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‘द केरला स्टोरी’ : वर्चस्व खोने के डर की द्विज अभिव्यक्ति

फिल्म निर्देशक सुदिप्तो सेन का उद्देश्य केवल दर्शकों का भावनात्मक शोषण करना है। तथ्यों और सच्चाई से उन्हें कोई लेना-देना नहीं है। अगर फिल्म की मानें तो सामाजिक दृष्टि से देश के सबसे समावेशी और सबसे प्रगतिशील राज्यों में से एक केरल को, मुसलमानों, जो वहां की आबादी का करीब एक-तिहाई हैं, से गंभीर खतरा है। बता रहे हैं नीरज बुनकर

हिंदी फिल्म ‘द केरला स्टोरी’ का फोकस हिंदू महिलाओं के जबरन धर्मांतरण पर नहीं, बल्कि हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को मज़बूत करने पर है। उच्च जातियों के हिंदुओं को यह डर है कि जाति-व्यवस्था बिखर जाएगी और इससे समाज पर उनकी पकड़ कमज़ोर होगी। इसे रोकने के लिए उन्होंने 80 बनाम 20 (80 प्रतिशत हिंदू और 20 प्रतिशत मुसलमान) के मुद्दे पर उत्तर भारत में सामाजिक ध्रुवीकरण का प्रयास किया और अनेक राज्यों में सफल भी रहे। लेकिन समतावादी आंदोलनों के लंबे इतिहास वाले दक्षिण भारत में यह करना आसान नहीं है। उच्च जातियों के दक्षिणपंथी हिंदू दशकों से कोशिश करने के बावजूद तमिलनाडु और केरल की राजनीति में अपने लिए जगह नहीं बना पाए हैं। ज़मीनी स्तर पर ज़हर फैलाकर समाज को ध्रुवीकृत करने में सफल न हो पाने के बाद वे सोशल मीडिया, मनोरंजन और जनसंचार के माध्यमों का इस्तेमाल इसके लिए करने लगे हैं।

विपुल अमृतलाल शाह द्वारा निर्मित यह फिल्म एक धर्म विशेष के खिलाफ नफरत फैलाती है और विभिन्न जातियों के बीच नफरत के भाव को नज़रअंदाज़ करती है। फिल्म शालिनी (अदा शर्मा) के फातिमा बनने और फिर यह अहसास होने पर कि उसका ब्रेनवाश किया गया था, अपना पूर्व व्यक्तित्व फिर से हासिल करने की जद्दोजहद पर केंद्रित है। शालिनी केरल की महिलाओं के एक ऐसे समूह से है, जो इस्लाम अपना कर कट्टरपंथी और अतिवादी इस्लामिक संगठन आईएस (इस्लामिक स्टेट) से जुड़ जाता है। यह संगठन मध्यपूर्व एशिया में जन्मा और उसी क्षेत्र में सक्रिय है। 

निर्देशक सुदिप्तो सेन का उद्देश्य केवल दर्शकों का भावनात्मक शोषण करना है। तथ्यों और सच्चाई से उन्हें कोई ख़ास लेना-देना नहीं है। अगर फिल्म की मानें तो सामाजिक दृष्टि से देश के सबसे समावेशी और सबसे प्रगतिशील राज्यों में से एक केरल को मुसलमानों, जो वहां की आबादी का करीब एक-तिहाई हैं, से गंभीर खतरा है।

यह मात्र संयोग नहीं है कि फिल्म 5 मई, 2023 को रिलीज़ हुई और 10 मई, 2023 को केरल के पड़ोसी राज्य कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान था। कर्नाटक की भाजपा सत्ता के खिलाफ असंतोष (जिसे अंग्रेजी में एंटी-इनकमबेंसी कहा जाता है) का मुकाबला कर रही थी और यह फिल्म उसे अपने काम की लगी। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस फिल्म से चुनाव में फायदा उठाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि, “[द केरला स्टोरी] उन चीज़ों के बारे में बताती है, जो देश को अंदर से खोखला कर रहीं हैं।” 

इसका क्या मतलब है? अगर देश के समक्ष सचमुच इतना बड़ा खतरा उपस्थित है तो केंद्र सरकार उससे निपटने के लिए क्या कर रही है? क्या भारत सरकार के पास ऐसे आंकड़े हैं, जिनसे यह पता चले कि इतनी संख्या में हिंदू महिलाओं को मुसलमान बनाकर आईएस के हवाले कर दिया गया है? 

सरकार के पास भले ही कोई आंकड़ा न हो, लेकिन फिल्म निर्माताओं को पता है कि केरल की 32,000 हिंदू महिलाएं मुसलमान बन चुकीं हैं और सीरिया व यमन से लापता हो गईं हैं। फिल्म के निर्देशक ने पहले तो कहा कि वे अपने दावे को सच सिद्ध कर सकते हैं। लेकिन न तो उन्होंने और ना ही सरकार ने ऐसे कोई सबूत पेश किये। और जब एक अदालत ने निर्माता से उनके आंकड़ों का स्रोत बताने को कहा तो उन्होंने फिल्म के ट्रेलर से 32,000 का आंकड़ा हटाना बेहतर समझा। अब 32,000 की जगह 3 ने ले ली है।

फिल्म निर्माता को शायद खुद भी नहीं मालूम कि वे कहना क्या चाहते हैं। फिल्म में कहीं कहा गया है कि सीरिया में 48 लड़कियां लापता हैं तो कहीं इसी संख्या को ‘हजारों’ में बताया गया है। काल्पनिक कहानियों और फिल्मों में भी तथ्यों की एकरूपता रहनी चाहिए और यहां तो फिल्म यथार्थ दिखाने का दावा कर रही है! 

एक दृश्य में फिल्म की एक पात्रा निमाह (योगिता बिहानी) एक पुलिस अधिकारी से बात करते हुए केरल के एक पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी के वक्तव्य को पूरी तरह तोड़-मरोड़ कर उद्धृत करती है– “हमारे पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा था कि अगले 20 सालों में केरल इस्लामिक स्टेट बन जाएगा। (केरल) विधानसभा में जून, 2012 में प्रस्तुत एक सरकारी रपट के अनुसार, हर साल औसतन 2,800 से लेकर 3,200 हिंदू और ईसाई परिवार मुसलमान बन रहे हैं। तीस हज़ार से ज्यादा महिलाएं लापता हैं और इनका गैर-आधिकारिक आंकड़ा 50,000 है और सर, हमारा विश्वास है कि यही सही संख्या है। केवल 703 मामले दर्ज किये गए हैं और केवल 261 महिलाओं का पता लगाया जा सका है।”

पुलिस अधिकारी जवाब देता है, “यह मामला कानून से जुड़ा हुआ है और हमें सुबूत चाहिए होते हैं। कानून जज्बातों पर नहीं चलता।” परन्तु शालिनी को जिस तरह के भयावह और दिल को हिला देने वाले ज़ुल्मों का शिकार होते हुए दिखाया गया है उससे दर्शक उसकी बात पर विश्वास करने को मजबूर हो जातें हैं और सबूत के बारे में सोचते ही नहीं। 

जब निमाह पुलिस अधिकारी से बात कर रही होती है तब कैमरा बार-बार दीवार पर टंगे गांधी के चित्र पर जाता है, मानों गांधी का सत्य का सिद्धांत निमाह और उसके ध्येय के साथ हो। इस दृश्य में यह भी दिखाने का प्रयास किया गया है कि गांधी की धरती पर हिंदू महिलाओं को न्याय नहीं मिल रहा है। जहां सरकार सबूत न होने की बात कर रही है, वहीं गांधी अपने-आप में सबूत हैं, जो निमाह के तर्कों का समर्थन कर रहे हैं। फिल्म में इस्लामोफोबिया (मुसलमानों से डर) है, उसमें मुसलमानों को आतंकवादी बताया गया है और बार-बार लव जिहाद की बात कही गई है। 

फिल्म के शुरूआती दृश्य में संयुक्त राष्ट्र संघ के कुछ अधिकारी मुख्य किरदार शालिनी से बातचीत कर रहे हैं। इसके बाद, अफ़ग़ानिस्तान की बंजर और सूखी धरती को दिखाया गया है। पृष्ठभूमि में एक गीत बजता है, जिसकी एक पंक्ति है– “मासूम को किसने बहकाया।” पूरी फिल्म में शालिनी और दूसरी हिंदू लड़कियों को मासूम और सीधी-सादी और इस्लाम को एक क्रूर धर्म बताया गया है। जाहिर है कि दो धर्मों को इस तरह से एक-दूसरे का विरोधाभासी बताना, दर्शकों के मन में पूर्वाग्रह तो उत्पन्न करेगा ही। फिल्म ऐसे बताती है मानों हर मुसलमान दुष्ट और क्रूर होता है। यह दोनों धर्मों के बीच दीवार खड़ा करने का प्रयास नहीं है तो और क्या है। हमें यह समझना होगा, यह स्वीकार करना होगा कि किन्हीं विशिष्ट सामाजिक समूहों या धर्मों की जो छवि दृश्य व श्रव्य माध्यमों के ज़रिये बनाई जाती है, वह उन समूहों या धर्मों के बारे में दर्शकों की सोच को प्रभावित करती ही है। 

फिल्म ‘द केरला स्टोरी’ का एक दृश्य

फिल्म में जिस तरह के वीभत्स दृश्य दिखाए गए हैं, वे निश्चित तौर पर सांप्रदायिक सद्भाव के लिए खतरा हैं। केरल का अत्यंत विकृत स्वरुप प्रस्तुत किया गया है और वहां के कॉलेजों को आईएस के भर्ती केंद्र बताया गया है। फिल्म में कुछ विद्यार्थी ओसामा-बिन-लादेन के प्रति श्रद्धा रखते हैं। वहीं हिंदू लड़कियां बड़ी आसानी से मुसलमान बनने के लिए राजी हो जातीं हैं। फिल्म में कोई किसी का असली दोस्त नहीं है, सभी आईएस के भर्ती एजेंट हैं। वे लड़कियों के साथ होने वाली छेड़छाड़ का उपयोग भी अपने षड़यंत्र को सफल बनाने के लिए करते हैं। हिंदू लड़कियां अपनी मुस्लिम दोस्त आसिफा (सोनिया बालानी), जिसे, दरअसल, आईएस द्वारा हिंदू लड़कियों को मुस्लिम बनाकर संगठन में भर्ती करने की ज़िम्मेदारी दी गई है, की सलाह पर छेड़छाड़ से बचने के लिए हिजाब पहनने पर राजी हो जातीं हैं। यह सही है कि किसी भी रचनात्मक विधा में लेखक या निर्माता को कुछ छूट लेने, तथ्यों से थोडा-बहुत समझौता करने का अधिकार होता है, लेकिन यहां तो केरल के यथार्थ को पूरी तरह विकृत कर दिया गया है। शालिनी कॉलेज में किस तरह के अनुभवों से गुजरी, यह बताया ही नहीं गया। फिल्म में जो कुछ दिखाया गया है, वह मुस्लिम समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह और शत्रुता का भाव जगाने वाला है। इससे सामाजिक एकजुटता को क्षति पहुंचेगी और समाज में अशांति भी फैल सकती है। 

फिल्म निर्माता ने आईएस के काम करने के तरीकों और उसकी पाशविकता के बारे में जो कुछ दिखाया है, वह कुछ हद तक सही हो सकता है, लेकिन केरल को आईएस के भर्ती केंद्र के रूप में दिखाना, अप्रासंगिक और हैरान करने वाला है। शालिनी संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिकारी से कहती है, “केरल टिक-टिक करते एक टाइम बम के ऊपर बैठा है सर। ‘गॉड्स ओन कंट्री’ [ईश्वर का अपना देश] नष्ट होने की कगार पर है। प्लीज सर, उसे बचाइए।” यह संवाद न केवल अनावश्यक है, बल्कि दर्शकों और विशेषकर केरल के रहवासियों में भय और असुरक्षा का भाव भरने वाला है।

शालिनी एक उच्च जाति के परिवार से है और एक ऐसे प्रदेश में रहती है, जो शिक्षा के मामले में देश में सबसे आगे है। ऐसे में यह विश्वास करना मुश्किल है कि वह अपने मुस्लिम दोस्त के बिछाये जाल में इतनी आसानी से फंस जाएगी। शालिनी की मासूमियत का इस्तेमाल केवल दर्शकों की सहानुभूति अर्जित करने के लिए किया गया है। आसिफा हिंदू देवताओं की लानत-मलामत करती है, जिससे शालिनी और गीतू (सिद्धि इदनानी) का हिंदू धर्म के प्रति अलगाव का भाव और गहरा हो जाता है। 

कुल मिलकर, फ़िल्म की विषयवस्तु, रूपक, दृश्य और संगीत – सब एक मुद्दे को सनसनीखेज बनाने और बहुसंख्यकों को लामबंद करने के लिए गढ़े गए हैं। दक्षिणपंथी संगठन और पार्टियां अपने लिए समर्थन जुटाने के लिए इस तरकीब का इस्तेमाल कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकारों ने अपने प्रदेशों में इस फिल्म को करमुक्त घोषित कर दिया है। इस प्रचार फिल्म को पश्चिम बंगाल सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया है। यद्यपि केरल के पड़ोसी राज्य तमिलनाडु ने इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया है, लेकिन वहां के मल्टीप्लेक्सों के मालिकों के संगठन ने फिल्म को प्रदर्शित नहीं करने का निर्णय लिया है। 

फिल्म में बलात्कार, महिलाओं को गर्भधारण करने के लिए मजबूर करने, बच्चों के यौन शोषण, आगजनी, आत्महत्या, षड़यंत्र, प्रेम, परित्याग, अजनबी से पुनर्विवाह, सीरिया भाग जाना, प्रिय व्यक्ति की मौत, अपने साथी पीड़ितों की हत्या, आईएस के चंगुल से मुक्ति और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार एजेंसी द्वारा बचाया जाना – यह सब है। शालिनी को अधिकारियों से कोई मदद नहीं मिलती, क्योंकि उसके पास सबूत नहीं हैं। इन सबका प्रयोग हिंदू राष्ट्र के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किया गया है। 

सुदिप्तो सेन विवेक अग्निहोत्री के असली चेले हैं। अग्निहोत्री की ‘द कश्मीर फाइल्स’ भी इसी तरह की एक प्रोपेगेंडा फैलानेवाली फिल्म है, जो एक समुदाय  के लोगों और एक राज्य (जम्मू-कश्मीर) का अपमान करती है। 

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया,  संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

नीरज बुनकर

लेखक नाटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी, नॉटिंघम, यूनाईटेड किंगडम के अंग्रेजी, भाषा और दर्शनशास्त्र विभाग के डॉक्टोरल शोधार्थी हैं। इनकी पसंदीदा विषयों में औपनिवेशिक दौर के बाद के साहित्य, दलित साहित्य, जाति उन्मूलन, मौखिक इतिहास व सिनेमा आदि शामिल हैं

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