h n

मीडिया नहीं, नागरिक पालिका ही लोकतंत्र का चौथा स्तंभ

प्रेस को भी जब चौथे स्तंभ के रूप में प्रचारित किया जाता है, तो उसका महत्व भी उसकी निगरानी के रूप में व्यक्त किया जाता है। लेकिन नागरिक और किसी कंपनी की निगरानी के बीच एक बुनियादी फर्क होता है। पढ़ें, यह अनिल चमड़िया का यह आलेख

संसदीय लोकतंत्र में एक संवैधानिक ढांचागत व्यवस्था को इस रूप में पढ़ाया और बताया जाता है कि उनके तीन अंग – विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका होते हैं। लेकिन संविधान में चौथे स्तंभ की व्यवस्था को भूला दिया जाता है। संविधान से बाहर संसदीय लोकतंत्र में एक चौथे स्तंभ की बात की जाती है। वह संवैधानिक ढांचागत व्यवस्था से जुड़ा नहीं होता है। भारतीय संविधान के पाठ में संसदीय लोकतंत्र के केवल तीनों अंगों के बीच संतुलन बनाने पर महत्व दिया गया है। लेकिन यह संतुलन किसके लिए? इस संतुलन का क्या अर्थ है?

मसलन, मौजूदा परिस्थिति में यह माना जाता है कि संविधान के सभी तीनों अंगों के बीच अभी तक एका नहीं हो पाई है, बल्कि जिस मीडिया को चौथे स्तंभ के रूप में नागरिक देखते रहे हैं, वह भी एक गंठजोड़ में शामिल हो गया है। किसी भी व्यवस्था की यह कौशलता मानी जाती है कि वह संतुलन बनाने में कितनी माहिर है।

हमें इस प्रश्न पर विचार करना है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आखिरकार क्या है? संदर्भ ग्रंथों के हवाले से यह बताया जाता है कि एडमंड बर्क ने स्वतंत्र प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताया है। वे 1730 में जन्मे और 1797 तक सक्रिय रहे। वे एक राजनीतिक सिद्धांतवादी थे। यानी प्रिंटिंग की सुविधा आने के बाद शासन प्रणाली से उसके जुड़ाव के महत्व को स्पष्ट किया गया है। इस संदर्भ में दो बातें और समझने की जरूरत पड़ती है। पहला तो यह कि संसदीय व्यवस्था एक शासन प्रणाली है, जबकि लोकतंत्र एक विचारधारा है। इसका यह अर्थ यह हुआ कि लोकतंत्र की विचारधारा के लिए एक शासन प्रणाली विकसित की गई। उस शासन प्रणाली में अनुभव के आधार पर एक चौथे स्तंभ को जोड़ना एडमंड बर्क को आवश्यक लगा।

इससे पूर्व जॉन लॉक (1632-1704) ने लोकतंत्र के विचार को इस तरह से विस्तार दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बिना लोकतंत्र खोखला विचार है। वे विद्रोह करने तक की स्वतंत्रता के समर्थक थे। फ्रांस्वा-मारी अरूऐ का उपनाम वॉल्तेयर है। उन्होंने भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की विचारधारा से जोड़ा।

हमें यहां दो स्थितियों को अलग-अलग करके समझना है। पहला तो लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार निहित होना चाहिए। दूसरा संसदीय शासन प्रणाली में प्रेस की आजादी का अधिकार है।

भारतीय संविधान में लोकतंत्र के लिए नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। इसे धारा 19(ए) में परिभाषित किया गया है। भारतीय संविधान में प्रेस की आजादी या आज की भाषा में मीडिया की आजादी का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। नागरिकों के लिए अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार मौलिक माना जाता है।

यहां इस प्रश्न का विश्लेषण करना है कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सुरक्षित होना महत्वपूर्ण है या फिर संसदीय प्रणाली में प्रेस अथवा मीडिया की आजादी का ही महत्व है?

भारतीय संविधान के संदर्भ में यदि इसका विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट है कि नागरिकों के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित किया गया है। जिस अधिकार का उपयोग वह नागरिक या नागरिक समूह भी कर सकता है, जो कि जनसंचार के क्षेत्र में व्यापार करना चाहते हैं। लेकिन अभिव्यक्ति के लिए जनसंचार माध्यमों का होना उसकी अनिवार्य शर्त नहीं है। जनसंचार माध्यम एक सुविधा है। यहां इस पहलू पर भी हम गौर कर सकते हैं कि अभिव्यक्ति की आजादी किस उद्देश्य से जुड़ी है। इस आजादी का एक संदर्भ है। संविधान एक वैचारिक दस्तावेज होता है और उसका उद्देश्य अपने लक्षित वैचारिक समाज व्यवस्था को विकसित और सुरक्षित करने के लिए एक शासन प्रणाली विकसित करना होता है। इस तरह हम यह पाते हैं कि लोकतंत्र के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार महत्वपूर्ण है और वह लक्ष्य की प्राप्ति से भी जुड़ा हुआ है।

आखिर हम संसदीय लोकतंत्र में प्रेस और मीडिया को चौथे स्तंभ के रूप में क्यों प्रचारित करते रहे हैं?

जैसा कि माना गया है कि तकनीक की सुविधा जनसंचार को व्यापक बनाती है। लेकिन ज्यादा से ज्य़ादा लोगों को एक साथ संबोधित करने की सुविधा से अभिव्यक्ति की आजादी के संदर्भों यानी उसके उद्देश्यों को नहीं छोड़ा जा सकता है। इसीलिए चौथा स्तंभ होने का भरोसा तभी कायम रह सकता है जब वह संविधान के लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में सक्रिय हो। यह बार-बार याद कराने की जरूरत होती है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार नागरिकों के लिए है। वह संविधान के तीनों अंगों पर अपनी नजर रखने, उससे शिकायत करने, उससे अपेक्षा करने, नागरिकों के मौलिक अधिकारों व मानवाधिकारों के हनन के हालात के खिलाफ माहौल विकसित करें। जब तक यह काम जनसंचार के माध्यम करते हैं तभी तक उसे चौथे स्तंभ के रूप में स्वीकार्यता हासिल हो सकती है।

भारतीय मीडिया : राेज-ब-रोज घट रही विश्वसनीयता

दरअसल, अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार एक संस्था का रूप है। उसे नागरिक पालिका के तौर पर देखा जाना चाहिए जो कि अनौपचारिक ढांचे में बंधी है। नागरिक पालिका जिस तरह संविधान के तीन स्तंभों वाली शासन प्रणाली को स्वीकार करता है उसी तरह से वह अपने अनौपचारिक ढांचे के बीच कई ऐसी औपचारिक संस्थाओं का भी निर्माण करता है या अपनी स्वीकृति देता है जो कि नागरिक पालिका के उद्देश्यों, जिम्मेदारियों व कर्तव्यों में सहायक हो सकता है। जनसंचार के माध्यम नागरिक पालिका के एक सहायक के तौर पर होते हैं। वह एक मात्र चौथा स्तंभ नहीं होता।

सवाल यह है कि अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार आमतौर पर बहाल नहीं हो, तो क्या प्रेस या मीडिया चौथे स्तंभ के रूप में बना रह सकता है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माध्यम पर निर्भरता नहीं रख सकती है। सर्वविदित है कि प्रेस या मीडिया किसी कंपनी या किसी विशेष समूह द्वारा संचालित व नियंत्रित होती है। इस तरह तो कंपनी और खास आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक हितों से जुड़े समूह के अर्थ में चौथा स्तंभ जुड़ जाता है।

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में प्रेस के नारे को प्रेस या मीडिया को संचालित व नियंत्रित करने वाली कंपनियों व समूहों ने लोकप्रिय बनाने में पूरी ताकत लगाई जबकि ब्रिटिश काल में भी यह देखा गया कि बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा संचालित प्रेस यानी समाचार पत्रों ने अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के बजाय अपने हितों को तरजीह दिया। ब्रिटिश सत्ता से मुक्ति के लिए आम लोग संघर्ष कर रहे थे और स्वयं को संगठित करने की कोशिश कर रहे थे। 1947 के बाद तो भारतीय संसद के दस्तावेजों में संसदीय प्रतिनिधियों के इस तरह के भाषण भरे पड़े हैं, जिनमें समाचार पत्र व प्रकाशन नियंत्रित और संचालित करने वाली कंपनियां व फर्म अपने फायदे के लिए आम लोगों के अभिव्यक्ति के विचारों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही हैं। आर्थिक ताकत के बूते ये कंपनियां समाज में अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का इस्तेमाल कर लोगों के बीच में झगड़े-फसाद को बढ़ावा दे रही हैं।

सन् 1955 के अगस्त महीने में प्रेस आयोग के प्रतिवेदन पर संसद में बहस का रिक़ॉर्ड देखें। यह स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश सत्ता की गुलामी से आजादी के बाद कैसे खास तरह के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक समूह प्रेस पर अपना एकाधिकार बनाए रखने की योजना को लेकर सक्रिय हैं।

एडमंड बर्क के नारे को आजादी के बाद भी ज्यादा से ज्यादा लोकप्रिय करने का यह नतीजा देखा गया कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अभिव्यक्ति की आजादी का नारा पृष्ठभूमि में धंसता चला गया। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया कंपनियां मजबूत होती चली गईं, और मीडिया पर उनका एकाधिकार मजबूत होता चला गया।

दूसरी तरफ नागरिक पालिका यानी नागरिक संस्थाओं के निर्माण को लेकर चेतना धुंधली होती गई। आज देश की लगभग 50 कंपनियां हैं, जो जनसंचार के तंत्र को नियंत्रित व संचालित करती हैं। दूसरी तरफ यह भी कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की चेतना स्वतंत्र तौर पर विकसित होने के बजाय प्रेस या समाचार पत्र चलाने वाली कंपनियों पर निर्भरता की शिकार हो गई। आजादी के मूल में आत्मनिर्भरता का भरोसा रहा है। लेकिन उसके स्रोत के रूप में विकसित किए अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के सामने परजीविता की स्थितियां विकसित की गईं।

चौथे स्तंभ का आखिर यही अर्थ है जिसमें यह माना जाता है कि लोकतंत्र की विचारधारा को मजबूत, विकसित और सुरक्षित रखने के लिए जो व्यवस्थागत ढांचा तैयार किया गया है, उस पर निगरानी रखने की चेतना निगरानी के रिश्ते के प्रश्न और सुधार से जुड़ा है। वह सुधार से ज्यादा परिवर्तन करने तक जाता है। प्रेस को भी जब चौथे स्तंभ के रूप में प्रचारित किया जाता है, तो उसका महत्व भी उसकी निगरानी के रूप में व्यक्त किया जाता है। लेकिन नागरिक और किसी कंपनी की निगरानी के बीच एक बुनियादी फर्क होता है। नागरिक की निगरानी यानी समस्त नागरिकों की नजर और अपेक्षा से जुड़ा होता है, जबकि कंपनी की निगरानी उसके हितों से टकराती है। उसके हितों से सुझाव और सुधार की दृष्टि नत्थी होती है।

नागरिक पालिका ही चौथा स्तंभ है जिसकी जिम्मेदारी अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार को इस्तेमाल करने की है। 

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

अनिल चमड़िया

वरिष्‍ठ हिंदी पत्रकार अनिल चमडिया मीडिया के क्षेत्र में शोधरत हैं। संप्रति वे 'मास मीडिया' और 'जन मीडिया' नामक अंग्रेजी और हिंदी पत्रिकाओं के संपादक हैं

संबंधित आलेख

बिहार में मजदूरी मांगने पर हिंसा, उठते सवाल
चंदेश्वर चौधरी के परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों ने ग्रामीण समाज में पीढ़ियों से चले आ रहे श्रम-संबंधों और शोषण पर भी...
नजीब के बिना दस साल : क्या हुआ ‘जेएनयू के विचार’ और समानता के उसके वादे का?
अगर यह पूछना कि ‘नजीब कहां है?’ शत्रुतापूर्ण हरकत है तो हमें यह पूछना चाहिए कि आखिर हम किस विचार की रक्षा कर रहे...
जंतर-मंतर महज स्थान नहीं, सामूहिक अभिव्यक्ति की आजादी की संस्था है
संसदीय लोकतंत्र में संसद से अभिव्यक्ति के अधिकार की गूंज को दूर करने के प्रयास सत्ता द्वारा निरंतर होते रहे हैं। अभी हाल तक...
विपक्ष के ज्ञापन पर राष्ट्रपति के मौन रहने के मायने
राष्ट्रपति के अधिकारिक भाषण को तैयार करने की एक प्रक्रिया होती है और उसमें राष्ट्रपति का कार्यालय मुख्य रूप से शामिल होता है। लेकिन...
जातिगत जनगणना में ओबीसी कॉलम की मांग को लेकर दिसंबर में बड़े आंदोलन का ऐलान
बैठक में मांग की गई कि वर्ष 2027 की जनगणना में ओबीसी के लिए स्वतंत्र एवं पृथक कॉलम शामिल किया जाए, ताकि ओबीसी समाज...