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आंबेडकरवादियों के लिए चैत्यभूमि का महत्व बताती डॉक्यूमेंट्री

सोमनाथ वाघमारे का अनूठा परिप्रेक्ष्य, साधारण दिखने वाले लेकिन आंबेडकरवादियों के ज़रिए कहानी को आगे बढ़ाने का उनका अभिनव तरीका और बढ़िया संगीत – ये तीनों मिलकर इस डॉक्यूमेंट्री को अध्येताओं और कार्यकर्ताओं दोनों के लिए जानकारी और ज्ञान का बेशकीमती स्रोत बनाते हैं। बता रहे हैं नीरज बुनकर

कुछ समय पहले लंदन के पास ओटरशॉ नामक गांव में सोमनाथ वाघमारे निर्देशित डॉक्यूमेंट्री ‘चैत्यभूमि’ का प्रदर्शन हुआ। इस कार्यक्रम में मैं भी मौजूद था। यह डॉक्यूमेंट्री आंबेडकरवादियों के लिए चैत्यभूमि की अहमियत को रेखांकित करती है। चैत्यभूमि मुंबई में वह स्थान है, जहां डॉ. बी.आर. आंबेडकर की अंत्येष्टि हुई थी। फिल्म का प्रदर्शन बुद्धिस्ट आंबेडकराईट मैत्री संघ, यूके द्वारा अपने वार्षिक आयोजन ‘धम्म चक्क अनुवत्तन दिन’ के मौके पर किया गया था। 

सोमनाथ को मैं 2017 से जानता हूं, जब हम दोनों टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज, मुंबई में एक साथ पढ़ते थे। अपने सीमित संसाधनों के बाद भी, सोमनाथ आंबेकरवादी परिप्रेक्ष्य से अर्थपूर्ण सिनेमा के निर्माण के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे हैं। उन्होंने शुरुआत अकेले की थी, लेकिन बाद में और लोग उनसे जुड़ते चले गए। चैत्यभूमि का निर्माण भी एक टीम के प्रयासों से हुआ है और इसी सिलसिले में सोमनाथ लंदन पहुंचे थे। 

इस फिल्म का पहला प्रदर्शन लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में हुआ, जहां से आंबेडकर ने अपनी दूसरी स्नातकोत्तर और पहली डॉक्टरेट उपाधि हासिल की थी। इसके बाद यह किंग्स कॉलेज, लंदन; लंदन विश्वविद्यालय के द स्कूल ऑफ़ ओरिएण्टल एंड अफ्रीकन स्टडीज; कैंब्रिज विश्वविद्यालय और फिर अंत में ओटरशॉ में दिखाई गई।

सोमनाथ के बगल में बैठकर इस फिल्म को देखते हुए उसकी विषयवस्तु ने मुझे भावुक कर दिया – और यह सभी आंबेडकरवादियों के साथ हुआ होगा। मुझे याद है कि मुंबई में अपने दो साल के रहवास के दौरान जब भी मेरा मन उद्विग्न होता था, मैं चैत्यभूमि चला जाता था, कभी अकेले तो कभी दोस्तों के साथ। अपनी पहली यात्रा में मैंने चैत्यभूमि की हर चीज़, उसके हर कोने को खूब ध्यान से देखा। बाबासाहेब के स्तूप को मैं बहुत देर तक देखता रहा। मेरे मन में भावनाओं का ज्वार उठ रहा था। उस समय जो विचार मेरे दिमाग में कौंधे, उन्हें मैंने एक कविता में व्यक्त किया। कविता का शीर्षक था– ‘चैत्यभूमि और मैं’।

चैत्यभूमि पर मैंने
अपना वास्तविक सत्य पाया
और पाई असीम शांति
और अंतहीन उर्जा।
बाबासाहेब की आंखों में मैंने देखे
सारे संघर्ष,
जो उन्होंने हमारे वास्ते किये
उनकी सौम्य मुस्कान की पृष्ठभूमि में
मैं देख सकता था
उनका छुपा हुआ दर्द, और स्पष्ट दृढ़ता
वे अपनी दृष्टि से हमें रास्ता दिखा रहे हैं
ताकि हम रहे जागरूक और
भटक न जाएं अपनी राह से।

सोमनाथ का सिनेमाई करिश्मा मुझे मानों खींचकर फिर से चैत्यभूमि ले गया। मैं उतना ही उद्वेलित, उतना ही निःशब्द महसूस कर रहा था। मानो मैं वहीं था, परदे पर दिख रहे लोगों के साथ बातचीत करते हुए। फिल्म में मुझे कई जाने-पहचाने चेहरे दिखे। मैं उनमें से कई को व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानता, मगर उनकी सामूहिक पहचान से मेरी मुलाकात काफी पुरानी है। 

सोमनाथ वाघमारे द्वारा निर्देशित डॉक्यूमेंट्री ‘चैत्यभूमि’ का एक दृश्य

चैत्यभूमि, डॉक्यूमेंट्री सिनेमा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान है, विशेषकर आंबेडकरी व दलित अध्ययन के क्षेत्र में। सोमनाथ वाघमारे का अनूठा परिप्रेक्ष्य, साधारण दिखने वाले आंबेडकरवादियों के ज़रिए कहानी को आगे बढ़ाने का उनका अभिनव तरीका और बढ़िया संगीत – ये तीनों मिलकर इस डॉक्यूमेंट्री को अध्येताओं और कार्यकर्ताओं, दोनों के लिए जानकारी और ज्ञान का बेशकीमती स्रोत बनाते हैं। वाघमारे द्वारा एक स्थल का जिस तरह उपयोग किया गया है, वह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। वे चैत्यभूमि को एक ऐसे स्थान के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो प्रेरणादायक है और साथ ही आंबेडकरवादी पहचान का केंद्रीय तत्व भी। फिल्म के दृश्य अद्भुत और यादों को ताज़ा करने वाले हैं। इस प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित स्थल की सुंदरता और असीम ऊर्जा को वे कैमरे में कैद करने में सफल रहे हैं और उसे एक अलग अर्थ देने में भी। 

‘चैत्यभूमि’ इस बात का सबूत है कि डॉक्यूमेंट्री फिल्में भी कितनी प्रभावशाली हो सकतीं हैं। वाघमारे की यह फिल्म आंबेडकरवादी आंदोलन और सामाजिक न्याय के विद्यमान संघर्ष के बारे में वैश्विक दर्शकों को शिक्षित और प्रेरित करने में सक्षम है।  

यह डॉक्यूमेंट्री मानवोचित भावनाओं के पूरा विस्तार – जिसमें राजनीतिक, व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, सांगीतिक और धार्मिक आयाम शामिल हैं – को अपने में समेटती है। इसकी शुरुआत एक जोशीले गीत से होती है, जिसमें आंबेडकरवादी आंदोलन की छवियों को पिरोया गया है। इस गीत के लेखक और संगीतकार कोई पेशेवर नहीं, बल्कि एक ट्रक चालक हैं, जो डॉक्यूमेंट्री में भी दिखलाई पड़ते हैं। यह प्रस्तुतीकरण आंबेडकरवादी कलात्मक विधाओं जैसे जलसा, शायरी, भीम गीत, गाना और मंडली की समृद्धि को रेखांकित करता है। इन विधाओं ने आंबेडकरवादी आंदोलन को जिंदा रखने और ग्रामीण, अशिक्षित वर्गों से लेकर शिक्षित तबकों तक आंबेडकर के विचार पहुंचाने में महती भूमिका अदा की है। 

पूरी डॉक्यूमेंट्री के केंद्र में आम आंबेकरवादी हैं। वे कथावाचक हैं, जो आख्यान को अबाध रूप से आगे ले जाते हैं और वह भी फिल्म की कलात्मक अखंडता को खंडित किये बिना। यह फिल्म आंबेडकरवादी आयोजनों में उपस्थित लोगों को केवल एक ‘भीड़’ के रूप में वर्णित करने के पारंपरिक ब्राह्मणवादी निरूपण को पुनर्परिभाषित करती है और यह बताती है कि इस ‘भीड़’ में सामुदायिक भावना और वैयक्तिता दोनों होते हैं। इसके अतिरिक्त, युवा और बौद्धिक जोश से भरपूर आंबेडकरवादी विद्वानों के समालोच्नात्मक साक्षात्कारों के ज़रिए, निर्देशक सोमनाथ आंबेडकरवादी परिप्रेक्ष्य से चैत्यभूमि के महत्व और उससे जुड़ी भावनाओं को अभिव्यक्त करने और उनके सैद्धांतिकरण के लिए व्यापक भारतीय और वैश्विक दर्शकों को वैचारिक ढांचा उपलब्ध कराते हैं।   

‘चैत्यभूमि’, इस स्थल के राजनीतिक पक्ष पर भी प्रकाश डालती है और उसकी तुलना शिवाजी पार्क और अन्य विचारधाराओं के पैरोकार राजनीतिक दलों से जुड़े स्थलों से करती है। फिल्म में आंबेडकरवादी छवियों को शिवसेना के बैनर के साथ दिखाकर, विरोधाभासी विचारधाराओं को चिह्नित किया गया है। एक विचारधारा हाशियाग्रस्त समुदायों का दमन करना चाहती है; तो दूसरी, लोगों की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति पर विचार किये बगैर समावेशिता को अंगीकार करती है। आंबेडकर से जुड़े स्थलों के बारे में राज्य के दृष्टिकोण को रेखांकित करने के लिए डॉक्यूमेंट्री दिखाती है कि किस तरह उन स्थलों की हालत में गिरावट आ रही है, वहीं वह इन कठिनाईयों के बावजूद लोगों की हिम्मत को दिखाती है। कैमरा हमें बताता है कि किस प्रकार आंबेडकर के शिक्षा और प्रगति के एक-दूसरे से जुड़े होने के सिद्धांत के अनुपालन में चैत्यभूमि में लोग अपने बच्चों की शिक्षा के लिए किताबें और आंबेडकरवादी आंदोलन के महत्वपूर्ण प्रतीक खरीद रहे हैं और करियर काउंसलिंग सेवाओं का लाभ उठा रहे हैं।

नागराज मंजुले, जो अपनी फिल्मों में महत्वपूर्ण किरदार निभाते हैं, की तरह सोमनाथ भी कैमरे के सामने आते हैं और यह बताते हैं कि वे एक फिल्म निर्माता बतौर ही नहीं, बल्कि एक आंबेडकरवादी बौद्ध की तरह भी चैत्यभूमि के उत्सव में भागीदार हैं। फिल्म के अंत में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम दिखाया गया है, जो बुद्ध पर केंद्रित है और बताया गया है कि किस प्रकार एक व्यक्ति बुरे कर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लेता है। यह हिस्सा फिल्म की विषयवस्तु की अंतिम परिणिति का बोधक है। इसकी पृष्ठभूमि में समुद्र में उठती लहरों के दृश्य और उसकी आवाज़ है, जो आंबेडकरवादी आंदोलन के निरंतर आगे बढ़ते रहने का प्रतीक है। बेतरतीब लहरों का शोर अंततः में आज़ादी, बराबरी और भाईचारे की लयबद्ध और समरस लहर में बदल जाएगा। अंत में आकाश से लिया गया संपूर्ण चैत्यभूमि का विहंगम चित्र, एकता और निरंतरता के भाव का सूचक है। 

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/राजन/अनिल)


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लेखक के बारे में

नीरज बुनकर

लेखक नाटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी, नॉटिंघम, यूनाईटेड किंगडम के अंग्रेजी, भाषा और दर्शनशास्त्र विभाग के डॉक्टोरल शोधार्थी हैं। इनकी पसंदीदा विषयों में औपनिवेशिक दौर के बाद के साहित्य, दलित साहित्य, जाति उन्मूलन, मौखिक इतिहास व सिनेमा आदि शामिल हैं

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