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जाति के विनाश का सवाल अनुत्तरित क्यों है?

इसरो के चेयरमैन एस. सोमनाथ ने यह दावा भी किया कि अलजेब्रा, समय के सिद्धांत, आर्किटेक्चर और यहां तक कि अंतरिक्ष विज्ञान के सिद्धांत भी वेदों से मिले थे। हमें यह ध्यान देना होगा कि इसरो के चेयरमैन कहीं भी यह कहते हुए नहीं सुने गए कि उन्होंने वेदों के भीतर के तमाम सूत्रों को खोजकर लोगों के सामने प्रस्तुत किया है। उन्हें बताना चाहिए कि क्या इन सूत्रों के आधार पर ही उन्होंने इंजीनियरिंग की अपनी पढ़ाई पूरी की? पढ़ें, द्वारका भारती का यह आलेख

जाति भारतीय समाज का यथार्थ है। और यह भी कि हम भारतवासी इस यथार्थ के साथ सामंजस्य बनाकर सदियों से जिए जा रहे हैं। आश्चर्य यह है कि हम किंचित भी इस व्यवस्था के प्रति विचलित नहीं होते, बल्कि इसे भारत की सांस्कृतिक विशेषताओं में गिन लेते हैं। इससे भी बड़ा आश्चर्य यह है कि जिन लोगों को इस जाति-व्यवस्था ने निरंतर काट खाया है, वे और भी दुलार से इसको अपने खूंटे से बांध कर रखे हुए हैं। 

जाति के संबंध में एक विडंबना यह भी है कि इसका नाम जितना छोटा दिखाई पड़ता है, उतने ही विराट सांस्कृतिक-पहाड़ इसकी पीठ पर लदे हुए देखे जाते हैं। इस पर विद्रूपता यह कि इसके सांस्कृतिक नश्तरों ने जिन लोगों को सबसे ज्यादा छलनी कर रखा है, वही इसको सहेजने में सबसे आगे खड़े देखे जाते हैं। इसकी सरंचना इतनी धूर्तता व दूरदृष्टि से रची गई है कि अब तक भी हम यह समझने में असमर्थ हैं कि इसको किसने और कैसे आसमान से उतार कर महीन अणुओं से भी महीनता से इस समाज में बो दिया है। यह इस प्रकार के धूल कण हैं जो बंद दरवाजे की दरारों से फूटती हुई तेज रौशनी में ही दिखाई देते हैं, जिन्हें दिन के सामान्य उजाले में देखना एकदम संभव नहीं होता।

केवल मनु नहीं था खलनायक

हमारे चिंतकों को ले-देकर एक मनु का नाम सामने उभरता हुआ दिखाई तो देता है, लेकिन स्पष्ट तौर पर हम यह घोषणा नहीं कर पाते कि इसका जन्मदाता यही व्यक्ति था। जबकि दलितों और शूद्रों को तमाम गालियां इसी व्यक्ति के नाम पर दी जाती हैं। डॉ. आंबेडकर जैसे विद्वान भी यही बताते हैं कि मनु इसका रचनाकार कदापि नहीं था, लेकिन इसका सबसे बड़ा पोषक अवश्य था। एक हैरानी पैदा करने वाला यह तथ्य भी डॉ. आंबेडकर सामने लाते हैं कि देश का ब्राह्मण और कई बातों के लिए दोषी हो सकते हैं, लेकिन देश के अन्य समुदायों पर जाति-प्रथा थोपना ब्राह्मणों के बूते के बाहर की बात थी। मनु ने, जिसे आंबेडकर एक शैतान की संज्ञा देते हैं, महज यही काम किया है कि जाति-व्यवस्था को एक संहिता का स्वरूप देकर भारत के दार्शनिक व धार्मिक ढांचे में इतनी सिद्धहस्तता से उतारा है कि इस देश में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह अनपढ़ हो, या कोई प्रकांड विद्वान, अमीर हो या निर्धन, संत हो या कोई खूंखार डाकू, जाति के प्रति पूर्णरूपेण निष्ठावान देखा जाता है। यही सबसे बड़ा कारण है कि हजारों वर्षों से चली आ रही इस प्रथा के स्वभाव को देखते हुए देश-विदेश के विद्वानों ने जाति-उन्मूलन की मुहिम को एक यूटोपियन मुहिम की संज्ञा देते हुए भारत का अंतिम सत्य मान लिया है। यानी इस देश की सामाजिक व्यवस्था ने यह तय कर रखा है कि भारत की आने वाली पीढ़िय़ों को इसी व्यवस्था में जन्म लेना होगा, और इसी में मरना होगा। यह एक ऐसी मूक-सहमति है, जिसे जन्मते ही कबूल करना होता है। एक मुस्लिम घर में पैदा होने वाला बच्चा बड़ा होने पर यदि चाहे तो अपना धर्म परिवर्तन कर सकता है। एक ईसाई भी ऐसा कर सकता है और चाहे तो एक हिंदू भी ऐसा कर सकता है, लेकिन भारतीय समाज में अपनी जाति में पैदा होकर कोई इससे पीछा नहीं छुड़ा सकता है। यदि ऐसा करता हुआ वह बाद में पकड़ा जाता है तो और भी नारकीय स्थिति उत्पन्न होना तय है। इससे आप जाति के मजबूत आधारों की स्थिति का आकलन सहज ही कर सकते हैं। यह इतनी महीनता से बुना गया ताना-बाना है कि संसार के चर्चित चिंतक भी आज हतप्रभ हो उठते हैं। इसकी भयावहता का अनुमान इसकी अति-महीन सरंचना से भलीभांति लगाया जा सकता है। 

इसकी सरंचना के बारे में और गहराई से जानने के लिए हमें एक भारतीय चिंतक गोविंद सदाशिव घुर्ये (1893-1983) को पढ़ना चाहिए। हालांकि डॉ. आंबेडकर ने उनके शोधों पर कई प्रश्न चिह्न भी लगाए हैं। लेकिन वे संभवत: देश के एकमात्र ऐसा चिंतक रहे, जिन्होंने भारत में समाज-शास्त्रीय सोच के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। जाति जैसे सामाजिक दुरूहता से ओतप्रोत विषय पर गंभीरता से काम किया है। जिस आधुनिक कहे जाने वाले समाज में हम जी रहे हैं, उसके पास भी इससे मुक्त होने की कोई अवधारणा अभी तक अपने अस्तित्व में नहीं देखी गई है। आज भी इसके कवच को भेदने में भारत का संविधान पूर्णतया सफल नहीं हुआ है। भारतीय संविधान के पास अस्पृश्यता व जाति के विरोध में कुछ संवैधानिक धाराएं तो अवश्य मौजूद हैं, लेकिन यह एक कटु सत्य है कि ये धाराएं भी जाति के मजबूत कवच को भेद नहीं पातीं। यही कारण है कि स्वतंत्रता के सात दशकों के बाद भी जाति एक अभेद्य दुर्ग के माफिक है। जाति से मुक्ति पाने के प्रयास में जो लोग अन्य धर्म में शरण लेते हैं, वहां भी जाति उनके लिए अलग श्रेणी स्वत: ही बन जाती है। दूसरे के घर में किसी अजनबी का प्रवेश उसे सदियों तक बेगानगी का अहसास दिलाने के बाद अंतत: अपना लेता होगा, लेकिन जाति के संदर्भ में ऐसा कभी नहीं होता। वहां उसका अलग वर्ग बन जाता है, जाति जस-की-तस बनी रहती है।

एक मंदिर में पूजा करते इसरो के चेयरमैन एस. सोमनाथ

वस्तुत: जाति की प्रकृति सिर्फ यही नहीं कि वह समाज को बांटती है, वह समाज को विभक्त करती हुई असमानता का व्यवहार भी करती है। एक व्यक्ति या एक समुदाय को पहाड़ से भी ऊंचा उठाती है तो दूसरे को रसातल से भी नीचे धकेल देती है। 

वैदिक युग में वर्ण और उत्तर वैदिक युग में निर्धारित किया गया कर्म 

वैदिक काल में पनपी वर्ण-व्यवस्था की उत्पत्ति को दैवीय बताने वालों को भी शायद यह अनुमान नहीं होगा कि उनकी यह चमत्कारिक व्यवस्था एक दिन जातिवाद से अस्पृश्यता में परिवर्तित हो, कितनों की अस्मिता को गर्त में धकेल देगी। ब्रह्मा के चार अंगों से चार वर्णों की उत्पत्ति की अवधारणा ने जिस ब्राह्मण को दैवी पुरुष घोषित किया था, वह आज भी इस समाज का सर्वोपरि अंग बना हुआ है। इस जकड़न को सांस्कृतिक रूप देने के लिए ब्रह्मा के चार अंगों से चार-वर्णों की उत्पत्ति के साथ-साथ संपूर्ण विश्व को उसी यज्ञानुष्ठाता पुरुष का एक अंश बता दिया गया, जिसमें चर-अचर सभी का समावेश भी बताया गया। इसी उत्तर वैदिक काल में प्रत्येक वर्ग के लिए अलग-अलग कर्मों का निर्धारण भी कर दिया गया। 

इस संदर्भ में हम यजुर्वेद के श्लोक 30/5 को देख सकते हैं। इसी काल में इन वर्णों का नामकरण भी कर दिया जाता है जो वर्ण-व्यवस्था का एक स्थायी स्तंभ बन जाता है। ब्राह्मण के लिए एहि, क्षत्रिय के लिए आगच्छ, वैश्य के लिए आद्रव तथा शूद्र के लिए आघव का नाम दिया जाता है। यह प्रक्रिया यहीं खत्म नहीं होती, वर्ण के आधार पर मानव की संज्ञा विभिन्न चौपायों से करने की प्रक्रिया भी देखने को मिलती है। उदाहरण के तौर पर अच्छा कर्म करने वालों का जन्म मनुष्य योनि के उच्च वर्ण में होना कहा गया, जबकि बुरा कर्म करने वालों का जन्म कुत्ता, शूकर, चांडाल जैसी अशुभ योनि में होना कहा गया। (छान्दोग्य उपनिषद् 5/10/7)

वर्ण-व्यवस्था को और भी व्यवस्थित स्वरूप देने के लिए इतने पुख्ता सांस्कृतिक नियमों का मुलम्मा चढ़ाया गया है कि आज के समाजशास्त्रियों की बुद्धि भी चकरा जाती है। मिसाल के लिए ब्राह्मण के नाम को दर्शाता हुआ ‘शर्मा’, क्षत्रियों के लिए ‘वर्मा’, वैश्य के लिए ‘गुप्त’ तथा शूद्र के लिए ‘दास’ शब्द निर्धारित कर दिया गया। इस प्रकार की व्यवस्था हम ‘बौद्धायन गृह्यसूत्रम्’ नामक ग्रंथ में देख सकते हैं। सरसरी दृष्टि से देखने से यह वर्गीकरण साधारण-सा नजर आता है, लेकिन यह एक ऐसा सांस्कृतिक आक्रमण था, जिसका सामना आज भी देश का निम्न वर्ण करने को अभिशप्त है। यह विचार वर्ण-व्यवस्था में स्थायित्व लाने का एक ऐसा अचूक अस्त्र था, जो आज भी अपना प्रभाव कम नहीं होने दे रहा। गहराई से देखें तो हमें यह भलीभांति स्पष्ट हो जाएगा कि इस प्रकार की सामाजिक व्यवस्था को इसलिए रचा गया ताकि प्रत्येक वर्ण का व्यक्ति अपनी मर्यादानुसार कोल्हू के बैल की भांति आंखें मूंदे चलता रहे। इसके प्रभाव को देखने के लिए हम गांधी के उन विचारों को देख सकते हैं, जो उन्होंने वर्ण-व्यवस्था के पक्ष में डॉ. आंबेडकर के समक्ष रखे थे। वर्ण-व्यवस्था के अर्थों को नकारने के अर्थ थे हिंदू धर्म की अस्मिता को चुनौती देना। 

हम अंदाजा लगा सकते हैं कि यह वर्ण-व्यवस्था का रूप आज भी कितना खौफनाक हो जाता है, जब शहर की गंदगी साफ करने के लिए एक वर्ण को ही झोंक दिया जाता है और वह घृणा का पात्र भी समझा जाता है। इसकी तुलना में उच्च वर्णों का प्रभाव और भी ऊंचा उठता चला जाता है।

वर्ण-व्यवस्था की यह चतुराई यहीं समाप्त नहीं होती। प्रत्येक वर्ण के व्यक्ति को यज्ञ करने के लिए अलग-अलग ऋतुओं का शास्त्रीय प्रावधान भी कर दिया गया है। मसलन, ब्राह्मण के लिए बसंत, क्षत्रिय के लिए ग्रीष्म (गर्मी), वैश्य के लिए शीत तथा रथकार सहित अन्य सभी वर्णों के लिए वर्षा ऋतु तय कर दी गई है। यहां यह ज्ञातव्य है कि शूद्र को यज्ञ के अधिकार से वंचित कर दिया गया है।

कहा गया है कि बसंत ऋतु में यज्ञ करने से ज्ञान, ग्रीष्म ऋतु में यज्ञ करने से सामाजिक प्रतिष्ठा तथा शक्ति प्राप्त होती है। भोजन और भोज्य पदार्थ की प्राप्ति के लिए वर्षा उपयुक्त बताई गई है।

गायत्री मंत्र का निहितार्थ

और आगे बढ़ें तो इस वर्ण-व्यवस्था को और गूढ़-रहस्य प्रदान करने के लिए गायत्री-मंत्र के पाठ का आरंभ ब्राह्मण के लिए ‘भू:’, क्षत्रिय के लिए ‘भूव:’, वैश्य के लिए ‘स्व:’ का प्रावधान तय कर दिया गया है ताकि वर्ण-व्यवस्था के भीतर की व्यवस्था में ब्राह्मण की स्थिति सर्वोच्चता से अटी रहे। इस प्रावधान को हम शतपथ ब्राह्मण (2/1/314) में देख सकते हैं। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी होगा कि ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ नामक शास्त्र में प्रत्येक वर्ण के लिए अलग-अलग मंत्रों का प्रावधान भी उल्लेखित किए गए हैं। जैसे, गायत्री का पाठ केवल ब्राह्मण के लिए है, जिससे वह तेजस्वी तथा ब्रह्मवर्चस हो जाता है। क्षत्रिय के लिए ‘त्रिष्टुभ’ छंद है, जिससे उसे ओजस्विता तथा इंद्रीय संबंधी पराक्रमता प्राप्त होती है। पशु की कामना करने वाले अर्थात वैश्य को जगती छंद का पाठ करना चाहिए। भोजन की कामना करने वाले को विराट छंद वाला मंत्र दो बार बोलना चाहिए।

मृत्यु के बाद भी यह व्यवस्था टूट न जाए, इसका भी पूरा ध्यान रखा गया है। क्षत्रियों की चिता सबसे ऊंची रखने का उल्लेख मिलता है। इस संदर्भ में हम लेखक विजय बहादुर राव की पुस्तक, ‘उत्तरवैदिक समाज एवं संस्कृति : एक अध्ययन’, (पृष्ठ 75) में देख सकते हैं। इसी काल में ही ब्राह्मण सर्वोच्चता प्राप्त करते हैं। ब्राह्मण की सर्वोच्चता के अर्थ थे– कर्मकांडों का अंधड़ उठना, क्योंकि विद्या अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन आदि करने वाले ब्राह्मणवर्ग से ही आते थे और यही लोग पौराहित्य का भी कार्य करते थे। इसके फलस्वरूप वर्ण-व्यवस्था अब जन्मना हो गई थी, जिसका पूरा लाभ ब्राह्मण वर्ग को प्राप्त हुआ। इसी काल में राजा को यह निर्देश लिखे मिलते हैं कि राजा ब्राह्मण वर्ग की सुरक्षा करे, अन्यथा उसका संपूर्ण साम्राज्य एक टूटी नाव की तरह नष्ट हो जाएगा। ब्राह्मण सत्ता में न होते हुए भी सत्ता पर भारी बनता है। कहा गया है कि गाय छीनने वाले क्षत्रिय के सभी विवाहित बंधु नष्ट हो जाते हैं और वह संतानहीन, गृहहीन होकर क्षय को प्राप्त होता है। ब्राह्मण की हत्या ही असली हत्या है। उसकी पत्नी के शीलहरण होने पर राष्ट्र का नाश हो जाता है। ऐसा व्यक्ति पित्तर लोक को प्राप्त नहीं कर सकता। यह हत्या भ्रूण-हत्या के समान है। इन सब घोषणाओं से सिद्ध होता है कि एक क्षत्रिय राजा कभी भी एक ब्राह्मण का राजा नहीं रहा। 

एक तरफ ऊंची जातियों का गुणगान तो दूसरी तरफ शूद्रों के प्रति अति निम्न स्तर का व्यवहार अपनाया गया। आपस्तम्ब श्रोतसूत्र में शूद्रों की उत्पत्ति असत्य से हुई घोषित की गई। ऐतरेय ब्राह्मण ग्रंथ में एक शूद्र को दासी पुत्र कहते हुए यज्ञ से बाहर किये जाने का भी उल्लेख प्राप्त होता है। कुछ उल्लेखों में यह भी कहा गया है कि शूद्र अस्पृश्य, अयज्ञीय होते हैं, उन्हें यज्ञ से वंचित कर देना चाहिए। एक शूद्र द्वारा दूहा गया अथवा स्पर्श किया दूध यज्ञ में प्रयुक्त नहीं हो सकता। उनके बनाए बर्तन में भी दूध नहीं ले जाया जा सकता।

शूद्र औरत के विषय में और भी घृणात्मक टिप्पणियों का उल्लेख मिलता है। ‘शांख्यायन ब्राह्मण’ में कहा गया है कि शूद्रा केवल वासना का साधन है। 

इस प्रकार हम पाते हैं कि उत्तर वैदिक सामाजिक चिंतकों की सबसे बड़ी चिंता वर्ण-व्यवस्था को सबल बनाए रखने तथा ब्राह्मण-क्षत्रिय का प्रभुत्व बढ़ाए रखने तक सीमित रही है। इससे भी चिंताजनक स्थिति यह है कि इन तथ्यों को नकारते हुए यह कहा जा रहा है कि भारतीय संस्कृति ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का अनुसरण करती आई है। त्रासदी यह भी है कि इस मुहावरे को पौराणिक-शास्त्रों का महान विचार घोषित करने की हठधर्मिता को लगाम नहीं लगाई जा रही, बल्कि इस झूठ को बार-बार दोहराया जा रहा है। इस पर चिंता नहीं की जा रही कि जाति की जनक रही वर्ण व्यवस्था को जन्म देने वाले पौराणिक शास्त्रों पर अंकुश क्यों नहीं लगाया जा रहा। देश में अस्पृश्यता पूर्णरूप में समाप्त नहीं हुई है और जाति का वर्चस्व पौराणिक शास्त्रों की तरह बना हुआ है। कितने आश्चर्य का विषय है कि उत्तर वैदिक समाज का मुख्य दर्शन ब्रह्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति रहा है, लेकिन यह देश आज भी जातिभेद से मुक्त होने की ललक से विहीन बना हुआ देखा जा रहा है। कहीं-कहीं तो यह भी कहा जा रहा है कि भारत की जाति-व्यवस्था ने हिंदू धर्म के अस्तित्व को बचाए रखा है।

पौराणिकता के मनोविज्ञान का खेल

वास्तव में पौराणिकता का मनोविज्ञान इतना सिर चढ़ कर बोल रहा है कि देश के जाने-माने वैज्ञानिक भी इसके प्रभाव से बच नहीं पाते। इस संदर्भ में हम इसरो के चेयरमैन एस. सोमनाथ के उस वक्तव्य को देख सकते हैं जो उन्होंने समय-समय पर व्यक्त किए हैं। एस. सोमनाथ चंद्रयान मिशन-3 के कारण चर्चा में आए हैं। इसी वर्ष उन्होंने उज्जैन के महर्षि पाणिनी संस्कृत और वैदिक यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में कहा कि संस्कृत भाषा वैज्ञानिक विचारों को आगे बढ़ाने में इस्तेमाल की जाती थी। कम्प्यूटर की भाषा भी संस्कृत है जो लोग कंप्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस सीखना चाहते हैं, उनके लिए संस्कृत भाषा काफी लाभदायक हो सकती है। इस इसरो चीफ ने यह दावा भी किया कि वेदों से मिले विज्ञान के सिद्धांत अरब देशों से होते हुए पश्चिमी देशों तक पहुंचे जहां उन्होंने इन सिद्धांतों को अलग-अलग रूप में प्रस्तुत कर उन्हें अपना बता दिया।

उन्होंने यह दावा भी किया कि अलजेब्रा, समय के सिद्धांत, आर्किटेक्चर और यहां तक कि अंतरिक्ष विज्ञान के सिद्धांत भी वेदों से मिले थे। यहां यह बताना जरूरी होगा कि इनको 2022 में पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है। एस्ट्रोनिटकल सोसायटी ऑफ इंडिया उन्हें स्पेस गोल्डमेडल से सम्मानित कर चुकी है। इस प्रकार के नामीगिरामी वैज्ञानिक जब वेदों को इस प्रकार व्याख्या प्रस्तुत करते हैं तो यह तय करना कठिन नहीं होता कि वेदों के प्रति आंखें मूंद कर सम्मान प्रकट किया जाय। लेकिन यहां हमें यह ध्यान देना होगा कि इसरो के यह चेयरमैन कहीं भी यह कहते हुए नहीं सुने गए कि उन्होंने वेदों के भीतर के तमाम सूत्रों को खोजकर लोगों के सामने प्रस्तुत किया है। उन्हें बताना चाहिए कि क्या इन सूत्रों के आधार पर ही उन्होंने इंजीनियरिंग की अपनी पढ़ाई पूरी की? संस्कृत के बारे में वे घोषणा करते हैं कि संस्कृत भाषा वैज्ञानिक विचारों को आगे बढ़ाने में प्रयोग की जाती थी। इस संदर्भ में जब हम संस्कृत भाषा के जानकारों की राय जानना चाहते हैं तो हमें निराशा ही हाथ लगती है। हम यहां संस्कृत भाषा के प्रकांड विद्वान डॉ. सुरेंद्र अज्ञात की संस्कृत भाषा पर की गई टिप्पणी को दोहराना चाहेंगे–  

“यह बहुत हैरानी की बात है कि वेदों को लिखने वाले ‘सर्वज्ञ’ ऋषियों-महर्षियों को न अपने देश का और न उस भाषा का नाम ज्ञात था, जिसमें वे वेद लिख रहे थे। ज्ञान के भंडार, सब विद्याओं के मूल स्त्रोत, आदि विशेषणों से मंडित किए जाने वाले वेदों से यह तक पता नहीं चलता कि उनके रचयिता किस भूभाग में और कब रहते थे। न उन्हें अपने देश का ज्ञान था, न काल का। संस्कृत भाषा का आभामंडल बनाए रखने के लिए सदैव प्रयास होते रहे हैं। इसी आभामंडल द्वारा ही संस्कृत भाषा को प्रत्येक रोग की दवा घोषित कर दिया गया है और ब्राह्मण वर्ग इसी भाषा की रहस्यमयी छवि के द्वारा अपना वर्चस्व कायम रखने में सदा सफल हो रहा है।” (अंबेडकरवाद और संस्कृत अर्थात् व्याकरण बनाम ब्राह्मणवाद, पृ. 32)

रामानुजन को जानते हैं तो आर्यभट्ट को भी जानिए

यदि संस्कृत भाषा में इतनी ही विशेषताएं हैं, इसमें विज्ञान के तमाम सूत्र मौजूद हैं, तो क्यों नहीं इसे विज्ञान के पाठ्यक्रम का एक जरूरी भाग मान कर पढ़ाया जाता है? हम यहां भारत के महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की चर्चा करना चाहेंगे। रामानुजन का गणितीय अनुसंधान उस कोटि का है, जिसे हम विशुद्ध गणित कहते हैं। उनके गणित के सूत्रों को भारत के विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, लेकिन भारत के महान लेखक गुणाकर मूले बताते हैं कि उनके (रामानुजन) द्वारा खोजे गए सैंकड़ों सूत्रों, प्रमेयों और अनुमानों पर छात्र-अनुसंधान कर रहे हैं, उनकी उत्पत्तियां खोज रहे हैं। लेकिन हैरानी का विषय है कि उन्होंने कहीं नहीं लिखा कि उन्होंने वेदों से कोई प्रेरणा या कोई सूत्र पाया है। हालांकि रामानुजन धार्मिक वृत्ति का चिंतनशील बालक था और घोषणा करता है कि उसे सपनों में “फार्मूले खोजने में नामगिरि देवी सहयोग देती है।” वास्तव में वे निरंतर संख्याओं के कारण ऐसा कहा करते थे। उसकी स्मृति और गणना शक्ति गजब की थी। संस्कृत के सभी आत्मनेपद और परस्मैपद धातुरूपों की सूची उसे कंठस्थ थी। इसके बावजूद भी वे यह नहीं घोषणा करते कि उन्हें सारा ज्ञान वेदों से मिला।

इसी कड़ी में हम एक और वैज्ञानिक व खगोल शास्त्री आर्यभट्ट की चर्चा करना चाहेंगे, जिनके नाम पर एक उपग्रह भी छोड़ा गया है। आर्यभट्ट की पहचान उनके इस सिद्धांत से भी होती है कि उन्होंने तमाम पुरातन सिद्धांतों को झूठ का पुलिंदा सिद्ध करते हुए सूर्य ग्रहण के वैज्ञानिक कारणों का खुलासा किया था। उन्होंने कहा था कि सूर्य को चंद्रमा जब ढंक लेता है तो सूर्यग्रहण होता है और पृथ्वी की छाया जब चंद्रमा को ढंक लेती है तो चंद्रग्रहण होता है। आर्यभट्ट विश्व की सृष्टि, जो वैदिक ग्रंथों में अक्सर चित्रित की जाती रही है, उसके सृजन और प्रलय के चक्र में विश्वास नहीं करते थे। उन्होंने काल को अनादि एवं अनंत माना है। आर्यभट्ट निश्चय ही क्रांतिकारी विचारक थे। उल्लेखनीय है कि उन्होंने श्रुति-स्मृति और पुराणों की परंपरा के विरोध में सही विचार प्रस्तुत करके साहस का परिचय दिया था और भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान की एक स्वस्थ परंपरा स्थापित की थी। ऐसे गणितज्ञ व वैज्ञानिक कहीं भी यह उल्लेख नहीं करते कि उन्होंने वैदिक-सूत्रों से प्रेरित होकर अपना वैज्ञानिक-आधार प्राप्त किया है।

इसी प्रकार ब्रह्मगुप्त, जो कि एक गणितज्ञ तथा महान वेधकर्ता थे, भी कहीं वैदिकता को इसका श्रेय नहीं देते कि उन्होंने वैदिक ग्रंथों से सूत्रों का आश्रय लेकर अपनी वैज्ञानिकता का प्रदर्शन किया है। स्पेस सेंटर से शुरुआत करके इसरो के चीफ पद तक पहुंचने वाले वैज्ञानिक जब यह घोषणा करते हैं कि वेदों से अंतरिक्ष विज्ञान के सिद्धांत मिलते हैं तो आस्थावादियों को इससे सिर्फ खाद-पानी ही मिलता है, विज्ञान की प्रेरणा नहीं। संस्कृत भी देश की अन्य भाषाओं की तरह एक भाषा ही थी, जिसके बल पर वैदिकता खूब फलती-फूलती रही थी। यदि हम यह कहें कि इस संस्कृत के तमाम सूत्र असमानता के प्रति समर्पित हैं तो कोई अतिकथन नहीं होगा। यह आमजन की भाषा कदापि नहीं रही, बल्कि विशेष वर्ण (ब्राह्मण) की ही भाषा रही है। इस भाषा का व्याकरण भी अपने भीतर वर्ण व्यवस्था को समेटे हुए है। संस्कृत भाषा के विद्वान डॉ. सुरेन्द्र अज्ञात के शोध को माने तो संस्कृत भाषा योरोपीय परिवार की आर्य/हिंदी/भारत-ईरानी शाखा की भाषा है। इसलिए संस्कृत और अवेस्ता (700 ई.पू. में रचित पारसियों का धर्मग्रंथ जो प्राचीन ईरानी भाषा में है) की भाषा में पर्याप्त समानता है। (अंबेडकरवाद और संस्कृत अर्थात् व्याकरण बनाम ब्राह्मणवाद, पृष्ठ 31) 

इन अर्थों में हम इस भाषा को विदेशी भाषा की संज्ञा भी दे सकते हैं। यह शायद विश्व की एकमात्र भाषा होगी जो असमानता के प्रति पूर्णतया प्रतिबद्ध होगी। हम कह सकते हैं कि ब्राह्मणवाद का संपूर्ण शब्द कोश है यह संस्कृत भाषा। इसी कारण बौद्धों के प्रति ब्राह्मणवाद का रूख बेहद कड़ा रहा है।

जाति-व्यवस्था की जनक वर्ण-व्यवस्था आज भी सैद्धांतिक व दार्शनिक तौर पर एक मजबूत गढ़ की तरह है। इससे भी निराशाजनक स्थिति यह है कि इस गढ़ को तोड़ने के लिए जो प्रयास हम देखते हैं, वे ऊंट के मुंह में जीरा से ज्यादा नहीं रहे हैं। यदि हम यह कहें कि भारतीय आदर्शवाद में इसका बोलबाला सदा रहा है तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी। भारत के अधिकतर आदर्शवाद की शाखाओं में वर्ण-व्यवस्था को एक सत्य मान कर सदा स्वीकार किया जाता रहा है। इस संदर्भ में यदि हम बौद्ध तथा जैनों के आदर्शवाद की चर्चा करें तो वहां भी दार्शनिक स्तर पर वर्ण-व्यवस्था को कोई अहमियत मिलती हुई नहीं देखी जाती, लेकिन सामाजिक स्तर पर इसका उल्लेखनीय विरोध देखने को नहीं मिलता।

महायान और हीनयान में अंतर

इसी संदर्भ में यदि हम बौद्धों की चर्चा करें तो स्थितियां जैनों से भिन्न अवश्य हैं, लेकिन वर्ण-व्यवस्था को वहां भी कोई ऐसी चुनौती नहीं मिलती जो इसको ज्यादा हानि पहुंचाती हो। इसके कई कारण रहे हैं। हीनयान बौद्धों की ऐसी शाखा रही है, जिसने वर्ण-व्यवस्था की कोई वकालत कदापि नहीं की, लेकिन वर्णव्यवस्था को मिटाने के लिए आदर्शवाद में कोई कठोर नियम रहे हों, ऐसा नहीं देखा जाता। बुद्ध वर्ण-व्यवस्था के प्रश्न पर स्पष्ट करते हैं कि ब्राह्मणियां भी ऋतुगामी होती हैं, प्रसव करती हैं और दूध पिलाती हुई देखी जाती हैं, तो ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से पैदा होकर श्रेष्ठ क्यों घोषित होते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि जन्मना सभी मनुष्य समान हैं, और उनकी जाति भी एक ही है। इसको हम नकार नहीं सकते कि बौद्ध संघों में वर्ण-व्यवस्था का कोई अधिमान नहीं था, लेकिन बाहरी दुनिया में संघ का कोई असर नहीं था। महायान बौद्धों की चर्चा करें तो वहां भी वर्ण-व्यवस्था को नहीं माना जाता। बौद्ध के अर्थ में सिर्फ बौद्ध ही होते हैं, लेकिन जब हम महायान के आदर्शवाद के संसार में प्रवेश करते हैं तो वेदांतवादी परंपरा तथा महायानी परंपरा में ज्यादा अंतर प्रतीत नहीं होता। नागार्जुन के शून्यवाद और शंकराचार्य के मायावाद, दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है। नागार्जुन का शून्यवाद दर्शन की दुनिया में एक सिद्धांत हो सकता है, लेकिन वर्ण-व्यवस्था को इससे कुछ लेना-देना नहीं है। यदि महायान के बारे में और चर्चा करें तो यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि महायान बौद्धों का आदर्शवादी दृष्टिकोण जो औपनिषदिक आदर्शवाद से प्रेरित है, महायानियों को ज्यादा चुभती नहीं है। कर्मकांडों के साथ-साथ वे सामाजिक स्तर पर वर्ण-व्यवस्था से भी सामंजस्य बनाए रखने में ज्यादा बुराई नहीं मानते। 

पुनश्च

वर्ण-व्यवस्था के पीछे जो आदर्शवादी चिंतन कार्यरत है, वही आज भारत की चिंतन परंपरा मानी जाती है। इसी चिंतन परंपरा पर डॉ. आंबेडकर जैसे व्यक्तित्व जब आघात करते हैं तो मानो वे एक बड़े पहाड़ से टकरा रहे होते हैं। इस देश के अधिकतर त्यौहार इसी आदर्शवादी चिंतन, जो कि ब्राह्मणवादी चिंतन भी कहा जाता है, पर आधारित देखे जाते हैं। किसी भी सांस्कृतिक व्यवस्था में परिवर्तन तब होते हैं जब वहां के लोग इसके लिए लालयित हों। लेकिन इस दौर में हम देख रहे हैं कि इन सांस्कृतिक मुहावरों के चलन में पहले से कहीं ज्यादा तीखापन आया है। राजनीति की सहायता से उन पौराणिक मुहावरों को पुन: स्थापित करने की कोशिशें इतनी शिद्दत से हो रही हैं, मानो भारत के उद्धार की तमाम सीढ़ियां पौराणिकता की ओर ही जाती हों। यह एक आत्मघाती विचार है। इससे समाज में परिवर्तन की उठती लहरों को गहरे दबाने में पूर्णतया सहायता मिलती है। इस प्रकार के सामाजिक माहौल में वर्ण-व्यवस्था जैसी क्रूर व्यवस्था को कोई चुनौती नहीं मिल रही। देश के धार्मिक कहे जाने वाले संगठनों के पास भी इस जाति-पाति के प्रति कोई ऊंचे स्वर सुनाई नहीं देते। इन पर टंगे लाऊडस्पीकरों पर कोई सामाजिक संदेश सुनने को नहीं मिल रहा जो हमें इस जात-पांत के प्रति सावधान करते हों सिवाय इसके कि भगवान की दृष्टि में सब समान हैं। जबकि हम जानते हैं कि आवश्यकता है समाज की दृष्टि में समान होने की। देश का प्रत्येक धार्मिक संगठन अपनी ही धुन में एक व्यवसायिक रुझान से ग्रस्त देखा जा रहा है।

इससे भी चिंताजनक स्थिति यह भी है कि जिन लोगों के पास इस समाज को बदलने का चिंतन व दिशा उपलब्ध है, वे भी निष्क्रयता का शिकार होकर मौन ही दिखाई पड़ते हैं। इस प्रकार के वातावरण में क्या यह कहा जा सकता है कि यह भारत कभी जातिविहीन समाज बन सकता है?

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

द्वारका भारती

24 मार्च, 1949 को पंजाब के होशियारपुर जिले के दलित परिवार में जन्मे तथा मैट्रिक तक पढ़े द्वारका भारती ने कुछ दिनों के लिए सरकारी नौकरी करने के बाद इराक और जार्डन में श्रमिक के रूप में काम किया। स्वदेश वापसी के बाद होशियारपुर में उन्होंने जूते बनाने के घरेलू पेशे को अपनाया है। इन्होंने पंजाबी से हिंदी में अनुवाद का सराहनीय कार्य किया है तथा हिंदी में दलितों के हक-हुकूक और संस्कृति आदि विषयों पर लेखन किया है। इनके आलेख हिंदी और पंजाबी के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। इनकी प्रकाशित कृतियों में इनकी आत्मकथा “मोची : एक मोची का अदबी जिंदगीनामा” चर्चा में रही है

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