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दलितों के लिए बारात निकालना आज भी बड़ी चुनौती क्यों बनी हुई है?

दलितों ने कठिन परिश्रम और संघर्ष, साथ ही संविधान प्रदत्त अधिकारों के कारण समाज में अपने लिए बेहतर स्थान हासिल किया है। यही सफलता सामंतवादी दंभ में डूबे लोगों के लिए असहजता का वजह बनती है। शायद इसी वजह से दलितों का मूंछ रखना या दूल्हे का घोड़ी पर चढ़ना उनके लिए असहनीय हो जाता है। बता रहे हैं सैयद जै़ग़म मुर्तज़ा

हाल ही में कई घटनाएं सामने आई हैं, जहां दलितों की शादी में दूल्हे के घोड़ी पर बैठने, बारात में नाचने, यहां तक कि साज-सजावट कराने तक पर भी सवर्ण समाज ने आपत्ति जताई। यह साफ तौर पर भेदभाव, जातिगत श्रेष्ठता की झूठी भावना और गहरी जड़ें जमा चुकी रूढ़िवादी सोच का नतीजा है। लेकिन सवाल यह है कि 21वीं सदी के भारत में भी हम इस मानसिकता पर अंकुश क्यों नहीं लगा पा रहे हैं?

इसी बीते 10 फरवरी की बात है। उत्तर प्रदेश के एटा के पीपल टोला इलाक़े के रहने वाले तेजपाल के यहां जश्न का माहौल था। अलीगढ़ से तेजपाल की बेटी मंजू की बारात आ रही थी। तैयारियां पूरी थीं, लेकिन बारात गांव में घुसते ही दबंगों ने घेर लिया और मारपीट शुरू कर दी। आरोप है कि शाक्य समाज (पिछड़ा वर्ग) के कुछ लोगों ने दूल्हे को घोड़ी से उतारने की कोशिश की और बात न मानने पर लाठी‑डंडों से हमला कर दिया। दूसरे पक्ष ने इन आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहा कि विवाद इसलिए हुआ क्योंकि बारात के कुछ युवक उनके घर चल रहे सगाई समारोह में बज रहे डीजे पर नाचने लगे।

दूसरे पक्ष का दावा सही भी हो सकता है लेकिन दलितों को घोड़ी पर बैठने और दूल्हे को घोड़ी से उतारने का आरोप कोई नया नहीं है। इससे महज़ एक हफ्ता पहले गुजरात के पाटन में भी लगभग ऐसी ही घटना घटी। यहां चंद्रुमाना गांव में विशाल चावड़ा नामक युवक की शादी थी। उसने घोड़ी पर बारात निकालने का फैसला किया लेकिन गांव के दबंगों को विशाल का घोड़ी पर चढ़ना गंवारा न था। उन्होंने महज़ इसलिए विरोध किया कि विशाल दलित है। बात न मानने पर गांव के सवर्णों ने तलवारें लहराईं, बारातियों के साथ मारपीट की, और दूल्हा को घोड़ी से नीचे उतार लिया। इसके बाद शादी का जश्न ग़म के माहौल में बदल गया।

पुलिस ने घटना के संबंध में एफआईआर भले दर्ज कर ली है, लेकिन यह इस बात की गारंटी नहीं है कि दोबारा ऐसी घटना नहीं होगी। इससे पहले की कई घटनाएं इस बात की तस्दीक़ करती हैं। मसलन, मार्च 2025 में आगरा में सड़क से गुज़र रही बारात पर हमला हुआ। आरोपियों ने जातिसूचक गालियां दीं और दूल्हे को घोड़ी से उतारने की कोशिश की। रिपोर्ट हुई, मगर कार्रवाई के नाम पर महज़ खानापूर्ति हुई। आगरा में ही अप्रैल 2025 में रोहित कुमार की बारात पर ऊंची जाति (ठाकुर समाज) के लोगों ने हमला कर दिया। हमलावरों को शादी में तेज़ संगीत बजाने और उनके घरों के सामने से बारात निकालने पर ऐतराज़ था। अगर पहली घटना में सख़्त कार्रवाई हुई होती तो शायद एक ही महीने बाद ऐसी दूसरी घटना न घटित होती। सवाल यही है कि आख़िर कबतक ऐसा होता रहेगा?

रोक हेतु कानूनी प्रावधान हैं, लेकिन अमल में नहीं लाए जाते

भारत में घोड़ी पर बैठकर बारात निकालना परंपरा और सामाजिक गौरव का प्रतीक माना जाता रहा है। इसकी जड़ें आज़ादी से पहले के रजवाड़ों में होने वाली शादी की रस्मों में हैं। उस समय बारात लेकर जाना और लड़की को सुरक्षित ब्याह लाना अपने आप में एक संघर्ष होता था। ख़ासकर जब बारातें दूर‑दराज़ इलाक़ों से होकर जंगलों से गुज़रती थीं, तो तलवार, घोड़ा और बारातियों का हथियार लेकर चलना व्यावहारिक था। आधुनिक काल में यह रस्म अब अधिकतर प्रतीकात्मक हो गई है और कई बार अप्रासंगिक भी प्रतीत होती है। लेकिन सवर्णों के लिए जहां यह परंपरा है, दलितों के लिए इसमें बराबरी हासिल करने का भाव छिपा है।

दलित चिंतक श्रीराम मौर्य कहते हैं, “आधुनिक काल में किसी के घोड़ी पर बैठने भर से सवर्णों का उद्वेलित होना समझ से परे है। घोड़ी महज़ प्रतीक है, जिसे सामंतवादी दंभ और ऐतिहासिक दबंगई से जोड़ लिया गया है। समस्या की जड़ यही है कि घोड़ी पर चढ़ना सामंतवादियों ने अपना विशेषाधिकार मान लिया है।”

वहीं अमरोहा निवासी मनोज कुमार जाटव का कहना है, “दलित दूल्हे का घोड़ी पर बैठना सम्मान से अधिक समानता के अधिकार में निहित है, जो उसे संविधान ने दिया है। अगर यह सवर्णों के लिए मूंछ का सवाल है, तो मूंछ तो दलित के चेहरे पर भी उतनी ही उगती है।”

यह साफ है कि भारतीय समाज में विद्वेष और असमानता की जड़ें अब भी गहरी हैं। हालांकि ग़रीबी के आंकड़े बताते हैं कि कई क्षेत्रों में कुछ सवर्ण जातियां शैक्षणिक और आर्थिक दृष्टि से दलितों से भी पिछड़ी हैं। इसके बरअक्स, दलितों ने कठिन परिश्रम और संघर्ष, साथ ही संविधान प्रदत्त अधिकारों के कारण समाज में अपने लिए बेहतर स्थान हासिल किया है। यही सफलता सामंतवादी दंभ में डूबे लोगों के लिए असहजता का वजह बनती है। शायद इसी वजह से दलितों का मूंछ रखना या दूल्हे का घोड़ी पर चढ़ना उनके लिए असहनीय हो जाता है।

लेकिन इस तरह की घटनाओं को रोकना क़ानून‑व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों की ज़िम्मेदारी है। मगर समस्या यह भी है कि स्वयं पुलिस और न्यायपालिका में असमानता गहरे तक पैठी हुई है। पुलिस बलों पर सवर्णों का प्रभुत्व होने के कारण दलितों को अक्सर अपनी शिकायत दर्ज कराने तक में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इसमें शक नहीं है कि अगर ईमानदारी से शिकायत दर्ज हों और एससी-एसटी उत्पीड़न निरोधक क़ानून के तहत वक़्त रहते कार्रवाई हो जाए तो इस तरह की घटनाएं रोकी जा सकती हैं।

इसके अलावा ग्राम पंचायतों और स्थानीय समितियों को जोड़कर भी इस समस्या का हल निकाला जा सकता है। मगर यह सब होगा तभी जब सवर्ण समाज के लोगों में जागरुकता बढ़े और वो संविधान, सामाजिक बराबरी और मानवाधिकार जैसे शब्दों का मर्म समझकर कमज़ोरों को बराबरी देने के लिए राज़ी हों। फिलहाल तो ऐसा होता दिख नहीं रहा है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सैयद ज़ैग़म मुर्तज़ा

उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले में जन्मे सैयद ज़ैग़़म मुर्तज़ा ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से लोक प्रशासन और मॉस कम्यूनिकेशन में परास्नातक किया है। वे फिल्हाल दिल्ली में बतौर स्वतंत्र पत्रकार कार्य कर रहे हैं। उनके लेख विभिन्न समाचार पत्र, पत्रिका और न्यूज़ पोर्टलों पर प्रकाशित होते रहे हैं।

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