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बसपा : एक हितैषी की नजर में

राजनीति में ऐसे दौर आते हैं और गुजर भी जाते हैं। बसपा जैसे कैडर आधरित पार्टी दोबारा से अपनी ताकत प्राप्त कर सकती है, लेकिन इसके लिए उसे ऐसे सहयोगी चाहिए, जो लंबे समय तक उसका साथ दे सकें। जाहिर तौर पर अब ‘एकला चलो’ की रणनीति कारगर नहीं है। बता रहे हैं विद्या भूषण रावत

दस वर्षों के बाद भारत में केंद्र की सरकार अब बहुमत के लिए अपने सहयोगियों पर निर्भर रहेगी। इसके संकेत साफ तब दिखाई देने लगे जब चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार व अन्य सहयोगी के साथ नरेंद्र मोदी बैठे दिखाई दिए और भाजपा के ताकतवर नेतागण थोड़ा किनारे किए गए। यह कहा जा सकता है कि ऐसा इन राजनेताओं के आत्म-अहंकार को संतुष्ट करने के लिए किया गया। जाहिर तौर पर कोई इतनी जल्दी उदार हो जाय, ऐसा नहीं समझा जाना चाहिए।

खैर इस बार के लोकसभा चुनाव की अच्छी बात यह रही कि भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई और अपने दम पर सरकार में नही है। उसे अपने सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ेगा। इन चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा है और वह 99 सीटें जीतने में कामयाब रही। कोई भी यह कह सकता है कि इसे अच्छा प्रदर्शन कैसे कहें जब अनेक राज्यों में कांग्रेस कोई भी सीट नहीं ला पाई। जैसे दिल्ली, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्य। 

लेकिन आज के हालातों में जब हमारे स्वतंत्र संस्थानों की स्थिति बेहद निराशाजनक है और ईडी, इनकम टैक्स, सीबीआई और यहां तक कि मीडिया का मनमाफिक इस्तेमाल अपने राजनीतिक विरोधियों को आर्थिक और सामाजिक तौर पर पूरी तरह से ध्वस्त करने के लिए किया जा रहा हो तो इंडिया गठबंधन के प्रदर्शन को बेहतरीन कहा जा सकता है। भाजपा का प्रचंड बहुमत से सत्ता में आने का सपना टूट गया है और देश के सभी संविधान पसंद लोगों ने राहत की सांस ली है।

देश के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण इन चुनावों के कुछ निष्कर्षों को समझना जरूरी है ताकि सभी इनसे कुछ सीख सकें। मसलन, उत्तर प्रदेश ने देश के संविधान की लड़ाई में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है और इंडिया गठबंधन के नेताओं को खुल कर समर्थन किया। बसपा के संस्थापक कांशीराम कहा करते थे कि हमें दिल्ली में मजबूत नहीं, मजबूर सरकार चाहिए ताकि उससे दलितों के हितों से संबंधित कानून पास करवा लिए जाएं। जब कांशीराम यह बात कह रहे थे, उस समय वह बसपा को निर्णायक भूमिका में देख रहे थे। उनका मतलब साफ था कि जब सरकारों के पास अपना बहुमत नही होता तो छोटे और क्षेत्रीय दल निर्णायक भूमिका में होते हैं और अपनी बातें और मांगें मनवाने में कामयाब होते हैं। इसका मतलब यह भी है कि मजबूर सरकार दलितों के हित में उस समय आएगी जब अपनी बात मनवाने के लिए दलितों की पार्टियां संसद व विधानसभाओं में मौजूद रहें। इसका एक मतलब यह भी है कि आज के हालातों में यदि बसपा के पास 5 सांसद भी होते तो वे बड़े बदलाव के वाहक बन सकते थे।

बसपा समर्थक एक वृद्ध महिला

खैर, आज बसपा बहुत ही कठिन दौर से गुजर रही है। पार्टी वर्तमान लोकसभा में बिना किसी प्रतिनिधित्व के रहेगी। पार्टी की रणनीति पर बहुत सवाल उठ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में पार्टी कुछ क्षेत्रों को छोड़कर अपना प्रभाव नहीं दिखा पाई। पार्टी ने बड़ी संख्या में मुस्लिम नेताओं को खड़ा किया था, लेकिन उसकी यह रणनीति सफल नहीं हो पाई। किसी गठबंधन के अभाव में बसपा बहुत कमजोर स्थिति में है और उसे अब गंभीरता से अपने भविष्य की रणनीति पर विचार करना होगा।

वैसे यह तो साफ है कि बसपा को इस देश की राजनीति में प्रासंगिक बने रहना देश के लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। इसकी वजह यह कि यह पार्टी आंबेडकरवादी आंदोलन से जन्मी पार्टी है और इसका हश्र वैसा न हो जैसे एक समय में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) का हो गया। 

राजनीति में ऐसे दौर आते हैं और गुजर भी जाते हैं। बसपा जैसे कैडर आधरित पार्टी दोबारा से अपनी ताकत प्राप्त कर सकती है, लेकिन इसके लिए उसे ऐसे सहयोगी चाहिए, जो लंबे समय तक उसका साथ दे सकें। जाहिर तौर पर अब ‘एकला चलो’ की रणनीति कारगर नहीं है। बसपा को अपनी रणनीति में व्यापक बदलाव लाने की आवश्यकता है, जिसमें युवाओं को आकर्षित करने के लिए नए एजेंडे हों।

इस बार के चुनाव में यह भी हुआ कि बसपा ने अपना घोषणापत्र नहीं जारी किया। उसने अपने कैडर के सामने और आम मतदाताओं के सामने कोई एजेंडा नहीं रखा। इसके अलावा वह सोशल मीडिया पर भी केवल अपने प्रमुख के ट्वीटर हैंडल के भरोसे बैठी रही। जबकि उसे सूचना क्रांति के इस दौर में अपने सूचना प्रसारण तंत्र को मजबूत करना चाहिए। इस बार तो ऐसा लगा कि बसपा चुनाव के पहले ही हार चुकी है, क्योंकि वह कोई नॅरेटिव प्रस्तुत नहीं कर सकी। दूसरी ओर इंडिया गठबंधन ने संविधान बचाने का नॅरेटिव सेट किया और बसपा के हिस्से के वोट भी हासिल कर कामयाबी प्राप्त की।

मैंने बसपा के विस्तार को 1990 से देखा है। कांशीराम ने पार्टी को खड़ा किया और उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज को मायावती के रूप में एक प्रेरणादायी नेतृत्व दिया। याद रखिए, कांशीराम का आंदोलन उत्तर प्रदेश में तभी सफल हुआ जब उसमें मायावती जैसी जुझारू महिला नेतृत्व कर रही थी। आज लोग कुछ भी कहें, लेकिन इस हकीकत से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि कांशीराम जी के नेतृत्व में और मायावती के रूप में एक मजबूत व्यक्तित्व के बिना यह आंदोलन कभी सफल नहीं हो पाता। किसी भी महान व्यक्तित्व की शक्ति और सफलता इस बात से मानी जा सकती है कि उसने कितने नए नेतृत्व को खड़ा किया। अक्सर यही हमारे नेताओं की असफलताए हैं, क्योंकि वे अपने परिवारों को छोड़ नया नेतृत्व विकसित ही नहीं करना चाहते।

इस मामले में कांशीराम भारतीय राजनीति के पुरोधा माने जाएंगे, क्योंकि जिस दौर में बड़ी-बड़ी पार्टियों में महिला नेतृत्व केवल किसी बड़े नेता के अधीन काम कर रही थी, वहीं बसपा में मायावती जैसे सशक्त व्यक्तित्व ने उत्तर प्रदेश में सफल नेतृत्व कर पार्टी को राष्ट्रीय फलक पर लाकर खड़ा कर दिया। यह पार्टी केवल एक समाज की नहीं थी, क्योंकि पार्टी ने गांव-गांव में अपनेआप को पिछड़ों, अति पिछड़ों और दूसरी दलित जातियों से जोड़ा। भारतीय राजनीति में ‘बहुजन’ सिद्धांत का प्रतिपादन केवल कांशीराम ने किया। जबसे भारतीय समाज का राजनीतिकरण हुआ और लोकतांत्रिक परंपराओं की नींव पड़ी, तब से बहुजन समाज की बात करने वाले केवल एक ही पार्टी और एक ही नेता रहे। वह है बसपा और कांशीराम।

यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि कांग्रेस, भाजपा, सपा, राजद, जदयू, व साम्यवादी पार्टियां, किसी को भी मूलरूप से बहुजन शब्द या सिद्धांत से कोई लेना-देना नहीं रहा है। अपने जन्म के लगभग 35 वर्ष बाद समाजवादी पार्टी आज बहुजन की बात कर रही है। हालांकि लगता यह है कि बहुजन शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहती, इसलिए पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक (पीडीए) शब्द का इस्तेमाल कर रही है, जो कि केवल एक राजनीतिक समीकरण है और इसमें अभी भी बहुजन समाज की खुशबू नहीं आती। यह ब्राह्मणवादी पूंजीवादी व्यवस्था का कोई विकल्प नही है।

इस हकीकत से कोई इनकार नहीं कर सकता कि उत्तर प्रदेश में जिस आंबेडकरवादी आंदोलन के बीज आरपीआई के समय से मौजूद थे, उसे सही मायनों में बसपा ने मुकाम तक पहुंचाने के प्रयास किए। बसपा को गठबंधन का महत्व पता है। जब 2007 में पहली बार मायावती ने बिना किसी दूसरी पार्टी के सहयोग के सत्ता संभाली थी, बेशक कोई राजनीतिक गठबंधन नहीं था, लेकिन सामाजिक गठबंधन तो था ही। लेकिन उसके बाद बसपा का यह सामाजिक गठबंधन टूटता चला गया।

यह यूं ही नहीं हुआ। बहुत से लोगों ने ऐसी खबर फैला दी कि मायावती बिना सतीश चंद्र मिश्र के कोई निर्णय नहीं लेती हैं। यह विरोधियों द्वारा उन्हें बदनाम करने की चाल थी। वैसे पार्टी में सभी से पूछ कर काम करना हो तो इसमें कोई बुरी बात नही है, लेकिन ऐसा प्रचारित किया गया कि बसपा प्रमुख किसी की नहीं सुनती। 

खैर, इन सभी बातों के कोई मतलब नही होते यदि मायावती लोगों से अपना संपर्क रखतीं। उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों से बहुत अच्छे से वाकिफ होने और बहुजन आंदोलन से जुड़े साथियों से नजदीकी रिश्तों के कारण मैं एक बात कह सकता हूं कि आज भी बसपा की ताकत बहुत बड़ी है, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने देश में हो रहे बदलाव को सही से नहीं आंका और नतीजा हुआ कि पार्टी आज की परिस्थितियों से बहुत दूर दिखाई देती है। आज देश का बहुत बड़ा वर्ग युवा है, जो सन् 2000 के बाद की पैदाइश वाला है। उसने मायावती के कार्यकाल को भी ढंग से नहीं समझा होगा, शायद अधिकांश को बीता वक्त याद भी नहीं हो। आज का युवा अपने एजेंडे पर बात करना चाहता है। वह हर समय जातीय समीकरण नहीं, अपने प्रश्नों पर आपकी राय और इरादा जानना चाहता है। दुखद यह कि बसपा ने कभी भी ऐसे प्रश्नों का जवाब खुले तौर पर नहीं दिया। 

इसके बावजूद बसपा के साथ एक खास बात यह है कि देश-दुनिया के आंबेडकरवादी लोगों की सहानुभूति उसके साथ आज भी है। लोग व्यक्तिगत तौर पर निराश होते हैं और पार्टी को मिशन के नाम पर समर्थन देते हैं। पिछले वर्ष पंजाब के चुनावों से पहले मैं बर्मिंघम, इंग्लैंड के अपने आंबेडकरवादी मित्र देविंदर चंदर जी के निमंत्रण पर उनके गांव नकोदर गया, जो एक समय में बसपा का बड़ा गढ़ था। देविंदर जी के पिता बसपा के नेता थे और कांशीराम उनके घर पर आ चुके थे। गांव में अधिकांश घरों पर बसपा के झंडे दिख रहे थे। मैं एक बुजुर्ग के घर पर गया और उनसे पूछा कि पार्टी की क्या स्थिति है पंजाब में? उन्होंने मुझे बताया कि पार्टी की स्थिति अच्छी नहीं है, लेकिन वह मिशन के लिए काम करते रहेंगे। पार्टी चाहे जीते या हारे, हम मान्यवर कांशीराम के बहुजन मिशन के सिपाही हैं और मरते दम तक पार्टी के साथ ही रहेंगे। ऐसे जुझारू कार्यकर्ता आज भी बहुत जगहों पर हैं, लेकिन बसपा को सोचना पड़ेगा कि आज के युवाओ में इतनी सहनशीलता नहीं है कि वे पार्टी के सत्ता में आने का इंतज़ार करेंगे। 

मैं जानता हूं कि आज भी बहुत से युवा जो बसपा का झंडा सोशल मीडिया पर बुलंद किए हुए हैं, वे अंदर से निराश थे। सबके दिल में एक टीस थी कि ‘काश बहन जी जनता के बीच ऐक्टिव हो जातीं, काश आनंद लगातार यात्राएं करते रहे’। आनंद जब ऐक्टिव हुए तो एक भाषण को लेकर उन्हें पद से ही हटा दिया गया। ऐसी स्थिति बेहद निराशाजनक रही। 

आज लोग बसपा के भविष्य को लेकर चिंतित है। उत्तर प्रदेश में अधिकांश दलितों ने पिछड़ों और मुस्लिम मतदाताओं के साथ मिलकर इंडिया गठबंधन के रूप में सपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों को वोट दिया। जाहिर तौर पर ये वोट संविधान को बचाने के लिए गए, क्योंकि भाजपा सरकार ने युवाओं के साथ जो खिलवाड़ किया है, वह जगजाहिर है। जैसा कि मैंने पहले कहा कि बसपा नॅरटिव की लड़ाई में हार गई। और जैसे मैंने कहा कि पार्टी में दूसरी कतार में युवा नेतृव की कई कतारें होनी चाहिए थी, जो कि आज नहीं है। आज यह पार्टी के बतौर बसपा की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह देशभर में मौजूद आंबेडकरवादी विचारकों, लेखकों, युवाओं की भावनाओं को अभिव्यक्त करने में पूरी तरह से असफल साबित हुई है। लेकिन अब भी समय गुजरा नहीं है। आंबेडकरवादी युवाओं की पहली पसंद अभी भी बसपा ही है, लेकिन उनकी भावनाओं का सम्मान करने के लिए पार्टी न केवल राजनीतिक पक्ष अपितु सांस्कृतिक पक्ष को भी मजबूत करे।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्या भूषण रावत

विद्या भूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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