केंद्र सरकार ने मई के आख़िर में दो अहम घोषणाएं कीं। पहली, केंद्र सरकार जनसांख्यिकी परिवर्तन आयोग का गठन करेगी जिसका काम जनसंख्या असंतुलन का अध्ययन करना और जनसंख्या में आए ‘अप्रत्याशित’ बदलावों का आकलन करना और राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और सामाजिक ढांचे पर इसके प्रभाव का अध्ययन करके नीतिगत और कानूनी समाधान सुझाना है। इस आयोग का अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर (सेवानिवृत्त) को बनाया गया है। उन्होंने अख़बारों में बयान दिया है कि इस क्षेत्र में अध्ययन का उन्हें कोई अनुभव नहीं है। यानी एक ऐसे व्यक्ति को इसका नेतृत्व दिया गया है जिसके पास इस मुद्दे की समझ नहीं है। उनके अलावा जिन्हें इस आयोग का सदस्य बनाया गया है, उनमें भी डेमोग्राफी के अध्येताओं के बजाए अफ़सरशाहों और भारत के जनगणना आयुक्त को रखा गया है। इनमें महत्वपूर्ण अपवाद अर्थशास्त्री डॉ. शमिका रवि हैं, जो प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य और तमिलनाडु के पूर्व और पश्चिम बंगाल के वर्तमान राज्यपाल आर.एन. रवि की बेटी हैं। शमिका रवि ने पिछले दिनों ही ‘निर्वाचन क्षेत्रों के आकार, बनावट और लोकसभा सीटों के परिसीमन’ पर एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी हैं।
इस क़वायद का एक अहम मक़सद आरएसएस और भाजपा के ख़िलाफ़ स्वाभाविक तौर पर एकजुट होने वाले बहुजनों की संख्या को एक जगह इकट्ठा होने से रोकना भी है, ताकि चुनावों में मुस्लिम, दलित और पिछड़े एक साथ गठजोड़ ना कर लें। अगर मुसलमान अलग कर दिए गए तो दलितों और पिछड़ों के पास मुसलमानों के सहयोग से भाजपा को हरा पाने का रास्ता संकरा हो जाएगा। एक तरह से यह आरएसएस-भाजपा की सत्ता पर क़ाबिज़ बने रहने की रणनीति है।
इसके ठीक बाद गृहमंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे 15 किलोमीटर के दायरे के सभी अवैध निर्माणों को ध्वस्त किया जाएगा। इसका मकसद घुसपैठ को ख़त्म करना है। यहां यह सवाल उठना लाज़मी है कि सीमावर्ती इलाक़ों में 15 किलोमीटर के दायरे तक के ही अवैध निर्माणों को सरकार क्यों तोड़ना चाहती है? क्या 15 किलोमीटर से ज़्यादा अंदर या देश के मध्य में स्थित अवैध निर्माणों को सरकार ‘वैध’ मानती है? इस सवाल को ऐसे भी रखा जा सकता है कि क्या सरकार सिर्फ़ बॉर्डर से सटे इलाक़ों के अवैध निर्माण को खतरनाक और देश के अंदरूनी हिस्सों के अवैध निर्माणों को अच्छा या कम ख़तरनाक मानती है? दरअसल, सरकार का मकसद, पहले संपत्ति को अवैध घोषित करना और फिर संपत्ति के मालिक की नागरिकता को संदिग्ध घोषित करना है। इसीलिए सरकार के इन क़दमों और उसके उद्देश्यों पर संदेह होना स्वाभाविक है।
दरअसल सरकार के इन दोनों निर्णयों की भाषा से यह समझना मुश्किल नहीं है कि इसका उद्देश्य धार्मिक आधार पर बसावट को घुसपैठ से जोड़ना है, जिसके निशाने पर मुसलमान होंगे क्योंकि अभी तक जो बुलडोज़र चलने का रिकॉर्ड रहा है, उसमें निशाने पर मुसलमान ही रहे हैं। यानी इन दोनों आदेशों का मतलब मुसलमान और घुसपैठिया शब्दों को समानार्थी बनाना है। इससे कथित घुसपैठ का मुद्दा जो अभी तक सिर्फ़ सीमावर्ती इलाक़ों तक ही सीमित है, उसकी पहुंच देश भर के गांवों और क़स्बों तक हो जाएगी। इसके बाद यह मुहावरा गढ़ा जाएगा कि सारे मुसलमान घुसपैठिये नहीं होते, लेकिन सारे घुसपैठिए मुसलमान ही होते हैं।
इस नॅरेटिव के मजबूत होते ही फिलहाल गुजरात और राजस्थान में लागू ‘डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट’ को पूरे देश में लागू करने का माहौल बनाया जाएगा।
दरअसल, इसके ज़रिए मोदी सरकार मुस्लिम विरोधी अनाधिकृत सांप्रदायिक धारणा को अधिकृत रूप देने का प्रयास कर रही है जिसके तहत लंबे समय से मुस्लिम बहुल मुहल्लों और क़स्बों को ‘मिनी पाकिस्तान’ प्रचारित किया जाता रहा है। मसलन, गुजरात के अहमदाबाद में स्थित जुहापुरा को अक्सर ऑटो वाले ‘मिनी पाकिस्तान’ बोलते मिल जाएंगे। इसी तरह मऊ, आज़मगढ़, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल इलाक़ों को ग़ैर मुस्लिमों के बीच आप ‘मिनी पाकिस्तान’ कहे जाने को सुन सकते हैं। यानी लंबे समय से इस धारणा को हमारी आम समझ का हिस्सा बनाने की सचेत कोशिश की गई कि जहां मुसलमानों की आबादी ज़्यादा होती है वह भारत का हिस्सा नहीं हो सकता, वो पाकिस्तान होता है। इसलिए मुसलमानों को मुहल्लों या गांवों से निकालना एक ‘राष्ट्रवादी कर्तव्य’ है। इसीलिए हम अब ऐसी ख़बरें देखते हैं कि किसी मुस्लिम परिवार के हिंदू बहुल इलाक़े में मकान ले लेने पर आरएसएस के विचार से प्रभावित लोग मुसलमानों को निकालने या ख़ुद पलायन कर जाने की धमकी देते हैं। आरएसएस के प्रभाव वाले गांवों के बाहर ‘विशुद्ध हिंदू गांव में आपका स्वागत है’ या ‘ग़ैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित’ होने वाले बोर्ड आपको दिख जाएंगे।

हिंदी के मुक़ाबले उदार माने जाने वाले अंग्रेज़ी अख़बारों में इसे आप मुस्लिम बहुल इलाक़ों के लिए ‘मुस्लिम डॉमिनेटेड’ शब्द के इस्तेमाल में भी देख सकते हैं जबकी संख्या के आधार पर किसी मुस्लिम बहुल इलाक़े के लिए ‘मुस्लिम पॉपुलेटेड’ या ‘डेंसली मुस्लिम पॉपुलेटेड’ शब्द ज़्यादा तार्किक होता। दरअसल, ऐसी भाषा का इस्तेमाल मुस्लिम मुहल्लों की हिंसक छवि बनाने के लिए की जाती है। मसलन, डॉमिनेटेड का अर्थ वर्चस्व होता है और जब आप ‘मुस्लिम डोमिनेटेड’ शब्द पढ़ते हैं तो ऐसा संदेश जाता है कि उक्त मुहल्ले या क़स्बे के लोग वर्चस्वशाली होते हैं।
ज़ाहिर है वर्चस्व सामने वाले किसी ‘दूसरे’ या कमज़ोर तबके यानी हिंदुओं को दबाकर ही दिखाया जा सकता है। इससे बहुसंख्यक समाज में यह आम सहमति बनती जाती है कि देश के अंदर ‘और पाकिस्तान’ नहीं बनने देना है।
इस उद्देश्य के लिए मीडिया और प्रशासन एक और शब्द ‘संवेदनशील’ या ‘सेंसिटिव’ का भी इस्तेमाल करता है। अगर इसका अध्ययन किया जाए तो हम पाएंगे कि ज़्यादातर मुस्लिम आबादी वाले इलाक़ों को ही मीडिया और पुलिस ‘संवेदनशील’ बताती है। जबकि पुलिस की डिक्शनरी के विपरीत व्यक्ति के स्तर पर किसी का संवेदनशील होना एक अच्छा इंसानी गुण माना जाता है, जिसका विलोम ‘संवेदनहीन’ होता है।
मुस्लिमों के ख़िलाफ़ इन धारणाओं से बहुसंख्यकों में यह सहमति बनती है कि इन छोटे-छोटे ‘पाकिस्तानों’ और ‘संवेदनशील’ जगहों पर ज़्यादा निगरानी और प्रशासनिक नियंत्रण की ज़रूरत है, जिसके लिए क़ानून भी बनने चाहिए।
भाजपा सरकार अब बहुसंख्यकों की इसी ‘सामूहिक चेतना’ को संतुष्ट करने के लिए डिस्टर्ब एरिया एक्ट यानी ‘अशांत क्षेत्र अधिनियम’ जो फिलहाल गुजरात और राजस्थान में लागू है, को पूरे देश में लागू करना चाहती है। इसके तहत व्यक्ति को अपनी संपत्तियों को बेचने से पहले डीएम की संस्तुति लेनी पड़ेगी जो स्थानीय थाना प्रभारी की जांच रिपोर्ट के आधार पर अपनी संस्तुति देगा। जांच इस पर भी केंद्रित होगी कि क्या आपने अपने धर्म के लोगों की जनसंख्या बढ़ाने के उद्देश्य, जिससे कि उक्त मुहल्ले या क़स्बे की डेमोग्राफी ‘असंतुलित’ हो जाये, तो ज़मीन नहीं ख़रीदी या बेची। जांच में मुहल्ले या क़स्बे के लोगों की राय भी ली जाएगी। अगर डीएम से संस्तुति लिए बिना या उसके आदेश के विपरीत आपने ज़मीन ख़रीदी या बेची तो इस गैर-जमानतीय अपराध में आपको 6 वर्ष तक की सज़ा हो सकती है। यानी यह क़ानून अपराधियों की एक नई श्रेणी विकसित करेगी, जिसके शिकार अधिकतर मुसलमान होंगे।
इस क़ानून का यह प्रावधान किसी भी व्यक्ति को अपनी मर्ज़ी से कहीं पर भी बसने के मौलिक अधिकार और अपनी मर्ज़ी से अपनी संपत्ति किसी को बेचने या किसी से भी ख़रीदने के अधिकार का उल्लंघन है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि मौलिक अधिकारों का हनन करने वाले क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई आपत्ति नहीं की।
एक तरह से यह क़ानून डीएम को यह तय करने का अधिकार भी देगा कि वो किसी भी इलाक़े की धर्म आधारित जनसंख्या निर्धारित करे। यानी अगर उसे लगता है कि किसी धर्म की आबादी कहीं ज़्यादा या कम है तो उसे ‘असंतुलित’ बताकर उस समुदाय के लोगों को वहां से हटा या बसा सकता है।
इस क़ानून में यह प्रावधान भी है कि डीएम किसी भी इलाक़े को सांप्रदायिक आधार पर ‘डिस्टर्ब्ड’ एरिया घोषित कर सकता है, जिसकी हर तीन साल पर समीक्षा होगी और वो समीक्षा के आधार पर उसे अगले तीन साल के लिए बढ़ा सकता है या ख़त्म कर सकता है। यानी मुसलमानों की हर अचल संपत्ति की ख़रीद बिक्री एक संदिग्ध गतिविधि होगी जिसकी निगरानी के लिए मुस्लिम मुहल्लों में ज़्यादा पुलिस और थानों की ज़रूरत होगी। जो इस तर्क के लिए माहौल निर्मित करेगा कि मुसलमानों को आपराधिक वर्ग में श्रेणीकृत किया जाए जैसे अंग्रेजों के ज़माने में कुछ वर्गों को श्रेणीबद्ध किया गया था।
ध्यान रहे यह भारत में 2026 में हो रहा है। जबकि अमरीका ने 1968 में ‘फेयर हाउसिंग एक्ट’ बनाया था, जिसके तहत धर्म, जाति, नस्ल, लिंग और राष्ट्रीयता के आधार पर किसी को घर देने से इनकार करने को अपराध घोषित कर दिया गया था। यानी मोदी सरकार वह करने जा रही है, जिसे असभ्य समझकर दुनिया बहुत पहले छोड़ चुकी है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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