोध दृष्टि नहीं कहा जा सकता।

बिहार के जहानाबाद जिले (गया के नजदीक) के बराबर पहाड़ की गुफा का प्रवेश द्वार। इन गुफाओं को मौर्य राजाओं ने आजीवकों के लिए बनवाई थी। (तस्वीर साभार : बिहार पर्यटन, जहानाबाद)

वेणीमाधव बरुआ की इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आजीवकों का अपना कोई ग्रंथ उपलब्ध न होने; तथा उनसे संबंधित छिटपुट सूचनाएं जैन, बौद्ध एवं ब्राह्मण ग्रंथों में यत्र-तत्र बिखरे होने के कारण – उनके ऊपर लिखने के लिए “तीव्र कल्पना और बौद्धिक सहानुभूति की बेहद आवश्यकता है।”[2] “कल्पना और बौद्धिक सहानुभूति” से बरुआ का आशय आजीवक श्रमणों के पौराणिक शैली में मनगढ़ंत आख्यान रचने से नहीं था। आशय आजीवकों के बारे में यत्र-तत्र प्राप्त, कहीं पूरक तो कहीं विरोधाभासी उल्लेखों की तह में जाकर, अंतर्निहित सत्य की पड़ताल करने से है।

पुस्तक की शुरुआत में ही बाशम लिखते हैं कि बौद्ध एवं जैन धर्म की तरह आजीवक धर्म भी ‘विधार्मिक धर्म’ है। विधार्मिक का अभिप्राय ऐसे धर्म या विचार से है, जो स्थापित धर्म या परंपरा का विरोध करता हो। मगर यहां वे एक साथ कई तथ्यों को नजरंदाज कर जाते हैं। जैसे–

  1. यह मानकर कि बौद्ध और जैन दर्शन – ब्राह्मण या वैदिक धर्म-दर्शनों की प्रतिक्रिया, उनके विरोध अथवा सुधारवादी अभियान के रूप में सामने आए थे – वे ब्राह्मण/वैदिक धर्मों को भारत की मूल या मौलिक धर्म परंपरा का दर्जा दे देते हैं। जबकि बाशम के समय तक सिंधु घाटी सभ्यता का बड़ा सच सामने आ चुका था। यह भी स्थापित हो चुका था कि वह अनार्य सभ्यता थी। पुरातत्वविद् उस सभ्यता को 3300 ईसा पूर्व से 1750 ईसा पूर्व का मानते हैं, जबकि आर्यों का इस देश में आगमन 1500 ईसा पूर्व के आसपास हुआ था। हम कह सकते हैं कि आर्यों का आगमन तब हुआ जब सिंधु सभ्यता उतार की ओर अग्रसर थी। अपने शोध-ग्रंथ में जान मार्शल ने सिंधु सभ्यता के धर्म के बारे में विस्तार से लिखा है। इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि सिंधु सभ्यता में जो धार्मिक परंपराएं और संस्कृति थी – उसकी झलक, वैसे देवी-देवता जो सिंधु सभ्यता की मुहरों, मूर्तिशिल्पों के रूप में दिखाई पड़ते हैं – भारत के सुदूर गांवों में सहस्राब्दियों बाद भी आसानी से दिख जाते हैं। वह श्रमण परंपरा से काफी मिलती-जुलती थी। इस आधार पर आसानी से कहा जा सकता है कि आजीवक दर्शन भारत की मूल, सिंधुकालीन दर्शन परंपरा की याद दिलाते हैं। ऋग्वेद में उनका असर साफ नजर आता है। महाभारत के अनुसार जो प्रदेश हिमालय, गंगा, सरस्वती, यमुना और कुरुक्षेत्र की सीमा से बाहर है, तथा जो सतलज, व्यास, रावी, चिनाब और झेलम – इन पांचों और छठी सिंधु नदी के बीच में स्थित है, वहां के निवासी वाहीक कहलाते हैं। वे धर्मबाह्यः और अपवित्र जन हैं। इसलिए उन्हें त्याग देना चाहिए।[3] गौर तलब है कि सिंधु सभ्यता से प्राप्त मुहरों और मूर्तिशिल्पों से देवी-देवताओं की जो आकृतियां सामने आई हैं, वैसी ही आकृतियां मगध और वैशाली के आसपास के गांवों की खुदाई से भी मिली हैं, जिनसे पता चलता है कि बुद्धकाल तक सिंधु संस्कृति मगध तथा उसके आसपास के क्षेत्रों तक फैल चुकी थी।
  2. बौद्ध एवं जैन दोनों के बारे में विद्वानों की राय है कि वे मध्यमार्गी दर्शन थे। उन्होंने अपने लिए धुर-आस्थावादी और परमभौतिकवादी दर्शनों के बीच से रास्ता निकाला था। यज्ञादि कर्मकांडों का सीधा असर जनसाधारण की जेब पर पड़ता था। उन्होंने यज्ञादि कर्मकांडों का विरोध किया। आत्मा, परमात्मा जैसे विषयों पर, जिन्हें लेकर अरसे से बहस चलती आ रही थी, उनके ऊपर अपनी ओर से कोई राय थोपने के बजाए – बुद्ध और महावीर – दोनों ने ही किनारे करना उचित समझा था। यज्ञ और दानादि जिनका सीधा असर जनसाधारण की जेब पर पड़ता था, का विरोध किया गया। वैसे भी ब्राह्मणों के धर्म-दर्शन, यज्ञादि कर्मकांड जनसाधारण के लिए थे भी नहीं। वे और उनकी आत्ममुग्ध दुनिया आश्रमों तक सिमटी थी। यज्ञादि के लिए वे समाज के शीर्ष वर्गों से मदद लेते। बदले में उनके बच्चों को शिक्षा देने की जिम्मेदारी उठाते थे। जनसाधारण में श्रमण धर्मों की प्रतिष्ठा थी। अभिजात मानसिकता के आत्ममुग्ध ब्राह्मण आजीवक मत में विश्वास रखने वाले जनों, जिनमें शिल्पकार वर्ग प्रमुख था – को ‘लोक’ तथा उनके दर्शन को ‘लोकायत’ कहकर हेय भाव से देखते थे।

ब्राह्मणवाद का असली प्रतिपक्ष भौतिकवादी आजीवक दर्शन थे। उनके बीच समन्वय स्थापित करने की कोशिश में ही जैन और बौद्ध दर्शनों का जन्म हुआ था।

यह भी पढ़ें : सिंधु घाटी की सभ्यता

क्या नियतिवाद आर्य दर्शनों की देन था?

अपने श्रम, कौशल एवं पुरुषार्थ के बल पर सिंधुवासियों ने अपने समय की सबसे विकासमान नागरी सभ्यता की नींव रखी थी। उसका संबंध दूर-दराज की सभ्यताओं से था। कदाचित उसकी कीर्तिकथाओं ने आर्यों को अपनी ओर आकर्षित किया था, लेकिन जब उन्होंने पंचनद प्रदेश में कदम रखा, उस समय विश्व की वह महान सभ्यता अपने पराभव की ओर बढ़ चली थी। आर्य सिंधु वासियों की अपेक्षा सभ्यता में बहुत ज्यादा पिछड़े हुए थे। हर पिछड़ी संस्कृति, विकसित संस्कृति के संपर्क में आने से घबराती है। आर्यों को भी लगा होगा कि जिन आदिम विश्वासों को वे अपने मूल प्रदेश से लेकर चले हैं – नागरी सभ्यता के संपर्क में आने से वे खतरे में पड़ सकते हैं। यह भी संभव है कि जिस सिंधु सभ्यता की गौरवमयी कीर्ति कथाएं सुनकर वे अपने मूल प्रदेश चले थे, उसे पराभव की ओर बढ़ते देख उन्हें धक्का लगा हो। उससे जो नैराश्यबोध उनके भीतर जन्मा, आगे चलकर उनके दर्शनों का स्थायी हिस्सा बन गया। पृथ्वी की अपेक्षा आकाश की दुनिया उन्हें स्थायी प्रतीत हुई। अपने देवताओं को ठिकाने के लिए उन्होंने आकाश में ही स्वर्ग की परिकल्पना की।

वैसे एक व्यावहारिक संभावना और भी है। नए शोध बताते हैं कि 1800 ईसा पूर्व के आसपास सिंधु क्षेत्र को भीषण सूखे का सामना करना पड़ा था। उससे बचने के लिए सिंधुवासियों को सुरक्षित ठिकानों की ओर बढ़ना पड़ा था। आर्यों की अर्थव्यवस्था का प्रमुख स्रोत पशुपालन था। खेती करना उन्होंने सिंधुवासियों से सीखा था। पशुओं के लिए चारे-पानी की खोज में वे भी उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ते गए। इस यात्रा के बीच दोनों सभ्यताओं में टकराव और सम्मिलन की प्रक्रिया चलती रही। शताब्दियों बाद सिंधुवासी अनार्यों ने तराई के क्षेत्रों में नागरी संस्कृति का विकास किया। उस समय तक आर्य भी यज्ञ-संस्कृति विकसित कर चुके थे। नए क्षेत्र में आने के बाद भी आर्यों ने अपने आश्रम, बस्तियों से दूर ऐसी जगहों पर बनाए जहां उनके पशुओं के लिए चारा-पानी आसानी से उपलब्ध हो सके।

निश्चितता और अनिश्चितता दोनों प्रकृति का सहज लक्षण हैं। सूरज समय पर उगता-डूबता है। वन-वनस्पतियां समयानुसार उगती, बढ़ती, फल देती और फिर नष्ट हो जाती हैं। इसके साथ-साथ अनस्थायित्व देखने को मिलता है। कब अतिवृष्टि हो, कब अनावृष्टि, कब आंधी-तूफान आकर सबकुछ तहस-नहस कर डालें, इसका आकलन कर पाना मुश्किल होता है। जीवन निश्चित हो सकता है, मृत्यु सर्वथा अनिश्चित है। कहा जा सकता है कि इसी ने मानव मन में नैराश्य को जन्म दिया। यही ब्राह्मण दर्शनों में मायावाद का जनक बना। आजीवक दर्शनों का नियतिवाद भी इसी की देन है। यह तर्क देखने में दमदार तो लगता है, लेकिन अनिश्चिततावादी होना और नियतिवादी हो जाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।

अनिश्चितता या अस्थायित्व प्रकृति का सहज लक्षण है। इसके लिए किसी अतिरिक्त कारण की आवश्यकता नहीं है, जबकि नियतिवाद के लिए पराशक्ति में विश्वास जरूरी है। आजीवक जीवन और प्रकृति से परे, किसी ईश्वर या आत्म को मानने से इंकार करते थे। प्रकृति को वे स्वयंभू मानते थे। इसलिए उन्हें अनिश्चितावादी तो कहा जा सकता है। नियतिवादी या नियतवादी नहीं। असली नियतिवादी उन्हें कहा जाना चाहिए जो पृथ्वी पर घट रही घटनाओं के लिए अदृश्य और वायवी देवताओं को जिम्मेदार मानते हैं। उन्हें खुश रखने के नाम पर यज्ञ के बहाने एक साथ सैंकड़ों बलियां चढ़ा दिया करते थे।

क्रमश: जारी

संदर्भ :

[1] हिस्ट्री एंड डॉक्ट्रीन ऑफ आजीवक्स, आर्थर लेवेलिन बाशम, लुजाक एंड कंपनी लिमिटेड, लंदन, 1951, पृ. 3.
[2] आजीविक्स, वेणीमाधव बरुआ, यूनिवर्सिटी ऑफ कलकत्ता, 1920, पृ. 22.
[3] बहिष्कृता हिमवता गङ्या च बहिष्कृताः
सरस्वत्या यमुनया कुरुक्षेत्रेण चापि ये।
पन्चाना सिन्धुष्ठानां नदीनां येऽन्तराश्रिताः
तान् धर्मबाह्यानशुचीन् वाहीकानपि वर्जयेत्। महाभारत, कर्ण पर्व, 44.6-7

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

ओमप्रकाश कश्यप

साहित्यकार एवं विचारक ओमप्रकाश कश्यप की विविध विधाओं की तैतीस पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। बाल साहित्य के भी सशक्त रचनाकार ओमप्रकाश कश्यप को 2002 में हिन्दी अकादमी दिल्ली के द्वारा और 2015 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के द्वारा समानित किया जा चुका है। विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में नियमित लेखन

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