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स्मृतियां शेष : मुक्ति तिर्की के कारण झामुमो को मिला था ‘तीर-धनुष’

झामुमो की आज की पीढ़ी को इस बात का पता नहीं होगा कि यह मुक्ति तिर्की का कितना बड़ा योगदान था झामुमो को राजनीतिक दल के रूप में मान्यता दिलाने में। लेकिन इससे इस बात की महत्ता कम नहीं हो जाती। मुक्ति विनम्र थे, दलित-आदिवासी समाज के प्रति समर्पित थे और उन्होंने जीवन भर अपने प्रतिबद्धताओं के प्रति समर्पित रहे। स्मरण कर रहे हैं विनोद कुमार

मुक्ति प्रकाश तिर्की नहीं रहे। उनका जन्म 18 अक्टूबर, 1953 को झारखंड के गुमला जिले में हुआ था। बीते 5 फरवरी, 2026 को वे दिवंगत हो गए। कैसे हुई उनकी मृत्यु, यह नहीं जानता। लेकिन खबर सुन कर अचंभित हुआ, क्योंकि वे हाल तक सोशल मीडिया पर सक्रिय थे। उनसे 20-25 वर्ष पहले रांची में ही कचहरी के आसपास मुलाकात हुई थी पहली बार। उन दिनों वे ‘दलित आदिवासी दुनिया’ को प्रिंट रूप में प्रकाशित करते थे। उस दिन बीच सड़क पर हमने एक-दूसरे को कैसे पहचाना, यह याद नहीं। लेकिन हमें जोड़ने वाली कड़ी थे गुरुजी, यानि शिबु सोरेन। हम दोनों उनके करीबी थे।

अपना पहला उपन्यास ‘समर शेष है’ प्रकाशित होने के कुछ वर्षों बाद मैं दिल्ली गया था, तो उनसे मिलने उनके आवास पर गया था। वे मेरे उपन्यास के बड़े प्रशंसक थे और उन्होंने बताया था कि मेरा उपन्यास उन्हें गुरुजी ने ही पढ़ने के लिए दिया था।

उस मुलाकात के बाद दुबारा उनसे मिलने का अवसर नहीं मिला, लेकिन फेसबुक पर हर दो-चार दिन पर उनसे मुलाकात होती रहती थी। वे मुझे ‘साहब’ कहते थे और इस पर मेरा उनसे कई बार विवाद भी हुआ कि आप मुझे साहब क्यों कहते हैं। लेकिन यह उनका अंदाज-ए-बयां था। गुरुजी निधन के पहले जब अस्पताल गए थे, तो मैंने तिर्की जी से संपर्क साधा। जब उनसे बात न हो सकी तो उन्हें मैसेज किया कि मैं उनसे बात करना चाहता हूं, काॅल लग नहीं रहा है। उन्होंने जवाब दिया– “जोहार, अहा! बिनोद साहब मुझसे बात करेंगे? कितनी खुशी और गर्व का विषय है।” इसके नीचे उन्होंने अपना नया मोबाईल नंबर दिया था– 8810303362। इसके जरिए उनसे लंबी बात हुई थी।

वे ‘दलित आदिवासी दुनिया’ पत्रिका के प्रबंध संपादक तो थे ही, बंधुआ मुक्ति मोर्चा के संयोजक भी थे। मेरी दिली इच्छा थी कि उनके साथ बंगाल के चाय बगानों के मजदूरों के गांवों का भ्रमण करूं, लेकिन यह संभव नहीं हो पाया और वे अपना किरदार निभा कर दुनिया से खामोशी से रुखसत हो गए।

मुक्ति जी की झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के निर्माण में बेहद महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। झामुमो को राजनीतिक दल के रूप में मान्यता दिलाने और उसे तीर-धनुष का सिंबल दिलाने में उनके योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। वे गुरुजी के ऐसे समर्थकों में से थे जिन्होंने प्रतिदान में, उनसे मेरी जानकारी में कभी कुछ नहीं मांगा। हो सकता है कि ‘दलित आदिवासी दुनिया’ पत्रिका निकालने में उन्होंने गुरुजी से थोड़ी बहुत मदद ली हो।

खैर, आपको वह प्रसंग सुनाता हूं कि कैसे उन्होंने झामुमो के लिए ‘तीर-धनुष’ का सिंबल प्राप्त किया था। यह उन दिनों की कहानी है जब टुंडी में चुनावी जंग हारने के बाद गुरुजी ने संथाल परगना का रुख किया। दरअसल उस चुनाव में हुआ यह था कि शिबू सोरेन तो खड़े हुए ही, कामरेड ए.के. राय ने शक्तिनाथ महतो को एमसीसी के टिकट पर खड़ा कर दिया उसी सीट से। और नतीजा यह हुआ कि दोनों चुनाव हार गए और कोयलांचल में पहली बार भाजपा का पूर्ववर्ती जनसंघ केे प्रत्याशी सत्यनारायण दुधानी चुनाव जीत गए। इस हार से बेहद टूटे मन के साथ शिबू सोरेन ने संथाल परगना का रुख किया, जो संथाल बहुल क्षेत्र था। वहां उन्हें साइमन मरांडी, स्टीफन मरांडी, हेमलाल मुर्मू सहित अनेक संगी-साथी मिले। उनका टुंडी आना-जाना तो रहा, लेकिन कार्यक्षेत्र संथाल परगना बनता गया। इंदिरा गांधी ने जब देश में इमरजेंसी लगाई थीं और हटाने के बाद चुनाव कराने का मन बनाया तो वे चाहती थीं कि आदिवासी इलाके में उनके साथ शिबू सोरेन आ जाएं, जिनकी ख्याति उस वक्त तक धनकटनी आंदोलन की वजह से पूरे देश में फैल चुकी थी।

मुक्ति प्रकाश तिर्की (18 अक्टूबर, 1953-5 फरवरी, 2026)

कहा जाता है कि के.बी. सक्सेना को धनबाद का उपविकास आयुक्त (डीसी) बना कर इस कार्य विशेष के लिए भेजा गया था कि वे गुरुजी को बागी जीवन छोड़ संसदीय राजनीति में आने के लिए राजी करें। के.बी. सक्सेना गुरुजी से मिलने टुंडी गए। पोखड़िया आश्रम देखा, रात्रि पाठशालाएं देखी और उन्होंने शिबू सोरेन को गुरुजी कहना शुरु कर दिया।

खैर, उनकी सलाह पर गुरुजी ने इमरजेंसी के दौरान आत्मसर्पण किया, जेल गए और फिर निकल कर संसदीय राजनीति में प्रवेश किया। उनकी राह ए.के. राय से अलग हो चुकी थी। कांग्रेस नेता ज्ञानरंजन और सूरजमंडल जैसे नेताओं ने उन्हें समझाया कि कम्युनिस्टों की छाया में उनका विकास नहीं होगा। झामुमो के गठन के वक्त भी ए.के. राय से उनका मतभेद खुल कर सामने आ गया था। राय ने झामुमो के गठन में तो भूमिका निभाई थी, लेकिन वे यह नहीं चाहते थे कि झामुमो एक राजनीतिक दल का रूप ले। वे उसकी परिकल्पना जन संगठन के रूप में करते थे। राजनीतिक दल के रूप में वे अपनी पार्टी मार्क्सवादी समन्वय समिति को बनाए रखना चाहते थे। लेकिन गुरुजी और बिनोद बिहारी महतो झामुमो को एक राजनीतिक दल बनाना चाहते थे।

जब राहें अलग हो गईं तो गुरुजी ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में 1980 का संसदीय चुनाव दुमका से लड़ा और जीते। उसके बाद झामुमो को एक राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण कराने की कोशिश शुरु हुई और इस काम में उनकी सर्वाधिक मदद मुक्ति तिर्की ने की, जिन्हें आज हम ‘दलित आदिवासी दुनिया’ के संपादक के रूप में जानते हैं। यहां याद दिला दूं कि साथी मुक्ति तिर्की पर भी हम बीस अन्य समाजकर्मियों के साथ देशद्रोह का मुकदमा भाजपा सरकार ने किया था, जिसे हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री बनने के बाद वापस लिया। मुक्ति तिर्की जी को आरोपी केवल इस कारण बनाया गया था क्योंकि उन्होंने फेसबुक पर मेरे एक पोस्ट को लाइक किया था।

मुक्ति तिर्की अलीपुरद्वार से पांच बार सांसद रहे एक शीर्ष नेता पियूष तिर्की के पुत्र थे और जब गुरुजी सांसद बन कर दिल्ली गए तो वे वहीं रहते थे तथा इंडियन एयरलाइंस में नौकरी किया करते थे। वे गुरुजी को संसद भवन तक ले जाने का काम करते। अपना ज्यादा समय गुरुजी के साथ बिताते-बिताते उन्होंने एयरलाइंस की नौकरी भी छोड़ दी। जब पार्टी को रजिस्टर्ड कराने की बात हुई तो यह काम उन्हें ही सौंपा गया। इधर कामरेड ए.के. राय भी अपनी पार्टी का पंजीकरण कराना चाहते थे।

अब हुआ यह कि तिर्की अपने कुछ अन्य साथियों के साथ आनन-फानन इस काम में जुट गए। भाकपा सहित कई पार्टियों के दफ्तर गए। उनके संविधान का अध्ययन किया और झामुमो का संविधान रजिस्ट्रार आफिस में जमा कर दिया। उन्होंने ‘तीर धनुष’, जो तब तक बिहार में मुक्त सिंबल था, की मांग की। यही मांग कामरेड ए.के. राय की तरफ से भी की गई थी। लेकिन कामरेड राय को धनबाद जाकर पार्टी का संविधान बनाना आदि काम था, इसलिए उनका आवेदन विलंब से रजिस्ट्रार कार्यालय में जमा हो पाया और ‘तीर-धनुष’ गुरुजी की पार्टी को मिल गया। जयपाल सिंह मुंडा की पार्टी झारखंड पार्टी का सिंबल मुर्गा था।

वैसे, कामरेड राय उस चुनाव चिह्न से पहले लड़ चुके थे और वे अपना विरोध दर्ज कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वह आज का जमाना नहीं था। ‘लाल-हरा’ की मैत्री टूट जाने के बाद भी कामरेड ए.के. राय और शिबू सोरेन एक-दूसरे का आजीवन सम्मान करते रहे।

झामुमो की आज की पीढ़ी को इस बात का पता नहीं होगा कि यह मुक्ति तिर्की का कितना बड़ा योगदान था झामुमो को राजनीतिक दल के रूप में मान्यता दिलाने में। लेकिन इससे इस बात की महत्ता कम नहीं हो जाती। मुक्ति विनम्र थे, दलित-आदिवासी समाज के प्रति समर्पित थे और उन्होंने जीवन भर अपने प्रतिबद्धताओं के प्रति समर्पित रहे। उनके जैसे लोग कम ही होते हैं जो बिना कुछ प्रतिदान में चाहे अपने कर्तव्य पथ पर चलते रहते हैं और खामोशी से इस दुनिया को सूना कर चले जाते हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विनोद कुमार

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता विनोद कुमार का जुड़ाव ‘प्रभात खबर’ से रहा। बाद में वे रांची से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘देशज स्वर’ के संपादक रहे। पत्रकारिता के साथ उन्होंने कहानियों व उपन्यासों की रचना भी की है। ‘समर शेष है’ और ‘मिशन झारखंड’ उनके प्रकाशित उपन्यास हैं।

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