h n

दारापुरी और सिद्धार्थ सहित अन्य की गिरफ्तारी का सामाजिक कार्यकर्ताओं व बुद्धिजीवियों ने की निंदा

भंवर मेघवंशी के मुताबिक एस.आर. दारापुरी, डॉ. सिद्धार्थ व श्रवण कुमार निराला की गिरफ्तारी यह बताती है कि यह चुप रहने का समय नहीं है कि सत्ता के निशाने पर कौन है। वस्तुत: स्थिति यह है कि सत्ता के निशाने पर वे सभी हैं जो वंचितों की बात करेंगे, उनके हक की बात करेंगे

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में भूमिहीन दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और पसमांदा मुसलमानों को एक-एक एकड़ जमीन देने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी की देश भर में निंदा की जा रही है। इन गिरफ्तार लोगों में एस.आर. दारापुरी हैं जो पूर्व में उत्तर प्रदेश में डीआईजी रहे तथा वर्तमान में सूबे में दलित आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर माने जाते हैं। इनके अलावा डॉ. सिद्धार्थ रामू भी गिरफ्तार लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने दलित-बहुजन वैचारिकी को लेकर अनेक किताबें लिखी हैं। वहीं आंबेडकर जन मोर्चा के संयोजक श्रवण कुमार निराला ने बहुजन समाज पार्टी से अपनी राजनीति की शुरुआत की थी और बीते तीन वर्षों से वह भूमिहीनों के पक्ष में आंदोलनरत हैं।

इस मामले में देश के प्रसिद्ध दलित सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी ने कहा कि उत्तर प्रदेश देश में ऐसा राज्य बन गया है जहां हक मांगने पर या तो लाठी मिलती है या फिर जेल। उन्होंने कहा कि एस.आर. दारापुरी, डॉ. सिद्धार्थ व श्रवण कुमार निराला की गिरफ्तारी यह बताती है कि यह चुप रहने का समय नहीं है कि सत्ता के निशाने पर कौन है। वस्तुत: स्थिति यह है कि सत्ता के निशाने पर वे सभी हैं जो वंचितों की बात करेंगे, उनके हक की बात करेंगे।

वहीं इस मामले में तिलका मांझाी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर के सेवानिवृत्त प्रो. विलक्षण बौद्ध ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार का कृत्य निश्चित तौर पर निंदनीय है। यह दलित-बहुजनों में जग रही चेतना को दबाने का कुत्सित प्रयास है। उन्होंने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश आरएसएस और भाजपा के लिए गुजरात के बाद दूसरा मॉडल बन गया है। 

एसआर दारापुरी, डॉ. सिद्धार्थ और श्रवण कुमार निराला तथा आंदोलन के दौरान मौजूद दलित-बहुजन महिलाएं

वर्कर्स यूनिटी पत्रिका के संपादक संदीप राऊजी ने कहा कि 2024 के पहले वे सभी लोग जेल भेजे जाएंगे, जो न्याय के पक्ष में खड़े होंगे। एक तरफ तो केंद्र सरकार यह कहकर पुराने कानूनों को खारिज कर रही है कि वे औपनिवेशिक काल के हैं तो दूसरी तरफ नए कानूनों के नाम पर देश में तानाशाही स्थापित करने की कोशिश कर रही है। इसका एक प्रमाण अरुंधति राय के खिलाफ दस साल पुराने मामले में मुकदमा चलाने की स्वीकृति देना है। तो यह बात साफ है कि लोकतंत्र के पक्ष में, गरीब-मजलूमों के पक्ष में बोलनेवालों को डराने की कोशिश की जा रही है। आप यह देखिए कि एस.आर. दारापुरी और डॉ. सिद्धार्थ के खिलाफ बिजली चोरी का आरोप लगाया गया है। लोगों की आवाज बंद करने का यह फर्जी तरीका सरकार अपना रही है। यह निंदनीय है।

वहीं गोरखपुर के स्थानीय लोग और बुद्धिजीवियों का भी यही मानना है कि वर्तमान केंद्र तथा उत्तर प्रदेश की सरकार जिस तरह संविधान में लिखे मौलिक अधिकारों की अवहेलना करते हुए पत्रकारों, सांस्कृतिकर्मियों या सामाजिक कार्यकर्ताओं का दमन कर रही है, यह हमला उसी की एक कड़ी है। सामाजिक कार्यकर्ता तथा ‘मेहनतकश’ पत्रिका के संपादक मुकुल जी का कहना है कि यह आंदोलन बिलकुल शांतिपूर्ण था तथा प्रशासन से अनुमति लेकर हो रहा था। कमिश्नर को ज्ञापन देने के बाद जिस तरह से आंदोलन के नेताओं के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज कर उन्हें गिरफ़्तार किया गया, यह एक दुर्भाग्यपूर्ण कदम है।

लेखक सांस्कृतिककर्मी राजाराम चौधरी का कहना है कि प्रदेश की योगी सरकार दलित, पिछड़े और जनपक्षधर लोगों का दमन कर रही है। उसे वर्तमान केंद्र सरकार का भी पूरा समर्थन प्राप्त है। यह घटना इसी तथ्य की पुष्टि करती है।

लंबे समय तक बैंकिंग ट्रेड यूनियन से जुड़े तथा लेखक एस.एन. सहाय का कहना है कि आज ट्रेड यूनियन तथा किसान संगठन से जुड़े लोगों का भारी दमन किया जा रहा है। फासीवादी तत्वों को धरना-प्रदर्शन करने और नफ़रत फैलाने की पूरी छूट दे दी गई है, लेकिन जनपक्षधर लोग जब अपने मूल अधिकारों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं, तो उन्हें झूठे मुकदमे में फंसाकर गिरफ़्तार किया जा रहा है।

वहीं छात्र तथा बहुजन राजनीति से जुड़े संजय यादव का कहना है कि यह सरकार दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक विरोधी है। लगातार उनका दमन किया जा रहा है और उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाया जा रहा है।

(इनपुट : स्वदेश सिन्हा)

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

एफपी डेस्‍क

संबंधित आलेख

लोकसभा चुनाव : आरएसएस की संविधान बदलने की नीयत के कारण बदल रहा नॅरेटिव
क्या यह चेतना अचानक दलित-बहुजनों के मन में घर कर गई? ऐसा कतई नहीं है। पिछले 5 साल से लगातार सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों और...
जातिगत जनगणना का विरोध एक ओबीसी प्रधानमंत्री कैसे कर सकता है?
पिछले दस वर्षों में ओबीसी प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने ओबीसी वर्ग के आमजनों के लिए कुछ नहीं किया। जबकि ओबीसी वर्ग...
मोदी फिर अलापने लगे मुस्लिम विरोधी राग
नरेंद्र मोदी की हताशा का आलम यह है कि वे अब पाकिस्तान का नाम भी अपने भाषणों में लेने लगे हैं। गत 3 मई...
‘इंडिया’ गठबंधन को अब खुद भाजपाई मान रहे गंभीर चुनौती
दक्षिण भारत में तो फिर भी लोगों को यक़ीन था कि विपक्षी दल, ख़ासकर कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करेगी। लेकिन उत्तर, पूर्व, मध्य और पश्चिम...
परिणाम बदल सकता है गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र में पिछड़ा बनाम अगड़ा का नॅरेटिव
गोरखपुर में पिछड़े और दलित मतदाताओं की संख्या सबसे ज़्यादा है। एक अनुमान के मुताबिक़ यहां पर क़रीब 4 लाख निषाद जाति के मतदाता...