भारत के स्वाधीनता संघर्ष के इतिहास का सबसे बड़ा दिवस संविधान दिवस है। वह दिन जब देश की जनता ने लंबे समय तक साम्राज्यवादी और सामंतवादी ताकतों के विरुद्ध संघर्ष करने के बाद अंततः अपने संविधान का निर्माण किया और अपनी हृदय की गहराइयों के साथ इसे अंगीकृत एवं आत्मार्पित किया। संविधान दिवस न सिर्फ पूरे राष्ट्र के लिए ऐतिहासिक है, बल्कि देश के बहुसंख्यक वर्ग के लिए भी यह अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है। यह इस देश का संविधान ही है जिसने दलितों को सदियों के जातिवाद, अमानवीयता, प्रताड़नाओं और अस्पृश्यता जैसी अपमानजनक प्रथाओं से न सिर्फ मुक्त किया, बल्कि उन्हें समानता और न्याय का अधिकार भी दिया। इसमें कोई दो-मत नहीं है कि इसका श्रेय संविधान-शिल्पी बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर को जाता है।
गौरतलब है कि भारतीय संविधान समानता और स्वतंत्रता का अधिकार न सिर्फ दलितों-पिछड़ों को बल्कि इस देश की महिलाओं, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों सहित सभी नागरिकों को समान रूप से प्रदान करता है। ऐसे में डॉ. आंबेडकर सिर्फ दलितों के ही नहीं, बल्कि पूरे देश के नायक हैं। लेकिन इधर कुछ वर्षों से सोशल मीडिया के जरिए जिस तरह का माहौल डॉ. आंबेडकर के विरुद्ध बनाया जा रहा है, वह निश्चित रूप से चिंतनीय है।
आए दिन सोशल मीडिया पर डॉ. आंबेडकर को लेकर भ्रामक खबरें प्रसारित की जा रहीं हैं, वह किसी से छिपी नहीं हैं। कभी कहा जाता है कि उनमें कोई मेरिट नहीं थी, तो कभी निराधार आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने आरक्षण का प्रावधान करके देश की जातिगत-व्यवस्था को बनाए रखा है।
दरअसल, ये बातें जितनी तर्कहीन हैं, उतनी ही आधारहीन भी। इन सभी कुतर्कों का बस एक उद्देश्य है– डॉ. आंबेडकर को टारगेट करना और इसके द्वारा दलितों-पिछड़ों का मनोबल नीचे गिराना।
दलित-अस्मिता के विमर्श के इतिहास को देखा जाए तो यह स्पष्ट रूप से दिखता है कि बीसवीं सदी के अंतिम दशक से इस वर्ग में अभूतपूर्व रूप से सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक जागृति आई है। दलितों ने शोषणकारी सामाजिक-व्यवस्था और अंधविश्वासी धार्मिक परंपराओं का सक्रियता से प्रतिरोध किया है। वे अपने अधिकारों के प्रति जागृत हुए हैं और अपनी अस्मिता को लेकर सजग हुए हैं।

निःसंदेह आज दलितों में जो आत्मविश्वास जागा है, उसके लिए वे डॉ. आंबेडकर के अथक परिश्रम और क्रांतिकारी विचारों के ऋणी हैं। यह अकारण नहीं है कि इधर कुछ वर्षों से बाबा साहब आंबेडकर को लेकर अनेक प्रकार की भ्रांतियां फैलाई जा रहीं हैं। डॉ. आंबेडकर के बहाने दलितों को टारगेट करने के लिए जो एक बात प्रमुखता से उठायी जाती है, वह है आरक्षण-व्यवस्था। सच कहा जाए तो आरक्षण-विरोधी लोगों को न तो सामाजिक-समानता से कोई सरोकार है न संवैधानिक मूल्यों में कोई विश्वास। वे स्वयं को भारतीय सामाजिक-व्यवस्था के पिरामिड के उच्चतम शिखर पर मानते है़ं और अपनी श्रेष्ठता को चुनौती देने वाले हर विचार, हर व्यक्ति का विरोध करते हैं, फिर चाहे वह नेहरू हों या डॉ. आंबेडकर।
अपने प्रोपेगैंडा को आगे बढ़ाते हुए ऐसे लोगों ने आजकल एक और ट्रेंड चला रखा है, जिसके द्वारा न सिर्फ डॉ़. आंबेडकर को टारगेट किया जा रहा है, बल्कि इतिहास के साथ भी छेड़छाड़ की जा रही है। कुछ समय से सोशल मीडिया पर एक भ्रामक खबर फैलाई जा रही है कि भारत के संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर नहीं, बल्कि बी.एन. राव थे और उन्होंने ही संविधान का ड्राफ्ट तैयार किया था।
इस बात में जितना छल है, उतनी ही बेबुनियाद भी। इसके पीछे की सच्चाई जानने के लिए इतना ही काफी होगा कि हम उस समय संविधान सभा में हुई बहसों को एक बार सुनें। संविधान सभा की प्रारूप समिति के सदस्य टी.टी. कृष्णामचारी का वह कथन भी सुनने योग्य है, जब उन्होंने संविधान निर्माण का सारा श्रेय डॉ. आंबेडकर को देते हुए उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की थी। संविधान सभा की चर्चाओं में आप देखेंगें कि संविधान के प्रारूप, इसके प्रावधानों और मूल्यों को कौन डिफेंड कर रहा है? वे थे डॉ. आंबेडकर। संविधान सभा के सदस्य बहस के दौरान किससे प्रश्न कर रहे थे? उनका जवाब देने वाले डॉ. आंबेडकर थे।
दरअसल बेनेगल नरसिंह राव उस प्रारूप समिति के मात्र सहायक और सलाहकार थे, जिसके अध्यक्ष डॉ. आंबेडकर थे। राव कानूनी मामलों के जानकार थे और पेशे से ब्यूरोक्रेट थे। इसलिए उनका कार्य यह था कि वह संविधान-निर्माण के लिए बनी प्रारूप समिति को सहायता और सलाह दें। वे डॉ. आंबेडकर ही थे जिन्होंने भारत के संविधान में उन सभी मूलभूत और आवश्यक संवैधानिक प्रावधानों और मूल्यों की प्रतिष्ठा की, जिसने देश के सभी नागरिकों और विशेष रूप से दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को समानता, स्वतंत्रता और न्याय का अधिकार सुनिश्चित किया।
लेकिन आज सोशल मीडिया पर कुछ लोगों द्वारा डॉ. आंबेडकर के विषय में झूठे नॅरेटिव गढ़े जा रहे हैं। यह इन लोगों की घटिया राजनीतिक विचारधारा को ही दर्शाता है। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब हम देखते हैं कि इन फर्जी नॅरेटिवों पर आंख मूंद कर विश्वास करने वालों में वह पीढ़ी भी शामिल है, जो खुद को जेन-जी कह रही है और अपनी तथाकथित आधुनिकता और खुले विचारों का दम भर रही है। लेकिन क्या सच में हमारे देश के जेन-जी आधुनिक हैं? क्या वे अपनी जातिगत पहचान और जाति आधारित प्रतिष्ठा के प्रति उदासीन हुए हैं? क्या सच में उन्होंने जातिवाद को पूर्णतः नकार दिया है?
अभी हाल ही में बीबीसी की एक रिपोर्ट आई, जिसमें बताया गया है कि “भारत की जेन-जी पीढ़ी में यूनिटी नहीं है क्योंकि वे जाति और धर्म के आधार पर बंटे हुए हैं।” आज सोशल मीडिया पर ऐसे बहुत से पेज बने हुए हैं, जो धड़ल्ले से जाति-आधारित घृणित सामग्रियां परोस रहे हैं और इसे देखने और लाइक करने वालों में एक बड़ा तबका जेन-जी का है।
देश के जेन-जी पीढ़ी की इस प्रवृत्ति के पीछे एक बड़ा कारण यह दिखाई देता है कि इस नई पीढ़ी ने किताबों से दूरियां बना ली हैं। उनमें इतना धैर्य नहीं है कि वे पांच-छह घंटे इतिहास, राजनीति और साहित्य संबंधी प्रामाणिक किताबों को पढ़ें।
(संपादन : नवल/अनिल)
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