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आंबेडकर को अपमानित करने वाले विजयेंद्र के खिलाफ हो कानूनी कार्रवाई 

फिल्म पटकथा लेखक व सांसद विजयेंद्र प्रसाद के मुताबिक, “जब आंबेडकर ने पानी मांगा तब जमींदार ने किसी से कहा कि एक गिलास में पेशाब कर वह उन्हें नमकीन पानी उपलब्ध करवा दे। फिर वह पेशाब उनकी मुंह पर फ़ेंक दी गई। इसके बाद जमींदार ने कहा कि कुछ दलित, ऊंची जातियों के पुरुषों की संतान होते हैं।” इसके विरोध में पढ़ें कांचा आइलैय्या शेपर्ड की टिप्पणी 

राज्यसभा सदस्य और तेलुगू फिल्म निर्देशक व पटकथा लेखक के. विजयेंद्र प्रसाद ने आंबेडकर के जीवन का जो चित्रण प्रस्तुत किया है, वह उनकी छवि को गहरी चोट पहुंचाने वाला है।

विजयेंद्र प्रसाद, तेलुगू सिनेमा के सबसे सफल निर्देशकों में से एक एस.एस. राजामौली के पिता हैं। पिता ने जीवन भर फिल्मों की पटकथाएं लिखीं और पुत्र ने पिता की पटकथाओं पर आधारित बड़े बजट की कई फिल्मों का निर्देशन किया। इस बीच, पिता-पुत्र ने हिंदुत्ववादी सत्ता और सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों में खासी पैठ बना ली। इसी के चलते केंद्र की आरएसएस-भाजपा सरकार की सिफारिश पर सन् 2022 में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने विजयेंद्र प्रसाद को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया। शायद संघ परिवार को लगता है कि पिता-पुत्र की जोड़ी उसके एजेंडा को आगे बढ़ाने में उपयोगी साबित हो सकती है।

पिता-पुत्र की तीन फिल्मों ‘बाहुबली’, ‘बाहुबली 2’ और ‘आरआरआर’ ने बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता हासिल की। ये तीनों फिल्में विजयेंद्र प्रसाद द्वारा लिखित कहानियों पर आधारित हैं। ये कहानियां काल्पनिक हैं और उनका इतिहास या वास्तविक घटनाओं से कोई संबंध नहीं है। फिल्मांकन में ग्राफ़िक्स और अन्य आधुनिक तकनीकों के भरपूर उपयोग से ये फिल्में रोमांचक बन पड़ी हैं। यह सचमुच त्रासद है कि इन अवैज्ञानिक फिल्मों ने जो अकूत धन कमाया वह ग्रामीण इलाकों और शहरों की मलिन बस्तियों में रहने वाले गरीब युवकों की जेब से आया। ये तीनों फिल्में ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ जैसी सामाजिक यथार्थ को उजागर करती फिल्मों से एकदम अलग हैं। ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ मुंबई की झोपड़पट्टियों में रहने वालों के जीवन पर गहन शोध पर आधारित थी और उसे ऑस्कर पुरस्कार हासिल हुआ था।

पिता-पुत्र की जोड़ी की फिल्मों का उद्देश्य समाज में बेहतरी लाना या सामाजिक स्थितियों के प्रति ध्यान खींचना नहीं है। उनका मुख्य लक्ष्य है ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना और इसके लिए वे कथित ऐतिहासिक नैरेटिव्स में भावनात्मकता और राष्ट्रवाद का जबरदस्त तड़का लगाते हैं। इन दिनों यह चलन फिल्मों सहित अनेक क्षेत्रों में बढ़ता ही जा रहा है।

विजयेंद्र प्रसाद ने हाल ही में एक आमसभा में जो कहा, उसके चलते मैं यह लेख लिख रहा हूं। उन्होंने कहा कि वे बी.आर. आंबेडकर पर एक कहानी लिख रहे हैं। साफ़ तौर पर यह कहानी फिल्म बनाने के लिए लिखी जा रही है। उन्होंने अपनी कहानी का संक्षिप्त विवरण भी दिया। इस विवरण का वीडियो वायरल हो गया क्योंकि उसमें उन्होंने अपने (कम्मा) पूर्वजों के जातिगत पापों को स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि उनके पूर्वजों ने आंबेडकर के समुदाय पर भयावह अत्याचार किए थे और इसके लिए उन्होंने माफ़ी भी मांगी। उन्होंने अपने पूर्वजों की ओर से कई बार ‘सॉरी’ कहा। हालांकि किसी ने भी उनसे यह कहने के लिए नहीं कहा था।

मगर प्रसाद तब चुप रहे थे जब इसी समुदाय के सदस्यों के विरुद्ध 1985 में कारम्चेडू में भयावह अपराध किए गए थे। मीडिया की रपटों के अनुसार उन्हें ऐसा नहीं लगता कि उन्हें दलितों और आदिवासियों पर जो अत्याचार आज भी हो रहे हैं उनके लिए भी माफ़ी मांगनी चाहिए। उन्होंने “मेरे पूर्वजों द्वारा किए गए अपराधों” की बात की। शायद उनका आशय यह था कि आज ऐसा कुछ नहीं हो रहा है। यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि वे अपनी ‘ऊंची जाति’ पर गर्वित हैं।

इसके बाद उन्होंने आंबेडकर और उनकी पहली पत्नी रमाबाई से जुड़े एक प्रसंग का विवरण दिया, जो शायद उनकी फिल्म का हिस्सा होगा।

राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत राज्यसभा सांसद व तेलुगू फिल्म पटकथा लेखक विजयेंद्र प्रसाद

इस वीडियो के सामने आते ही दलित-आंबेडकरवादी बुद्धिजीवियों ने उस पर कड़ी आपत्ति की। बत्तुला रामप्रसाद नामक एक व्यक्ति ने 26 फरवरी, 2026 को हैदराबाद के सैदाबाद पुलिस थाने में एक शिकायत दर्ज कर विजयेंद्र प्रसाद के खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत कार्यवाही की मांग की। अब चूंकि विजयेंद्र प्रसाद एक प्रभावशाली राजनेता हैं और आरएसएस-भाजपा के समर्थन से राज्यसभा सदस्य भी हैं, इसलिए अब तक उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। दलित समुदाय से आने वाले जानेमाने वकील श्रीकांत चिंताला, जो तेलंगाना उच्च न्यायालय में वकालत करते हैं, ने 4 मार्च 2026 को संबंधित पुलिस उपायुक्त और अन्यों को कानूनी नोटिस जारी कर यह पूछा कि अब तक एफआईआर क्यों दर्ज नहीं की गई। मगर इस मामले में आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

वीडियो और शिकायत के अनुसार, विजयेंद्र प्रसाद ने आंबेडकर के विवाह का विवरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि विवाह के समय आंबेडकर 14 साल के थे और रमाबाई 9 साल की थीं। शास्त्रों में वर्णित प्रक्रिया के अनुरूप, नवदंपत्ति से कहा गया कि आंबेडकर की धोती और रमाबाई की साड़ी में गांठ बांधकर वे पवित्र अग्नि के तीन फेरे लगाएं। विजयेंद्र के अनुसार, रमाबाई ने गांठ खोल कर दौड़ लगा दी और कहा कि वे रेस में जीत गईं हैं।

आंबेडकर की किसी भी लिखित जीवनी में इस तरह की घटना का कोई विवरण नहीं है। इस काल्पनिक प्रसंग को शायद इसलिए गढ़ा गया है ताकि यह दिखाया जा सके कि दोनों का विवाह शास्त्रों द्वारा विहित रीति से हुआ था। और यह दावा कि रमाबाई ने दौड़ लगा दी शायद कथित घटना को नाटकीय स्वरूप देने के लिए जोड़ा गया है। कुल मिलाकर यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि आंबेडकर की शादी हिंदू धार्मिक रस्मों से हुई। इसका क्या कोई प्रमाण उपलब्ध है?

इसी वीडियो में विजयेंद्र ने एक और घटना का विवरण दिया, जो उनके अनुसार शोध पर आधारित है। यह विवरण और परेशान करने वाला है। विजयेंद्र के अनुसार, जब रमाबाई मृत्युशैय्या पर थीं तब उन्होंने अपने गांव के पोखर का पानी पीने की इच्छा व्यक्त की। सूट पहने और टाई लगाए आंबेडकर पानी लाने गांव में गए। वहां के एक जमींदार ने उनसे उनकी जाति पूछी। जब आंबेडकर ने कहा कि वे दलित हैं तब उस जमींदार ने आंबेडकर के सारे कपड़े उतरवा दिए और उन्हें केवल एक कच्छे (तेलुगू में गोची) में खड़ा कर दिया। जब आंबेडकर ने पानी मांगा तब जमींदार ने किसी से कहा कि एक गिलास में पेशाब कर वह उन्हें नमकीन पानी उपलब्ध करवा दे। फिर वह पेशाब उनकी मुंह पर फ़ेंक दी गई। इसके बाद जमींदार ने कहा कि कुछ दलित, ऊंची जातियों के पुरुषों की संतान होते हैं और जब ऊंची जातियों के पुरुष, दलित महिलाओं के साथ संभाेग करते हैं तब उन्हें जाति की कोई परवाह नहीं होती। अपरोक्ष रूप से वे यह कह रहे थे कि संभवतः आंबेडकर ऊंची जाति के किसी जमींदार की संतान थे।

यह एक अत्यंत अपमानजनक कहानी है, जिसका कोई प्रमाण इतिहास की पुस्तकों में नहीं मिलता। ऐसा लगता है कि विजयेंद्र प्रसाद ने आंबेडकर को अपमानित करने के लिए और उन पर कीचड़ उछालने के लिए यह कहानी गढ़ी है। यह आंबेडकर के जीवन से जुड़ा कदाचित सबसे जातिवादी काल्पनिक आख्यान है।

आंबेडकर के कोई अनुयायी या अध्येता एक राष्ट्रीय नेता के बारे में इस तरह की झूठी कहानियां बर्दाश्त नहीं कर सकता। ऐसे प्रयास की पूरे देश में कड़ी निंदा होनी चाहिए और संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए चाहे उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा और पद जो भी हो। अगर आंबेडकर पर किसी फिल्म में ऐसी घटना दिखाई जाती है तो यह बहुत गलत होगा। जिन राष्ट्रीय नायकों के जीवन के बारे में सब कुछ दस्तावेजों में उपलब्ध है, जब उनके बारे में काल्पनिक बातें कही जा सकती हैं तो आप केवल कल्पना कीजिए कि पैसा कमाने के लिए क्या कुछ नहीं किया जा सकता।

आधुनिक भारत में आंबेडकर के जीवन पर जितना शोध हुआ है, उतना शायद ही किसी अन्य के जीवन पर हुआ हो। अगर कोई लेखक ऐसे व्यक्ति के जीवन के बारे में इस तरह की घटनाओं का ‘आविष्कार’ कर सकता है तो वह किसी भी ऐतिहासिक विरासत को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत कर सकता है। इसलिए यह ज़रूरी है कि हर जाति और समुदाय के अध्येता इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी की निंदा करें और संबंधित व्यक्ति के खिलाफ उपयुक्त कानूनी कार्रवाई की मांग करें।

(यह आलेख पूर्व में वेब पत्रिका न्यूजक्लिक द्वारा अंग्रेजी में प्रकाशित है। यहां हम लेखक की सहमति से हिंदी अनुवाद प्रकाशित कर रहे हैं। मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

कांचा आइलैय्या शेपर्ड

राजनैतिक सिद्धांतकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता कांचा आइलैया शेपर्ड, हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के सामाजिक बहिष्कार एवं स्वीकार्य नीतियां अध्ययन केंद्र के निदेशक रहे हैं। वे ‘व्हाई आई एम नॉट ए हिन्दू’, ‘बफैलो नेशनलिज्म’ और ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ शीर्षक पुस्तकों के लेखक हैं।

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