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आखिर क्यों लिखा जाता है डॉ. आंबेडकर को ‘दलित नेता’?

पहले इस एक रहस्य को समझ लें कि दलितों के नेता और दलित नेता के विशेषण में क्या फर्क हैं। यह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के वक्त एक बड़े मंत्री ने अपने छोटे मंत्री को बताई थी। बड़े मंत्री ने छोटे मंत्री को बताया कि उनकी पार्टी में ‘दलितों का नेता’ स्वीकार्य नहीं है, बेशक ‘दलित नेता’ स्वीकार्य है। पढ़ें, अनिल चमड़िया का यह आलेख

मीडिया विमर्श

मैं किसी ऐसे समाचार पत्र की तलाश में था, जिसने उस समय डॉ. भीमराव आंबेडकर को राष्ट्रीय नेता कहा हो, जब वे बतौर राजनीतिज्ञ और सामाजिक आंदोलन के नेता के तौर पर स्थापित होने लगे थे। लेकिन डॉ. आंबेडकर के लिए एक ही विशेषण था– दलित नेता। डॉ. आंबेडकर को राष्ट्रवादी लिखने का तो ख्याल ही नहीं हो सकता था, क्योंकि यह अछूत और शूद्रों के लिए हो ही नहीं सकता था। यह उन नेताओं के लिए था, जिनकी पहचान मुस्लिम के रूप में होती थी और जिनके स्वर ‘राष्ट्रवादियों’ के साथ मिल जाते थे।

आखिर क्यों किसी राजनीतिज्ञ को दलित नेता लिखा जाता है? आखिर क्यों भारतीय राजनीति में शूद्रों और अछूतों के बीच जन्मे राजनीतिज्ञों के लिए पिछड़े, आदिवासी और दलित नेता का विशेषण लगा दिया जाता है?

जगजीवन राम ने एक पत्रकार सम्मेलन में इस बात पर आपत्ति प्रगट की थी, जब एक संवाददाता ने उनसे सवाल पूछे जाने के क्रम में उन्हें हरिजन नेता के तौर पर संबोधित किया। जगजीवन राम ने कहा कि वे हरिजन नेता नहीं, बल्कि देश के नेता हैं। लेकिन सवाल फिर यही कि राष्ट्रवादियों को जगजीवन राम जैसे राजनेता को राष्ट्रीय नेता मानने का मन स्वीकार क्यों नहीं करता है?

पहले इस एक रहस्य को समझ लें कि दलितों के नेता और दलित नेता के विशेषण में क्या फर्क हैं। यह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के वक्त एक बड़े मंत्री ने अपने छोटे मंत्री को बताई थी। बड़े मंत्री ने छोटे मंत्री को बताया कि उनकी पार्टी में ‘दलितों का नेता’ स्वीकार्य नहीं है, बेशक ‘दलित नेता’ स्वीकार्य है। वह छोटा मंत्री दलितों के नेता बनने के चक्कर में पड़ गया था और यह शिकायत बड़े मंत्री के यहां पहुंच गई थी।

मूकनायक के एक अंक व डॉ. आंबेडकर की तस्वीर

दलित नेता के विशेषण से किसी राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय नेता को संबोधित करने से क्या होता है? सबसे पहले तो यह कि किसी नेता को दलित कहने से उसका यह हक छीन लिया जाता है कि वह पूरे देश की तरफ से बोल सकता है। देश की तरफ से बोलने का दावा वे करते हैं, जो राजनीतिक-सामाजिक स्तर पर अपना वर्चस्व रखते हैं।

दूसरी बात यह कि दलित नेता, पिछड़े वर्ग के नेता, आदिवासी नेता बुलाकर उन्हें जाति की सीमा में कैद कर दिया जाता है। दूसरे शब्दों में उन्हें जतिवादी ठहराने की छूट हासिल कर ली जाती है।

फिर यह कहा जाता है कि राष्ट्र का निर्माण करना हैं। नींव से निर्माण शुरू होता है। किसी राष्ट्र के निर्माण का यह अर्थ हुआ कि समाज का जो हिस्सा सबसे नीचे दबा हुआ है और जिस पर हर स्तर के सबसे ज्यादा दबाव होते हैं, उसे मजबूत किया जाए। जो नेता दलितो के साथ राष्ट्र निर्माण की बात करते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि राष्ट्र का निर्माण वर्चस्व को थोपने से नहीं हो सकता है।

बंबई विधान सभा में डॉ. आंबेडकर के एक बहस को सुनें। वे राष्ट्र को किस तरह से परिभाषित कर रहे हैं और कैसे उनके ऊपर राष्ट्र की एक ऐसी परिकल्पना थोपी जाती रही है, जिसमें वंचितों को दबाए रखना सामान्य व स्वभाविक मान लिया जाता है। दलितो की बेहतरी यानी निर्माण को राष्ट्र से अलग माना जाता है।

डॉ. आंबेडकर ने कहा कि “मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमे कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूं। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह बात भी साफ-साफ बता देना चाहता हूं कि मेरी एक और निष्ठा भी है, जिसके लिए मैं प्रतिबद्ध हूं।… यह निष्ठा है अछूत समुदाय के प्रति जिसमें मैंने जन्म लिया है। … और मैं इस सदन को पूरे जोर के साथ कहना चाहता हूं कि जब कभी देश के हित और अछूतों के हित के बीच टकराव होगा, तो मैं अछूतों के हितों को तरजीह दूंगा। अगर कोई आततायी बहुमत देश के नाम पर बोलता है, तो मैं उसका समर्थन नहीं करूंगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। जो यहां हैं और जो यहां नहीं हैं, सब मेरी इस भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश को तरजीह दूंगा। लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित में टकराव होगा, तो मैं दलित वर्गों के हित को प्राथमिकता दूंगा।”

तत्कालीन मुख्यमंत्री बी.जी. खेर ने डॉ. आंबेडकर के पूरे वक्तव्य में इस अंश को अलग कर दिया, जहां वे कहते हैं कि “अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित में टकराव होगा, तो मैं दलित वर्गों के हित को प्राथमिकता दूंगा।”

बी.जी. खेर ने कहा कि मेरा एतराज उनके इस वक्तव्य से हैं। अंश समग्र से बड़ा नहीं हो सकता है। समग्र में अंश का समावेश होना चाहिए।

डॉ. आंबेडकर ने जवाब दिया कि मै आपके समग्र का अंश नहीं हूं। मैं एक अलग अंश हूं।[1]

डॉ. आंबेडकर को यह सफाई देने के लिए मजबूर किया जाता है कि वह अपने देश से बेहद प्यार करते हैं। आखिर किन-किन समुदाय में जन्मे लोगों को यह सफाई देनी पड़ती है और किन्हें जन्मजात राष्ट्रप्रेमी मान लिया जाता है? वह कह रहे हैं कि कोई आततायी बहुमत देश के नाम पर बोल रहा है या कोई पार्टी देश के नाम पर बोल रही है तो उसका समर्थन किया ही जाय।  वह यह भी कह रहे हैं कि यह देश के नाम पर बोलने का अधिकार किन समुदायों के बीच जन्मे लोगों का है और क्या उन्हें राष्ट्र मानने के लिए बाध्य किया जाता है?

डॉ. आंबेडकर स्पष्ट करते हैं जब देश के नाम पर बोलकर आततायी बहुमत दलितों को राष्ट्र नहीं माने तो क्या करना चाहिए?

दरअसल, बी.जी. खेर राष्ट्र और दलित को दो हिस्से के बांट देने की सुविधा हासिल करना चाहते हैं। डॉ. आंबेडकर दलित और राष्ट्र एक दूसरे के लिए हैं, यह स्पष्ट कर रहे हैं। बी.जी. खेर जब दलितों के हितों को राष्ट्र हित से अलग देख रहे है तो इसका अर्थ यह होता है कि वे राष्ट्र के नाम पर बोलकर वर्चस्व के हितों को ही राष्ट्र के रूप में स्वीकार करने के लिए एक बाध्यकारी स्थितियां तैयार करना चाहते हैं।

दलित, पिछड़े, धार्मिक अल्पसंख्यक, आदिवासी समुदाय में जन्मने वाला देश की तरफ से बोलने का हकदार नहीं है, यही स्वीकार्य है। इसी संदर्भ में यह भी नोट किया जाना चाहिए कि मुस्लिम और दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय में जन्मे लोगों में कुछ के लिए राष्ट्रवादी का खिताब दिया जाता है? यह राष्ट्रवादी का खिताब देने का हक किसके पास सुरक्षित रहा है? किसी को राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता कहने का क्या तात्पर्य हो सकता है? क्या वह मुस्लिम राष्ट्रवादी है, जो वर्चस्व के राष्ट्रवाद का समर्थन करता है?

एक नागरिक को यह अधिकार है कि वह खुद को राष्ट्र महसूस करें। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद राष्ट्रवाद के आधार पर देशों और गणतंत्रों का निर्माण और विकास करने का एजेंडा बना तो राष्ट्रवाद को समाज के विभिन्न हिस्सों ने अपने-अपने हितों और समाज निर्माण के उद्देश्य से पारिभाषित किया।

यह अनुभव किया गया है कि डॉ. आंबेडकर को बार-बार यह सफाई देने के लिए बाध्य किया जाता है कि वे अपने देश से कितना ज्यादा प्यार करते हैं? वर्चस्व के खिलाफ आवाज उठाना दरअसल राष्ट्र के खिलाफ आवाज उठाने के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश तब भी होती थी जैसे बाद के दिनों में देखने को मिलता है। मुसलमानों पर यह एक अतिरिक्त और जबरदस्त दबाव होता है कि वह स्वयं को राष्ट्रवादी के रूप में साबित करें? यह भी गौर करें कि यह साबित करने के लिए क्या पैमाने स्वीकार्य होते हैं। उन पैमानों के अलावा राष्ट्र प्रेम स्वीकार्य नहीं है। एक नागरिक के तौर पर नहीं। एक मुसलमान के तौर उन्हें हर वक्त जीना पड़ता है। इससे उस समय डॉ. आंबेडकर की भी स्थितियों की कल्पना की जा सकती है।

डॉ. आंबेडकर उस समय के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे राजनीतिज्ञ थे। वे विदेश में ही नहीं बस गए। वे देश लौटे और सबके लिए एक स्वस्थ और सुंदर देश का निर्माण करने के सपने के साथ सक्रिय रहे। लोगों को संगठित करते रहे। देश की बीमारियां बताते रहे। लेकिन वर्चस्व की राजनीति राष्ट्र के नाम पर स्वयं के एकाधिकार को सुरक्षित रखने के लिए नए-नए औजार तैयार करने में लगी रही। राष्ट्र के नाम पर बोलने के अधिकार से वंचित रखने के लिए दलित नेता, पिछड़े वर्ग के नेता, आदिवासी नेता आदि जैसे विशेषणों का हमला जारी है।

निष्कर्षत: डॉ. आंबेडकर को सदैव राष्ट्रीय नेता व राष्ट्र निर्माता लिखा जाना चाहिए।

[1] मधु लिमये, डॉ. आंबेडकर : एक चिंतन, मीडिया स्टडीज ग्रुप, नई दिल्ली, 2023, पृ. 19-20

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अनिल चमड़िया

वरिष्‍ठ हिंदी पत्रकार अनिल चमडिया मीडिया के क्षेत्र में शोधरत हैं। संप्रति वे 'मास मीडिया' और 'जन मीडिया' नामक अंग्रेजी और हिंदी पत्रिकाओं के संपादक हैं

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