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वो आखिरी पल जब सूर्यास्त हुआ एक महानायक का

सुबह 9 बजकर 45 मिनट पर जब रत्तु जी को लिये कार बाबा साहेब के घर में प्रविष्ट होती है तो श्रीमती सविता आंबेडकर उन्हें अपनी भीगी आंखों से अंदर लेकर जाती हैं और रोते हुए नानक चंद जी को बताती हैं कि साहेब उन्हें छोड़ कर चले गए। पढ़ें, द्वारका भारती का यह आलेख

बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के साथ आखिरी पलों तक रहने वाले नानक चंद रत्तु द्वारा लिखी पुस्तक – डॉ. आंबेडकर के अंतिम कुछ वर्ष – एक ऐसा दस्तावेज है, जो इस मसीहा के अंतिम क्षणों की गाथा का पूरा विवरण देता है। इसको पढ़ते हुए पाठक इस महानायक की अंतिम यात्रा पर उमड़ने वाली दारुणता से उपजे वातावरण से प्रभावित हुए बिना रह नहीं सकता। मौत कितनी निर्दयी होती है, इसके अहसास उनके परिनिर्वाण की ख़बर पढ़ने वाले की मानसिकता से कर सकते हैं। मृत्यु कभी भी प्रशंसा का पात्र नहीं रही। यह मानव के साथ घटने वाले सबसे भयानक और हृदयविदारक पल होते हैं, लेकिन किसी मसीहा का इस धरती से चले जाना, खुदाई के एक बड़े हिस्से को भी मानो अपनी आगोश में ले जाता है।

इन अर्थों में प्रत्येक साल का 6 दिसंबर हम सबके लिए एक मातम-सा माहौल दे जाता है। इस दिन हम अपने एक ऐसे दोस्त को खो रहे होते हैं, जिसकी भरपाई हम आज तक नहीं कर पाए हैं। देश के आजकल के हालात हमें और भी ज्यादा शिद्दत से उनकी गैरहाजरी का दंश देते हैं। रत्तु जी उस रात को जब बाबा साहेब हमसे विदा लेते हैं, उसका विवरण लिखते हुए कहते हैं– “5 दिसंबर, 1956 की रात में जब मैंने बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर से घर जाने की अनुमति ली, जैसा कि इससे पहले के अध्याय में जिक्र कर आया हूं, उनके स्वास्थ्य में कुछ भी असामान्य नहीं था। अतः दो बजे घर पहुंच कर मैंने जल्दी-जल्दी भोजन किया और सोने चला गया। पर बाबा साहेब का मुझे वापस बुलाना, जबकि मैं साईकिल ले कर बाहर निकल रहा था, अलमारी से ‘प्राक्कथन और परिचय’ की टाइप की हुई प्रतियां, बुद्ध शासन कौंसिल, रंगून को भेजे जाने वाले टाइप किए हुए पत्र तथा आचार्य पी.के. अत्रे व एम.एम. जोशी को लिखे पत्र निकालने को कहना और उनको देर तक अर्थपूर्ण निगाहों से देखना, उन कागजों को हाथों में लेना, बिस्तर के पास रखी छोटी मेज पर रखना तथा मुझसे अगले दिन सुबह जल्दी आने को कहना आदि मुझे रह-रह कर याद आता रहा और मैंने करीब-करीब जागते हुए ही सारी रात गुजार दी।

डॉ. आंबेडकर के निधन व अंत्येष्टि से संबंधित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित खबरें

6 दिसंबर की सुबह मैं देर से उठा, क्योंकि मैं दो बजे के बाद ही सो पाया था। बाहर देखा तो पाया कि आसमान में घने बादल छाए हुए थे। सुबह के कोहरे के कारण अंधेरा छाया हुआ था, कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। मेरी आंखों में अभी भी नींद भरी हुई थी और मैं रजाई ओढ़ कर पुनः सो गया। बाहर सर्दी बहुत पड़ रही थी।

प्रातः करीब 9 बजे किसी ने दरवाजा खटखटाया और दरवाजे की घंटी भी तेज स्वर में बज रही थी। मैं उठा और सोचा कि इस समय कौन हो सकता है? थोड़ी देर बाद दरवाजे की घंटी फिर बजी। मैं बिस्तर पर पड़े पड़े ही चीखा– ‘कौन है?’ कोई जवाब नहीं आया। दरवाजे पर खड़े व्यक्ति ने शायद सुना नहीं होगा। घंटी फिर बज उठी। मैं जोर से चिल्लाया– ‘क्या गूंगे-बहरे हो?’ फिर भी कोई उत्तर नहीं आया। मैं थोड़ा डरा, दरवाजा खोलने को लपका, मेरी पत्नी जो पहले ही उठ चुकी थी, भी मेरे पीछे लपकी। ‘थोड़ा रुको’, फुसफुसाई, ‘वह छड़ी ले लो’, उसने मुझे सावधान किया। सावधानी के लिहाज से उसने की-होल से झांका। बाहर का दृश्य किसी भी तरह से आश्वस्त करने वाला नहीं था। दो व्यक्ति थे बाहर, एक लंबा और दूसरा मध्यम कद-काठी का। घंटी पुनः बजी और दरवाजा खटखटाया गया। आवेश में जैसे ही मैंने दरवाजा खोला, तो आगुंतकों को देखकर हैरान रह गया। वे और कोई नहीं, बाबा साहेब के नौकर-रसोइया सुदामा व ड्राइवर कालू थे। इतनी सुबह उनका आना, चेहरे पर घबराहट व बाबा साहेब की कार को पास ही देख कर, मेरी नसों का खून जम गया। इसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। मेरे पूछने पर कि बाबा साहेब कैसे हैं? वे कुछ नहीं बोल पाए। केवल इतना ही कहा कि श्रीमती सविता के कहने पर बुलाने आए हैं और मुझे तुरंत ही चलना है।”

रत्तु जी की मनोदशा को समझा जा सकता है। ठीक यही मनोदशा उस समय इस ख़बर से आंबेडकरी जगत के प्रत्येक व्यक्ति की हुई होगी कि बाबा साहेब नहीं रहे।

26, अलीपुर रोड, नई दिल्ली स्थित डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय स्मारक के परिसर में एक कोने पर डॉ. आंबेडकर के महापरिनिर्वाण स्थल के रूप में चिह्नित स्थान पर स्थापित डॉ. आंबेडकर की आवक्ष प्रतिमा

सुबह 9 बजकर 45 मिनट पर जब रत्तु जी को लिये कार बाबा साहेब के घर में प्रविष्ट होती है तो श्रीमती सविता आंबेडकर उन्हें अपनी भीगी आंखों से अंदर लेकर जाती हैं और रोते हुए नानक चंद जी को बताती हैं कि साहेब उन्हें छोड़ कर चले गए। नानक चंद रत्तु लिखते हैं कि इस ख़बर को सुनना उनके लिए पूरे जीवन में हिला देने वाला अनुभव था। वे अंदर जाते हैं तो एक महान व्यक्ति को वे चिर निद्रा में देखते हैं, जिसे वे रात को एक जागते, स्वस्थ इंसान के रूप में छोड़ कर गए थे।

आगे वे लिखते हैं कि बाबा साहेब के चेहरे पर अपूर्व शांति छायी हुई थी, मानो भगवान बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया हो।

पता चलते ही बाबा साहेब के साथ रहने वाले विद्वान चिंतक श्री सोहन लाल शास्त्री जी भी तत्काल 26 अलीपुर रोड पहुंचते हैं। वे भी बुरी तरह घबराए हुए थे। थोड़ी देर के बाद ही भिक्खु आनंद कौसल्यायन, टी.वी. भोंसले, विमलचंद, एस.एन. शास्त्री और बड़ी संख्या में अन्य बाबा साहेब के सहयोगी पहुंचने लगे। नानक चंद रत्तु लिखते हैं कि इस अवसर पर एस.एन. शास्त्री बाबा साहेब की जीवन साथी डॉ. सविता अंबेडकर पर अति क्रोधित हो रहे थे। वे कह रहे थे कि वह बाबा साहेब को ठिकाने लगाने के अपने इरादे में सफल हो गई।

रत्तु जी आगे लिखते हैं कि उन्हें शांत नहीं किया जा सका था। दिल्ली में मातम का माहौल बन चुका था। मानो दिल्ली की हवा भी रुक गई थी। समाचार पत्रों के संवाददाताओं के फोन घनघना उठे थे। इस खबर को पूरा देश पचा नहीं रहा था।

पता चलते ही बड़ी संख्या में बाबा साहेब के अनुयायी, जिनमें अनुसूचित जाति संघ का झंडा लिए, काली पट्टी बांधे, अपने दिलों में असीम दुख समाए, आंखें नम किए आने लगे। आने वाली औरतें दहाड़ें मार कर रोती हुई देखी गईं। शव को फूल-मालाओं में ढंक कर बैठक में रखा गया। और उनके पास भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं और चित्र रखे गए। लोग उनके इर्द-गिर्द रोते हुए परिक्रमा करते जा रहे थे।

इस अवसर पर उस समय के संचार मंत्री जगजीवन राम, गृहमंत्री जी.बी. पंत, राज्य सभा के उपसभापति एस.वी. कृष्णमूर्ति, स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृतकौर, संसद सदस्य सरदार स्वर्णसिंह, राज्यसभा व विधि मंत्रालय के अधिकारीगण फूलमालाओं व फूल-गुच्छों के सांथ बाबा साहेब के निवास स्थान पर उपस्थित हुए। केंद्रीय उप शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर आदि सबकी आंखों में आंसू थे।

26, अलीपुर रोड, नई दिल्ली स्थित डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय स्मारक में बनाया गया डॉ. आंबेडकर का अध्ययन कक्ष

उनका इस संसार को छोड़ जाने का किसी को जरा भी अंदेशा नहीं था। यह एक अप्रत्याशित हादसा जैसा ही था। एक महान योद्धा हमें छोड़ कर कहीं दूर चला गया था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी उनके पार्थिव शरीर पर माल्यार्पण करने पहुंचे। वे अक्सर बाबा साहेब के स्वास्थ्य के बारे में पूछते रहा करते थे।

उनकी इस आकस्मिक मृत्यु से उन दिनों लोगों द्वारा किसी षड्यंत्र का संदेह भी व्यक्त किया जा रहा था। शायद इस मृत्यु को हज़म करना कठिन था। कोई उनको ज़हर देकर मारने का संदेह व्यक्त कर रहा था। सबसे ज्यादा शक सविता अंबेडकर पर ही था। पूरा अंबेडकरी जगत – मानो सकते की हालत में था।

कहा जाता है कि गांधी की मौत के बाद मुंबई शहर ने शोकाकुल लोगों का इतना बड़ा समूह देखा था। हर आंख के कोर से मानों दुनिया का पानी उतर आया हो। यह दिन मानो आंबेडकरी जगत के लिए सबसे ज्यादा वेदना देने वाला दिन है, लेकिन यह वेदना आज और भी तीव्र हो जाती है जब हम देखते हैं कि बाबा साहेब के विचारधारा की निरंतर उपेक्षा हो रही है। बाबा साहेब की विचारधारा सिर्फ राजनीति के मैदान तक ही सीमित हो कर रह गई है।

इन सबसे हट कर यदि हम उनकी विचारधारा का आज मुल्यांकन करें तो हमें यह कहने में शायद कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर हमें समग्र रूप में अपने जन्म दिन से ज्यादा परिनिर्वाण पर इन अर्थों में अधिक प्रभावित करते हैं कि उनकी ढेरों उपलब्धियां हमारे सामने आ चुकी होती हैं, जिन पर चलकर इस समाज में वैचारिक परिवर्तन में हमें सहायता मिल सकती है। यह दिन हमारे लिए शोक का दिन हो सकता है, लेकिन यह दिन हमें यह भी स्मरण करवाता है कि बाबा साहेब शारीरिक रूप में भले ही हमारे बीच नहीं, उनके दिए गए ढेरों विचार पुस्तकों के रूप में हमें आंदोलित कर रहे हैं।

उनका दिया हुआ सबसे बड़ा विचार बौद्ध धम्म के रूप में हमारे जीवन का एक अनिवार्य अंग बन चुका है। यह भी एक त्रासदी ही मानी जाएगी कि उनके दिए गए इसी विचार को कम अपनाया गया है। यदि इसे अपनाया भी गया है तो आधे-अधूरे रूप में ही।

आज आंबेडकरवाद सिर्फ वह हथकंडा बन गया है, जिसे सरकारी कर्मचारी संघों ने यहां अपनी मांगें मनवाने या सरकार को डराने के लिए प्रयोग किया है तो राजनीति वालों ने इसका इस्तेमाल अपनी ज़मीन तलाशने के लिए किया है। जब भी देश के दमित वर्ग पर कोई सामाजिक, राजनीतिक व प्रशासनिक अत्याचार होता है तो बाबा साहेब के चित्र को साथ में लिए मैदान में उतर आते हैं। ऐसा करना शायद असंगत नहीं, लेकिन उनकी महान विचारधारा को सिर्फ तब तक ही अपने हाथ में रखना, जब तक हमारा स्वार्थ पूर्ण नहीं होता, बाद में उसे एकदम तिलांजलि दे देना, एक बड़ा मजाक माना जाएगा।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

द्वारका भारती

24 मार्च, 1949 को पंजाब के होशियारपुर जिले के दलित परिवार में जन्मे तथा मैट्रिक तक पढ़े द्वारका भारती ने कुछ दिनों के लिए सरकारी नौकरी करने के बाद इराक और जार्डन में श्रमिक के रूप में काम किया। स्वदेश वापसी के बाद होशियारपुर में उन्होंने जूते बनाने के घरेलू पेशे को अपनाया है। इन्होंने पंजाबी से हिंदी में अनुवाद का सराहनीय कार्य किया है तथा हिंदी में दलितों के हक-हुकूक और संस्कृति आदि विषयों पर लेखन किया है। इनके आलेख हिंदी और पंजाबी के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। इनकी प्रकाशित कृतियों में इनकी आत्मकथा “मोची : एक मोची का अदबी जिंदगीनामा” चर्चा में रही है

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