कई बार हम अधिकारों की लड़ाई में अपना कर्तव्य पीछे छोड़ देते हैं। एक अध्यापक का मूल कर्तव्य पढ़ाना है। डॉ. हरप्रीत सिंह इस बात से भलीभांति वाकिफ़ हैं तभी तो वे कुलपति दफ़्तर के बाहर अपने अधिकारों और जातीय उत्पीड़न के ख़िलाफ़ संघर्ष के साथ-साथ धरना स्थल पर ही ‘न्याय और हिस्सेदारी’ विषय पर कक्षाएं भी चला रहे हैं। प्रोफ़ेसर हरप्रीत का कहना है कि हम विरोध प्रदर्शन का सदुपयोग करना चाहते हैं, इसी उद्देश्य से हमने इस मुद्दे पर व्याख्यान आयोजित करने का विचार किया।
डॉ. हरप्रीत सिंह पंजाब यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत हैं। उनके साथ नौकरी ज्वाइन करने वाले उनके सवर्ण सहकर्मी आज विभागाध्यक्ष हैं, जबकि वे पिछले 18 सालों से उसी पे-ग्रेड पर काम कर रहे हैं। दलित समुदाय से आने वाले डॉ. हरप्रीत सिंह दो-दो प्रमोशन रोके जाने और जातीय उत्पीड़न पर कोई कार्रवाई न किए जाने के ख़िलाफ़ धरने पर बैठे हुए हैं। संस्थागत यातना की अपनी कहानी अपनी ज़ुबानी दूरभाष पर वे कुछ यूं बताते हैं–
“मैं पंजाब यूनिवर्सिटी में साल 2008 से काम कर रहा हूं। मेरा मूल चयन दिल्ली यूनिवर्सिटी में हुआ था। साल 2007-08 में मैंने ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में पढ़ाया है। यहां पंजाब यूनिवर्सिटी में मेरा चयन मेरिट के आधार पर ओपेन पोस्ट के अगेंस्ट हुआ था। यह आरक्षित पोस्ट नहीं थी। साल 2008 में पंजाब यूनिवर्सिटी में कुल तीन लोगों का चयन हुआ था। एक अमृता शेरगिल, दूसरी स्मिता शर्मा और तीसरा मैं। मैं मास्टर डिग्री के साथ आया था, जबकि डॉ. अमृता शेरगिल डॉक्टरेट डिग्री और डॉ. स्मिता शर्मा एमफिल डिग्रीधारी थीं। यूजीसी की गाइडलाइन है कि यदि आप करियर एडवांसमेंट स्कीम (सीएएस) के तहत प्रमोशन के लिए जाते हैं तो आपकी शैक्षणिक योग्यता के मुताबिक क्राइटेरिया अलग-अलग होती हैं। यदि आपके पास पीएचडी डिग्री है तो चार साल बाद ही प्रमोशन के योग्य हो जाते हैं। यदि एमफिल डिग्री हो तो पांच साल में और एमए की डिग्री रहने पर छह साल बाद सीएएएस प्रमोशन के योग्य होते हैं।
दिल्ली यूनिवर्सिटी की मेरी सर्विस को जोड़ करके मेरी सर्विस के छह साल 2013 में पूरे हो जाते हैं। डॉ. स्मिता के सर्विस के जो पांच साल हैं, वह भी 2013 में पूरे होते हैं। चूंकि मैं जुलाई 2007 से सर्विस में था तो मेरी छह साल की सेवा जुलाई 2013 में पूरी होती है। जबकि डॉ. स्मिता ने पंजाब यूनिवर्सिटी नवंबर, 2008 में ज्वाइन किया था तो उनके पांच साल नवंबर, 2013 में पूरे होते हैं। तो इस तरह ज्वाइनिंग के आधार पर वे मुझसे जूनियर साबित होती हैं। दिक्कत यहीं पर हुई कि मैं उम्र में उनसे 6-7 साल छोटा था। तो मूल विवाद यहीं से शुरू हुआ।
मैंने सीएएस प्रमोशन के लिए साल 2013 में आवेदन किया। उसकी प्रोसेसिंग 2015 में हुई। 2013 में यूजीसी नई रेगुलेशन लेकर आई थी जिसमें सीएएस के तहत शिक्षकों की पदोन्नति के लिए अकादमिक प्रदर्शन संकेतक (एपीआई) स्कोर अनिवार्य कर दिया गया। जबकि यूनिवर्सिटी ने मुझे 2015 में जो प्रमोशन ऑर्डर किये, वे बिना एपीआई के थे। लेकिन 2024 तक मुझे यूनिवर्सिटी की तरफ़ से कोई ऑर्डर रिसीव नहीं हुआ। इसी बीच मैंने 2013 में पीएचडी की पढ़ाई के लिए स्टडी-लीव का अप्लीकेशन दिया, जिसे यूनिवर्सिटी ने दो साल बाद 2015 में स्वीकार किया और दो साल की स्टडी लीव दे दिया।
मेरे सीएएस के तहत प्रमोशन के जो प्रमोशन ऑर्डर आए थे, उनकी कभी भी मेरी सर्विस बुक में इंट्री नहीं की गई। इसका मतलब हुआ कि मेरा ग्रेड-पे, मेरा वेतन कभी रिवाइज़ नहीं किया गया। स्टडी-लीव के बाद जब 2017 में मैंने फिर से यूनिवर्सिटी ज्वाइन किया तब मैंने पूछा कि मेरे प्रमोशन ऑर्डर चढ़े क्यों नहीं हैं मेरी सर्विस बुक में तो मुझे ऑफिस से कोई जवाब नहीं मिला। मैंने उनसे पूछा कि यदि आपको मेरे 2015 के सीएएस प्रमोशन से जुड़ा कोई संवाद (कम्युनिकेशन) रिसीव हुआ हो तो दीजिए। उन्होंने कहा कि नहीं मिला। फिर मैं इस्टैबलिशमेंट ब्रांच, एकाउंट ब्रांच गया और मैंने पूछा कि ऐसा कैसे है कि मेरा ग्रेड पे ऑर्डर रिवाइज नहीं किया गया है। लेकिन वे कभी इस पर तो कभी उस पर टालते रहे। मुझे कभी स्पष्ट जवाब नहीं मिला।
इसके बाद साल 2023 में यूनिवर्सिटी ने सातवां वेतन आयोग लागू किया, और सैलरी और ग्रेड रिवाइज हुईं। तो अर्थशास्त्र की तत्कालीन विभागाध्यक्ष अमृता शेरगिल जी ने नोटिस किया और बताया कि आपका तो ग्रेड-पे संशोधित ही नहीं किया गया है। उन्होंने उपयुक्त कार्रवाई करते हुए ग्रेड पे संशोधन को मेरे सर्विस बुक में डाला और आगे की प्रक्रिया के लिए एकाउंट ब्रांच को भेज दिया।
फिर मुझे पता चला कि यूजीसी के 2018 के नए रेगुलेशन में सीएएस प्रमोशन से जुड़े क्लॉज 6.3 में कुछ भ्रम है। वर्ष 2023 में यूजीसी ने जैसे ही स्पष्टीकरण जारी किया मैंने अविलंब आवेदन किया। मैंने सीएएस प्रमोशन का सितंबर, 2023 में आवेदन डाला, तो स्मिता शर्मा और नितिन अरोड़ा ने एसोसिएट प्रोफ़ेसर पद के प्रमोशन के लिए आवेदन किया। विभागाध्यक्ष ने मुझे कहा कि आपके आवेदन के संदर्भ में 3 अक्टूबर, 2023 को मीटिंग रखी गई है आप मीटिंग में आइए। उन्होंने उन दोनों को प्रमोशन दे दिया और मेरा प्रमोशन नकारते हुए मुझे मिसगाइड किया। मीटिंग में प्री-स्क्रीनिंग समिति ने कहा कि पहले आपका आवेदन इस्टैबलिसमेंट ब्रांच जाएगी, फिर वहां से होकर प्री स्क्रीनिंग कमेटी के पास जाएगी। जबकि मानक प्रक्रिया यह है कि सीएएस प्रमोशन का आवेदन विभागीय दफ़्तर में जमा किया जाता है। विभाग ही प्री-स्क्रीनिंग कमेटी आयोजित करती है। फिर प्री-स्क्रीनिंग के बाद फाइनल अप्लीकेशन इस्टैबलिशमेंट ब्रांच भेजा जाता है ज़रूरी ऑर्डर के लिए।
जबकि मेरे केस में ऐसा नहीं हुआ। मेरा फॉर्म प्री-स्क्रीनिंग समिति ने इस्टैबलिसमेंट ब्रांच के पास भेज दिया गया, फिर वहां से वापस विभाग में प्री-स्क्रीनिंग के लिए भेज दिया गया। कहा गया कि पहले विभाग प्री-स्क्रीनिंग आयोजित करे फिर फॉर्म को इस्टैबलिशमेंट ब्रांच भेजा जाए। जबकि 3 अक्टूबर, 2023 को प्री-स्क्रीनिंग के बाद डॉ. स्मिता शर्मा को ग़लत सीएएस प्रमोशन दे दिया गया। यूजीसी रेगुलेशन 2008 के तहत शोधपत्र प्रकाशन के मानदंड के आधार पर वह इसके लिए क्वालीफाई नहीं हो रही थीं। प्री-स्क्रीनिंग कमेटी ने भी पाया था कि उनके शोधपत्र मान्यता प्राप्त ज़र्नल में प्रकाशित नहीं हुए थे। समिति ने उनसे जर्नल में प्रकाशित शोधपत्र दिखाने को कहा, लेकिन वे नहीं दिखा सकीं। यूजीसी रेगुलेशन को धता बताते हुए स्मिता शर्मा को जातीय आधार पर आगे बढ़ाया गया।

अप्रैल-मई 2023 में विभागीय बैठक के दौरान डॉ. स्मिता शर्मा ने मुझ पर जातिवादी टिप्पणी की। मैंने इस बारे में विभागाध्यक्ष को सूचित किया। हद तो तब हो गई जब डॉ. स्मिता शर्मा को फरवरी, 2024 में विभागाध्यक्ष बना दिया गया। इसके बाद उन्होंने मुझे और डॉ. मीनू जो कि दलित समुदाय से आती हैं, को टारगेट करना शुरू कर दिया। उनका जातिवादी टिप्पणी करना आम होता गया। हमने जातिवादी टिप्पणी पर कड़ा ऐतराज़ जताते हुए फिर से संबंधित अथॉरिटी को रिपोर्ट किया और इसका दस्वेजीकरण किया। मैंने जातीय उत्पीड़न की 4-5 शिक़ायतें की, लेकिन डॉ. स्मिता शर्मा के ख़िलाफ़ कार्रवाई तो दूर विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनका संज्ञान तक नहीं लिया।
डॉ. स्मिता शर्मा फिलहाल अर्थशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्ष हैं। प्री-स्क्रीनिंग कमेटी आयोजित करना उनके ही अधिकार क्षेत्र में आता है। प्री-स्क्रीनिंग कमेटी के सारे सदस्य वर्चस्ववादी जातियों के लोग होते हैं, जो उनकी बात मानने वाले लोग होते हैं। इस तरह वे मेरा सीएएस प्रमोशन रोक रही हैं। प्री-स्क्रीनिंग कमेटी के दौरान मुझे अपमानित करते हुए उनके द्वारा कहा गया कि– “तुम बहुत छोटी चीज़ हो।”
वहीं यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार याजविंदर पाल वर्मा और कुलपति रेणु विग दलितों के प्रति जातीय पूर्वाग्रह रखते हैं। जब मैंने जातीय उत्पीड़न की शिक़ायत यूनिवर्सिटी के एससी/एसटी सेल से की तो उसके समन्वयक-सह-संपर्क अधिकारी डॉ. जगतार सिंह पर दबाव बनाकर इन्होंने एक मनमानी रिपोर्ट बनवाई कि यह जातीय उत्पीड़न का नहीं, बल्कि प्रमोशन का मामला है और स्मिता शर्मा को क्लीनचीट दे दिया।
विभागाध्यक्ष स्मिता शर्मा ने धमकाते हुए कहा कि यदि अब मेरे ख़िलाफ़ जातीय उत्पीड़न की शिक़ायत करोगे तो मेरे पास जेंडर कार्ड है। मैं तुम्हारे खिलाफ़ सेक्सुअल हैरसमेंट का केस फाइल करूंगी। एक खुली बैठक में उन्होंने कहा कि यदि मैं तुम्हारी जाति की होती तो फिर तुम देखते कि मैं तुम्हारा क्या हाल करती।
विभागाध्यक्ष स्मिता शर्मा और विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष
विभागाध्यक्ष डॉ. स्मिता शर्मा ने दूरभाष पर बातचीत में कहा कि “हमारे यहां अलग से बात करने या प्रतिक्रिया देने की परंपरा नहीं है। प्रशासन ने जो बयान ज़ारी किया है, वही मेरा पक्ष है।” पंजाब विश्वविद्यालय के पब्लिक रिलेशन के डायरेक्टर डॉ. विनीत पुनिया द्वारा इस मामले में प्रतिक्रिया के तौर पर एक बिंदुवार विस्तृत नोट ज़ारी किया गया है–
- डॉ. हरप्रीत की शिकायत उनकी पदोन्नति के चरणों से संबंधित वेतन वृद्धि से जुड़ी थी। उनकी वेतन वृद्धि से संबंधित सभी मामले विश्वविद्यालय स्तर पर सुलझा लिए गए हैं। शेष मामले लेखापरीक्षा शाखा के स्तर पर पुष्टि के अधीन थे, जो चंडीगढ़ प्रशासन के सीधे पर्यवेक्षण में कार्य करती है।
- स्पष्टता के लिए, मामले का विवरण इस प्रकार है–
डॉ. हरप्रीत ने सर्वप्रथम 2010 की यूजीसी अधिसूचना के तहत आवेदन किया था। जून, 2013 में, यूजीसी ने संशोधित दिशानिर्देश जारी किए और पूर्व में दी गई छूट वापस ले ली गई। सभी उम्मीदवारों को निर्धारित सीमा के अनुसार 2013 की अधिसूचना के तहत आवेदन करना आवश्यक था। उन्होंने लगभग 80 अन्य मामलों की तरह उस चरण में पुनः आवेदन नहीं किया। परिणामस्वरूप, लेखापरीक्षा द्वारा उनके वेतन निर्धारण को मंजूरी नहीं दी गई।
उनकी दूसरी पदोन्नति 2018 में देय थी। हालांकि, उन्होंने 2023 में आवेदन किया। उस समय, लेखापरीक्षा ने पाया कि प्रथम चरण का वेतन निर्धारण (₹6,000-7,000) अधूरा था। उन्हें 2013 के दिशानिर्देशों के तहत नए सिरे से आवेदन करने की सलाह दी गई थी। चूंकि निर्धारित समय सीमा के भीतर पात्रता की शर्तें पूरी तरह से पूरी नहीं हुईं, इसलिए मामले में आगे की कार्यवाही की आवश्यकता थी।
उन्होंने 2025 के अंत में पुनः आवेदन किया। उनके पुनः आवेदन के बाद, सीएएस मामले की कार्यवाही शुरू हुई और फाइल को चरण 1 से चरण 2 और चरण 2 से चरण 3 के लिए मंज़ूरी दे दी गई। मामला सुलझ गया है।
- जाति आधारित भेदभाव के आरोप के संबंध में, विश्वविद्यालय की एससी/एसटी समिति ने शिक़ायत की जांच की और जाति आधारित भेदभाव का कोई सबूत नहीं पाया।
(संपादन : नवल/अनिल)
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