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मोदी के दस साल के राज में ऐसे कमजोर किया गया संविधान

भाजपा ने इस बार 400 पार का नारा दिया है, जिसे संविधान बदलने के लिए ज़रूरी संख्या बल से जोड़कर देखा जा रहा है। इसकी अभिव्यक्ति भाजपा के अनेक नेता विभिन्न रूपों में अपने संबोधनों में कर रहे हैं। बता रहे हैं सुशील मानव

अभी दो दिन पहले यानी आंबेडकर जयंती के एक दिन पहले राजस्थान के बाड़मेर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि– “आंबेडकर खुद आ जाएं तो भी संविधान खत्म नहीं कर सकते।” जबकि हकीकत कुछ और ही है।

अभी बहुत दिन नहीं हुए जब प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय ने बीते अगस्त, 2023 में एक अख़बार के लिए लिखे अपने लेख में कहा था–

“हम जो भी बहस करते हैं, वो ज़्यादातर संविधान से शुरू और खत्म होती है। महज कुछ संशोधनों से काम नहीं चलेगा। हमें ड्राइंग बोर्ड पर वापस जाना चाहिए और शुरू से शुरुआत करना चाहिए। … ये पूछना चाहिए कि संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, न्याय, स्वतंत्रता और समानता जैसे शब्दों का अब क्या मतलब है? हमें खुद को एक नया संविधान देना होगा।” 

दरअसल, भाजपा ने इस बार 400 पार का नारा दिया है, जिसे संविधान बदलने के लिए ज़रूरी संख्या बल से जोड़कर देखा जा रहा है। इसकी अभिव्यक्ति भाजपा के अनेक नेता विभिन्न रूपों में अपने संबोधनों में कर रहे हैं। मसलन, डॉ. आंबेडकर की जयंती (14 अप्रैल, 2024) की पूर्व संध्या पर ही अयोध्या (फ़ैज़ाबाद) संसदीय सीट से भाजपा के उम्मीदवार और मौजूदा सांसद लल्लू सिंह ने लोगों को संबोधित करके कहा कि– “सरकार तो 272 में भी बन जाती है, लेकिन 272 की संरकार संविधान में संशोधन नहीं कर सकती है। उसके लिए दो तिहाई बहुमत से अधिक चाहिए होगा, संविधान में संशोधन करना है या नया संविधान बनाना है, इसलिए 400 सीटें चाहिए।” 

इससे पहले 10 मार्च, 2024 को पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा सांसद अऩंत कुमार हेगड़े ने कर्नाटक के उत्तरा कन्नडा जिले में एक रैली में ‘संविधान में संशोधन’ की बात करते हुए कहा कि इसके लिए भाजपा को राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत और एनडीए को 400 से अधिक सीटें जीतने की ज़रूरत होगी।

इस तरह 2024 लोकसभा चुनाव में संविधान अब चुनावी मुद्दा बन गया है। जहां सत्ताधारी दल के उम्मीदवार संविधान बदलने और नया संविधान बनाने की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस लगातार संविधान बचाने की गुहार मतदाताओं से लगा रहे हैं। बाबू जगजीवन राम की जयंती (5 अप्रैल) के मौके पर घोषणापत्र ज़ारी करते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा– “बहुत ज़रूरी है कि जनता यह समझे कि ये नॉर्मल चुनाव नहीं है। यह लोकतंत्र को बचाने का, संविधान को बचाने का चुनाव है और इसको लड़ना और जीतना बहुत ज़रूरी है।” अपने घोषणापत्र में कांग्रेस ने न्याय और संविधान की रक्षा को प्रतिबद्ध न्यायपालिका में सुधार का वादा किया। 

दरअसल साल 1976 में इंदिरा गांधी की सरकार ने संविधान में 42वां संशोधन करके इसकी प्रस्तावना में तीन नए शब्द– ‘समाजवादी’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ जोड़े थे। तब से ही समाजवादी और धर्मनिरपेक्षता शब्द आरएसएस-भाजपा की आंखों में चुभते आ रहे हैं। इन दोनों शब्दों को संविधान का प्रस्तावना से हटाए बिना भारत को हिंदू राष्ट्र नहीं घोषित किया जा सकता है। हालांकि 16 मई, 2014 से सत्ता में आने के बाद भाजपा ने संविधान के स्वरूप को बदलने के लिए इसमें अनेक संशोधन किए, क़ानूनों को बदला और रद्द किया है। बीते अप्रैल, 2023 में केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने देश को बताया था कि भाजपा सरकार ने अपने 9 वर्षों के शासन काल में करीब दो हजार से अधिक प्रावधानों और क़ानूनों को खत्म कर दिया है।

खाद्य सुरक्षा अधिकार कानून को हाशिए पर रखकर पांच किलो राशन के नाम पर राजनीति

ऐसे में सवाल उठता है कि पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार के 10 साल के कार्यकाल के बाद संविधान में अभी क्या और कितना बचा हुआ है? अपने पहले कार्यकाल में भाजपा ने यूपीए शासन के पिछले दशक के दौरान बनाए गए आठ अधिकार-आधारित क़ानूनों में से कई के प्रावधानों को खत्म या कमज़ोर किया है। इनमें आरटीआई अधिनियम, 2005; महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), 2005; वन अधिकार अधिनियम (एफआरए), 2006; असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008; शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009; भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013; राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013; और मैनुअल स्कैवेंजिंग निषेध अधिनियम, 2014 शामिल हैं। ये क़ानून दशकों के जन-आंदोलनों और नागरिक समाज की सक्रियता के बाद अस्तित्व में आए थे।

वन अधिकार कानून-2006 को किया निष्प्रभावी 

वन अधिकार कानून-2006 के बनने से आदिवासी व परंपरागत वननिवासी जंगलों के असली मालिक हो गए। जंगलो और पहाड़ों का मुफ्त खनन करके बड़ा मुनाफा कमाने के भारतीय पूंजीपतियों के मंसूबों पर एक तरह से पानी फिर गया। वे तर्क देते रहे कि इससे देश का आर्थिक विकास कमज़ोर होगा। इसके बाद मोदी सरकार द्वारा ‘मसौदा वन नीति 2018’ लाकर ‘वन अधिकार कानून-2006’ को निष्प्रभावी कर दिया गया। फिर साल 2019 में ही कार्पोरेट लॉबी को सपोर्ट करने वाले कथित पर्यावरणविदों ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दायर करके आदिवासियों को अतिक्रमणकारी और जंगलों को नष्ट करने वाला बताकर उनकी जंगलों से बेदख़ली का मार्ग प्रशस्त किया। और 2019 में, केंद्र सरकार ने आदिवासियों-परंपरागत वननिवासियों से सहमति प्राप्त करने की आवश्यकता के बिना अन्य परियोजनाओं के लिए ‘सैद्धांतिक’ अनुमोदन की अनुमति देने वाला एक परिपत्र भी ज़ारी किया। हालांकि आदिवासी मामलों के मंत्रालय ने वन मंत्रालय के इस क़दम का विरोध करते हुए कहा कि यह आदिवासी अधिकारों का उल्लंघन है, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। आदिवासी नेताओं ने आरोप लगाया कि सैद्धांतिक मंजूरी देने का मतलब समुदाय पर अपनी सहमति देने के लिए दबाव डालना है। इसके अलावा, वन संरक्षण अधिनियम में 2023 के संशोधन ने वन मंजूरी को और भी आसान बना दिया।

भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना अधिनियम-2013 

यह कानून दलित किसानों और भूमि मालिकों के हितों को संरक्षित करता था। औद्योगिक परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण के ख़िलाफ़ देश के विभिन्न हिस्सों, विशेष रूप से पूर्वी भारतीय राज्यों पश्चिम बंगाल और ओडिशा और पश्चिमी भारतीय राज्य महाराष्ट्र में तीव्र और अक्सर हिंसक आंदोलनों की एक शृंखला के बाद यह क़ानून बनाया गया था। इस क़ानून के बनने के बाद से मनमाने तरीके से किसानों की ज़मीनें छीनने वाले कार्पोरेट के हित प्रभावित हो रहे थे। अतः सत्ता में आने के कुछ महीने बाद ही दिसंबर, 2014 में मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा उत्पादन, ग्रामीण आधारभूत संरचना, सस्ते आवासों का निर्माण, औद्योगिक गलियारा बनाने, सरकार के स्वामित्व वाली ज़मीन पर सार्वजनिक-निजी परियोजनाएं लागू करने के नाम पर इस क़ानून में संशोधन करके कार्पोरेट के हित में कमज़ोर कर दिया। पहले 2014 में एक अध्यादेश के साथ और फिर 2015 में एक विधेयक के द्वारा। संसद में बहुमत का समर्थन हासिल नहीं कर पाने  पर सरकार ने  कहा  कि “राज्य अनिश्चित काल तक आम सहमति का इंतज़ार नहीं कर सकती और उनमें से कुछ विकास को बढ़ावा देने के लिए अपने स्वयं के भूमि कानून बनाना चाहते हैं।” 

इसमें कहा गया है कि संघीय सरकार ऐसे राज्य कानूनों को मंजूरी देगी। इसके बाद गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे भाजपा शासित राज्यों ने क़ानून बनाकर वही किया जो मोदी सरकार राष्ट्रीय स्तर पर करना चाहती थी और संघीय सरकार ने उन क़ानूनों की अनुमति दी।

सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 

सरकारी संस्थाओं को जिम्मेदार बनाने के लिए बनाए गए इस अधिकार का प्रभाव जगजाहिर है। खुद मोदी सरकार इस क़ानून की वजह से कई बार फंसती नज़र आई। फिर चाहे वो मोदी की डिग्री सार्वजनिक करने का मामला रहा हो, नोटबंदी पर रिजर्व बैंक की बैठक से संबंधित जानकारी का खुलासा रहा हो, तत्कालीन आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन द्वारा पीएमओ को बड़े फ्रॉड करने वालों की सूची सार्वजनिक करने का आदेश रहा हो, कालेधन पर मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी) का आदेश या प्रधानमंत्री द्वारा फर्जी राशन कार्ड मामले पर जानकारी देने का आदेश रहा हो। फिर साल 2019 में सूचना का अधिकार क़ानून में संशोधन किया गया। इस संशोधन से यह तय किया गया कि केंद्र सरकार सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की शर्तें निर्धारित कर सकती है जबकि यह पहले से तयशुदा रूप में निर्धारित थीं। यह संशोधन सरकार को आयुक्तों के लिए वेतन और सेवा की शर्तें तय करने की शक्ति भी देता है। यह सीधे तौर सूचना आयोगों पर सरकार के नियंत्रण को स्थापित करता है। इसका एक परिणाम यह हुआ कि सरकारी अधिकारी यह कहकर सूचना देने से इनकार करने लगे हैं कि वांछित जानकारी किसी की व्यक्तिगत जानकारी है। पीएम केयर फंड को लेकर भी इसी तरह के बहाने बनाए गए। 

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिकार क़ानून-2013 बनाम पांच किलो राशन

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिकार कानून-2013 यूपीए सरकार की सबसे महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक थी, जिससे देश की 75 प्रतिशत ग्रामीण और 50 प्रतिशत शहरी आबादी को लाभ पहुंचता था। इसी क्रम में अंत्योदय अन्न योजना जिनमें निर्धन परिवार को हर महीने 35 किलो राशन दिया जाता था। हालांकि इस योजना को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिकार कानून से अलग रखा गया था। तब भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली और खाद्य सुरक्षा गारंटी योजना का विश्व व्यापार संगठन से लेकर देशी कार्पोरेट तक ने विरोध किया। सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने पुडुचेरी और चंडीगढ़ में पीडीएस सिस्टम बंद करके सीधे कैश देने की योजना शुरू की। कोरोना काल में लॉकडाउन और कामबंदी से उपजे जनाक्रोश को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने प्रति यूनिट मुफ्त राशन योजना चालू किया। लेकिन कोराना काल में ही आधार कार्ड से न जुड़े होने की दलील देकर 3 करोड़ राशन कार्ड को सरकार ने रद्द कर दिया, जिससे बहुतायत दलित व आदिवासी लोग प्रभावित हुए थे। इसके बदले सरकार ने पांच किलो राशन देने का प्रावधान शुरू किया और इस योजना का जबर्दस्त फायदा उत्तर प्रदेश समेत तमाम राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिला। इसी के चलते यह योजना लोकसभा चुनाव तक सरकार ने बरकरार रखा है। 

बताते चलें कि 2021 में, शीर्ष सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग ने सब्सिडी बचाने के लिए खाद्य सुरक्षा अधिकार कानून के तहत कवरेज में कटौती की सिफारिश की, जिसके बाद वित्त वर्ष 2023-24 में खाद्य सुरक्षा के लिए सरकार के बजट में पिछले वर्ष के संशोधित बजट की तुलना में 32 प्रतिशत की कटौती की।  

शिक्षा का अधिकार

यूपीए का एक ऐतिहासिक कानून शिक्षा का अधिकार अधिनियम था, जो 6-14 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने की गारंटी देता था। इस क़ानून के तहत नो-डिटेंशन पॉलिसी बच्चों को फेल करने और स्कूल से निकालने पर पाबंदी लगाता था। पर मोदी सरकार ने ‘नई शिक्षा-2020’ नीति लागू करके देश भर में एक लाख से अधिक सरकारी स्कूलों को बंद कर दिया। 

दंड संहिताओं में बदलाव

दिसंबर, 2023 में केंद्र सरकार ने देश में बीते 150 साल से चले आ रहे तीन बुनियादी आपराधिक क़ानूनों में बड़े पैमाने पर बदलाव किए। ये तीनों क़ानून थे– भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) 1860, दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) 1973 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (एविडेंस एक्ट), 1872। जिस समय में ये तीनों विधेयक पारित हुए, उस वक्त 150 विपक्षी सांसदों को सदन से निलंबित करके दोनों सदनों को लगभग विपक्षविहीन बना दिया था। यह भारत के संसदीय इतिहास में पहला मौका था, जब एक सत्र के दौरान इतनी बड़ी संख्या में निलंबन हुआ था। ज़ाहिर है कि इन विधेयकों को विपक्ष के सांसदों के सामने चर्चा के लिए पेश नहीं किया गया।

बात इतने भर तक नहीं है। केंद्र द्वारा नए क़ानूनों में कई नए अपराधों को शामिल किया गया। मसलन, राजद्रोह अधिनियम को हटाकर “देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा” करने के लिए प्रावधान लाए गए, इस कानून में अपराध का दायरा बहुत बड़ा रखा गया है इसलिए इसके दुरुपयोग की आशंका अधिक है। जैसे कि अभी तक के प्रावधानों के मुताबिक़, किसी व्यक्ति को अधिकतम 15 दिनों तक पुलिस हिरासत में रखा जा सकता था, लेकिन अब इसे बढ़ाकर, अपराध की गंभीरता के मुताबिक 60 और 90 दिन तक कर दिया गया है। 

यह तथ्य भी किसी से परे नहीं है कि किस जाति-वर्ग के लोग झूठे आरोपों में अपराधी बनाकर धरे जाते हैं। एनसीआरबी के आंकड़े के मुताबिक दिसंबर, 2021 तक भारत के जेलों में 5.54 लाख कैदी हैं। इनमें 15.9 प्रतिशत मुस्लिम, और 73 प्रतिशत आदिवासी, दलित और ओबीसी हैं। 

यूएपीए को अत्याधिक कठोर बनाया जाना

ऐसे ही साल 2008 में, यूपीए सरकार द्वारा लाये गये गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम 1967 (यूएपीए) में संशोधन करके इसके प्रावधानों को और अधिक कठोर बनाया गया। मोदी सरकार ने 2019 के संशोधन के साथ यूएपीए के प्रावधानों को सख्त कर दिया, जिससे सरकार न केवल संगठनों बल्कि व्यक्तियों को भी आतंकवादी के रूप में नामित कर सकती है और उनकी संपत्तियों को कुर्क कर सकती है। इसकी एक परिणति ‘बुलडोजर राज’ के रूप में भी हुई है। संघीय सरकार द्वारा नियंत्रित आतंकवाद विरोधी क़ानून प्रवर्तन एजेंसी, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की शक्तियों को मजबूत किया गया  और इसका दायरा बढ़ाया गया। इसके अलावा, क़ानून का उपयोग और अधिक उग्र हो गया। जांच के नाम पर मानवाधिकारों के उल्लंघन की गुंजाइश बढ़ गई और प्रावधानों ने  पर्याप्त सबूतों के बिना भी जमानत पाना बेहद कठिन बना दिया है।  

प्रेम विवाह पर अंकुश

वर्ष 2017 से भाजपा शासित कम-से-कम सात राज्यों में या तो धर्मांतरण विरोधी क़ानून को सख़्त किया गया है और अंतरधार्मिक विवाह संबंधी नए क़ानून पारित किए हैं। नए क़ानूनों ने अंतरधार्मिक विवाहों को क़रीब-क़रीब असंभव बना दिया है, अंतरधार्मिक विवाह के बाद होने वाले धर्म परिवर्तन भी बेहद मुश्किल हो गए हैं। इन क़ानूनों के तहत अब अंतरधार्मिक जोड़ों को शादी से पहले ज़िला मजिस्ट्रेट स्तर के अधिकारी से अनुमति लेनी होगी। इसके लिए नोटिस जारी किया जाएगा, ताकि विवाह को लेकर अगर किसी को आपत्ति हो तो वह उसे दर्ज़ करा सकें। जाहिर है इन क़ानूनों का इस्तेमाल अंतरधार्मिक जोड़ों को परेशान करने के लिए किया जाता है, ख़ासकर अगर पुरुष अल्पसंख्यक समुदाय से हुआ तो यह उत्पीड़न और भी बढ़ जाता है। जबकि अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-21 (जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार) का अभिन्न अंग है।    

एनआरसी और सीएए के नाम पर देश बांटने की नीति

31 अगस्त, 2019 को प्रकाशित असम की राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के आखिरी सूची में लगभग 19.07 लाख लोगों को निकाल दिया गया, जिसमें 12 लाख गैर मुस्लिम (बहुतायत हिंदू) थे। इन 12 लाख हिंदू लोगों को फिर से नागरिकता देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा नागरिकता संशोधन अधिनियम-2019 लाया गया। अधिनियम के अनुसार 2015 से पहले बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान से भारत आए हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख और ईसाई अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता प्रदान की जाएगी, यानि मुसलमानों को नहीं दिया जाएगा। यह क़ानून देश के संविधान की मूल संरचना से छेड़छाड़ करता है और नागरिकता प्रदान करते समय धर्म के आधार पर भेदभाव करता है। यह भारत के संविधान की प्रस्तावना, अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) अनुच्छेद 15 का उल्लंघन करता है।  

संविधान प्रदत्त आरक्षण की मौलिक अवधारणा में छेड़छाड़

नरेंद्र मोदी सरकार 124वां संविधान संशोधन विधेयक 2019 लेकर आई। इस अधिनियम ने संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में एक खंड जोड़कर संशोधन किया, जिसमें आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (ईडब्ल्यएस) को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 10 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया गया। यह संशोधन संविधान के मूल प्रावधान आरक्षण के उद्देश्यों का हनन करता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण प्रावधान करता है। इसके लिए शर्त यह था कि उस वर्ग को साबित करना होगा कि वह अन्य वर्ग के मुक़ाबले सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा हुआ है। 

खास बात यह कि ईडब्ल्यूएस मामले में सरकार ने कोई डेटा या स्टडी रिपोर्ट नहीं तैयार की थी और न ही इसके लिए कोई आयोग का गठन किया गया। हालांकि जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तब पांच जजों की बेंच ने 3-2 के बहुंमत से इसे मान्यता दे दी। इसका विरोध करनेवालों में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस यू.यू. ललित और जस्टिस रवींद्र भट्ट ने कहा था कि 103वां संशोधन संविधान के बुनियादी ढांचे के खिलाफ़ है। यह संवैधानिक रूप से निषिद्ध भेदभाव को बढ़ावा देता है। ईडब्ल्यूएस सामाजिक न्याय के खिलाफ़ है। ये समानता पर गहरा आघात है। वहीं तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने माना था कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए। एससी, एसटी, ओबीसी के ग़रीब लोगों को इससे बाहर करना भेदभाव दिखाता है। हमारा संविधान बहिष्कार की अनुमति नहीं देता। यह संशोधन सामाजिक न्याय के ताने बाने को कमज़ोर करता है। इस तरह ये बुनियादी ढांचे को कमज़ोर करता है।

संघीय व्यवस्था पर घातक प्रहार

केंद्र सरकार ने 5 अगस्त, 2019 को पूरे जम्मू-कश्मीर को बंधक बनाकर राज्य से पूर्ण राज्य का दर्ज़ा छीनकर उसके दो टुकड़े कर दिए। साथ ही लोकतंत्र को निरस्त करके अपनी संघीय शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए जम्मू कश्मीर के लोगों को विशेषाधिकार देने वाले अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया। पूरे दो साल तक इंटरनेट बंदी करके लोगों को उनके मूल अधिकारों से वंचित रखा। पिछले एक साल से मणिपुर के ईसाई कुकी आदिवासी समुदाय के ख़िलाफ़ सरकार और सरकारी मशीनरी ने पहाड़ी क्षेत्र में आरक्षित और संरक्षित वनों के व्यापक सर्वेक्षण और कुकी बस्तियों को जंगल से बेदख़ल करने का अभियान शुरू किया। बहुसंख्यक मैतेई को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने को लेकर मणिपुर उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को केंद्र सरकार को सिफारिश भेजने का आदेश दिया। जिसके बाद शुरू हुए जातीय और सांप्रदायिक जनसंहार में अब तक सैकड़ों लोग मारे गए हैं। कुकी समुदाय की स्त्रियों के यौन शोषण और यातना का वीडियो पूरी दुनिया ने देखा। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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