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उत्तर प्रदेश में राम के बाद कल्कि के नाम पर एक और धार्मिक ड्रामा शुरू

एक भगवाधारी मठाधीश ने हमारे प्रधानमंत्री को कल्कि भगवान के मंदिर के लिए भूमि-पूजन का न्यौता दिया, और उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया, पलट कर यह नहीं पूछा कि ये कौन-सा नया भगवान है, जिसका मंदिर बनवा रहे हो? बता रहे हैं कंवल भारती

उत्तर प्रदेश में राम के बाद अब विष्णु के एक और अवतार ‘कल्कि भगवान’ की कल्पना को मूर्त रूप दे दिया गया। ठीक अयोध्या की तर्ज पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते 19 फरवरी, 2024 को उत्तर प्रदेश के संभल जिले के गांव एंचोड़ा कम्बोह में, जिसका नाम कल्कि धाम रखा गया है, शिला-पूजन करके भगवान कल्कि के भव्य मंदिर के निर्माण की बुनियाद डाल दी। महाकाल उज्जैन से आए पंडितों ने नौ शिलाओं का पूजन किया। लोगों की भीड़ इकट्ठा करने के लिए उत्तर प्रदेश के कई जिलों से लगभग पांच सौ बसों से भाजपा नेताओं द्वारा लोगों को भरकर भेजा गया। यह इक्कीसवीं सदी के युग का, भारत की गोबर-पट्टी का, वह धार्मिक पाखंड है, जिसे सुनकर दुनिया के लोग न केवल हंसेगे, बल्कि हिंदुओं की समझ पर भी आश्चर्य करेंगे। इस कल्कि धाम के पीठाचार्य प्रमोद कृष्णम हैं, जो कांग्रेस में रहकर भी सदा आरएसएस और भाजपाई हिंदुत्व के साथ थे। 

जहां इस्लाम अपनी ईश्वरीय नबूवत (दूत-सेवा) हजरत मुहम्मद पर और ईसाइयत ईसा मसीह पर खत्म कर चुके हैं, वहां ब्राह्मणों की विष्णु का मनुष्य रूप में अवतरण लेना अभी बंद नहीं हुआ है। विष्णु का अंतिम अवतार कल्कि के रूप में अभी होना बाक़ी है। यह अवतार कब होगा, इसे नरेंद्र मोदी तो क्या, पीठाधीश प्रमोद कृष्णम भी नहीं बता सकते। विज्ञान मौसम तक की सटीक भविष्यवाणी कर सकता है, पर ब्रह्म-ज्ञान में इतनी शक्ति नहीं कि वह कल्कि अवतार का सटीक समय बता सके। जिस अवतार का कोई वैज्ञानिक आधार ही नहीं है, उसके बारे में कोई बता भी कैसे सकता है? ब्राह्मणवादी संस्कृति का सारा साम्राज्य मिथ्या पौराणिक कथाओं पर खड़ा किया गया है, जिसे लोगों में अंधविश्वास और अज्ञान फैलाकर कायम रखा जाता है। लेकिन भारत में शासन-सत्ता भी ब्राह्मणवादियों के हाथों में है, इसलिए इसे कायम रखने में सत्ता का आतंक भी एक बड़ी भूमिका निभाता है। इसके बावजूद एक बड़ी संख्या उन हिंदुओं की है, जो वैज्ञानिक सोच के हैं। वे निश्चित रूप से इस पाखंड के साथ नहीं है। लेकिन वे मुखर नहीं होते। आखिर इन पाखंडियों से कौन पूछेगा कि ईश्वर कभी अवतार नहीं लेता। गीता जैसी किताब ने भी लोगों के दिमागों में यह अंधविश्वास भर दिया है कि जब-जब धर्म की हानि होती है, ईश्वर अवतार लेता है। लेकिन उनके दिमाग में यह बात नहीं आती कि किस धर्म की हानि होती है, तब ईश्वर अवतार लेता है? जब धर्म और कानून के खिलाफ आचरण करने वालों के लिए अदालतें काम कर रही हैं, तो ईश्वर अवतार लेकर क्या करेगा? लेकिन तथाकथित ब्रह्मज्ञानियों ने धारणा यह फैलाई हुई है कि ईश्वर दुष्टों का संहार करने के लिए आएगा। पर ये कौन से दुष्ट हैं, जिनका संहार जरूरी है? 

अवतारों की कथा बताती है कि सतयुग में वामन अवतार के लिए असुर दुष्ट थे। त्रेता में राम-अवतार के लिए ब्राह्मणों को सताने वाले राक्षस दुष्ट थे। द्वापर में कृष्ण-अवतार के लिए कौन दुष्ट थे? कौरव या आदिवासी? पता ही नहीं चलता। कृष्ण ऐसा अस्पष्ट अवतार है, जो ब्राह्मण-संस्कृति से मेल ही नहीं खाता। पर कलयुग में कल्कि-अवतार की जो कहानी गढ़ी गई है, उसमें कल्कि भगवान के लिए कौन दुष्ट हैं? ब्राह्मण तो नहीं हो सकते, क्षत्रिय और वैश्य भी नहीं हो सकते। फिर बाक़ी कौन बचा, दलित-पिछड़े और आदिवासी लोग, या फिर मुसलमान और ईसाई। तब क्या कल्कि अवतार शूद्रों और ईसाई-मुसलमानों का संहार करने के लिए  होगा?

हालांकि कल्कि नाम से ही कलयुग का आभास होता है। कलयुग कितना बुरा युग है, इसका विस्तार से वर्णन गोस्वामी तुलसीदास कर चुके हैं। वह बेचारे कलयुग से बहुत परेशान थे, क्योंकि उनके समय में ब्राह्मणों का मान घट गया था, और शूद्र-म्लेच्छों की बाढ़ आ गई थी, वे ब्राह्मणों को ज्ञान देने लगे थे। कलयुग में शूद्रों को शिक्षा मिलने लगी थी, इससे तुलसीदास चिंतित थे। स्वामी विवेकानंद ने भी कलयुग को शूद्र-क्रांति के रूप में देखा था। पर क्या कल्कि भी इसी चिंता से ग्रस्त होकर जन्म लेगा? फिर कलयुग के बाद क्या होगा? ब्राह्मणों ने तो चार ही युग बनाए हैं। उसके आगे के युग की कोई कल्पना ही उन्होंने नहीं की। और इसलिए नहीं की क्योंकि मुसलमान और अंग्रेज आ गए। उनके राज में ब्राह्मणों की कल्पना ने काम ही करना बंद कर दिया। इसलिए उन्होंने सत्, त्रेता, द्वापर तीन युगों का अंत तो किया, पर कलयुग का अंत नहीं कर सके।  उसे उन्होंने उसकी अवधि तय किए बिना ही छोड़ दिया। लेकिन पुराणों के अनुसार कलयुग कृष्ण की मृत्यु के बाद ही शुरू हो गया था। विष्णु पुराण ने सतयुग की 4000 वर्ष, त्रेता की 3000 वर्ष, द्वापर की 2000 वर्ष और कलयुग की 1000 वर्ष की गणना की है। किसी-किसी ने इससे भी ज्यादा वर्षों की की है। इस गणना के अनुसार, कलयुग कब का खत्म हो चुका है। द्वापर युग के कृष्ण की मृत्यु भी डॉ. गोपाल अय्यर जैसे कुछ विद्वानों ने 1177 ईसापूर्व निर्धारित की है। इस गणना से भी कलयुग खत्म हो चुका है। लेकिन कल्कि अवतार हुआ ही नहीं। 

संभल में कल्कि अवतार की पूजा करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

सवाल है कि क्या प्रमोद कृष्णम या अन्य पौराणिक ब्राह्मण यह बात नहीं जानते कि कलयुग खत्म हो गया है। फिर वे किस कल्कि अवतार की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो होना ही नहीं है?

अख़बारों में कल्कि धाम में शिला पूजा का जो विज्ञापन छपा है, उसमें कल्कि भगवान का भी चित्र दिया गया है। इस चित्र में कल्कि भगवान हाथ में नंगी तलवार लिए हुए एक सफ़ेद घोड़े पर बैठे हुए हैं, घोड़ा दौड़ रहा है, और वह अपनी तलवार के वार से दुश्मनों को काटते-मारते जा रहे हैं। क्या यह संभव है कि गोला-बारूद और स्टेनगन के दौर में कोई भगवान घोड़े पर बैठकर तलवार से युद्ध करेगा? दूसरी बात, अगर अवतार हो भी गया, तो विष्णु की अवतार-परंपरा के अनुसार उसे किसी राजवंश में जन्म लेना होगा। संपूर्ण भारत में ही अब राजवंश नहीं हैं। संभल में भी, जहां अवतार होगा, कोई राजवंश नहीं है। फिर वह किस राजा के वंश में जन्म लेगा? साधु-सन्यासियों के घर में तो जन्म लेगा नहीं, क्योंकि वे ब्रह्मचारी होते हैं। शूद्रों के यहां भगवान अवतार लेते नहीं हैं। वैश्यों में कभी अवतार हुए नहीं। फिर कहां होगा? हो सकता है प्रमोद कृष्णम बेहतर जानते हों कि कल्कि के रूप में विष्णु भगवान संभल के किस परिवार में जन्म लेंगे? वह आखिर कल्कि धाम के पीठाचार्य हैं, सीधा कनेक्शन हो सकता है उनका भगवान से? लेकिन अगर मान भी लिया जाए कि कल्कि भगवान किसी परिवार में पैदा हो ही गए, तो उनकी पढ़ाई-लिखाई कहां होगी? संभल में या संभल से बाहर? उसे तलवारबाजी कौन सिखायेगा, क्योंकि इस विद्या के प्रशिक्षण केंद्र तो शायद अब भारतीय सेना की अकादमी में भी नहीं है? अगर तर्क और बुद्धि से कोई विचार करेगा, तो कल्कि-अवतार की परिकल्पना एक पाखंड के सिवा कुछ नहीं है। लेकिन हां, अगर गोबर-भरे दिमाग से ही सोचना है, तो सब कुछ है।

धार्मिक पाखंड को सबसे ज्यादा बढ़ावा दे रहे हैं हमारे राजनीतिक रहनुमा, जिन पर भारत को एक बौद्धिक और वैज्ञानिक राष्ट्र बनाने की जिम्मेदारी है। लेकिन वे सबसे अधिक विवेक-शून्य और धर्मभीरू हैं। एक भगवाधारी मठाधीश ने हमारे प्रधानमंत्री को कल्कि भगवान के मंदिर के लिए भूमि-पूजन का न्यौता दिया, और उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया, पलट कर यह नहीं पूछा कि ये कौन-सा नया भगवान है, जिसका मंदिर बनवा रहे हो? उन्होंने उस मठाधीश को यह भी समझाना उचित नहीं समझा कि पहले कल्कि का अवतार तो होने दीजिए, उससे पहले मंदिर क्यों? इसे कहते हैं, आंख-मूंदकर ब्राह्मणवाद के पीछे चलना। और इसका कारण यह है कि ब्राह्मणवाद ही अब उनकी हिंदुत्व की राजनीति का एकमात्र आधार बन गया है। इस तरह की राजनीति वही नेता करता है, जिसने जनता की शिक्षा-रोजगार के लिए कुछ न किया हो और जो राजनीति में हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का ही दोहन करना जानता है।

इलाहाबाद में एक ब्राह्मण-विद्वान डॉ. वेदप्रकाश उपाध्याय हुए हैं, जो धर्मशास्त्राचार्य और सारस्वत वेदांत प्रकाश संघ के संचालक हैं। उन्होंने कई खोजपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें दो पुस्तकें यहां उल्लेखनीय हैं। इनमें एक है ‘कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब’ और दूसरी है ‘नराशंस और अंतिम ऋषि।’ ये दोनों ही पुस्तकें 1970 में प्रकाशित हुई थीं। इन पुस्तकों में उन्होंने कल्कि और नराशंस को, जो एक ही हैं, इस्लाम के अंतिम पैगंबर मुहम्मद साहब के रूप में सिद्ध किया है। उन्होंने वेद-पुराणों से उद्धरण देकर विष्णु के इस अंतिम अवतार की विशेषताओं का विवरण दिया है; जैसे वह रेगिस्तान के इलाके में पैदा होगा, ऊंट और घोड़े की सवारी करेगा, उसकी बारह पत्नियां होंगी, वह अधर्मियों से युद्ध करेगा, इत्यादि-इत्यादि। यह विवरण देने के बाद वह लिखते हैं, कि ये सारी विशेषताएं मुहम्मद साहब में मिलती हैं। इस आधार पर उनका निष्कर्ष है कि जिस कल्कि अवतार की प्रतीक्षा की जा रही है, वह तो मक्का में मुहम्मद साहब के रूप में चौदह सौ साल पहले ही हो चुका है। मुझे लगता है कि यह विवरण प्रमोद कृष्णम को स्वीकार तो नहीं होगा, क्योंकि जिस देश में इतने सारे संत-महात्मा तमाम देवताओं, देवियों और सिद्धों के नाम पर मठाधीश बनकर ऐश्वर्य भोग रहे हैं, वहां प्रमोद कृष्णम ने इतनी दूर की कौड़ी लाकर अपने आजीवन भोगेश्वर्य का जो प्रबंध किया है, उसे कैसे छोड़ देंगे?

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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