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हिंदी पट्टी में इसलिए आवश्यक हैं जोतीराव फुले का जीवन-दर्शन और विचार

यह भी एक गंभीर तथ्य है कि 1857 के सिपाही विद्रोह को अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम कह कर मुख्यधारा के इतिहासकार गौरवान्वित करते हैं, लेकिन जोतीराव फुले ने इसे ब्राह्मणवादी शासन को पुनः स्थापित करने के प्रयास के रूप में देखा और चिह्नित किया। पढ़ें, विनोद कुमार का यह आलेख

[दलित-बहुजनों के लिए अप्रैल माह विशेष मायने रखता है। इस महीने की 11 तारीख को जोतीराव फुले और 14 तारीख को डॉ. आंबेडकर की जयंती पूरे देश में लोग धूमधाम से मनाते हैं। जोतीराव फुले का जन्म 11, अप्रैल 1827 को हुआ था और इस लिहाज से यह वर्ष उनके जन्म के दो सौवीं जयंती का आगाज है। फारवर्ड प्रेस इस अवसर पर प्रस्तुत कर रहा है जोतीराव फुले व उनके विचारों पर आधारित आलेखों की शृंखला। आज पढ़ें विनोद कुमार का यह आलेख]

मुझे डॉ. आंबेडकर की यह बात हमेशा उत्प्रेरित करती है कि मानसिक आजादी जनता के राजनीतिक विस्तार के लिए पहली आवश्यकता है। अरब में राजनीतिक सत्ता बनाने के पहले पैगंबर मोहम्मद संपूर्ण धार्मिक क्रांति की गई थी। भारतीय इतिहास भी इसी निष्कर्ष का समर्थन करता है। मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त द्वारा संचालित राजनीतिक क्रांति से पहले महात्मा बुद्ध की धार्मिक और सामाजिक क्रांति हुई थी। महाराष्ट्र में शिवाजी के नेतृत्व में राजनीतिक क्रांति भी महाराष्ट्र के संतों के द्वारा किए गये धार्मिक-सामाजिक सुधारों के बाद हुई थी। ऐसे ही सिखों की राजनीतिक क्रांति के पहले गुरु नानक द्वारा की गयी धार्मिक और सामाजिक क्रांति हुई थी।

अब यदि डॉ. आंबेडकर के उपरोक्त कथन को गहराई से देखें तो यह तीव्र एहसास होता है कि हिंदी पट्टी में इस तरह की सामाजिक-धार्मिक क्रांति हुए सदियां गुजर गईं। हिंदी साहित्य के इतिहास में जिसे भक्ति काल की संज्ञा दी गई है, उस दौर के बाद किसी वैचारिक क्रांति का दौर नहीं आया। और उस दौर को यदि हम कबीर, तुलसी और मीरा का दौर कहें तो प्रभावी रहे वर्णाश्रम में अटूट विश्वास रखने वाले तुलसी। कबीर अपने समय के आगे थे, तो मीरा व्यक्ति स्वातंत्र्य का आगाज करती हैं। धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में कोई बड़ा विमर्श नहीं हुआ जैसा कि हम बंगाल सहित दक्षिण के राज्यों में देखते हैं।

इसी का परिणाम है कि हिंदी पट्टी आज भी मनुवाद के गिरफ्त में है और उसके पुरोधा यहां सत्ता पर काबिज हैं। आर्थिक क्षेत्र में इसका प्रतिफलन इस रूप में हुआ है कि हिंदी पट्टी के प्रमुख राज्य चाहे वह उत्तर प्रदेश हो या बिहार, आर्थिक विकास की दृष्टि से राज्यों की सूची में सबसे निचले पायदान पर हैं। सामंतवाद, जातीय उत्पीड़न, स्त्रियों के प्रति अपराध की दृष्टि से हिंदी पट्टी सबसे आगे है। हालांकि अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह, गांधी का अहिंसक चंपारण आंदोलन, भ्रष्टाचार के खिलाफ बिहार का जेपी आंदोलन और सवर्ण राजनीति पर कील ठोंकने का काम लालू-नीतीश के नेतृत्व में बिहार से ही शुरु हुआ। उत्तर प्रदेश में मुलायम और मायावती के शासन का दौर, बिहार में लालू और नीतीश के राजनीति का दौर सब फना हो गया। आखिर क्या वजह है कि हिंदी पट्टी मनुवाद के गिरफ्त से मुक्त नहीं हो पा रही? बार-बार पुनरुत्थानवादी शक्तियां कैसे प्रभावी हो जाती हैं?

फीचर इमेज : पुणे के फुलेवाड़ा में स्थित जोतीराव फुले के घर, जो कि अब संग्रहालय में रूप में संरक्षित है, में रखी एक पेंटिंग, जिसमें सत्यशोधक समाज की गतिविधियों को चित्रित किया गया है

इसकी मुख्य वजह यही है कि हिंदी पट्टी में कभी धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्रांति नहीं हुई। डॉ. आंबेडकर ने बार-बार वर्ण-व्यवस्था पर चोट की, जाति-प्रथा के उन्मूलन पर जोर दिया, लेकिन उनके उत्तराधिकारी इसी वर्ण व्यवस्था के भीतर जातीय समीकरण और सवर्ण राजनीति से गठजोड़ कर सत्ता में हिस्सेदारी के रास्ते पर चल पड़े। डॉ. आंबेडकर ने शिक्षा पर भी बहुत जोर दिया, लेकिन उस दिशा में भी आगे कुछ ठोस काम नहीं हुआ।

ऐसे वक्त में हमें जोतीराव फुले बेहद याद आते हैं, जिन्होंने मजदूरों के शोषण के खिलाफ भी आवाज तो उठाई, लेकिन उनका मुख्य एजेंडा ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर प्रहार और स्त्री शिक्षा सहित तमाम वंचित समुदायों की शिक्षा पर जोर रहा और उन्होंने जीवन भर एकाग्र भाव से यह काम किया। उन्होंने जिन मुद्दों पर और जिस तरह काम किया, वह अनूठा था और सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक क्षेत्र में बदलाव के लिए हिंदी पट्टी में उनके वैचारिक अवदानों का प्रचार प्रसार बेहद जरूरी है।

जोतीराव फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को सतारा, महाराष्ट्र में हुआ था। इनके परिजन माली का काम किया करते थे। सन् 1840 में इनका विवाह सावित्रीबाई फुले से हुआ। उस दौर में स्त्री शिक्षित हो, इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। लेकिन जोतीराव ने अपनी पत्नी को शिक्षित कराने के क्रम में स्त्री शिक्षा का अलख जगाने का प्रण लिया और 1848 में अपना पहला स्कूल खोला जिसमें उनकी पत्नी शिक्षिका बनीं और इस तरह उन्होंने देश में पहली भारतीय महिला शिक्षिका होने का गौरव प्राप्त किया। कितना प्रचंड विरोध हुआ होगा, इसकी हम आज कल्पना ही कर सकते हैं। प्रवाद, गाली गलौच, उन पर गोबर फेंका जाना जैसी घटनाएं और अंततोगत्वा सामाजिक दबाव में आकर पिता ने बेटे और बहू को घर से ही निकाल दिया। लेकिन उनका काम रूका नहीं। एक की जगह तीन स्कूल खुल गए।

यह भी पढ़ें – फुलेवाद के मूलभूत सिद्धांत एवं उनकी प्रस्तावनाएं (पहला भाग)

वैचारिक विमर्श के लिए 1873 में उन्होंने महाराष्ट्र में ‘सत्यशोधक समाज’ नामक संस्था का गठन किया। जिन मूल्यों में वे विश्वास करते थे, उसे आगे बढ़ाया। स्त्री शिक्षा के प्रचार प्रसार और उसे व्यापक बनाने के साथ-साथ बाल विवाह का विरोध, विधवा विवाह का समर्थन, ब्राह्मण-पुरोहितों के बगैर विवाह कराने की पद्धति का प्रचलन, जिसे सरकारी मान्यता भी मिली। श्रमिकों, कामकाजी महिलाओं और किसानों के लिए सांध्य विद्यालय उनके काम के नमूने बने। सामाजिक क्षेत्र में उनके अवदानों के लिए 1888 में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें महात्मा की उपाधि से नवाजा गया। एक सामाजिक दृष्टि से पिछड़े समाज में जन्मे साधारण व्यक्ति भी अपनी सेवा भावना और दृढ़ संकल्प की बदौलत किस तरह सम्मान का अधिकारी बन जाता है, उनका जीवन इस बात का उदाहरण है।

जोतीराव फुले राजनीतिक क्षेत्र में तो सक्रिय नहीं हुए, लेकिन उन्होंने अपने दौर की राजनीति पर गहरी नजर रखी और जाति उत्पीड़न के विरोध के क्रम में अपने समय के चिपलूणकर और तिलक जैसे शक्तिशाली ब्राह्मणवादी नेताओं की प्रखर आलोचना की। भारत की जाति-व्यवस्था और उसके तहत होने वाले उत्पीड़न की तुलना उन्होंने अमेरिका में व्याप्त गुलाम व्यवस्था से की। यह हमेशा विमर्श का विषय रहा है कि दुनिया में, खास कर अमरिका सहित यूरोपीय देशों में व्याप्त मध्य युग की गुलामी व्यवस्था बदतर थी या वर्णवादी जाति-व्यवस्था के तहत शूद्रों का भारत में शोषण। जोतीराव फुले ने स्पष्ट कहा कि अपने देश में जातिगत उत्पीड़न अमेरिका की दास प्रथा से बिल्कुल भी कमतर नहीं है।

यह भी एक गंभीर तथ्य है कि 1857 के सिपाही विद्रोह को अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम कह कर मुख्यधारा के इतिहासकार गौरवान्वित करते हैं, लेकिन जोतीराव फुले ने इसे ब्राह्मणवादी शासन को पुनः स्थापित करने के प्रयास के रूप में देखा और चिह्नित किया। हाल के वर्षों में इस तरह के विमर्श सामने आये हैं, लेकिन उस दौर में जब यह इतिहास घटित हो रहा था, उसे देखना और उसके बारे में इस रूप में कहना एक साहसिक काम था।

इसी तरह उन्होंने आज के बहुचर्चित राजनीतिक वितंडावाद यानि धर्मांतरण के बारे में भी अपनी स्पष्ट राय रखी। उनकी समकालीन पंडित रमाबाई ने ईसाई धर्म को स्वीकार किया और उन पर चतुर्दिक आक्रमण हुआ। लेकिन अपनी पुस्तक ‘सत्य के सार’ में फुले ने धर्मांतरण के अधिकार का बचाव करते हुए रमाबाई का भी बचाव किया। आरएसएस की राजनीति का आज भी यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और आज से डेढ़ दो सौ वर्ष पूर्व जोतीराव फुले इस पर अपनी दो टूक राय रख रहे थे।

निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि हिंदी पट्टी में उनके व्यक्तित्व, उनके काम करने की शैली और उनके जीवन-दर्शन का प्रचार प्रसार सामाजिक बदलाव के लिए नितांत जरूरी है। इसीसे हिंदी पट्टी में छाया घना अंधेरा दूर होगा।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

विनोद कुमार

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता विनोद कुमार का जुड़ाव ‘प्रभात खबर’ से रहा। बाद में वे रांची से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘देशज स्वर’ के संपादक रहे। पत्रकारिता के साथ उन्होंने कहानियों व उपन्यासों की रचना भी की है। ‘समर शेष है’ और ‘मिशन झारखंड’ उनके प्रकाशित उपन्यास हैं।

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