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‘हेरि महां दरद दिवाणी म्हारा दरद न जाण्या कोय’

पति की मृत्यु और पुनर्विवाह न होने की स्थिति में मीरा का यह पक्ष अधिक मुखरता से अभिव्यक्त हुआ है। उन्हें कुछ भी मानने से पहले स्त्री माना जाना चाहिए, जिसकी अपनी इच्छाएं हैं, जिनकी पूर्ति उस सामंती समाज में असंभव हैं। पढ़ें, डॉ. सुरेश कुमार जिनागल का यह विमर्श

विमर्श : मीरा और उनका समाज

सांची पियाजी री गूदड़ी, जामे निरमल रहै सरीर।
छप्पन भोग बुहाई दे हे, इण भोगिन में दाग।
लूण अलूणों हो भलो हे, अपणे पिया जी को साग।

…. …. …. …. …. …. …. …. ……………..

छैल विराणो लाख को हे, अपणे काज न कोइ।
ताके संग सीधरतां हे, भला न कहसी कोइ।
वर होणों अपणों भलो हे, कोढ़ी कुष्टी कोइ।
जाके संग सिधारतां हे भलो कहै सब कोइ।
अविनासी सूं बालवां हे, जिन सूं सांची प्रीत।
मीरा कूं प्रभु मिल्या हे एही भगति की रीत।।[1]

मीरा के इस पद में पतिव्रत धर्म की आवश्यकता पर बल दिया गया है। बावजूद इसके उनके काव्य में जगह-जगह कृष्ण के प्रति प्रेम की अनेक झांकियां मिलतीं हैं। मीरा के पति भोजराज का देहावसान उनके विवाह के कुछ वर्षों बाद हो गया था, फिर क्या वजह है कि मीरा एक ओर पतिव्रत धर्म के पद गाती हैं तो दूसरी ओर कृष्ण-प्रेम के? कृष्ण-प्रेम के चलते उन्होंने कुल-मर्यादा का भी त्याग कर दिया है, जिसका वर्णन उन्होंने अपने पदों में स्थान-स्थान पर किया है। क्या मीरा ने वास्तव में कुल-मर्यादा का परित्याग कर दिया था? इसको जानने से पहले हमें मीरा की वास्तविक स्थिति जान लेनी चाहिए। बकौल माधव हाड़ा– “मीरां जीवन विरत संत भक्त और जोगन नहीं थी, वह प्रेम दीवानी और पगली नहीं थी और वह वंचित-पीड़ित, उपेक्षित और असहाय स्त्री भी नहीं थी। वह एक आत्मचेत, स्वावलंबी और स्वतंत्र व्यक्तित्व वाली सामंती स्त्री थी।”[2] ‘मीरा सामंती स्त्री थीं’, ऐसी स्थिति में वे कुल-मर्यादा का खंडन करें, यह असंभव-सी बात लगती है। मीरा के पास धन-दौलत भी है। वे दान-पुण्य और मंदिर आदि भी बनवाती हैं– “मीरां एक सामंत की विधवा थी, उसकी हैसियत एक जागीरदार की थी और उसके पास आर्थिक स्वावलंबन के साधन थे। वह संपन्न थीं और इतना संपन्न थीं कि साधु-संतों को आतिथ्य सत्कार में मुहरें देती थीं। वल्लभ संप्रदाय के प्रामाणिक माने जाने वाले वार्ता ग्रंथों में इसके साक्ष्य हैं।”[3]

इस स्थिति में कुल-मर्यादा का खंडन वास्तविक नहीं लगता। हो सकता है कि अपने घर में ही भजन आदि गाने को स्वयं मीरा और उनके परिवार वाले कुल-मर्यादा का खंडन मान रहे हों! दूसरा यह भी संभव हो सकता है कि वह वैधव्य स्थिति में भी कृष्ण से प्रेम करती रहीं। चूंकि सवर्ण समाज में उस समय पुनर्विवाह नहीं होता था, इसलिए हो सकता है कि मीरा स्वयं कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को कुल-मर्यादा का खंडन मानती हों! बाकी परिवार तो कुल-मर्यादा को नष्ट करने वाली के रूप में देखता ही था। मीरा को रूढ़िवादी सवर्ण समाज में पैदा होने की सज़ा मिली थी। उनका पुनर्विवाह नहीं हो सकता था। ऐसी स्थिति में ही उनको कृष्ण को काल्पनिक पति मानना पड़ा। हालांकि माना जाता है कि कृष्ण के प्रति उनका अनुराग बालपन से ही था। उन्होंने स्वयं ही अपने पदों में बार-बार इसे स्वीकार किया है–

आओ मनमोहनजी मिठो थारो बोल
बलपनां की प्रीत रमियाजी, कबै नहिं आओ थारो तोल।[4]

कहीं-कहीं वे अपनी पुरानी प्रीत के बारे में बताती हैं–

मेरी उनकी प्रीत पुराणी, उण बिन पल न रहाऊं।[5]

एक जगह पूर्वजन्म के प्रेम की बात करती हैं–

पूर्व जनम की प्रीत पुरानी, सो क्यूं छोड़ी जाय।[6]

मीरा के ‘बालपन’ का, ‘पूर्वजन्म’ का या ‘पुराने समय’ का अर्थ एक ही है। बालपन की अधिकांश बातें बच्चों के मन में आगे चलकर भी बनी रहती हैं। मीरा के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा। बालपन की कृष्ण संबंधी काल्पनिक स्मृतियां अब उनके कठिन विधवा जीवन का विश्राम स्थल बन गई होंगी। मीरा कई पदों में सपने में कृष्ण से विवाह होने की बात भी सामने आती है–

माई महाने सुपणा मां परण्या दीनानाथ।
छप्पन कोटां जणां पधारयां दूल्हो सिरि ब्रजनाथ।
सुपाणां मां तोरण बंदयारी सुपणां मां गह्या हाथ।
सुपणां मां म्हारे परण गया पाया अचल सोहाग।
मीरां री गिरधर मिल्या री, पूरब जणम रो भाग।[7]

बालपन की स्मृतियां अब सपने में भी बदल गई हैं। इस बदलाव में अंतर यह आया है कि अब उनके सुहाग की पूर्ति काल्पनिक कृष्ण से होती है। इस पद में ‘सपने’ का कई बार जिक्र हुआ है। स्वप्न शब्द का अधिक बार आना उनके मन के अविश्वास (पति और प्रेमी का न होना) को पुख्ता करता है। ‘अचल सुहाग’ की बात भी कुछ ऐसी ही है। वे बार-बार बताना चाहती हैं कि अब वे विधवा नहीं हैं। सुहाग पर बलाघात विधवा जीवन को नकारने की चाहत से प्रेरित है।

माधव हाड़ा ने अपनी पुस्तक ‘पचरंग चोला पहर री सखी’ में मीरा के समाज को गतिशील समाज माना है– “मीरा का समाज आदर्श समाज तो नहीं था, लेकिन वह पर्याप्त गतिशील और द्वंद्वात्मक समाज था। तमाम अवरोधों के बाद भी इसमें कुछ हद तक मीरां होने की गुंजाइश और आजादी थी।”[8] वे यह मानते हैं कि विधवाओं का पुनर्विवाह हो सकता था– “वर्ण व्यवस्था के ब्राह्मण आदर्श में विधवाओं का विवाह निषिद्ध था, लेकिन यह ‘चाल चलगत व्यवहार’ में पूरी तरह कभी नहीं आया। मध्यकाल और उससे पहले यहां शिल्पी, कृषक, शूद्र और आदिवासी जातियों में विधवा विवाह आम थे और सोपान क्रम की उच्च जातियों में भी ये पूरी तरह निषिद्ध नहीं थे।”[9] आगे वे कहते हैं– “धर्म और शास्त्र भले ही स्त्री को एक विवाह की ही अनुमति देते हों, लेकिन मीरां के समाज में स्त्रियों को पुनर्विवाह की आजादी थी। यहां के जाट, गुर्जर, माली, बिसनोई सहित लगभग 80 प्रतिशत समाजों में नाता, मतलब पुनर्विवाह होता था।”[10]

माधव हाड़ा यहां शूद्रों और सवर्णों की सामाजिक स्थिति में अंतर करना भूल गए हैं। शूद्रों, दलितों और आदिवासियों में विवाह-विच्छेद और पुनर्विवाह की सामाजिक स्वीकृति पहले से रही है। सवर्ण समाज ने यह स्वीकृति कभी नहीं दी। यहां तक कि स्वतंत्रता के बाद डॉ. आंबेडकर हिंदू कोड बिल के माध्यम से हिंदू स्त्रियों के लिए तलाक और पुनर्विवाह के अधिकार की हिमायत कर रहे थे तब सवर्ण समाज ने ही उनका सबसे अधिक विरोध किया था। अंतत: उनको कानून मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा। अपने विश्लेषण में माधव हाड़ा दोनों समाजों की सामाजिक स्थिति में घालमेल कर दे रहे हैं?

आगे उनका कहना है कि सोपान क्रम की उच्च जातियों में पुनर्विवाह हो सकता था, तब वे मीरा को कैसे भूल गए? क्या मीरा सोपान क्रम की उच्च जातियों में नहीं आती हैं? माधव हाड़ा ने उस काल की अन्य स्त्रियों का भी जिक्र किया है, जो सामंती व्यवस्था में पिस रही थीं– “महाराणा कुंभा की पुत्री रामबाई का निर्वाह जब गिरनार के शासक मंडलिक के साथ नहीं हुआ, तो उसका भतीजा पृथ्वीराज ससैन्य गिरनार गया और वहां से उसको मेवाड़ ले आया। रामबाई बाद में आजीवन मेवाड़ में रही। इसी तरह पृथ्वीराज की बहन आनंदीबाई का निर्वाह जब सिरोही के राव जगमल के साथ नहीं हुआ, तो वह सिरोही गया और अपने बहनोई को अपनी बहन के चरणस्पर्श करने के लिए मजबूर किया। मीरा का निर्वाह भी जब मेवाड़ में बहुत मुश्किल हो गया तो चाचा विरमदेव ने उसे मेड़ता बुला लिया था।”[11] रामबाई, आनंदीबाई और मीराबाई को पीहर क्यों लौटना पड़ा?

मीराबाई की एक पेंटिंग (साभार : विकिपीडिया)

सवाल है कि माधव हाड़ा तत्कालीन सवर्ण समाज को किस आधार पर गतिशील समाज कहते हैं? ये सभी सामंती स्त्रियां क्या अपनी खुशी से पीहर लौट रही थीं? पहली बात तो यह कि सवर्ण समाज गतिशील रहा होता तो इन स्त्रियों को इस प्रकार की कठिनाइयां नहीं उठानी पड़तीं। अगर कठिन घड़ी आती भी तो पुनर्विवाह की व्यवस्था होने की स्थिति में अपने जीवन को पुन: प्रारंभ कर सकती थीं। माधव हाड़ा इस वैधव्यपूर्ण जीवन को गर्व का जीवन बताते हैं– “राजवंशों की विधवा बहन-बेटियां बहुत सम्मानपूर्वक अपने पीहर में जीवन व्यतीत करती थीं। मेवाड़ के महाराणा रायमल ने अपनी विधवा बहन रामबाई को जावर का परगना दिया था। रामबाई आजीवन मेवाड़ में रही और उसने दानपुण्य, तीर्थाटन आदि के साथ जावर में एक मंदिर बनवाया।”[12] यहां पुनर्विवाह की अस्वीकृति और विधवा जीवन को पीहर में दान-पुण्य के गौरव से ढंक दिया गया है। मीरा को भी तो जागीर मिली हुई थी, वह भी तो दान-पुण्य भी कर कर रही थीं, फिर क्या मीरा के अपने समाज ने उनको सम्मानपूर्ण जीवन जीने दिया? क्यों उनको अपने अंतिम दिन मथुरा में बिताने पड़े?

म्हारों सांवरो ब्रजवासी।
जग सुहाग मिथ्या री सजणी होंवां हो मिट ज्यासी।
वरन कर्यां अविणासी म्हारों, काल व्याल णा खासी।
म्हारों प्रीतम हिरदां बसतां दरस लह्या सुखरासी।
मीरां र् प्रभु अबिनासी, सरण गह्या थें दासी।।[13]

परिस्थितियां व्यक्ति के व्यक्तित्व से छनकर ही अंतरंग होती हैं। छनने की इस प्रक्रिया में व्यक्तित्व और परिवेश दोनों शामिल होते हैं। ‘जग सुहाग मिथ्या है’ की परिस्थिति मीरा के व्यक्तित्व से छनकर ही उनके साहित्य में अभिव्यक्त हुई है। भोजराज की मृत्यु ने ही संभवत: ‘जग सुहाग मिथ्या’ और ‘म्हारों प्रीतम हिरदां बसतां’ की परिस्थिति से मीरा को गुजरने से मजबूर किया हो? अब मृत्यु के बाद मीरा ने भोजराज को मन में बसा लिया है। हालांकि भोजराज के जीवित रहने की अवस्था में भी ‘जग-सुहाग मिथ्या’ लग सकता है, पर मीरा को कठिन परिस्थितियों से पति की मृत्यु के बाद ही गुजरना पड़ा था। अत: हम यह मानकर चलते हैं कि यह परिस्थिति पति की मृत्यु के बाद ही आई होगी। ‘जग सुहाग मिथ्या’ पंक्ति के दर्द की अधिकता ‘म्हारों प्रीतम हिरदां बसतां’ के माध्यम से हुई है। मिथ्या सुहाग को भी हृदय से बाहर नहीं निकाल पाना उसके प्रति आसक्ति तो है ही, साथ ही सुहागन बने रहने की चाहत भी है। सुहागन बने रहने की चाहत के कारण वे बार-बार कृष्ण को सच्चा प्रियतम कहती हैं–

म्हारां तो गिरधर गोपाल दूसरा णां कूयां।[14]

अन्य पंक्ति देखिए–

गिरधर म्हारों सांचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊं।[15]

‘सच्चा प्रियतम’ और ‘दूसरा न कोई’ का बलाघात अनुपस्थित के प्रति अधिक लगाव को सूचित कर रहा है। कवि कई बार महत्त्वपूर्ण या मुख्य को गौण बताकर गौणता में ही उसकी महत्ता सिद्ध करता है। पाश की एक पंक्ति कि ‘पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती’ में प्रत्यक्ष में लगता है कि पुलिस की मार खतरनाक नहीं होती, पर कवि इसको गौण बताकर भी यह बताना चाह रहा है कि पुलिस की मार खतरनाक होती है। हां, इससे खतरनाक और भी कुछ हो सकता है। मीरा के साथ भी ऐसा ही है। वे ‘दूसरा न कोई’ और ‘सच्चा प्रियतम’ के माध्यम से गौण (पति) को मुख्य बना रही हैं। मीरा ने ‘जग सुहाग को कच्चा’ माना, उसको ‘हृदय में बसाया’, गौणता से उसकी प्रमुखता सिद्ध की और इन सबसे अधिक उसकी प्रतीक्षा की, जब यह लगने लगा कि पति नहीं आने वालें हैं। कच्चा सुहाग बिखर गया है तब पुनर्विवाह न होने की स्थति में कृष्ण को कल्पनिक पति मानना प्रारंभ कर दिया–

आंखयां तरशां दरसण प्यासी।
मग जोवां दिण बीतां सजणी, रैण पड़या दुखराशी।
डारां बैठया कोयल बोल्या, बोल सूण्या री गासी।
कड़वा बोल लोक जग बोल्या, करस्यां म्हारी हांसी।
मीरां हरि रे हाथ बिकाणी, जणम जणम की दासी।[16]

मीरा द्वारा कृष्ण को काल्पनिक पति मानने के यहां दो कारण दिखाई देते हैं। एक तो भोजराज जिंदा नहीं हैं और दूसरा लोक ने उन्हें कड़वे बोल बोले और साथ ही उनके वैधव्य की भी हंसी उड़ाई। मीरा ने अपने अवचेतन में कृष्ण को पति तो मान लिया पर उससे भी मिलन असंभव है और न वह दांपत्य सुखों की पूर्ति कर सकता है। इसलिए अब कृष्ण से मिलन असंभव जानकर विरह के पद गाती हैं–

डारि गयो मनमोहन पासी [फांसी]…
विरह की मारी मैं बन डोलूं, प्राण तजूं करवट ल्यूं कासी।
मीरां से प्रभु हरि अविनाशी, तुम मेरे ठाकुर मैं तेरी दासी।।[17]

मीरा ने अपने स्त्रीत्व को स्पष्टता से अभिव्यक्त किया है। आलोचक उनके इस पक्ष की उपेक्षा करके उनको भक्ति के खांचे में फिट कर देते हैं। पति की मृत्यु और पुनर्विवाह न होने की स्थिति में उनका यह पक्ष अधिक मुखरता से अभिव्यक्त हुआ है। मीरा को कुछ भी मानने से पहले स्त्री माना जाना चाहिए, जिसकी अपनी इच्छाएं हैं, जिनकी पूर्ति उस सामंती समाज में असंभव हैं। उन्होंने अपनी इन इच्छाओं को स्पष्टता से और बिना लाग-लपेट के सामने रखा है–

रमैया बिन नींद न आवै।
नींद न आवै विरह सतावै, प्रेम की आंच ढुलावै।
बिन पिया जोत मंदिर अंधियारो, दीपकदाय न आवै।
पिया बिना मेरी सेज अलूनी, जगत रैण बिहावै।
पिया कब रे घर आवै॥[18]

प्रियतम के बिना सूनी सेज सांप के समान लगती है। इस कारण उनको नींद नहीं आती–

सूनी सेज व्याल बुझायां जागा रैण बितावां।
नींद णेणा णा आवां।[19]

एक अन्य पंक्ति, जिसमें वे प्रियतम के बिना जक न पड़ने (सुकून नहीं मिलने) की बात कहती हैं–

जक ण परत मन बहुत उदासी।[20]

मीरा ने मिलन की स्थिति को भी अपने पदों में अभिव्यक्त किया है। इस बारे में विद्वान कह सकते हैं कि जब भोजराज मर गया है और कृष्ण मीरा की कल्पनिक मन:स्थिति हैं, तब मिलन किससे? इसके बारे में कहा जा सकता है कि पुनर्विवाह न होने की स्थिति में मीरा ने कृष्ण को कल्पित पति माना। मीरा ने स्वप्न में कृष्ण से विवाह होने की बात अनेक बार कही है। मीरा के मिलन के पद मीरा की काल्पनिक मन:स्थिति को स्पष्ट करते हैं। इस काल्पनिक मन:स्थिति को अपनाने के लिए समाज ने उनको मजबूर किया है। मिलन की स्थिति का एक पद देखा जा सकता है–

साजण म्हारे घर आया हो।
जुगां जुगां री जोवतां, विरहण पिव पाया हो।
रतण करां नेवछावरां, ले आरत साजां, हो।
प्रीतम दिया सनेसड़ा, म्हारों घणों नेवाजां हो।
पिया आया म्हारे संवरां, अंग आनंद साजां हो।[21]

मीरा कालीन समाज की सड़ी-गली मान्यताओं और विधवा होने की वज़ह से मीरा न तो स्वतंत्र जीवन ही जी सकती थीं और न ही पुनर्विवाह ही कर सकती थीं। विधवा होने के कारण समाज उनको गालियां देता है। ऐसी स्थिति में बचपन की कृष्ण संबंधी स्मृति उनके कठिन जीवन का विश्राम स्थल बनती हैं। अब वे कृष्ण के सपने देखती हैं। स्वप्न में ही कृष्ण से विवाह रचती हैं। काल्पनिक मिलन करती हैं। ऐंद्रिक इच्छाएं, जिनकी पूर्ति नहीं हो पा रहीं हैं, को स्पष्ट अभिव्यक्त करती हैं। उनका समाज उनकी इन इच्छाओं को नहीं समझ सका था। ये सब इच्छाएं और आकांक्षाएं उस पूरे समाज की स्त्रियों की हैं, जिनका विधवा होने की वजह से पुनर्विवाह नहीं हो सकता था। मध्यकाल के भक्त और आधुनिक काल के विद्वान भी मीरा के इस दुख को नहीं समझ पाए। सबने अपने-अपने खेमे के हिसाब से उनकी व्याख्याएं की हैं। मीरा को इस बात का दुख रहा कि उनके इस दर्द को कोई समझ नहीं पाया, न उनका समाज, न मध्यकाल के भक्त और न ही आधुनिक काल के विद्वान। इसलिए हारकर मीरा को कहना पड़ा–

हेरि महां दरद दिवाणी म्हारा दरद न जाण्या कोय।
दरद की मरया दर-दर डोलयां बैद मिल्या नहिं कोय।[22]

संदर्भ सूची

[1] परशुराम चतुर्वेदी संपादित, ‘मीरा की पदावली’, हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, 2002, पद संख्या 26
[2] माधव हाड़ा, ‘पचरंग चोला पहर री सखी’ वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, पृष्ठ 9
[3] वही, पृष्ठ 13
[4] परशुराम चतुर्वेदी संपादित मीरा पदावली, पद संख्या 99
[5] वही, पद संख्या 20
[6] वही, पद संख्या 42
[7] वही, पद संख्या 27
[8] माधव हाड़ा, ‘पचरंग चोला पहर री सखी’, पृष्ठ 61
[9] वही, पृष्ठ 73
[10] वही, पृष्ठ 82
[11] वही, पृष्ठ 86
[12] वही, पृष्ठ 87
[13] मीरा पदावली, पद संख्या 193
[14] वही, पद संख्या 18
[15] वही, पद संख्या 20
[16] वही, पद संख्या 45
[17] वही, पद संख्या 65
[18] वही, पद संख्या 74
[19] वही, पद संख्या 78
[20] वही, पद संख्या 125
[21] वही, पद 149
[22] वही, पद 70


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लेखक के बारे में

डॉ. सुरेश कुमार जिनागल

लेखक राजकीय महाविद्यालय पिड़ावा, झालावाड़ (राजस्थान) में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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