[दलित-बहुजनों के लिए अप्रैल माह विशेष मायने रखता है। इस महीने की 11 तारीख को जोतीराव फुले और 14 तारीख को डॉ. आंबेडकर की जयंती पूरे देश में लोग धूमधाम से मनाते हैं। जोतीराव फुले का जन्म 11, अप्रैल 1827 को हुआ था और इस लिहाज से यह वर्ष उनके जन्म के दो सौवीं जयंती का आगाज है। फारवर्ड प्रेस इस अवसर पर प्रस्तुत कर रहा है जोतीराव फुले व उनके विचारों पर आधारित आलेखों की शृंखला। आज पढ़ें अजय कुमार साव का यह आलेख]
‘ब्राह्मणवाद की छाती पर बिरसा-फुले-आंबेडकर’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि क्रांति की बिगुल चेतना है। भारत की वर्णाश्रमी मनीषा ने जिस प्रकार नवजागरण को भारत में असफल करने का कुंठित प्रयास किया, वह सच में सफल हो जाता यदि हमारे पास बिरसा, फुले, आंबेडकर और पेरियार जैसे क्रांतिधर्मी व्यक्तित्व न होते।
पूरे भारत में नवजागरण की मशाल से शूद्रों (दलित, आदिवासी, पिछड़े तथा स्त्री सहित बहुजन के अर्थ में) के घरों को प्रकाशित करने वाले अग्रणी व्यक्ति महात्मा जोतीराव फुले थे। महात्मा फुले ने शिक्षा पर वर्णाश्रमियों के एकाधिकार को चुनौती दी और शिक्षा के द्वार बहुजनों के लिए खोलने के लिए संघर्ष किया, क्योंकि वे शिक्षा के महत्व को जानते थे। वे जानते थे कि अविद्या ही सभी प्रकार के अंधविश्वासों की जड़ है, साथ में भारत के गरीब जनता के गरीब रहने और विषमतामूलक अभिशप्त समाज बने रहने का कारण भी। इसलिए वे लिखते हैं– “विद्या बिना मति गई, मति बिना नीति गई, नीति बिना गति गई, गति बिना वित्त गया, वित्त बिना शूद्र गए; इतने अनर्थ एक अविद्या ने किया।”
फुले ‘गुलामगिरी’ में यह प्रश्न करते हैं कि इस देश में शूद्रों, अतिशूद्रों और स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार क्यों नहीं दिया गया? ब्राह्मणों ने उन्हें वेदों को पढ़ने और सुनने का अधिकार क्यों नहीं दिया? उन्हें वंचित रखने का कारण क्या था? उन्हें अधिकार दिया गया सिर्फ़ उच्च वर्णों के लोगों की सेवा करने का। सिर्फ़ सेवा का दूसरा अर्थ गुलामी होता है। ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ को धर्मशास्त्रों में सनातन सिद्धांत का रूप दिया। पाप और पुण्य की कई कथाएं उन्होंने पुराणों में लिखी, उन कथाओं ने भट्ट-ब्राह्मणों को सर्वश्रेष्ठ बना दिया। उनको भूमंडल का स्वामी बना दिया। वास्तव में उसके लिए एक बहुत बड़ा षड्यंत्र था। धर्मशास्त्रों के आधार पर ही पुरोहितों ने इस देश में सांस्कृतिक उपनिवेशवाद को बढ़ावा दिया। यह उपनिवेशवाद कई शताब्दियों तक पनपता रहा। वर्णभेद और जातिभेद की नीति ही इस गुलामी की आधारशिला थी।
उन्नीसवीं सदी में भारत में अंग्रेजों की नई शिक्षा प्रणाली की वजह से जो नया शिक्षित वर्ग पैदा हुआ, उनमें से कुछ लोगों का ध्यान भारतीय समाज की कुरीतियों की ओर गया। उन्होंने उन कुरीतियों को समाज से दूर करने के लिए समाज सुधार और धार्मिक सुधार का काम अपने हाथ में लिया। उन्होंने अपने समाज की अमानवीय कुप्रथाओं के खिलाफ, धार्मिक सड़न के खिलाफ जागृति लाने की कोशिश की। इस काल को भारतीय नवजागरण का प्रारंभिक काल माना जाता है। राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, रानाडे, भंडारकर, आगरकर आदि के कार्य उतना सामाजिक परिवर्तन के लिए वांछित नहीं थे, जितना महात्मा फुले के कार्य। द्विजों का समाज सुधार केवल उनके वर्गों तक ही सीमित था। उनकी परिधि में कभी दलित, पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यक आ ही नहीं पाएं।

यह षड्यंत्र ही है कि नवजागरण का अग्रदूत राजा राममोहन राय जैसे द्विजों को कहा जाता है और महात्मा फुले जैसे प्रगतिशील शख्सियतों को उपेक्षित रखा जाता है। इस बारे में विमलकीर्ति लिखते हैं– “महात्मा फुले के दर्शन, कार्य और विचारधारा का आज़ादी से पहले और बाद के प्रारंभिक दशकों में जितना अध्ययन और मूल्यांकन होना चाहिए था उतना हो नहीं सका। और यह सब अनजाने में हुआ, ऐसी बात नहीं है, बल्कि जान-बूझकर उनके कार्य और विचार-दर्शन को नज़रअंदाज़ किया जाता रहा और आज भी यही स्थिति बनी हुई है। हमारे देश में सदियों से यह होता चला आ रहा है कि जो लोग परंपरागत समाज व्यवस्था को बदलने या उसमें आमूलाग्र परिवर्तन की बात करते हैं और एक नई समाज व्यवस्था की स्थापना का सपना देखते हैं, उनको हमेशा उपेक्षित किया गया है।”
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फुले को उपेक्षित किए जाने के कारणों की जानकारी भी विमलकीर्ति अपने शब्दों में देते हैं– “जोतिबा फुले भारत में क्रांतिकारी समाज परिवर्तन के आंदोलन के मूल प्रवर्तक हैं, यह बात सिद्ध करने के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। उनके साहित्य को पढ़ने से ही इस बात का पता चलता है कि उन्होंने किस तरह हिंदू समाज के शूद्र-अतिशूद्र वर्गों की समस्या को उजागर करने की कोशिश की है। उन्होंने किसानों के सवालों को उठाया। गांव देहातों में गांव के मुखिया, जमींदार, साहूकार, कुलकर्णी, ब्राह्मण, बनिया और पटवारी आदि लोग किसानों के अज्ञानता का लाभ उठाकर किस प्रकार उनका शोषण करते हैं, इस बात का विश्लेषण जितनी गहराई से फुले साहित्य में मिलता है, उतना उनके समकालीन किसी भी समाज सुधारक में नहीं। उन्होंने स्त्री की गुलामी के सवालों को उठाया। वे पंडा-पुरोहित वर्ग को धार्मिक शोषक वर्ग की संज्ञा देते हैं और बताते हैं शूद्र, अतिशूद्र तथा नारी वर्ग हिंदू धर्म के धार्मिक गुलाम हैं। जोतिबा फुले की राय में यह सारे सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, शैक्षणिक सवाल हिंदू समाज व्यवस्था, हिंदू धर्म, पुरोहित वर्ग के कारण पैदा हुए हैं, इसलिए वे इसी व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन की आवश्यकता महसूस करते हैं।”
महात्मा फुले कम स्कूली शिक्षा के बावजूद विवेकवान और चेतनशील व्यक्ति थे, इसलिए बहुत कम उम्र में ही वे वर्णाश्रमियों के कुटिलताओं को समझ गए और उनसे सीधी टक्कर लेने लगे। वे कहते हैं– “जिस प्रकार बाल काटना नाई का धर्म नहीं धंधा है, उसी प्रकार पूजा-पाठ ब्राह्मण का धर्म नहीं धंधा है।” दुखद यह है कि आज कथित डॉक्टरेट भी मानसिक गुलाम हैं। बहुजनों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए ही फुले ने अपनी पत्नी को पढ़ाया और शिक्षिका बनाया। अपने धन से स्कूल खोले। उन्होंने विधवा स्त्रियों के लिए पुनर्वास की व्यवस्था की। आज के आज़ाद ख्याल स्त्रियों को अपने धार्मिक कार्यक्रमों से थोड़ा-सा फुर्सत पाकर फुले दंपति और आंबेडकर को पढ़ना चाहिए।
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अपनी पुस्तक ‘गुलामगिरी’ में फुले ब्राह्मणों के सभी मकड़जालों को अपने तर्कों से ध्वस्त करते हैं। विष्णु के अवतारों का पोंगा पंडितों ने जो मकड़जाल बुना हुआ, जिसे आजकल के कुछ कुमार विश्वास टाइप सनातनी विद्वान डार्विन के विकासवाद से वेरिफाई करते नहीं थकते, उन सभी ढकोसलों पर फुले ने विराम लगा दिया है। किस प्रकार ब्राह्मण अंग्रेजों के चापलूस और मुखबिर थे उसकी पूरी व्याख्या ‘गुलामगिरी’ में मौजूद है। क्यों बाबासाहेब को लग रहा था कि जॉन की जगह जगदीश बैठेंगे और हमारा देश गुलाम ही रहेगा, इस पर महात्मा फुले बहुत पहले ही लिख चुके थे।
‘गुलामगिरी’ में फुले बताते हैं कि किस प्रकार भट्ट-ब्राह्मणों ने शूद्रों-अतिशूद्रों को शिक्षा, ज़मीन और संपत्ति के साधनों से वंचित किया। शूद्र-अतिशूद्र यहां के मूल निवासी हैं। सही मायने में वे इस देश के भूमिपुत्र हैं। आर्य बाहर से यहां आए और उनका यहां के मूल निवासियों से सदियों तक संघर्ष होता रहा। कई प्रकार के षड्यंत्रों का सहारा लेकर उन्होंने शूद्र-अतिशूद्रों को जीता और फिर दासता की खाई में धकेल दिया।
महात्मा फुले की सबसे महत्वपूर्ण बात जो वे ‘गुलामगिरी’ में करते हैं, वह है प्रतिनिधित्व की बात। आरक्षण का ख्याल फुले के ही मस्तिष्क की उपज है, जिसे बाद में शाहू जी महाराज ने कोल्हापुर में लागू करके दिखाया। फुले का मानना था कि हमारा शोषण तभी खत्म हो सकता है जब हमारे लोग भी शासन में पहुंचेंगे। हालांकि आज के पूंजीवादी दौर ने सारी प्रतिबद्धताओं की कमर तोड़ दी है, फिर भी बहुजन समाज इस उम्मीद में चुनाव प्रक्रिया में भाग लेता है कि भले नाम के लिए ही सही हमारे वर्ग के प्रतिनिधि हैं संसद में।
महात्मा फुले की यह विशेषता थी कि वे बहुजनहित की बात बहुजन भाषा में ही लिखना, बोलना पसंद करते थे। उनकी सभी रचनाएं बहुजनबोली मराठी में है। लेकिन, जहां भी उन्हें लगता कि जनता की किसी समस्या से अंग्रेज शासकों को अवगत कराना है तो वे अंग्रेज़ी का इस्तेमाल भी करते थे।
‘गुलामगिरी’ में महात्मा फुले राजा बलि की छल पूर्वक कि गई निर्मम हत्या की बात करते हैं। चूंकि बलि एक प्रजापालक राजा थे और उनकी दृष्टि में किसी विशेष वर्ग का कोई महत्व नहीं था। वे मूलनिवासियों के राजा थे। इसलिए वामन नामक ब्राह्मण ने छल से उनकी संपत्ति हड़प कर उनकी हत्या कर दी। फुले राजा बलि को ही एक आदर्श राजा मानते थे। जिस प्रकार रैदास बेगमपुर और कबीर अमरदेसवा की कल्पना करते हैं, उसी तरह फुले बलिराज्य की कल्पना करते हैं जो अपने समय में समानता और न्याय का पर्याय था।
(संपादन : नवल/अनिल)
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