इतिहासकार एच.जी. वेल्स अपनी चर्चित किताब ‘विश्व इतिहास की रूपरेखा’ में मगध सम्राट असोक को इन शब्दों में चित्रित करते हैं– “सैकड़ों-हजारों सम्राटों से इतिहास अटा पड़ा है। इनके नामों के साथ-साथ बड़ी-बड़ी उपाधियां इतिहास की बहुत जगह घेरे हुए हैं, पर अशोक सूर्य की भांति अलग से चमक रहा है, सूर्य की भांति एकमात्र चमकता हुआ पिंड। वोल्गा से जापान तक आज भी अशोक नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। चीन, तिब्बत और यहां तक भारत भी जो उसके सिद्धांतों को तो छोड़ चुका है, लेकिन उसकी महानता की विरासत को सहेज कर रखे हुए हैं। आज की पीढ़ी, अशोक और उसकी विरासत को जानती है, उसका मूल्य समझती है और उसे संभाल कर रखे हुए है। पता नहीं इस पीढ़ी में कितने ने कांस्टेंटाइन[1] या चार्ल्स-मेगने[2] का नाम भी सुना होगा?”[3]
मानव जाति के इतिहास में और मानवता की उन्नति और विकास में भूमिका के संदर्भ में वेल्स सिकंदर महान, सीजर और नेपोलियन की तुलना असोक से करते हैं। वे कहते हैं कि हो सकता है कि ये तीनों अशोक से बड़े योद्धा और प्रशासक रहे हों, परंतु क्या बड़े योद्धा और प्रशासक होने के अर्थ हैं कि वे मानव जाति के इतिहास में असोक से बड़े इंसान थे या महान सम्राट थे? वेल्स इस सवाल का जवाब एक बुनियादी सवाल उठाते हुए देते हैं– “इन तीनों व्यक्तियों ने, जिन्होंने हमारे इतिहास के पन्नों को घेर रखा है, मानव जाति को क्या स्थायी देते है? सिकंदर ने क्या सृजन किया?”[4]
वेल्स लिखते हैं कि “ज्यों-ज्यों उसकी [सिकंदर की] शक्ति बढ़ी, त्यों-त्यों उसकी मदांधता और प्रचंडता का भी विस्तार हुआ। वह खूब शराब पीता था और निदर्यता पूर्वक लोगों की हत्या करता था। … सिकंदर के बारे में जो बात सही है, वैसा ही कुछ सीजर के बारे में भी। सचमुच में वह कैसा था? निरा लंपट और उच्छृंखल आदमी।…वह एक हल्के दर्जे का बूढ़ा अय्याश मनुष्य प्रतीत होता है, मनुष्यों का उच्च शासक नहीं।”[5]
इसी तरह नेपोलियन के बारे में वेल्स लिखते हैं– “पुरानी व्यवस्था खत्म हो चुकी थी या हो रही थी, अपरिचित नए बल, रूप और दिशा की तलाश में संसार में घूम रहे थे। अगर इस मनुष्य (नेपोलियन) में किंचित मात्र भी दृष्टि की गंभीरता और सृजनात्मक कल्पना की शक्ति होती, अगर उसमें थोड़ी-सी स्वार्थ रहित इच्छाशक्ति होती, तो वह मानव जाति के लिए ऐसा कुछ काम कर गया होता, जो उसे इतिहास का सूर्य बना देता …। नेपोलियन ने अपने देश को चाहे जितना फायदा पहुंचाया हो, किंतु जहां तक मानव-जाति के प्रति उसके आभारों का संबंध हैं, वे लगभग नगण्य हैं।”[6]
फिर वेल्स असोक के बारे में लिखते हैं– “जिन लाखों राजाओं के नामों से इतिहास के पृष्ठ भरे जा रहे हैं, उन राजराजेश्वरों और महाधिराजाओं के मध्य में असोक का नाम अकेले नक्षत्र के समान दैदीप्यान है।” वेल्स कहते हैं कि यदि विश्व इतिहास के किसी राजा या सम्राट से यदि असोक की तुलना करनी हो तो किसी एक से नहीं की जा सकती है। विश्व के कई महान सम्राटों के व्यक्तित्वों को एक साथ मिलाकर ही उनकी तुलना असोक से की जा सकती है। वह डॉ. कोपलस्अन के स्वर में स्वर मिलाकर कहते हैं कि “वह (असोक) न केवल बौद्ध धम्म का कौंस्टेटाइन था, वरन् ग्रीस के स्थान पर बौद्ध धर्म से आविष्ट सिकंदर भी था। वह एक ऐसा निस्वार्थ नेपोलियन था, जो यश के स्थान पर कल्याण (मेतलाम) से प्रेरित था।”[7]
जवाहरलाल नेहरू अपनी चर्चित किताब ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में असोक को एक अद्भुत शासक के रूप में याद करते हुए लिखते हैं– “इस अद्भुत शासक (असोक) ने, जिसे अब तक हिंदुस्तान में और एशिया के दूसरे हिस्सों में प्रेम के साथ याद किया जाता है, बुद्ध के सत्कर्म और सद्भाव की शिक्षा फैलाने में और जनता के हित में काम करने में अपने को पूरी तरह लगा दिया। वह घटनाओं को हाथ-पर-हाथ रखकर देखनेवाला और ध्यान में डूबा हुआ और अपनी उन्नति की चिंता में खोया हुआ आदमी न था। वह राज-कार्य में मेहनत करने वाला था। उसने यह ऐलान कर दिया था कि मैं सदा के लिए तैयार हूं, सब वक्तों में सब तरह, चाहे मैं खाना खाता होऊं, चाहे रनिवास में होऊं, चाहे शयन में, या स्नान में, सवारी पर रहूं या महल बाग में, सरकारी कर्मचारी, जनता के कार्यों के बारे में मुझे बराबर सूचना देते रहें।… जिस समय भी हो, जहां भी हो, मैं लोकहित में काम करूंगा।”[8]
नेहरू असोक की धार्मिक-पंथिक सहिष्णुता और सभी धर्मों के प्रति आदर के भाव-नीति की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं कि उसने ऐलान कर दिया था कि, “सभी मत किसी-न-किसी वजह से आदर पाने के अधिकारी हैं। इस तरह का व्यवहार करने से आदमी अपने मत की प्रतिष्ठा को बढ़ाता है, साथ ही दूसरे मतों और लोगों की सेवा करता है।”[9] दुनिया में बौद्ध धम्म के प्रचार-फैलाव में असोक की भूमिका को रेखांकित करते हुए नेहरू लिखते हैं कि “उसके दूत और एलची सीरिया, मिस्र, मैसिडोनिया, साइरीन और एपाइरस तक बुद्ध के संदेश और उसकी शुभकामनाओं को लेकर पहुंचे। वे मध्य एशिया भी गए और बरमा-सियाम भी, और उसने खुद अपने बेटे और बेटी – महेंद्र और संघमित्रा – को, दक्खिन में लंका भेजा। सभी जगह दिमाग और दिल को फेरने की कोशिश की, जब्र या ज़ोर नहीं इस्तेमाल किया।…बौद्ध धर्म हिंदुस्तान में काश्मीर से लेकर लंका तक बड़ी तेजी से फैला। यह नेपाल में भी पैठा और बाद में तिब्बत और चीन और मंगोलिया तक पहुंचा।”

नेहरू असोक के भवन निर्माता रूप और अन्य रूपों को जोर देकर याद करते हैं। अकारण नहीं है कि आजाद भारत के केंद्रीय प्रतीक चिह्नों में असोक से जुड़े प्रतीकों की केंद्रीय भूमिका है। भारत का राष्ट्रीय चिह्न सारनाथ के असोक स्तंभ शीर्ष से लिया गया है। इसमें चार सिंह (शेर) हैं, जो चारों दिशाओं की ओर मुख किए हुए हैं (चित्र में तीन दिखाई देते हैं)। इसके नीचे धम्मचक्र, बैल, घोड़ा, हाथी और सिंह की आकृतियां बनी हैं। नीचे लिखा है– ‘सत्यमेव जयते’। यानी सत्य की ही विजय होती है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज के बीच में बना नीला चक्र ही असोक चक्र है। इसमें 24 तीलियां होती हैं। यह धर्म, न्याय और निरंतर गतिशीलता का प्रतीक है। इसे भी सारनाथ के असोक स्तंभ के धम्मचक्र से लिया गया है। इन चिह्नों के भारत के रुपए, भारतीय राज्य के मुहरों और अन्य जगहों पर देख सकते हैं। यह सब संविधान सभा में सम्राट असोक के मुरीद नेहरू और बुद्ध को अपना मार्गदर्शक मानने वाले आंबेडकर की उपस्थिति के चलते ही संभव हुआ।
भारतीय राष्ट्र के राष्ट्रीय प्रतीक चिह्नों और रोजमर्रा की जिंदगी में सम्राट असोक की उपस्थिति किस रूप में है, इसकी चर्चा करते हुए लेखक-इतिहासकार सुनील खिलनानी लिखते हैं कि “हर बार जब कोई भारतीय व्यक्ति कोई पत्र भेजता है या अपने हाथों में नोट (रुपया) लेता है या कोई नौकरशाह किसी सरकारी दस्तावेज पर मुंहर लगाता है, तो वह करीब 2000 वर्ष पहले के चिह्न का इस्तेमाल करता है, तो उसमें चार पत्थर स्तंभों से बने चार सिंह होते हैं, जो चारों दिशाओं में देख रहे हैं। जिस व्यक्ति ने इस भव्य और चिरस्थायी आइकन का सृजन किया है, वह भारत के इतिहास का एक बहुत महान और अचंभे में डालने वाला व्यक्तित्व है। यह ईसापूर्व तीसरी शताब्दी का राजा (असोक) है। सब चीजों से बड़ी एक चीज जो इसके विचारों के केंद्र में रही है, वह यह है कि एक शासक को अपने शासन के मातहत लोगों के बीच की विविधता को स्वीकार करना चाहिए। यह राजा भुला दिया गया था, लेकिन आधुनिक भारतीय राज्य को प्रेरणा देने वापस आ गया। जिसे हम आज अशोक के नाम से जानते हैं।… वह बहुत ही भाग्यशाली था, उसे जीवन-भर देवनामपियंम के रूप जाना गया।… दुनिया के अलग-अलग देशों में उसने अपने विचारों को फैलाया। हिंसक तरीके से नहीं, बल्कि अपनी नैतिक बल और समझा-बुझाकर।”[10]
इतिहासकार विलियम डैलरिम्पल असोक की अद्वितीयता के बारे में लिखते हैं कि “अशोक के अनोखे स्तंभ बताते हैं कि अशोक कितना अद्वितीय था। वह इतिहास का पहला राजा था, जिसने खुद को बलशाली और ताकतवर के रूप में प्रस्तुत करने की जगह अपने को प्रबुद्ध, मानवीय और सद्चरित्र दार्शनिक के रूप में प्रस्तुत किया।… उसने कहा कि वह लोगों के लिए किसी भी समय, कहीं भी उपलब्ध है। … वह एक दुर्लभ किस्म का शासक था, यहां तक कि आज भी कोई उस जैसा शक्तिशाली हो और वह कहे, ‘मैं अपनी गलतियों के लिए क्षमा चाहता हूं।’”[11]
विलियम डैलरिम्पल कलिंग युद्ध में इतने सारे लोगों के मारे जाने एवं घायल होने के बाद असोक के पछतावे, दुख और युद्ध से विरत होने की निर्णय जैसा कोई उदाहरण इतिहास और वर्तमान में नहीं पाते हैं। वे लिखते हैं कि दुनिया के इतिहास में विजयी राजा अपने विजय का बखान करते हैं। अपने साम्राज्य विस्तार का ब्यौरा देते हैं। अपनी शक्ति का बयान करते हैं। अपनी शक्ति और धन का गुणगान करते हैं। डैलरिम्पल लिखते हैं कि, “वह (अशोक) अपने विस्तृत साम्राज्य का कोई जिक्र नहीं करता है, न ही अपने धन-संपदा और शक्ति का बखान करता है। इसकी जगह वह निहायत ही एक इंसान के रूप में अपनी बात रखता है। वह स्वयं को एक उदार और लोगों को प्यार करने वाले शासक के रूप में प्रस्तुत करता है।”[12] वे आगे लिखते हैं कि “अपने समकालीनों में अशोक के विचार आश्चर्यजनक तरीके से मौलिक, यहां तक कि क्रांतिकारी हैं। निश्चित तौर उसने बौद्ध धम्म की नियति को उसी पैमाने पर तीव्र गति से बदल दिया, जिस तरह से सम्राट कौंस्टेनटाइन के क्रिश्चियन धर्म स्वीकार करने से इस धर्म का प्रभाव और विस्तार बहुत तेजी से बढ़ा था।”[13]
इरफान हबीब और विवेकानंद झा इस बात से चकित हैं कि असोक ने जीवन-जगत के जिस क्षेत्र में हाथ लगाया, उसे अद्वितीय रूप दे दिया। वे लिखते है कि “ऐसा लगता है कि अशोक द्वारा छुआ गया हरेक क्षेत्र हमें चकित करने में सक्षम हैं।”[14]
असोक के साम्राज्य की विस्तार की चर्चा करते हुए इरफान हबीब व विवेकानंद झा लिखते हैं कि चंद्रगुप्त मौर्य और उसके वारिस बिंदुसार का साम्राज्य भी बहुत व्यापक था, लेकिन इसका पुख्ता प्रमाण नहीं मिलता है। असोक का साम्राज्य का विस्तार कहां से कहां तक था, इसके ठोस प्रमाण असोक के स्तंभों-शिलालेखों और अन्य स्रोतों से मिलते हैं। इस संदर्भ में वे लिखते हैं कि “अब तक मौर्य साम्राज्य द्वारा सीमा विस्तार को अशोक के शिलालेखों के भौगोलिक संदर्भों और उसके मूल स्थानों के आधार पर संतोषजनक ढंग से परिभाषित किया जा सकता है। शिलालेख II और XIII से स्पष्ट होता है कि साम्राज्य की उत्तर-पश्चिमी सीमा सेल्यूकस के साम्राज्य से सटी थी, क्योंकि शिलालेख में एंटिओकस (प्रथम या द्वितीय) को अशोक का निकटतम पड़ोसी बताया गया है। अशोक के कंधार और लाघमॉ (अफगानिस्तान) और शाहबाजगढ़ी व मानसेहरा (उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान) के शिलालेखों से साबित होता है कि मौर्य साम्राज्य अफगानिस्तान के काफी अंदरूनी इलाकों तक फैला था, और शिलालेख XIII (और शिलालेख V) में यवनों और कंबोजों के साम्राज्य के भीतर बताए जाने वाले संदर्भ की भी पुष्टि करते हैं। कश्मीर मौर्यों के अधीन था, यह तो निश्चित नहीं है, लेकिन कालसी (देहरादून, उत्तराखंड) के शिलालेख और नेपाल की तराई में रुक्मिनीदेई और निगाली सागर के स्तंभ लेखों से पता चलता है कि गंगा के मैदान में मौर्य साम्राज्य की सीमा हिमालय के पहाड़ियों तक सटी थी। बांग्लादेश के महास्थान में मिले एक सरकारी शिलालेख से यही लगता है कि बंगाल के अधिकांश हिस्से को भी साम्राज्य के अधीन किया जा चुका था। पश्चिम में अशोक का जूनागढ़ अभिलेख साबित करते हैं कि गुजरात भी मौर्यों अधीन आ चुका था। दक्कन प्रायद्वीप में अशोक के शिलालेख व्यापक तौर पर पाए गए हैं। मुंबई के पास सोपारा का शिलालेख साबित करता है कि कोंकण भी साम्राज्य का अंग बनाया जा चुका था। पूर्वी तट पर उड़ीसा के धौली और जौगढ़ के शिलालेख कलिंग को अधिग्रहित करने के अशोक के दावों की पुष्टि करते हैं। कर्नाटक के पठार और दक्षिण आंध्र में अशोक के अनेक शिलालेख मिले हैं। लेकिन तमिलनाडु और केरल में अभी तक कोई शिलालेख नहीं मिला है, जिससे शिलालेख II और XIII में अशोक द्वारा चोलों, पांडियनों, सातियपुतों और केरलपुतों के अलावा ताम्बपम्नी (श्रीलंका) को साम्राज्य की सीमा के बाहर बताए जाने की बात साबित होती है।”[15]
यदि सिंधु घाटी सभ्यता के पुरातात्विक स्रोतों को छोड़ दिया जाए, उसके सैकड़ों वर्षों बाद के भारत के इतिहास का पुरातात्विक प्रमाण असोक के अभिलेखों से ही मिलता है। इन अभिलेखों के महत्व को रेखांकित करते हुए इरफान हबीब लिखते हैं कि “अशोक हमारे लिए जो शिलालेख छोड़ गए हैं, वे अद्वितीय स्मारक हैं, और उनके महत्व के जितने कारण हैं, उनमें किसी को कम या ज्यादा कहना संभव नहीं है। आज की तारीख में, भारत में इनसे प्राचीन लेखन के स्वीकृत उदाहरण नहीं हैं, बशर्ते, सिंधु घाटी सभ्यता की न पढ़ी जा सकी चित्रलिपि को किनारे कर दें। अशोक के शिलालेख तीन बिलकुल अलग-अलग भाषाओं में, मसलन प्राकृत, इरानी-अरामी और ग्रीक में हैं, और ब्राह्मी, खरोष्ठी, अरामिक व ग्रीक लिपियों में लिखे हैं। अशोक कालीन ब्राह्मी उन तमाम लिपियों की पूर्ववर्ती है, जिसमें आज हिंदी व (द्रविड़ भाषाओं समेत) अधिकांश भारतीय भाषाएं लिखी जाती हैं।”[16] असोक साम्राज्य और शासन के बारे में जानने के प्राथमिक स्रोत उनके शिलालेख ही हैं। असोक के शासकीय वर्ष ही भारत में संवत् के इस्तेमाल का पहला उदाहरण है। भारत में ललित कला का इतिहास असोक द्वारा अपने स्मारकों व स्थापत्य के लिए पत्थर का इस्तेमाल किए जाने के साथ शुरू होता है। भवन निर्माण में उसका कोई जोड़ नहीं दिखता। इन सब बातों को ध्यान में रखकर ही शायद इरफान हबीब और विवेकानंद झा लिखते हैं कि “ऐसा लगता है कि अशोक द्वारा छुआ गया हरेक क्षेत्र हमें चकित करने में सक्षम हैं।”
इतिहासकारों के निष्कर्षों के आधार पर हम कह सकते हैं कि–
- असोक पहले सम्राट थे, जिन्होंने आज से करीब दो हजार वर्ष पहले भारतीय उपमहाद्वीप को एक राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक ईकाई के रूप में एकीकृत और संगठित किया। वे ‘फाउंडिंग फादर ऑफ इंडियन नेशन’ हैं। असोक का राज्य आज के तमिलनाडु और केरल को छोड़कर आज के पूरे भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और पूर्वी अफगानिस्तान तक विस्तृत था। असोक के अभिलेख इसकी पुरातात्विक गवाही देते हैं। यह कोई मिथक या कपोल-कल्पना नहीं है, यह पुष्ट ऐतिहासिक तथ्य है।
- असोक पहले सम्राट थे, जिन्होंने भारत को लिखने की लिपि प्रदान किया, जिसे धम्म लिपि कहा जाता है। धम्म लिपि का ब्राह्मी लिपि कैसे नाम दिया गया, यह अलग कहानी है। असोक से पहले सिंधु घाटी की सभ्यता की भारत में एकमात्र लिपि मिली है, लेकिन वह अभी पढ़ी नहीं जा सकी है। धम्म लिपि के माध्यम से उन्होंने भारत को पहली बार एक लिखित भाषा प्रदान की, यह मुख्य रूप से पालि-प्राकृत भाषा है।
- असोक ने अपने शिलालेख तीन-चार लिपियों में लिखवाया। व्यापक तौर पर धम्म लिपि का इस्तेमाल हुआ। उनके अभिलेख प्राकृत, इरानी-अरामी और ग्रीक में हैं, और ब्राह्मी, खरोष्ठी, अरामिक व ग्रीक लिपियों में लिखे हैं। अशोक कालीन ब्राह्मी उन तमाम लिपियों की पूर्ववर्ती है, जिसमें आज हिंदी व (द्रविड़ भाषाओं समेत) अधिकांश भारतीय भाषाएं लिखी जाती हैं। (नोट– जो नए तथ्य समाने आए हैं, उनके आधार यह कहा जा रहा है, असोक की धम्म लिपि से पहले तमिल भाषा की लिपि प्रचलन में आ गई थी, लेकिन अभी यह शोध प्राथमिक स्तर पर है।)
- असोक भारत में प्लेटो द्वारा अपनी कृति ‘रिपब्लिक’ में बताए गए ‘दार्शनिक राजा’ के अवधारणाके पहले मूर्त रूप थे। ऐसा राजा जिसके राज्य संचालन के केंद्र में सिर्फ और सिर्फ जनकल्याण है, व्यक्तिगत-पारिवारिक स्वार्थ और पद-प्रतिष्ठा नहीं। असोक भारत ही नहीं दुनिया में, जनकल्याणकारी राज्य के पहले संस्थापक हैं। उन्होंने जनकल्याण राज्य की सिर्फ बातें नहीं कि उसे जमीन पर उतार दिया। लोग, यहां तक कि प्राणीमात्र का हित, असोक के जीवन और राज्य संचालन का मुख्य सरोकार था।
- असोक के समय में ही करीब पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में एक प्रशासनिक व्यवस्था कायम हुई। केंद्रीय सत्ता के साथ क्षेत्रीय प्रशासनिक ईकाईयां निर्मित हुईं। भारतीय उपमहाद्वीप प्रशासनिक तौर पर एक हद तक एकीकृत और संगठित हुआ।
- पूरे उपमहाद्वीप में एक कर व्यवस्था बनी। इस कर व्यवस्था से होने वाली आय को जन कल्याण के व्यापक कामों के लिए असोक ने खर्च किया।
- असोक ने पालि-प्राकृत भाषा को पूरे उपमहाद्वीप के लिए इस्तेमाल किया। उनके अधिकांश शिलालेख और अन्य अभिलेख इसी भाषा में हैं। हालांकि उन्होंने अलग-अलग जगहों की अलग-अलग बोलियों को भी इसमें समाहित करने की कोशिश की है। आज की शब्दावली में कहें तो प्राकृत भाषा पूरे भारतीय उपहाद्वीप की भाषा बनी।
- असोक ने पूरे भारत उपमहाद्वीप (भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश) और अफगानिस्तान को एक सांस्कृतिक ईकाई के रूप में संगठित किया, जिसमें विविधता और भिन्नता को काफी जगह दी गई है।
- असोक भारत में धर्मनिपेक्षता के पहले संस्थापक हैं। उन्होंने अपने अभिलेखों-शिलालेखों में भारत की धार्मिक-सांप्रदायिक विविधता और बहुलता को स्वीकार करते हुए किसी धर्म-संप्रदाय की दूसरे धर्म-संप्रदाय के लोगों द्वारा निंदा घृणित कर्म कहा। खुद के धर्म या धम्म की असमय और गैर जरूरी प्रशंसा को भी अच्छी निगाह से नहीं देखा है। असोक सभी धर्मों और संप्रदायों की फलने-फूलने और आपस में संवाद करने का अवसर देने की हिमायत करते हैं।
- असोक ने भारत के सभी धर्मों-संप्रदायों को महत्ता देते हुए भी भारतीय उपमहाद्वीप को धम्म (बौद्ध धम्म) के आधार पर एक सांस्कृतिक-सामाजिक ईकाई के रूप में संगठित करने की कोशिश की, जिसमें उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली। उनके लिए बौद्ध धम्म एक बेहतर जीवन पद्धति, जीवन-मूल्य के साथ समाज और राज्य के संचालन का मार्ग दर्शक सिद्धांत था। असोक के समय में बौद्ध धम्म भारत और भारत के बाहर सबसे अधिक फला-फूला और विकसित हुआ।
- बुद्ध ने धम्म का बीज बोया था, जिस बीज को एक विशाल वृक्ष में असोक ने बदल दिया, जो सबको छाया दे, सबको फल-फूल प्रदान करे।
- असोक ने बौद्ध धम्म को मानव जाति के मार्ग दर्शक के रूप में पूरी दुनिया में पहुंचाने और फैलाने का काम अपने हाथ में लिया। इस काम में अन्य लोगों के साथ उन्होंने अपने बेटे-बेटी को भी लगाया। उन्होंने भारत और दुनिया को बुद्ध के धम्म का मार्ग दिया। यह जीवन-मूल्यों, सामाजिक मूल्यों और राज्य संचालन के मूल्यों का मार्ग था, जिसके केंद्र में बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय था।
धम्म को धर्म कहने-समझने की गलती न करें। ऐसा करते ही बुद्ध का सारा दर्शन, चिंतन और जीवन-मूल्य उलट जाता है। धम्म को धर्म कहते ही या समझते ही, इसकी सारी तार्किकता, वैज्ञानिकता और लौकिकता अपना अर्थ खो देती है। धम्म को देश-दुनिया के मार्ग-दर्शक सिंद्धांत के रूप में स्थापित करने की असोक की सारी कोशिशों पर पानी फिर जाता है। वे बौद्ध धम्म को एक जीवन-पद्धति और जीवन-मूल्य के रूप में, समाज और राज्य-व्यवस्था के संचालन के मार्ग-दर्शक सिद्धांत के रूप में दुनिया में फैलाना चाहते थे। इसमें उन्हें काफी सफलता भी मिली। बौद्ध धम्म भले ही बुद्ध की देन थी, लेकिन उसे देशव्यापी और विश्वव्यापी धम्म बनाने में सबसे बड़ी भूमिका असोक की थी।
- असोक मानव जाति के उन राजाओं-सम्राटों में शामिल हैं, जिनके राज्य का उद्देश्य जनकल्याण, अमन-चैन और लोगों की सुख-समृद्धि थी।
सच्चे अर्थों में भारत की नींव यदि किसी ने डाली उस व्यक्ति का नाम सम्राट असोक है। वे भारत (इंडिया) के फाउंडिंग फादर हैं। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर चार्ल्स एलेन ने अपनी किताब ‘अशोका, दी सर्च फॉर इंडियाज लॉस्ट इंपेरर’ में असोक को ‘इंडियाज फाउंडिंग फादर’ के रूप में चिह्नित किया है।
[1] रोमन साम्राज्य के सबसे प्रभावशाली सम्राटों में एक महत्वपूर्ण सम्राट थे, जिनका शासन काल लगभग 306 ईसवी से 337 ईसवी तक रहा।
[2] मध्यकालीन यूरोप के सबसे शक्तिशाली शासकों में से एक थे। इन्हें “Father of Europe” (यूरोप का जनक) भी कहा जाता है। (जन्म : लगभग 742 ईसवी, मृत्यु: 814 ईसवी)
[3] वेल्स, एच.जी., विश्व इतिहास की रूपरेखा, अनुवाद नवोदिता शर्मा, संवाद प्रकाशन, मेरठ, 2025, पृ. 392
[4] वही
[5] वही
[6] भंडारकर, डॉ. डी.आर., अशोक, सिद्धार्थ बुक्स, दिल्ली, 2023, पृ. 165-166
[7] भंडारकर, बुद्धिज्म, प्रिमिटिव एंड प्रजेंट, पृ. 166
[8] नेहरू, द डिस्कवरी ऑफ इंडिया, पेंगुइन रैंडम हाडस, किंडल संस्करण
[9] वही
[10] खिलनानी, सुनील, इनकैरनेशंश, इंडिया इन फिफ्टी लाइव्स, पेंगुइन रैंडम हारूस, यूके, 2016, पृ. 44
[11] द गोल्डेन रोड: हाउ एनशिएंट इंडिया ट्रांसफार्म्ड द वर्ल्ड, ब्लूम्सबरी पब्लिकेशन, लंदन, 2024, पृ. 37-38
[12] वही
[13] वही, पृ. 38
[14] इरफान हबीब-विवेकानंद झा, मौर्यकालीन भारत, अनुवाद विपिन शुक्ला, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2025, पृ. 184
[15] वही, पृ. 33-34
[16] वही, पृ. 66
(संपादन : नवल/अनिल)
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