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ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड : बिहार की भूमिहार राजनीति में फिर नई हलचल

भोजपुर जिले में भूमिहारों की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही। एक समय सुनील पांडे और उसके भाई हुलास पांडे की इस पूरे इलाके में तूती बोलती थी, जिसे ब्रह्मेश्वर मुखिया का समर्थन हासिल था। पटना हाई कोर्ट ने मुखिया के हत्याकांड की सुनवाई को लेकर अहम फैसला सुनाया है। पढ़ें, यह खबर

बिहार के कुख्यात रणवीर सेना के संस्थापक रहे ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या का मामला एक बार फिर चर्चा में है। पटना हाई कोर्ट के जस्टिस संदीप कुमार की एकल पीठ ने बीते 15 जुलाई, 2024 को अपने एक फैसले में आरा की निचली अदालत (सेशन कोर्ट) द्वारा इस मामले में सुनवाई पर पूर्ण रूप से रोक लगा दी है। साथ ही हाई कोर्ट ने सेशन कोर्ट द्वारा सीबीआई द्वारा इस मामले में दायर आरोपपत्र को खारिज करने के फैसले को निरस्त कर दिया।

गौरतलब है कि ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या 1 जून, 2012 को अहले सुबह आरा के कातिरा मोहल्ले में तब कर दी गई थी, जब वह मार्निंग वॉक के लिए निकला था। उसकी हत्या के बाद एक के बाद एक अनेक कहानियां प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सामने आईं। इस संबंध में फारवर्ड प्रेस द्वारा एक खोजी रपट “किसकी ‘जादुई गोलियों’ ने ली ‘बिहार के कसाई’ की जान?” शीर्षक से वर्ष 2012 में पत्रिका के प्रिंट संस्करण में प्रकाशित की गई थी। 

हालांकि इस मामले की जांच के लिए तब बिहार सरकार ने एक एसआईटी का गठन किया था, लेकिन मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी।

इस मामले में दिलचस्प यह है कि एसआईटी और सीबीआई दोनों ने अलग-अलग चार्जशीट आरा की निचली अदालत के समक्ष दायर किया। सीबीआई ने जहां एक ओर पूर्व विधान पार्षद हुलास पांडे को आरोपियों में शुमार किया, वहीं एसआईटी ने हुलास पांडे के नाम का उल्लेख तक नहीं किया।

पूर्व विधान पार्षद व सीबीआई द्वारा आरोपित हुलास पांडे, पटना हाई कोर्ट और ब्रह्मेश्वर मुखिया

इस मामले में बड़ी हलचल तब हुई जब सेशन कोर्ट ने सीबीआई द्वारा प्रस्तुत आरोपपत्र को खारिज कर दिया, जिसमें हुलास पांडे के अलावा अमितेश कुमार पांडे उर्फ गुड्डू पांडे, बालेश्वर राय और मनोज राय उर्फ मनोज पांडे को अभियुक्त बनाया।

वहीं सेशन कोर्ट ने बिहार पुलिस की एसआईटी द्वारा प्रस्तुत आरोपपत्र को स्वीकार किया, जिसमें अभय पांडे, नंद गोपाल पांडे उर्फ फौजी, रीतेश कुमार सिंह उर्फ मोनू और प्रिंस पांडे को अभियुक्त बनाया था।

सियासी गलियारे में इसे लेकर कई तरह के सवाल सामने आए। एक तरफ यह कहा गया कि यह हुलास पांडे और अन्य तीन अभियुक्तों को बचाने की कवायद है।

दरअसल, भोजपुर जिले में भूमिहारों की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही। एक समय सुनील पांडे और उसके भाई हुलास पांडे की इस पूरे इलाके में तूती बोलती थी, जिसे ब्रह्मेश्वर मुखिया का समर्थन हासिल था। ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद उसके बेटे इंदूभूषण सिंह ने अपने पिता की विरासत पर अधिकार किया और सवर्ण राजनीति पर अपना दावा पेश किया।

यह वही राजनीतिक जमीन थी, जिस पर सुनील पांडे और हुलास पांडे का कब्जा था। लेकिन इंदूभूषण सिंह को कामयाबी नहीं मिली। वहीं बीतते समय के साथ सुनील पांडे और हुलास पांडे की चमक भी फीकी पड़ती गई है। इसकी एक वजह यह भी रही कि ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या में हुलास पांडे की संलिप्तता की खबर सार्वजनिक हुई। और वह भी सीबीआई के द्वारा।

अब एक बार फिर मुखिया की हत्या का मामला कानूनी पेंचीदगियों में फंसता जा रहा है। अपने न्यायादेश में पटना हाई कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा की गई अब तक की सुनवाई पर एक तरह से पानी फेर दिया है।

यह इसलिए भी उल्लेखनीय है कि सीबीआई और इंदूभूषण सिंह दोनों ने निचली अदालत की सुनवाई पर सवाल उठाया था और हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। इंदूभूषण सिंह की ओर से उसके वकील माधव राज ने हाई कोर्ट को बताया था कि सेशन कोर्ट द्वारा तथ्यों को अनदेखा किया जा रहा है। ऐसे में जो लोग दोषी हैं, वे बच जाएंगे और जो बेकसूर हैं, वे फंस जाएंगे।

जाहिर तौर पर इंदूभूषण सिंह के निशाने पर हुलास पांडे व सीबीआई के द्वारा आरोपित अन्य तीन आरोपी हैं। बहरहाल, इस मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को होगी और यह भी मुमकिन है कि यह सुनवाई और लंबी हो। लिहाजा, मुखिया की हत्या किसने की, अभी भी इसके ऊपर पर्दा पड़ा रहेगा।

(संपादन : राजन/अनिल)


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लेखक के बारे में

नवल किशोर कुमार

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के संपादक (हिन्दी) हैं।

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