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आजीवकों के बारे में हिंदू व जैन धर्म ग्रंथों में क्या है?

वायुपुराण में एक जगह आजीवक दर्शन को ‘लोक’ का दर्शन बताया गया है। खासकर उनका जो शिल्प-कौशल के बल पर अपनी आजीविका चलाते थे। लेकिन अपवाद स्वरूप कुछ को छोड़ दिया जाय तो ब्राह्मण ग्रंथों में उसके लिए ‘लोकायत’ शब्द ही इस्तेमाल किया गया है। पढ़ें, ओमप्रकाश कश्यप के आलेख का दूसरा भाग

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आजीवक दर्शन का बहुजन पक्ष (दूसरा भाग) : आजीवक और निमित्त वाचन

आजीवकों पर एक और आरोप लगाया गया है कि वे भविष्य बताकर अपनी आजीविका चलाते थे। यह आरोप भी सही नहीं लगता। महावीर के पहले प्रव्रज्यावर्ष में जब वे अस्थिक ग्राम से गुजरते हैं, उनकी भेंट उत्पल नाम के निमित्तवेत्ता से होती है। वह महावीर के दस सपनों में से नौ का फलादेश तो बता देता है। दसवें स्वप्न का फलादेश स्वयं महावीर बताते हैं। दूसरे वर्ष में ‘अच्छंदक’ नामक पाषंड लोग मिलते हैं, जो ज्योतिष द्वारा अपने जीवन का निर्वाह कर रहे थे। उसी वर्ष सेयंविया से सुरभिपुर जाते समय जब वे नाव में सवार होते हैं तो उनकी खेमिल नामक नैमित्तिक से भेंट होती है, जो नाव में बैठे-बैठे अपशकुनों के बारे में बताता है। नाव से उतरने के बाद उनकी भेंट ‘पुण्य’ नामक सामुद्रिक से होती है, जो पदचिह्नों को देखकर आगत का पूर्वानुमान लगाता था।

जैन ग्रंथों में महावीर भी निमित्तवाचन करते हुए मिलते हैं। मक्खलि गोसाल द्वारा यह पूछने पर कि “आज मुझे भिक्षा में क्या मिलेगा?” महावीर का उत्तर मिलता है, “कोंदों के तंदुल, खट्टी छाछ और एक कूट रुपया।”[1] जैन ग्रंथों के अनुसार इस भविष्यवाणी के सही होने पर गोसाल नियतिवाद का कायल हो जाता है। तीसरे प्रव्रज्यावर्ष में कोल्लाग सन्निवेश से सुवर्णखल की ओर जाते समय गोसाल ग्वालों को खीर पकाते देखता है। वह उन्हें भोजन करके आगे बढ़ने का आग्रह करता है। महावीर भविष्य देखकर बताते हैं– “खीर पकेगी नहीं, हांडी फूट जाएगी।” ऐसा ही होता है। दसवें प्रव्रज्यावर्ष में सिद्धार्थपुर से कूर्मग्राम जाते समय, सात फूलों वाले तिल के पौधे को देखकर गोसाल महावीर से पूछते हैं– “क्या यह तिल का पौधा फल देगा?” महावीर फिर भविष्यवाणी करते हैं– “बिलकुल निपजेगा। इन सातों फूलों के जीव एक फली में सात तिलों के रूप में जन्म लेंगे।” जैन विद्वान इसे भी गोसाल के नियतिवाद की ओर आकृष्ट होने का कारण बताते हैं।

यह भी कहा गया है कि एक दिन छह दिशाचर गोसाल के समक्ष उपस्थित होकर निमित्तशास्त्र के कुछ अंशों का वाचन करते हैं, जिससे वह सुख, दुख, लाभ, हानि, जीवन और मरण इन छह बातों में सिद्धवचन नैमित्तिक बन जाता है।[2] ऊपर जिन नैमित्तिकों के नाम आए हैं, उत्पल, खेमिल, पुण्य या ‘अच्छंदक’ नामक पाषंडस्थ– इनमें से एक भी आजीवक नहीं है। बताया गया है कि महावीर द्वारा हांडी के फूटने, भोजन में कोंदों के तंदुल, खट्टी छाछ और एक रुपया तथा तिल की फली से सात तिल निकलने जैसी भविष्यवाणियों द्वारा ही गोसाल “नियतिवाद की ओर आकृष्ट होता” है। ऐसे में गोसाल या दूसरे आजीवकों को नियतिवादी बताना, यह कहना कि वे भविष्य बताकर आजीविका कमाते थे, एकदम गलत है।

कल्याणविजयी जी जिसे निमित्तशास्त्र का कुछ अंश पढ़ना बताते हैं, उन्हें जैन ग्रंथ भगवतीसूत्र में ‘पुब्ब’ (पूर्वगत) कहा गया है। तदनुसार छह दिशाचर गोसाल के समक्ष, “अष्टांग महानिमित्त के सामान्य अध्ययन मात्र से सब प्राणी, सब भूत, सब जीव और सब सत्वों के लिए, जिन छह अनतिक्रमणीय व्याकरणों की व्याख्या करते हैं, वे हैं– लाभ, अलाभ, सुख, दुख, जीवन और मरण।”[3] ‘पुब्ब’ या ‘पूर्वगत’ जैन दर्शन के ग्रंथ हैं, जिन्हें ‘दृष्टिवाद’ का अंग माना गया है। नंदीसूत्र में इनकी संख्या 14 बताई गई है। ये हैं– 1. उत्पादपूर्व, 2. अग्रायणीयापूर्व, 3. वीर्यप्रवादपूर्व, 4. अस्तिनास्तिप्रवादपूर्व, 5. ज्ञानप्रवादपूर्व, 6. सत्यप्रवादपूर्व, 7. आत्मप्रवादपूर्व, 8. कर्मप्रवादपूर्व, 9. प्रत्याख्यानपूर्व, 10. विद्यानुवादपूर्व, 11. अवन्ध्यपूर्व, 12. प्राणायुपूर्व, 13. क्रियाविशालपूर्व, 14. लोकबिंदुसारपूर्व। भगवती सूत्र के अनुसार छह दिशाचरों (यायावर मनस्वी) ने उपर्युक्त में से दसवें पुब्ब के बाद से मक्खलि गोसाल के समक्ष विवेचना की थी।

बिहार के गया जिले के निकट बराबर पहाड़ी गुफाओं में आजीवकों की प्रतिमाएं

यदि यह मान लिया जाए कि गोसाल ने पुब्बों के आधार पर ही भविष्यवाचन की कला सीखी थी, तो कहना होगा कि ये विद्याएं पहले से ही जैन दर्शन का हिस्सा थीं। इन दिनों ये ग्रंथ उपलब्ध नहीं हैं। जैन ग्रंथ स्थिविरावलि चरित्र (परिशिष्टपर्वन) के अनुसार मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त के गुरु भद्रबाहू अंतिम जैन विद्वान थे, जिन्हें सभी 14 पुब्बों का ज्ञान था। अकाल के दौरान नष्ट हुए जैन ग्रंथों को दुबारा लिखने के लिए पाटलीपुत्र में जैनसंघ की बैठक हुई थी। उसके लिए भद्रबाहू को भी आमंत्रित किया गया। एक व्रत में लिप्त होने के कारण भद्रबाहू ने संघ की बैठक में उपस्थित होने में अपनी असमर्थता जताई। अंत में वे स्थूलिभद्र को पुब्बों का ज्ञान देने को तैयार हो गए। उन्होंने दस पुब्बों का ज्ञान दे भी दिया था। बाद में जब उन्हें पता चला कि स्थूलिभद्र अर्जित ज्ञान का उपयोग चमत्कार प्रदर्शन के लिए कर रहे हैं, तो उन्होंने बाकी चार पुब्बों का ज्ञान देने से इंकार कर दिया। स्थूलिभद्र द्वारा क्षमा-याचना के बाद वे अंतिम चार पुब्बों का ज्ञान देने को तैयार तो हुए मगर एक शर्त लगा दी कि उनका ज्ञान किसी और को नहीं दिया जा सकेगा। भद्रबाहू के बाद संघ का प्रधान बनने के बाद स्थूलिभद्र अपने शिष्यों महागिरी और सुहास्तिन को केवल दस पुब्बों की ही शिक्षा देते हैं, बाकी चार की नहीं। स्थूलिभद्र आरंभ के दस पुब्बों के अध्ययन के बाद ही चमत्कार दिखाने लगते हैं, इसका आशय यह है कि चमत्कार प्रदर्शन की विद्या, जैनियों में भी विद्यमान थी।

‘भगवतीसूत्र’ के पंद्रहवें अध्याय में मक्खलि गोसाल के जीवन के बारे में विस्तार से दिया है। एक भी स्थान पर उन्हें निमित्त-वाचन करते हुए नहीं दिखाया गया था। इसलिए गोसाल या आजीवकों को निमित्त वाचक कहना, उचित नहीं है। हां, वे अपने समय के ‘मौसम-विद्’ हो सकते हैं, जो कि एक ज्ञान-विज्ञान, तर्क और विवेचना पर आधारित कला थी। उन दिनों की अर्थव्यवस्था में व्यापार का बड़ा योगदान था। सिंधु सभ्यता व्यापार केंद्रित नागरी सभ्यता थी। बुद्ध के समय तक भी अंतरप्रायद्विपीय व्यापार में काफी वृद्धि हो चुकी थी। लंबी यात्राओं चाहे समुद्री हों या मैदानी, पर निकलने से पहले मौसम का ध्यान रखना जरूरी था। ऐसे में हवाओं और आसमान का रुख देखकर मौसम का पूर्वानुमान लगाने वालों का उन यात्राओं की सफलता में बड़ा योगदान था। इसलिए मौसम की करवटों की जानकारी रखने वालों का समाज में बड़ा ही महत्व रहा होगा। इसी से ज्योतिष को सामुद्रिक विज्ञान भी कहा गया। इस काम के लिए आरंभ में अनुभवसिद्ध व्यक्ति ही आगे आते होंगे। आगे चलकर जब जाति का प्रभाव बढ़ा और पुत्र को पिता का, न केवल संपत्ति और परिवार के मामले में, अपितु ज्ञान के क्षेत्र में भी सहज उत्तराधिकारी मान लिया गया तो इस क्षेत्र में भी दूसरे-तीसरे दर्जे की प्रतिभाएं आने लगीं। मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाले लोग जातक के भविष्य के बारे में उलुलू-जुलूल बातें बताकर धन कमाने लगे। ज्योतिष का धंधा बदनाम हुआ तो उसे आजीवकों को निमित्तभाषी बताकर, भड़ास निकालने का एक और बहाना मिल गया। आजीवकों को बदनाम करने के लिए निमित्त भाषी होना उनके ऊपर ऐसे ही लाद दिया गया, जैसे ब्राह्मण जब तक आश्रम परंपरा में थे, तब तक मांस-मदिरा का खुलकर प्रयोग करते थे। वेदों और स्मृतियों में ऐसे विवरण भरे पड़े हैं। आगे चलकर जब वे समाज से जुड़े तो खुद को शेष जनसमाज से अलग और विशिष्ट दिखाने के लिए उन्होंने मांस, मदिरा आदि को राक्षसों, दैत्यों का पसंदीदा पेय बताकर उनसे किनारा करना शुरू कर दिया।

वैसे भी नियतिवादी के लिए पराशक्ति में विश्वास रखना आवश्यक है। ऐसी पराशक्ति, जो लोगों के भाग्य या नियति का निर्धारण करती हो। आजीवक दृश्यमान जगत से परे किसी भी शक्ति को स्वीकारने को तैयार नहीं थे। ऐसे में उन्हें नियतिवादी कहना, सिवाय अपनी कमजोरियों को दूसरे के मत्थे मढ़ देना, या अवसर आने पर झूठ को दूसरों के ऊपर डाल देने जैसा ही धत्तकर्म है। यह प्रवृत्ति आजीवकों को छोड़कर, उस समय के तीनों दर्शनों, ब्राह्मण, जैन और बौद्ध में मौजूद थी।

आजीवक से लोकायत और लोकायत से चार्वाक तक

आजीवक, लोकायत और चार्वाक दर्शन को आमतौर पर एक दर्शन के पर्याय के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। वायुपुराण में एक जगह आजीवक दर्शन को ‘लोक’ का दर्शन बताया गया है। खासकर उनका जो शिल्प-कौशल के बल पर अपनी आजीविका चलाते थे। लेकिन अपवाद स्वरूप कुछ को छोड़ दिया जाय तो ब्राह्मण ग्रंथों में उसके लिए ‘लोकायत’ शब्द ही इस्तेमाल किया गया है। ब्राह्मण दर्शन उन दिनों भी अल्पसंख्यकों के दर्शन थे। अल्पसंख्यक ग्रंथि से उबरने के लिए ही ब्राह्मणों ने आजीवक दर्शन को ‘लोकायत’ जैसा नाम दिया था। कालांतर में जब आश्रमों से निकलकर, उन्होंने ‘लोक’ में अपने लिए जगह बनाने की शुरुआत की तो भौतिकवादी आजीवक दर्शनों को लोकायत (लोक से निकला या लोक में परिव्याप्त) दर्शन कहना असंगत लगने लगा। सो छठी-सातवीं शताब्दी के बाद उन्होंने लोकायत को चार्वाक दर्शन कहना आरंभ कर दिया। आजीवक या चार्वाक दर्शन का प्रणेता कथित देवगुरु आचार्य वृहस्पति को बताया गया है। यह भी कहा गया है कि बार-बार जीत रहे असुरों की एकता को भंग करने के लिए ही उन्होंने लोकायत धर्म का प्रणयन किया था। विष्णुपुराण के अनुसार असुर उन दिनों वैदिक चर्या का अनुसरण करने वाले थे। उससे देवताओं को डर सताने लगा तो वे विष्णु के पास गए। तब विष्णु ने माया-मोह की रचना की, जिसने साधनारत असुरों को भटका दिया। पराशर ऋषि के मुख से असुरों को कहलवाया गया–

“हिंसा से भी धर्म होता है, यह बात किसी प्रकार युक्तिसंगत नहीं है। अग्नि में हवि जलाने से फल की प्राप्ति होगी, यह भी बच्चों की बात है। अनेक यज्ञों द्वारा देवत्व लाभ करके यदि इंद्र को शमी आदि काष्ठ का ही भोजन करना पड़ता है तो इससे पत्ते खाने वाला पशु ही अच्छा है। यदि यज्ञ में बलि दिए गए पशु को स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो यजमान अपने पिता को क्यों नहीं मार डालता? यदि किसी अन्य पुरुष के भोजन करने से किसी भी पुरुष की तृप्ति हो सकती है तो विदेश की यात्रा के समय खाद्य पदार्थ परिश्रम करके ले जाने की क्या आवश्यकता है? पुत्रगण घर पर ही श्राद्ध कर दिया करें। यह समझकर कि यह श्राद्धादि कर्मकांड लोगों की अंधश्रद्धा ही है, इसके प्रति लोगों को उपेक्षा करनी चाहिए। श्रुति आदि आप्तवाक्य आकाश से नहीं टपका करते …”[4]

अब सवाल है ब्राह्मणों को ‘आजीवक’ नाम से क्या चिढ़ थी? इसका कारण था कि जैन एवं बौद्ध ग्रंथों में जहां आजीवकों की आलोचना की गई है, वहीं उनके कठिन व्रतों, त्याग और अनुशासनमय जीवन की जमकर प्रशंसा भी की गई है। ब्राह्मण जिन दिनों आश्रमों में अपेक्षाकृत सुख-सुविधामय जीवन जीते थे, आजीवक श्रमण कठिन यायावर व्रतों का पालन करते थे। वन-वनस्पति, पशु-पक्षी सहित संपूर्ण प्रकृति को अपने-अपने अस्तित्व का हिस्सा मानते थे। प्रकृति से उतना ही ग्रहण करते थे, जितना अस्तित्व रक्षा के लिए आवश्यक हो। जीवन के लिए पशु का आहार जरूरी था, तो नियम बनाया गया कि भोजन सामूहिक हो। कम से कम जीव हत्याएं हों, इसके लिए छोटे-छोटे प्राणियों की हत्या करने के बजाय हाथी जैसे बड़े जीव को मारकर समूह की भूख का इंतजाम कर लिया जाए। ऐसे श्रमण हस्तितापस कहलाते थे। एक और संप्रदाय था, जिसके अनुयायी पूरी सृष्टि को प्राणवंत मानते थे। उनके लिए पूरी सृष्टि ‘देवता’ जैसी थी। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मानव-समुदाय एक ही चेतना के बहुआयामी विस्तार थे। इसलिए वे सभी के प्रति विनत् रहते थे। जड़-चेतन, छोटे-बड़े सभी के प्रति ऐसे विनयव्रती श्रमणों को ‘वैनायिक’ कहा जाता था।

ऐसे कठिन व्रती, त्यागमय, अनुशासित जीवन जीने वाले आजीवकों से आश्रम की सुख-सुविधामय जीवन-शैली के अभ्यस्त, और आगे चलकर पौरोहित्य आदि के चलते वैसे ही जीवन की राह खोज निकालने वाले ब्राह्मण स्पर्धा नहीं कर सकते थे। इसलिए आजीवक नाम से किनारा करते हुए, उन्होंने पहले उसे ‘लोकायत’ कहना शुरू किए और जब अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए उन्हें लोक का संरक्षण जरूरी लगने लगा तो चार्वाक जैसा चलताऊ नाम देकर, बदनाम किया जाने लगा।

आजीवक दार्शनिक पकुध कात्यायन को परमाणुवाद का जनक माना गया है। आवश्यकता इस दर्शन पर नए अनुसंधान और मौलिक शोधदृष्टि के साथ विचार करने की है।

क्रमश: जारी

संदर्भ :

[1] भगवतीसूत्र, अध्याय 15, त्रिषष्टि श्लाका पुरुष, हेमचंद्राचार्य
[2] श्रमण भगवान महावीर, कल्याणविजयी जी गणी, श्री कल्याणविजय शास्त्र संग्रह समिति, जालोर, 1998, पृ. 36-37
[3] भगवतीसूत्र 15.4-5
[4] विष्णुपुराण 3.18. 26-31

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

ओमप्रकाश कश्यप

साहित्यकार एवं विचारक ओमप्रकाश कश्यप की विविध विधाओं की तैतीस पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। बाल साहित्य के भी सशक्त रचनाकार ओमप्रकाश कश्यप को 2002 में हिन्दी अकादमी दिल्ली के द्वारा और 2015 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के द्वारा समानित किया जा चुका है। विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में नियमित लेखन

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