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फुलेवाद के मूलभूत सिद्धांत एवं उनकी प्रस्तावनाएं (पहला भाग)

जमीनी संघर्ष के लिए फुलेवाद शुद्ध वर्गीय संगठन का मार्ग स्वीकार करता है। फुले के शिष्य भालेराव किसान संगठन खड़ा करते हैं और दूसरे फुले शिष्य लोखंडे कामगार संगठन का निर्माण करते हैं। जातीय प्रबोधन और वर्गीय संगठन इन दो अलग-अलग माध्यमों से ही जाति अंतक युद्ध लड़ा जा सकता है। यही है फुलेवाद का क्रांतिकारी सिद्धांत। पढ़ें, श्रावण देवरे के विस्तृत आलेख का पहला भाग

[दलितबहुजनों के लिए अप्रैल माह विशेष मायने रखता है। इस महीने की 11 तारीख को जोतीराव फुले और 14 तारीख को डॉ. आंबेडकर की जयंती पूरे देश में लोग धूमधाम से मनाते हैं। जोतीराव फुले का जन्म 11, अप्रैल 1827 को हुआ था और इस लिहाज से यह वर्ष उनके जन्म के दो सौवीं जयंती का आगाज है। फारवर्ड प्रेस इस अवसर पर प्रस्तुत कर रहा है जोतीराव फुले उनके विचारों पर आधारित आलेखों की शृंखला। आज पहली प्रस्तुति के रूप में पढ़ें महाराष्ट्र के सामाजिक न्याय के चिंतक सत्यशोधक प्रो. श्रावण देवरे के आलेख का पहला भाग]

हम किसी भी आंदोलन पर चर्चा करते हैं तो सर्वप्रथम उस आंदोलन को खड़ा करने वाले व्यक्ति का उल्लेख करते हैं, जिसके कारण उस विचारधारा को, आंदोलन को व्यक्तिगत नाम प्राप्त होता है। फुलेवाद, आंबेडकरवाद, मार्क्सवाद, गांधीवाद आदि नाम पर आंदोलन व विचारधाराएं पहचानी जाती हैं। उसके बाद उस आंदोलन का क्या और किस तरह का परिणाम सामने आता है या यह कि उसका लाभार्थी कौन और नुकसान भोगी कौन रहा, के अलावा सबसे महत्त्वपूर्ण आज के समय में उस आंदोलन की प्रासंगिकता आदि बातें आती हैं।

किसी भी विचारधारा को तत्वज्ञान का दर्जा प्राप्त करने के लिए जिन कसौटियों से पार पाना होता है उनमें से एक है उनका वैश्वीकरण। मानवीय समाज व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन घटित करके मनुष्य को प्रगति के अगले सोपान पर ले जाने में सहायक सिद्ध होने वाली विचारधारा को तत्वज्ञान के रूप में समझना चाहिए। इस आधार पर देखें तो पूंजीवादी लोकशाही का तत्वज्ञान भारतीय समाज पर लागू करनेवाला गांधीजी का विचार यह गांधीवाद के रूप में जाना जाता है। वर्ण और जाति-व्यवस्था के अंत का तर्कसंगत विचार, सिद्धांत प्रस्तुत करके  कुछ हद तक सफलता पानेवाला फुले का विचार फुलेवाद व आंबेडकर का विचार अंबेडकरवाद के रूप में जाना जाता है। इस लेख में हम फुलेवाद के मूल सिद्धांत क्या हैं और आज के संदर्भ में इनकी उपयोगिता क्या है इस पर विचार करेंगे।

फुलेवाद का मुख्य उद्देश्य है– वर्ण व जाति आधारित भेदभावकारी व्यवस्था को नष्ट करना और उसकी जगह समतावादी व लोकशाही क्रांति करना। उसके लिए उन्होंने कुछ मूलभूत सिद्धांत प्रस्तुत किया, उनका पहला मूलभूत सिद्धांत था–“बलि राजा के पतन के बाद भारतीय इतिहास ब्राह्मण व गैर-ब्राह्मण के बीच के संघर्ष का इतिहास है।”

जिस समय मार्क्स अपनी मार्क्सवादी तत्वज्ञान का पहला सिद्धांत प्रस्तुत कर रहे थे उसी समय तात्यासाहेब महात्मा जोतीराव फुले अपने फुलेवाद का पहला सिद्धांत प्रस्तुत कर रहे थे और उस पर अमल भी कर रहे थे।

मार्क्सवाद का पहला सिद्धांत है कि “प्राथमिक साम्यवादी समाज के पतन के बाद दुनिया का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।” इन दोनों सिद्धांतों में इतनी समानता है कि प्रथम दृष्टि से ऐसा लगता है कि इन दोनों महापुरुषों की मुलाकात हुई होगी और मिल-बैठकर आपस में चर्चा करके दोनों ने ये सिद्धांत तैयार किए होंगे। लेकिन यह सत्य नहीं है, क्योंकि मार्क्स व  फुले कभी एक-दूसरे से नहीं मिले और कभी एक-दूसरे का भाषण भी नहीं सुने, एक-दूसरे की पुस्तकें व लेख भी नहीं पढ़े और फिर भी इन दोनों महापुरुषों की विचार प्रक्रिया तंतोतंत जुड़ती है अर्थात मानव समाज का विकास अनेक स्तर व अनेकविध छटायुक्त होने के बावजूद उसकी दिशा सतत आगे बढ़ने वाली होने के कारण समकालीन विचारधाराओं में व तत्वज्ञान में समानता होना स्वाभाविक है।

मार्क्स के सामने वर्गीय समाज था, इसलिए वह अपने सिद्धांत में वर्गीय संकल्पना प्रस्तुत करते हैं और तात्यासाहेब के सामने वर्ण व जाति आधारित समाज था, इसलिए वे वर्ण एवं जातीय संकल्पना प्रस्तुत करते हैं। मार्क्स एवं फुले में जो अनेक साम्यताएं दिखती हैं, उनमें उनके द्वारा रखा गया ऐतिहासिक भौतिकवाद है। यह तत्वज्ञान का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। मार्क्स ने अपनी सैद्धांतिकी में प्राथमिक साम्यवादी समाज बताया है। यह समाज पूर्णतया वर्गविहीन समतावादी समाज था, ऐसा वह कहते है। उसी प्रकार तात्यासाहेब महात्मा जोतीराव फुले बलि का राज बताते हैं। यह बलि का राज्य जातिविहीन व स्त्री-पुरुष समतावादी समाज था, ऐसा हमें तात्यासाहब बताते हैं।

अनंत महादेवन द्वारा निर्देशित फिल्म ‘फुले’ का एक दृश्य

मार्क्स को अपना आदर्श मॉडल प्राथमिक साम्यवादी समाज लगता था, तो तात्यासाहब फुले को बलि का राज्य आदर्श मॉडल लगता था। मार्क्स अपना सिद्धांत सिद्ध करने के लिए स्वामी बनाम दास , जमींदार बनाम कुल व पूंजीपति बनाम कामगार ऐसे वर्गीय संघर्ष का उदाहरण देते हैं। तात्यासाहब के सामने वर्ण व जातीय समाज होने के कारण वे बलि राजा बनाम वामन, एकलव्य बनाम द्रोणाचार्य, शंबूक बनाम राम, कर्ण बनाम परशुराम जैसे अनेक वर्ण-जातीय संघर्ष के उदाहरण देते हैं। तात्यासाहेब फुले ने ‘गुलामगिरी’ ग्रंथ में दशावतारों की गई वैज्ञानिक समीक्षा वर्ण-जातीय ऐतिहासिक भौतिकवाद का हिस्सा है।

मार्क्स ने जिस तरह मूलभूत शोषण, शासन की व्यवस्था के रूप में वर्ग-व्यवस्था बताया उसी प्रकार तात्यासाहब ने मूलभूत शोषण, शासन की व्यवस्था के रूप में वर्ण व जाति-व्यवस्था को बताया। इन दोनों समाज व्यवस्थाओं के विरोध में लड़ेगा कौन? इसके बारे में भी तात्या साहेब फुले और मार्क्स में कमाल की साम्यता है।

शोषणकारी वर्ग-व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए वर्ग-व्यवस्था से सर्वाधिक पीड़ित अर्थात कामगार लड़ेगा, ऐसा मार्क्स कहते हैं। वहीं तात्यासाहब कहते हैं कि वर्ण व जाति-व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए  समाज के दो घटक शूद्रातिशूद्र और स्त्री लड़ेंगे। यह तात्यासाहेब ने अपने कृत्यों से से सिद्ध किया। तात्यासाहेब के क्रांति कार्यों की शुरुआत लड़कियों व अस्पृश्यों के लिए स्कूल खोलने से हुई। अपने गुरु के इस वर्ण-जाति विरोधी संघर्षों के सिद्धांत का विकास आगे चलकर उनके शिष्य बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर करते हैं। वे ‘राइटिंग्स एंड स्पीचेज’ के पांचवें खंड के पृष्ठ संख्या 112 पर एक चार्ट के माध्यम से वर्ण-जाति विरोधी युद्ध का सिद्धांत बताते हैं। इस विकसित सिद्धांत के अनुसार, वर्ण-जाति विरोधी युद्ध में एक पक्ष ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीन वर्णोसे निकली जातियां हैं। इस जाति युद्ध में दूसरे पक्ष का नेतृत्व अस्पृश्य करते हैं और ओबीसी इनके स्वाभाविक मित्र हैं, यह भी बाबासाहेब स्पष्ट करते हैं।

तात्यासाहब महात्मा जोतीराव फुले और मार्क्स के बीच धर्म का पोस्टमार्टम यह भी एक समान धागा है। धर्म-चिकित्सा भांडवली लोकशाही क्रांति का एक अहम हिस्सा है और जाति-अंतक भांडवली लोकशाही क्रांति का अविभाज्य हिस्सा है। जिस प्रकार मार्क्स धर्म को अफीम की गोली बताकर ही नहीं रूकते, बल्कि वे यह कहते हैं कि धर्म ने भी मानव विकास के विशेष स्तर पर प्रगतिशील भूमिका निभाई है। उसी प्रकार तात्यासाहेब महात्मा जोतीराव फुले भी धर्म की चीरफाड़ करते समय वर्ण-जाति व्यवस्था के लिए ब्राह्मणी वैदिक धर्म को दोषी ठहराते हैं, लेकिन गैर भारतीय धर्मों – ईसाई व इस्लाम – के अलावा सिक्ख, बौद्ध, जैन आदि भारतीय धर्मों को प्रगतिशील मानते हैं।

वर्ग आधारित व्यवस्था को नष्ट करने के लिए शोषित वर्ग में वर्गीय चेतना का निर्माण होना आवश्यक है। यह वर्गीय चेतना इतनी तीव्र होनी चाहिए कि वह वर्गीय संघर्ष के लिए प्रवृत्त होनी चाहिए। उसके लिए वर्गीय संगठन खड़े करने पड़ते हैं। इस वर्गीय चेतना को संघटित करके उसे क्रांति का मार्ग दिखाने का काम राजनीतिक पार्टी करती है। रूस में कामगार संगठनों ने क्रांति की। वहीं चीन में किसान संगठनों ने क्रांति की। इन दोनों राष्ट्रों के कम्युनिस्ट पार्टियोंने यह क्रांति कर दिखाई।

फुलेवाद व मार्क्सवाद यहां एक-दूसरे से दूरी बनाते हुए फिर से एकत्र आते हुए दिखाई देते हैं। जाति आधारित व्यवस्था नष्ट करने के लिए शोषित जातियों में जातीय चेतना का निर्माण होना चाहिए, लेकिन उसके लिए जातीय संगठन खड़ा करने की आवश्यकता नहीं, बल्कि सत्यशोधक समाज जैसे समतामूलक संगठन निर्माण करके प्रबोधन के माध्यम से जातीय चेतना का निर्माण करना और उसी माध्यम से जाति-व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करने हेतु प्रेरित करना – फुलेवाद का सूत्र है। जाति-चेतना का निर्माण करने के लिए यह प्रबोधन आवश्यक है। ऐसे प्रबोधन से सिर्फ सामाजिक और सांस्कृतिक संघर्ष हो सकता है। क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए जमीनी लड़ाई आवश्यक होती है। लेकिन सवाल है कि आमने-सामने की यह क्रांतिकारी लड़ाई कौन और कैसे लड़ेगा? इस बारे में फुलेवाद व मार्क्सवाद में फिर से साम्यता दिखाई देती है।

जमीनी संघर्ष के लिए फुलेवाद शुद्ध वर्गीय संगठन का मार्ग स्वीकार करता है। फुले के शिष्य भालेराव किसान संगठन खड़ा करते हैं और दूसरे फुले शिष्य लोखंडे कामगार संगठन का निर्माण करते हैं। जातीय प्रबोधन और वर्गीय संगठन इन दो अलग-अलग माध्यमों से ही जाति अंतक युद्ध लड़ा जा सकता है। यही है फुलेवाद का क्रांतिकारी सिद्धांत।

इतना स्पष्ट रूप से तात्यासाहेब फुले हमें अपने कृतियों से प्रत्यक्ष बताते हैं। तात्यासाहेब के समय में वर्ग का गर्भधारण जाति चेतना के अंदर हो ही रहा था, फिर भी उन्होंने उभरती वर्ग-व्यवस्था को ध्यान में रखकर वर्ग आधारित संगठनों का निर्माण कर और उनके माध्यम से जाति अंतक आंदोलन खड़ा किया। इसे उनकी ‘महान दूरदृष्टि’ ही कही जा सकती है।। तात्यासाहब फुले के समय में क्रांतिकारी पॉलिटिकल पार्टी स्थापना करनेकी कोई गुंजाईश नही थी, मगर गुरु के इसी जाति अंतक वर्गीय सिद्धांत का विकास करते हुए 1936 में डॉ. आंबेडकर ने ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ की स्थापना की।

लेकिन 1944 में इस जाति अंतक वर्गीय सिद्धांत से बाबासाहेब को दूरी बनानी पड़ी। उन्हें अपनी पार्टी इंडिपेंडेंट लेबर पाटी को भंग करके जाति की नींव पर ‘शेडल्यूल्ड कास्ट फैडरेशन’ की स्थापना के द्वारा जाति संगठन का मार्ग स्वीकार करना पड़ा। यहां से अंबेडकरवाद की समस्याएं शूरू होती है जो आज तक जारी है।

फुलेवाद का शैक्षणिक सिद्धांत भी क्रांतिकारी है। तात्यासाहेब महात्मा फुले के शिक्षण कार्यों में उनके ब्राह्मण मित्र उनकी मदद करते थे। शूद्रातिशूद्रों के बच्चों को जाति अंतक शिक्षा देने के लिए यह स्कूल चलाए जाते थे। ब्राह्मणवाद का षड्यंत्र बच्चों को पढाया जाता था। मगर तात्यासाहब के ब्राह्मण मित्र इस बात का विरोध करते थे। अपने सहयोगी ब्राह्मण मित्रों को फटकारते हुए “शिक्षण किसलिए?” ऐसा प्रश्न तात्यासाहेब खुद ही उपस्थित करते है और स्वयं ही उसका उत्तर देते हुए कहते हैं– “… मेरे कहने का तात्पर्य ऐसा था कि उन्हें (शूद्रातिशूद्रों को) ऊंचे दर्जे की शिक्षा देकर उसके द्वारा अपना अच्छा और बुरा समझने की शक्ति आए…”[1]

आगे तात्यासाहेब स्पष्ट करते हैं कि शूद्रातिशूद्र के बच्चोंको ऊंचे दर्जे की शिक्षा देकर ब्राह्मणों के पूर्वजों द्वारा अपने ऊपर किए गए अन्याय-अत्याचार की जानकारी देनी चाहिए ताकि उसके खिलाफ संघर्ष करने की प्रेरणा मिलेगी। सभी सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए ‘ब्राह्मणों का कसब (ब्राह्मणों का छल-कपट)’  नाम की एक पुस्तिका और दूसरी ‘बली राज्य’ नाम की किताब लिखी। लेकिन ब्राह्मणों के भय के कारण अंग्रेजों ने इन दोनों पाठ्यपुस्तकों को स्वीकार नहीं किया।[2]

क्रमश: जारी

संदर्भ :

[1] महात्मा फुले समग्र वांग्मय, महाराष्ट्र राज्य साहित्य व सांस्कृतिक मंडल, पृष्ठ 193

[2] उपरोक्त, पृष्ठ 192

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

श्रावण देवरे

अपने कॉलेज के दिनों में 1978 से प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े श्रावण देवरे 1982 में मंडल कमीशन के आंदोलन में सक्रिय हुए। वे महाराष्ट्र ओबीसी संगठन उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए। उन्होंने 1999 में ओबीसी कर्मचारियों और अधिकारियों का ओबीसी सेवा संघ का गठन किया तथा इस संगठन के संस्थापक सदस्य और महासचिव रहे। ओबीसी के विविध मुद्दों पर अब तक 15 किताबें प्राकशित है।

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