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प्रलेस का 18वां राष्ट्रीय अधिवेशन संपन्न, दलित-बहुजन व स्त्रियों की हिस्सेदारी को लेकर सवाल शेष

प्रलेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य और उर्दू की प्रोफ़ेसर अर्जुमंद आरा कहती हैं कि हाशिए पर होने का मतलब है कि हाशिए पर ही हैं – किसी भी मंच पर वो सेंटर में नहीं हैं – तभी तो हम उनको हाशिए पर कह रहे हैं। पढ़ें, यह सुशील मानव की रपट

व्यंग्य विधा को अप्रतिम ऊंचाई देने वाले साहित्यकार हरिशंकर परसाई के जन्मशती के मौके पर अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) का 18 वां राष्ट्रीय अधिवेशन जबलपुर में सम्पन्न हुआ। गत 20-22 अगस्त, 2023 को इस तीन दिवसीय अधिवेशन में देश के 19 राज्यों के पांच सौ से ज़्यादा प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में शामिल क्यूबा के राजदूत अलेक्जेंड्रा ने अपने देश की तरफ़ से शुभकामनाएं व्यक्त की। कार्यक्रम की शुरुआत इप्टा द्वारा गीतकार शैलेंद्र के क्रांतिकारी जनगीत की पेशकश से हुई। अधिवेशन में अनेक साहित्यकारों की किताबों का लोकार्पण हुआ और प्रलेस का घोषणापत्र ज़ारी किया गया। इसके अलावा राष्ट्रीय कार्यकारिणी चुनाव में टी. नारायणन राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गये और सुखदेव सिंह सिरसा दूसरी बार राष्ट्रीय महासचिव के रूप में चुने गए। 

सम्मेलन में मणिपुर और नूह की हिंसा के साथ ही विभाजनकारी सोच और सांप्रदायिकता को लेकर गंभीर चिंता देखने को मिली। लेखकों ने लोकतंत्र, समानता, भाईचारा को लेकर आवाज बुलंद की। अधिवेशन में उद्घाटन सत्र से लेकर लगभग हर सत्र में वक्ताओं ने अपनी बात रखते हुए सभी जन संगठनों व देश भर के लेखकों से एकजुट होकर आम आदमी, किसान, मजदूर, महिला, अल्पसंख्यकों, दलित,आदिवासियों के हक और अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करने की बात कही। फ़ासीवादी व सांप्रदायिक ताक़तों के ख़िलाफ़ संयुक्त मोर्चा बनाने के आह्वान के साथ अधिवेशन का समापन हुआ।

इस तीन दिवसीय अधिवेशन में कुल पांच सत्र हुए। उद्घाटन वक्तव्य देते हुए सामाजिक कार्यकर्ता सईदा हमीद ने हरिशंकर परसाई को याद करते हुए कहा कि उनकी रचनाएं आजकल के समय से टकराती हैं। मॉब लिंचिंग, अलगाववाद को उन्होंने देश के सौहार्द्र पर हमला बताया। फिर मणिपुर का उल्लेख कर आगाह करते हुए योजना आयोग की पूर्व सदस्य ने सम्मेलन से रोशन दुनिया के लिए चिंगारी पैदा होने की उम्मीद व्यक्त की।

देश के प्रख्यात रंगकर्मी प्रसन्ना ने श्रम के महत्व पर बल देते हुए कहा कि लोकतंत्र पर ख़तरे को देखते हुए हम सब यहां पर इकट्ठे हुए हैं। सिर्फ़ सोचने या अच्छी बात करने से समाज नहीं बदलेगा। कबीर, रैदास ने जो किया था हमें वह करना होगा।

खोजी पत्रकार लेखिका नवशरण कौर ने मंच से कहा कि आप सबको देखकर खुशी हो रही है कि हम बहुत सारे लोग हैं जो जनवादी सोच रखने वाले हैं। हम जिस दौर से गुज़र रहे हैं यह हमारे ऊपर छाये घने बांदलों का है। इसे छंटना होगा। हम देख रहे हैं देश में किस तरह से बुलडोज़र चलाये जा रहे हैं, दमन का दौर चल रहा है। इस चीज का सामना कैसे करना है, इस पर बात होनी चाहिए। 

इस अवसर पर मंच पर अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष विभूति नारायण राय, महासचिव सुखदेव सिंह सिरसा, सेवाराम त्रिपाठी, कुंदन सिंह परिहार, हिमांशु राय आदि उपस्थित रहे। संचालन तरुण गुहा नियोगी ने किया। कार्यक्रम में अधिवेशन की स्मारिका सहित अनेक पुस्तकों का विमोचन भी किया गया।

मंचासीन विभूति नारायण राय व अन्य

प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव ने इस मौके पर कहा कि परसाई ने जिस ‘ठिठुरते गणतंत्र’ की बात कही थी, आज वह दिख रहा है। आज जिन परिस्थितियों में लेखक समागम हो रहा है ऐसी परिस्थितियां पहले कभी नहीं थीं। उन्होंने कहा कि संविधान, लोकतंत्र पर हमले की मुनादी सुनाई दे रही है। सरकार के लोग खुलकर संविधान बदलने की बात कर रहे हैं और अभी हाल ही में स्वतंत्रता, समानता और संविधान के बेसिक ढांचे पर सवाल उठाते हुए लेख लिखा गया। उन्होंने कहा कि ये वो लोग हैं, जो देश की आज़ादी के समय कहते थे कि संविधान की ज़रूरत ही नहीं है। आज वर्णाश्रमी व्यवस्था बनाए रखने के लिये हिंदू एकता की बात की जा रही है और हिंदू राष्ट्र के नाम पर देश की बहुलतावादी संस्कृति पर हमला किया जा रहा है। उन्होंने प्रेमचंद का उल्लेख करते हुए कहा कि हमें वर्ण और वर्ग से मुक्त होने के लिए काम करना होगा।

इसी सत्र में अपनी बात रखते हुए भगवान सिंह चावला ने कहा कि आज हमारे सामने स्वतंत्रता, समता जैसे मूल्यों को बचाने की चुनौती है। हमें मिलकर इन मूल्यों की रक्षा करनी होगी।

प्रलेस के इस राष्ट्रीय अधिवेशन में आदिवासी विमर्श पर विचार किया गया। दूसरे सत्र में संस्कृति के सवाल पर बोलते हुए प्रलेस झारखंड के महासचिव महादेव टोप्पो ने कहा कि पूरी दुनिया में आदिवासी विकासवाद का शिकार हो रहा है और वह संघर्ष कर रहा है। आदिवासियों की संस्कृति पृथ्वी के उपभोग की नहीं बल्कि उसे संरक्षित करने की है। दुनिया को बचाने के लिए आदिवासी जीवन संस्कृति को अपनाना होगा।

सुभाष मनसा ने मंच से कहा कि संस्कृति का मतलब मनुष्य होकर जीना है। कुछ लोग मनुष्य होकर जीने नहीं देना चाहते, वह चाहते हैं कि सब उनके अनुसार जिएं और यहीं टकराव पैदा होता है। अगर आप मनुष्यता के साथ नहीं जीते तो संस्कृति पर बात करना बेकार है।

मणिपुर से आये साहित्यकार इकेन खूराइजम ने मणिपुर हिंसा पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि दो महीने तक केंद्र सरकार ने हिंसा को लेकर कुछ नहीं बोला। लेखकीय दायित्व को याद करते हुए उन्होंने कहा कि हम इतने दुख और दर्द में रहे कि न कुछ लिख पाये, न कोई कविता न कहानी। यह राजनीतिक और आर्थिक लड़ाई है, जिसे सांप्रदायिक बना दिया गया। मैतेई और कुकी सदियों से एक साथ रहते आ रहे थे आज उन्हें एक दूसरे का जानी दुश्मन बना दिया गया। उन्होंने कहा कि हम शांति और न्याय की आवाज बुलंद करने के लिए यहां अपने साथियों के साथ पहुंचे हैं।

बेहतर दुनिया बनाने में लेखकों की भूमिका विषय पर आयोजित परिसंवाद में आनंद मेन्से (कर्नाटक), आरती (भोपाल), शिवानी (पश्चिम बंगाल), समाधान इंग्ले (महाराष्ट्र) द्वारा विचार व्यक्त किया गया। सत्र का संचालन शैलेंद्र शैली ने किया। वहीं अधिवेशन के आखिरी सत्र में अकादमिक जगत और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता बरकरार रखने और देश में किसी भी तरह के अवैज्ञानिक प्रचार को सरकार द्वारा प्रतिबंधित करने की मांग, नूंह जैसी हिंसा दुबारा ना घटित हो, हिमांचल प्रदेश में राष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा घोषित करने की मांग, 545 दिनों से चल रहे रूस-युक्रेन युद्ध के खिलाफ़, किसान आंदोलन की सफ़लता को याद करते हुए उनकी मांगों का समर्थन, ‘न्यूज़ क्लिक’ सहित अन्य मीडिया संस्थानों पर हो रहे हमलों सहित सभी वर्गों को समान नि:शुल्क शिक्षा की मांग आदि विभिन्न प्रस्तावों पर चर्चा कर सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किये गये।

सांगठनिक सत्र में कार्यकारणी का गठन किया गया, जिसमें आंध्र प्रदेश के तेलुगु भाषा के बड़े साहित्यकार पी. लक्ष्मी नारायणा को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। पंजाबी भाषा के विख्यात साहित्यकार सुखदेव सिंह सिरसा को राष्ट्रीय महासचिव के रूप में दूसरी बार चुना गया। वरिष्ठ लेखकों में से नरेश सक्सेना, विभूति नारायण राय, राजेन्द्र राजन, अमिताभ चक्रवर्ती, रतन सिंह ढिल्लो आदि ने संबोधित किया।

दलित-बहुजन व स्त्रियों की भागीदारी

प्रलेस के अधिवेशन, मंच और राष्ट्रीय कार्यकारिणी में दलित बहुजनों की भागीदारी के सवाल पर वरिष्ठ साहित्यकार और प्रलेस कार्यकारिणी सदस्य वीरेंद्र यादव प्रलेस के 18वें राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान पारित प्रस्तावों को पढ़ने पर ज़ोर देते हुए कहते हैं कि कोई भी संगठन हो पर उसकी वैचारिकता क्या है, चीजें इससे निर्धारित होती हैं। आरएसएस की सोच क्या है, वे मायने रखता है न कि आरएसएस भाजपा के संगठन में दलितों और आदिवासियों की संख्या। मान लीजिए आरएसएस में दलित-आदिवासी ज़्यादा संख्या में हैं और अल्पसंख्यक भी हैं कुछ संख्या में तो चीजें इससे बहुत तय नहीं होती हैं। तय इससे होती हैं कि संगठन की वैचारिकता क्या है। भाजपा की सरकार में दलित भी हैं पिछड़े भी हैं इन सबके बावजूद एजेंडा तो हिंदुत्व का चल रहा है वहां पर। 

प्रलेस के ढांचे पर उन्होंने कहा कि प्रलेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पेनुगोंडा लक्ष्मी नारायण तेलुगु भाषा के हाशिए के समाज के साहित्यकार हैं। राष्ट्रीय महासचिव सुखदेव सिंह सिरसा सिख समुदाय के पंजाबी भाषा के साहित्यकार हैं। सचिव मंडल में उर्दू की अर्जुमन आरा हैं, और भी कई लोग हैं। सूची अभी ज़ारी नहीं हुई है। तो मैं बहुत डिटेल से नहीं बता सकता। तो इनके मुद्दों पर भी बात हुई और उन्हे मंच पर बोलने का स्पेस दिया गया। तो जो लोग संगठन में हैं उन्हें ही बोलने का स्पेस दिया जाएगा। जो नहीं हैं उनके लिए कोशिश हो रही है कि उन्हें शामिल करके दायरे को बढ़ाया जाए। 

वहीं प्रलेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य और उर्दू की प्रोफ़ेसर अर्जुमंद आरा कहती हैं कि हाशिए पर होने का मतलब है कि हाशिए पर ही हैं – किसी भी मंच पर वो सेंटर में नहीं हैं – तभी तो हम उनको हाशिए पर कह रहे हैं। यह सिर्फ़ प्रगतिशील लेखक संघ की बात नहीं है, जो सियासी प्लेटफॉर्म होते हैं, उनकी भी है कि हर एक को पोलिटिकली करेक्ट स्टेटमेंट समझा जाता है। जो अस्मितावादी हैं उनका अपना संघर्ष है। एक तरह से उनको लगता है कि ये नाइंसाफ़ी है उन्हें वो मुकाम नहीं मिला है। प्रलेस के इस अधिवेशन में औरतों को जगह तो दी गई, लेकिन यह भी कहा जा सकता है कि आटे में नमक होना ज़रूरी है। तो वो पोलिटिकली करेक्ट स्टैंड तो रहा है। सिर्फ़ एक सत्र ऐसा था, जिसमें औरतें नज़र नहीं आईं। मैंने सवाल उठाया तो महासचिव सिरसा जी ने स्टेज से बताया कि दो नेशनल एक्जीक्युटिव औरतों को रखा था इस सत्र के लिए, पर वो आईं हीं नहीं। हालांकि वह चाहते तो वहां इतनी सीनियर महिलाएं थीं, उनमें से किसी को ले सकते थे। हालांकि प्रलेस के अधिवेशन में हर ग्रुप के लोग मौजूद थे। लेकिन कोई ऐसा सोचे कि जैसा दलित लेखक संघ या महिला लेखक संघ है, तो जाहिर है फिर वो उन्हीं का फोरम होता है। तो उतनी तादात में हम किसी इन्क्लुसिव फोरम से उम्मीद नहीं करते हैं। वो एक स्टेटमेंट होता है ना कि जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी भागीदारी। तो वो लेखक संगठन में मुमकिन नहीं होता है इस तरह से काउंट करना और लिखना। फिर लेखन का क्या मतलब रह जाएगा। 

प्रलेस सदस्य शिवानी प्रलेस में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के सवाल पर कहती हैं कि महिलाओं को प्रलेस में निर्णय लेने वाले मजबूत पोजीशन में होना चाहिए पर वहां महिलाओं का प्रतिनिधित्व उस तरह से नहीं है। तो जैसा कि दफ़्तरों और कार्यस्थलों पर होता है कि आप हमारे हिसाब से चलिए, वही मानसिकता है। अगर महिला निर्णय लेने की स्थिति में होती तो राय साहेब जैसे लोग प्रलेस में नहीं होते। 

झारखंड प्रलेस के उपमहासचिव शेखर मलिक कहते हैं कि जयपुर के पिछले सम्मेलन में भी हमने इन मुद्दों पर बात किया था और राज्य सम्मेलनों में भी लगातार बातें हो ही रही हैं कि हम स्त्री, युवा, दलित, आदिवासी आदि वर्गों का किस प्रकार से संगठन के भीतर भागीदारी को बढ़ाएंगे, सुनिश्चित करेंगे। केवल नेतृत्व वाले स्तर पर शायद वो नहीं दिखता है। इस सम्मेलन में मुख्य अतिथि वक्ता सईदा हमीद रहीं। खोजी पत्रकार नवशरण कौर को सम्मेलन के अंदर मंच पर जगह दी गई। झारखंड प्रलेस के कार्यकारी अध्यक्ष महादेव टोप्पो को राष्ट्रीय समिति में जगह दी गई है। युवा साथियों का थोड़ा अभाव दिखा है कार्यकारिणी के अंदर। महाराष्ट्र के मराठी भाषी दलित साहित्याकारों ने दलितों का प्रतिनिधित्व किया। मूल सोच जिसको विचार कहते हैं वो यह रहा है कि अस्मितावादी चीजों को ओवरलुक करते हुए हम समग्रता में देखते हैं। इसका अर्थ यह कि हम वर्ग चिह्नित करते हुए जगह नहीं बनाएंगे बल्कि सभी को उस तरह से देखेंगे। जैसे स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक सभी शोषित वर्ग के अंदर आते हैं। इस बार के कार्यक्रम में महिलाओं की भागीदारी थी, युवाओं की कुछ कमी रही। जब तक हम उनकी आवाज़ नहीं सुनेंगे या स्पेस नहीं देंगे तब तक उनकी आवाज़ें दबती रहेंगी। या बातें इस तरह से उभर कर नहीं आ पाएंगी। ज़रूर इन सब पर बातें होनी चाहिए। 

प्रलेस इकाई ग्वालियर के अध्यक्ष और राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य जितेंद्र विसारिया कहते हैं कि महादेव टोप्पो लगातार मंच पर रहे। हर प्रदेशों से जो प्रतिनिधि आये थे उनमें ठीक मात्रा में दलित भी थे, आदिवासी, स्त्रियां और अल्पसंख्यक भी थे। लेकिन प्रलेस में जो वर्चस्व है वो क्षेत्रवाद का ज्यादा है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश वाला बेल्ट हावी रहता है और वही निर्णय लेता है। वही राजेंद्र राजन, वही विभूति नारायण राय यही उसमें इधर-उधर करके हो जाते हैं। बीच में जब नूर ज़हीर जी ने आवाज़ उठाया तो उसका प्रभाव यह पड़ा कि मुझे भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में लिया गया था। महाराष्ट्र के अच्छे खासे आंबेडकरवादी हैं राष्ट्रीय कार्यकारिणी में, दिल्ली की अर्जुमंद आरा हैं। तमाम प्रदेशों से लोग हैं। तो कोई असंतुष्टकारी स्थिति हो यह नहीं कहेंगे। लेकिन नेतृत्व में मध्य प्रदेश को भी पीछे छोड़ दिया जाता है। हरीओम राजौरिया हों, विनीत तिवारी, सारिका, कुमार अम्बुज पवन करण, महेश कटारे, ये सब हाशिए पर ही हैं। इनकी बहुत केंद्रीय भूमिका नहीं है। प्रलेस में पार्टी हावी हुई है। यह लेखकों का संगठन है और उसमें से साहित्य ही ग़ायब कर दिया है। पहले काव्य पाठ वगैरह होता था, साहित्यिक चर्चाएं होती थी। तो साहित्यकार हाशिए पर हैं, जो पार्टी और प्रलेस दोनों से जुड़े हैं वो केंद्रीय भूमिका में हैं। राजेंद्र राजन सांसद विधायक रहे हैं, पर लेखन में उनका क्या योगदान है, मुझे नहीं पता नहीं है। ऐसे ही विभूति नारायण का है। कई लोग तो प्रलेस से इसलिए कट गये क्योंकि इसके कार्यकारी अध्यक्ष राय जी स्त्रीविरोधी हैं। इस कारण महिलाओं की कमी हुई है संगठन में। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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