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लोकसभा चुनाव : कसौटी पर होगा आंबेडकरवाद

2025 आरएसएस का शताब्दी वर्ष है। सौवें साल से पहले संघ अपने हिंदू राष्ट्र के सपने को पूरा करना चाहता है। नरेंद्र मोदी संघ के प्रचारक रहे हैं। वे गुरु दक्षिणा में संघ को हिंदू राष्ट्र सौंपना चाहते हैं। पढ़ें, प्रो. रविकांत का आलेख

लोकसभा चुनाव बेहद करीब है‌। सत्तापक्ष यानी नरेंद्र मोदी के मंसूबों लिए यह चुनाव बेहद खास है। जबकि विपक्ष के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति है। कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक पांच महीने तक (7 सितंबर, 2022 से 26 जनवरी, 2023) पैदल चलते हुए राहुल गांधी ने 4000 किलोमीटर की भारत जोड़ो यात्रा की। इस यात्रा से उपजे माहौल में विपक्षी दल एकजुट होने लगे। मई, 2023 में विपक्ष की पहली बैठक पटना में हुई। इसके बाद बेंगलुरुर, मुंबई और दिल्ली में इंडिया गठबंधन बनकर तैयार हुआ। लेकिन जनवरी, 2024 तक आते-आते राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और निजी स्वार्थ टकराने लगे। गठबंधन की शुरुआत करने वाले नीतीश कुमार अब फिर से नरेंद्र मोदी के पाले में जा चुके हैं। निस्संदेह इंडिया गठबंधन से विपक्ष का मजबूत नॅरेटिव बना था। लेकिन नीतीश कुमार के पाला बदलते ही मीडिया रात-दिन इसे कमजोर बताने में लगा हुआ है। सवाल है कि क्या यह चुनाव मीडिया के नॅरेटिव पर लड़ा जाएगा? 

दरहकीकत यह है कि विपक्ष की एकजुटता में आई दरार के बावजूद यह चुनाव मोदी के लिए कतई आसान नहीं है। यही कारण है कि भाजपा अपने नए-पुराने तमाम साथियों को साधने में लगी है। यह चुनाव देश के दलितों और वंचितों के अस्तित्व की लड़ाई का सबसे बड़ा चुनाव होने जा रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो 2024 का चुनाव यह तय करेगा कि दलितों-वंचितों का भविष्य सुरक्षित रहेगा या नहीं। डॉ. आंबेडकर ने 1940 में ही इस चुनौती को समझ लिया था। उन्होंने अपनी किताब ‘पाकिस्तान : द पार्टीशन आफ इंडिया’ में स्पष्ट तौर पर लिखा था कि अगर हिंदू राष्ट्र बनता है तो यह करोड़ों दलितों के लिए बड़ी आपदा साबित होगी। इसलिए किसी भी कीमत पर इसे रोका जाना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि हिंदू राष्ट्र ब्रिटिश हुकूमत से भी ज्यादा क्रूर होगा। आज एक तरफ तमाम बाबा और हिंदुत्ववादी संगठन भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का एलान कर रहे हैं तो दूसरी तरफ सत्तातंत्र के जरिए डॉ. आंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान को धीरे-धीरे कुतरा जा रहा है। भाजपा के कतिपय नेताओं से लेकर प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबराय संविधान को बदलने की बात कह चुके हैं।

गांधी, नेहरू और आंबेडकर के समय से मौजूदा दौर तक हिंदुत्ववादियों के मंसूबे जगजाहिर हैं। हिंदुत्व के झंडाबरदार रहे सावरकर ने आजादी के आंदोलन में खुलेआम अंग्रेजों का साथ दिया। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि आजादी और नया संविधान हिंदुत्ववादियों को कतई नहीं भाया। इसलिए वे विभाजन के समय सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने के लिए खासकर पाकिस्तान से आने वाले हिंदुओं और सिक्खों को उकसाने में लगे रहे। गांधी की शहादत भी इसी साज़िश का हिस्सा थी। लेकिन इसके बाद लंबे समय तक हिंदुत्ववादी हाशिए पर रहे।

बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायवती, वंचित बहुजन आघाड़ी के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रकाश आंबेडकर व आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद

लेकिन झूठ और फरेब करके हिंदुत्ववादी अपने आपको खड़ा करने की कोशिश करते रहे। अपनी असलियत को छुपाकर दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के बीच धर्म के नाम पर घुसपैठ करते रहे। वर्ष 1990 के दशक में पहली बार उन्हें कामयाबी मिली। मंदिर आंदोलन के उभार के बावजूद वे अल्पमत में रहे। लेकिन 2014 में कारपोरेट के रथ पर सवार होकर नरेंद्र मोदी पूरे बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में दाखिल हुए। इसके बाद आरएसएस ने अपने एजेंडे को लागू करना शुरू किया। पहले पांच साल में खासकर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के अधिकारों को कुचला गया। उनके खिलाफ सरेआम नफरत और हिंसा हुई। दूसरे कार्यकाल में मोदी संघ के असली एजेंडे की तरफ बढ़े। दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के अधिकारों और अवसरों को कुचला जाने लगा। जाति-व्यवस्था के पेंच कसे जाने लगे और हिंदू राष्ट्र बनाने की मुनादी की जाने लगी। उस संविधान को हटाने की बात होने लगी, जिसने वंचितों को सदियों की गुलामी से मुक्त किया। मनुस्मृति, गीता और रामचरित मानस का महिमामंडन किया जाने लगा। जाहिर तौर पर इन धर्मग्रंथों के जरिए वर्ण और जाति-व्यवस्था को जायज ठहराने की साज़िश की जा रही है। 

ध्यातव्य है कि डॉ. आंबेडकर दलितों, शूद्रों और स्त्रियों की गुलामी के लिए धर्मग्रंथों को ही सबसे बड़ा जिम्मेदार मानते थे, क्योंकि इनके जरिए उस व्यवस्था को ईश्वरीय विधान बनाया गया। इसीलिए उन्होंने कहा था कि धर्मग्रंथों को विस्फोटक से उड़ा देना चाहिए।

पिछले एक दशक में हिंदुत्व का क्रूर चेहरा दलितों ने देखा। ऊना (जुलाई, 2016) में दलित नौजवानों को सरेआम नंगा करके पीटा जाना और हाथरस (सितंबर, 2020) में दलित बेटी की बलात्कार जैसी तमाम घटनाएं इस बात की गवाह हैं कि डॉ. अंबेडकर की आशंका गलत नहीं थी। दलित उत्पीड़न की घटनाएं तो पहले भी होती रही हैं लेकिन इन 10 सालों में एक बड़ा बदलाव आया है। अब उत्पीड़नकारियों का समर्थन हिंदुत्ववादी संगठन करते हैं। सत्तातंत्र अपराधियों को बचाने में लग जाता है। हाथरस में बलात्कारियों के समर्थन में एक पूरा जलसा किया गया, जिसमें भगवा झंडा लहरा रहे थे और जय श्रीराम के नारे लग रहे थे। इस तरह की घटनाएं निरंतर दुहराई जा रही हैं। हिंदुत्ववादियों के इन नारों में अन्याय और उत्पीड़न की चीत्कार का गला घोंटा जा रहा है।

बताते चलें कि 2025 आरएसएस का शताब्दी वर्ष है। सौवें साल से पहले संघ अपने हिंदू राष्ट्र के सपने को पूरा करना चाहता है। नरेंद्र मोदी संघ के प्रचारक रहे हैं। वे गुरु दक्षिणा में संघ को हिंदू राष्ट्र सौंपना चाहते हैं। नई संसद में सेंगोल की स्थापना से लेकर राममंदिर के उद्घाटन में समूचे देश को भगवामय बनाकर हिंदू राष्ट्र की पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या डॉ. आंबेडकर की चुनौती पराजित हो जाएगी? अथवा इस चुनाव में दलित-वंचित समाज डटकर हिंदुत्ववादी ताकत का मुकाबला करेगा? 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

रविकांत

उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के दलित परिवार में जन्मे रविकांत ने जेएनयू से एम.ए., एम.फिल और लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की डिग्री हासिल की है। इनकी प्रकाशित पुस्तकों में 'समाज और आलोचना', 'आजादी और राष्ट्रवाद' , 'आज के आईने में राष्ट्रवाद' और 'आधागाँव में मुस्लिम अस्मिता' शामिल हैं। साथ ही ये 'अदहन' पत्रिका का संपादक भी रहे हैं। संप्रति लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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