h n

डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की साहित्यिक, भाषायिक व वैचारिक यात्रा

डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की प्रकाशित कृतियां भाषा-विज्ञान, साहित्यालोचना, इतिहास-बोध, लोकसंस्कृति तथा बहुजन विमर्श के विविध आयामों को अपने आप में समेटी हुईं हैं। वे बौद्ध चेतना, बहुजन साहित्य विमर्श तथा सामाजिक न्याय की वैचारिकी को समृद्ध करने वाले एक महत्त्वपूर्ण बौद्धिक हस्ताक्षर हैं। उनके जीवन व साहित्यकर्म के बारे में बता रहे हैं हरेराम सिंह

डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह समकालीन हिंदी साहित्य, भाषा-विज्ञान और आलोचना-जगत के ऐसे विशिष्ट विद्वान हैं, जिन्होंने अपने व्यापक अध्ययन, मौलिक चिंतन और निरंतर सृजनशीलता के माध्यम से हिंदी साहित्य को नई वैचारिक दृष्टि प्रदान की है। साथ ही उन्होंने बौद्ध-इतिहास को नया आयाम दिया है। उन्होंने भारतीय साहित्य और भाषा में उस चिंतन को खास रूप से प्रभावित एवं विकसित किया है, जिसे लोकतांत्रिक कहा जाता है और जहां समाज का वंचित तबका अपने आप को साहित्य और इतिहास में खुद को मजबूती के साथ खड़ा पाता है। साहित्य, इतिहास, राजनीति एवं दर्शन के क्षेत्र में वंचित-शोषित तबके के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। बौद्ध इतिहास को नए सिरे से देखने-परखने का उन्होंने जो औजार विकसित किए हैं, उससे न केवल इतिहास वरन् भाषा और साहित्य का मूल्यांकन भी आसान हुआ है और इसका यह परिणाम हुआ है कि कबीर और रैदास का मूल्यांकन भी बौद्ध-पद्धति से होना शुरू हो गया है।

जीवन-परिचय

डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह का जन्म बिहार के रोहतास जिला के दिनारा प्रखंड के अरंग गांव में 5 नवंबर, 1965 को एक संपन्न किसान परिवार में हुआ। उनके माता-पिता का नाम क्रमशः रेशमा देवी तथा बुद्ध राम सिंह है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांवों में हुई। स्नातकोत्तर की शिक्षा उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर से पूरी की। फिर 1996 में उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट किया। इसके बाद 1996 में लेक्चरर के रूप में वीरकुंवर सिंह विश्वविद्यालय की अंगीभूत इकाई शांति प्रसाद जैन महाविद्यालय, सासाराम में नियुक्त हुए। अध्यापन के इस सफर में 2024 में एसपी जैन कॉलेज सासाराम के हिंदी विभागाध्यक्ष रहे तथा 25 जुलाई, 2025 को रोहतास महिला कॉलेज, सासाराम के प्राचार्य नियुक्त हुए। डॉ. सिंह ने भारत के कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों को बनाया एवं चार दर्जन के आसपास पुस्तकों की रचना की।

बिहार सरकार ने भाषा के क्षेत्र में विशेष कार्य के लिए उन्हें डॉ. ग्रियर्सन पुरस्कार (2016-17) से सम्मानित किया। उनकी पुस्तकें अंग्रेजी, मराठी, गुजराती, बांग्ला, पंजाबी आदि भाषाओं में अनूदित हुई हैं। देश के अनेक विश्वविद्यालयों में उनकी पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं। ‘भाषा’, ‘आजकल’, ‘हंस’, ‘समकालीन भारतीय साहित्य’, ‘गवेषणा’, ‘साहित्य अमृत’, ‘साक्ष्य’, ‘मध्य भारती’, ‘नटरंग’, ‘वागर्थ’, ‘भाषा भारती’, ‘योजना’, ‘कथाक्रम’, ‘फारवर्ड प्रेस’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में वे छपते रहे हैं। साहित्यकारों में कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, केदारनाथ सिंह, राजमल बोरा, रमणिका गुप्ता, मधुकर सिंह जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों ने डाॅ. राजेंद्र प्रसाद सिंह के कार्यों की प्रशंसा की है। इसके अलावा वे वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, छपरा सिंडिकेट में बिहार सरकार द्वारा दो बार मनोनीत सदस्य रहे।

पुस्तकें, जिनसे बहुजन साहित्य समृद्ध होता है

डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें 42 से ऊपर हैं। उनकी प्रमुख पुस्तकों में ‘भाषा का समाजशास्त्र’ (2004), ‘भारत में नाग परिवार की भाषाएं’ (2006, 2010 में अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित), ‘भोजपुरी के भाषाशास्त्र’ (2006), ‘भोजपुरी व्याकरण, शब्दकोश और अनुवाद की समस्या’ (2008), ‘द री-राइटिंग प्रॉब्लम्स ऑफ भोजपुरी ग्रामर, डिक्शनरी एंड ट्रांसलेशन’ (2008), ‘हिंदी साहित्य का सबाल्टर्न इतिहास (2009), ‘आधुनिक भोजपुरी के दलित कवि और काव्य’ (2010), ‘हिंदी साहित्य प्रसंगवश’ (2010), ‘भोजपुरी भाषा व्याकरण आ रचना’ (2011), ‘हिंदी की लंबी कविताओं का आलोचना-पक्ष’ (2011), ‘ओबीसी साहित्य-विमर्श’ (2014), ‘भाषा, साहित्य और इतिहास का पुनर्पाठ’ (2016), ‘हिंदी के प्रमुख भाषावैज्ञानिक’, ‘बोलियां एवं अस्मितामूलक भाषाविज्ञान’ (2019), ‘छिपाए रैदास बाहर आए’ (2022), ‘नए औजार से कबीर की खुदाई’ (2026) मुख्य हैं। बुद्ध एवं सम्राट असोक से संबंधित इतिहास-पुस्तकों में ‘इतिहास का मुआयना’ (2017), ‘खोए हुए बुद्ध की खोज’ (2018), ‘बौद्ध सभ्यता की खोज’ (2020), ‘बौद्ध इतिहास की झलक’ (2023), ‘सम्राट असोक का सही इतिहास’ (2023), ‘इतिहास में घूमता हुआ धम्म-चक्क’ (2023), ‘भारत में असोक-राज’ (2024) आदि उल्लेखनीय हैं।

अन्य पुस्तकों में ‘दलित साहित्य का इतिहास-भूगोल’ (2008), ‘भोजपुरी-हिंदी-इंग्लिश लोक शब्दकोश’ (2009), ‘पंचानवे भाषाओं का समेकित पर्याय शब्दकोश’ (2010), ‘साहित्य में लोकतंत्र की आवाज’ (2010), ‘ओबीसी साहित्य का विविध आयाम’ (2015) शामिल हैं। इनके अलावा भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने कई पुस्तकों का लेखन एवं संपादन किया है। मसलन, ‘जगदेव प्रसाद वाङ्मय’ (2011) तथा ‘सुखदेव प्रसाद वर्मा’ (2018) जैसे बहुजन नायकों पर पुस्तकों का संपादन उनकी खास उपलब्धि रही है।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की कुछ किताबें

भाषाविज्ञान की बहुजन व्याख्या

डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने हिंदी भाषा और साहित्य को नए नजरिये से देखा। उन्होंने वैदिक भाषा, संस्कृत भाषा और आमजन की भाषा का गहरा तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया तथा उनके बीच के अंतर्संबंधों को न सिर्फ और स्पष्ट किया, बल्कि कई नई स्थापनाएं भी दी। उन्होंने ‘भाषा का समाजशास्त्र’ में स्पष्ट लिखा है कि– “समाज-भाषा विज्ञान के माध्यम से भारतीय समाज के उन दबाव-समूहों की शिनाख्त की जानी बाकी है जिन्होंने भाषायी व्यवस्था को अपने सांचे में ढाला है एवं गलत-सही स्थापनाओं को इनकी संपुष्टि में इस्तेमाल किया है।” और स्थापना के तौर पर बताया है कि संस्कृत की प्राचीनता इससे प्रमाणित नहीं होती कि उसमें ‘घ, ध, भ’ जैसी ध्वनियां हैं। महाप्राण स्पर्श ध्वनियां के होने के कारण के रूप में वे ‘वर्ण-संकोच’ को मानते हैं। प्राकृत भाषा के साथ और ऐसे कई देशी शब्द हैं जिनके वर्ण-संकोच से वैदिक भाषा ने अपने को संस्कारित किया है। उन्होंने भोजपुरी के ‘हलुक’ से संस्कृत का ‘लघु’ शब्द की व्युत्पत्ति माना है। उन्होंने एक वैदिक कवि की चर्चा इसी क्रम में किया है, जहां वह बताता है कि विद्वतगोष्ठियों में बैठकर हमने एक-एक शब्द को छाना है जैसे सत्तू को छलनी से छाना जाता है। मतलब साफ है कि वैदिक भाषा के शब्दों से पूर्व भी शब्द थे, जिसे वैदिक कवि छान रहे थे। फिर तो कोई अंतर्विरोध रह ही नहीं जाता है कि वेदों की भाषा बिल्कुल आदिम थी। वैदिकों ने मगध क्षेत्र में जाना कभी पसंद नहीं किया। मगध में मरने से मुक्ति नहीं मिलती और वहां जाने पर प्रायश्चित के लिए गंगा-स्नान का प्रावधान है। मगध की भाषा को ‘तैत्तरीय ब्राह्मण’ में ‘कर्णकटु’ बताया गया है। यह मगधों के साथ आर्यों का दुराव भाव ही था, क्योंकि वे उदीच्य प्रेमी थे और प्राच्य-प्रदेश की प्राकृत भाषा को निम्न समझते थे। ध्यान से देखें तो यह ब्रिटिशों की भाषाई पूर्वाग्रहों की भांति है, जो आजतक चली आ रही है और यही कारण है कि आज भी देशी बोली को, आदिवासियों की भाषा को उचित सम्मान नहीं मिल पाया है।

बहुजनों के इतिहासवेत्ता

डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने इसी तरह ‘हिंदी साहित्य का सबाल्टर्न इतिहास’ में वैसे हिंदी के इतिहास लेखकों को रेखांकित किया है जो बिना तासी, ग्रियर्सन और शिवसिंह को पढ़े साहित्येतिहास में गलत तथ्य दर्ज किए हैं। हिंदी साहित्य के इतिहास को देखें तो कई ऐसी बातें उभरकर सामने आती हैं जहां पक्षपात, विद्वेष एवं घृणा तक दिख जाती है। सिद्धों की भाषा के प्रति आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नजरिया अच्छा नहीं है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह राहुल सांकृत्यायन की स्थापना के साथ खड़े दिखते हैं जहां सिद्धों की भाषा पुरानी हिंदी में संस्कृत के विपरीत लिंगों, वचनों और कारकों की संख्या में निरंतर कमी दिखाई देती है और क्रियाएं, वाक्य-संरचना एवं पदक्रम हिंदी के अत्यंत निकट हैं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने माना है कि “हिंदी साहित्य का आरंभ बिहार के मगह क्षेत्र से होता है।” अपने सबाल्टर्न इतिहास में डॉ. सिंह ने यह भी माना है कि योगियों से अधिक प्रगतिशील सिद्ध थे।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह

इस किताब के ‘वीरगाथाकाल का मिथ’ शीर्षक अध्याय में आचार्य रामचंद्र शुक्ल पर डॉ. सिंह का आरोप है कि “वे जानते थे कि वीरगाथाकाल की सामग्री संदिग्ध है फिर भी धीर-गंभीर शुक्ल जी कपोलकल्पित मिथ रच डाले। कारण था कुछ भट्ट ब्राह्मण-रचनाकारों को साहित्य के इतिहास में स्थान देना। उनमें तीन उत्तर प्रदेश के थे। शुक्ल जी का संबंध भी उत्तर प्रदेश के बस्ती जिला, मिर्जापुर एवं काशी से था। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने तुलसी दास को जिस तरह से सराहा है वह भी अकारण नहीं है और न ही कबीर की उपेक्षा, क्योंकि कबीर बड़ी जाति से संबंध नहीं रखते थे।”

डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने ‘नए औजार से कबीर की खुदाई’ में लिखा है कि “जिस संत साहित्य में कबीर और रैदास से लेकर घासीदास तक बड़े-बड़े कवि हुए, उसी संत साहित्य को शुक्ल जी ने लिखा है कि इनकी रचनाएं साहित्यिक नहीं हैं और भाषा ऊटपटांग है।” उन्होंने ‘गगन घटा घहरानी’ कबीर के पद में ‘पूरब दिसा से उठी है बदरिया’ का अर्थ बोधगया एवं ज्ञान-घटा से लगाया है कि “पूरब दिशा क्या है? वही पूरब का बोध गया है। यहीं से घटा पश्चिम चली।”

कबीर के संबंध में डॉ. सिंह के ‘भारत-मत दर्पण’ के हवाले से बताया है कि रामानंद कबीर के जन्म से 44 वर्ष पहले ही गुजर गए थे तो फिर कबीर उनके शिष्य कैसे हुए? इस तरह उन्होंने साहित्येतिहास के कई ऐसे घालमेल का पर्दाफाश किया है, जिसे कोई तार्किक एवं तत्यपरक मस्तिष्क इनके तथ्यों के आगे उसे स्वीकार करने से इंकार कर देगा। ‘छिपाए रैदास बाहर आए’ में रैदास बुद्ध की तरह वर्ण-व्यवस्था का विरोध करते नजर आ रहे हैं– “मुरिख हैं जो करत हैं, बरन अबरन विचार।” वे यह भी लिखते हैं कि “रैदास जीव मत मारहिं, इक साहिब सभ मांहि।” यहां भी बुद्ध का प्रभाव स्पष्ट है। सच पूछा जाए तो कबीर और रैदास का प्रभाव ‘भक्तिकाल’ पर जबरदस्त है। डॉ. सिंह ने उस कोण को ही बदल डाला है, जिससे लोग अब तक इन्हें देखते आए थे। इसलिए डॉ. सिंह की ये दोनों आलोचना-पुस्तकें हिंदी साहित्य के लिए ‘टर्निंग प्वाइंट’ हैं, जहां से सिर्फ आगे ही देखा जा सकता है। शायद यही वजह है कि डॉ. ललन प्रसाद सिंह ने उनके बारे में लिखा है– “डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की आलोचना-दृष्टि भी अन्य आलोचकों से भिन्न है।” 

डॉ. सिंह की किताब ‘इतिहास का मुआयना’ (हर्ष विवेक राज द्वारा ‘हिस्ट्री ऑन ट्रायल’ शीर्षक से अंग्रेजी में अनूदित) में बताया गया है कि सिंधु घाटी सभ्यता आस्ट्रो-द्रविड़ों की ही है। दरअसल बौद्ध सभ्यता का क्रमशः विकास हुआ है। और यह सभ्यता कबीर और रैदास में भी दिखाई देती है– “एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढ़ा सिंह चरावै गाई।” कबीर इसके प्रमाण हैं। असोक स्तंभ का चित्रण कबीर में अचानक नहीं हुआ है। डॉ. सिंह मानते हैं कि बौद्ध सभ्यता का प्रचार उत्तर में मौर्यों ने किया तो दक्षिण में सातवाहनों ने। दोनों के अभिलेखों की भाषा प्राकृत थी। दोनों में संस्कृत में अभिलेख नहीं मिलते हैं। उत्तर एवं दक्षिण भारत के अनेक प्रांतों में स्तूप, चैत्य एवं बौद्ध गुफाएं विद्यमान है। फिर भला कोई भी भारतीय साहित्यकार इससे अछूता कैसे रह सकता है यदि वह समता एवं लोकतांत्रिक ढांचे को पसंद करता है।

वैदिक बनाम आमजनों का साहित्य

डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह आधुनिक हिंदी साहित्येतिहास के अलहदा साहित्यकार व विचारक हैं। वैदिक भाषा को लेकर दी गईं उनकी स्थापनाएं अलहदा तो हैं ही, ग्रामीण जीवन की संवेदनाओं, लोकसंस्कृति की गहरी समझ और सामाजिक यथार्थ के प्रति सजग दृष्टि ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को और विशिष्ट आयाम प्रदान करता है। ‘भोजपुरी के भाषा शास्त्र’ इसका प्रमाण है।

 

डॉ. सिंह का साहित्यिक अवदान बहुआयामी है। वे भाषा-विज्ञानी, आलोचक, इतिहास-दृष्टा, संपादक और अध्यापक के रूप में समान रूप से प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने साहित्य को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम न मानकर उसे समाज, संस्कृति और इतिहास के अंतर्संबंधों को समझने का सशक्त माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया है। उनके चिंतन का केंद्र सदैव वे समुदाय रहे हैं, जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास और साहित्य में अपेक्षित स्थान नहीं मिल सका है। इस दृष्टि से उनका लेखन सामाजिक न्याय, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज बन जाता है।

विशेष रूप से बौद्ध चेतना, बहुजन विमर्श और सामाजिक परिवर्तन की वैचारिकी को साहित्यिक बहस के केंद्र में स्थापित करने में उनका योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने बुद्ध, कबीर, रैदास, जोतीराव फुले, डॉ. भीमराव आंबेडकर और जगदेव प्रसाद की समतामूलक परंपरा को साहित्यिक विमर्श से जोड़ते हुए ‘ओबीसी साहित्य’ और ‘बहुजन साहित्य’ को सैद्धांतिक आधार प्रदान किया है। ‘ओबीसी साहित्य विमर्श’ में उन्होंने लिखा है— “ओबीसी साहित्य पुराना है। इसकी चर्चा नई है जैसे कि न्यूटन के पहले भी गुरुत्वाकर्षण था। हिंदी का कोई भी आलोचक अथवा इतिहासकार ओबीसी साहित्य की धारा को आदिकाल से लेकर मध्यकाल और आधुनिक काल तक अत्यंत सहज ढंग से पहचान सकता है।” इसलिए कबीर के साहित्य को वे ओबीसी साहित्य मानते हैं। कबीर के पदों में श्रमशील जातियों का दर्शन बखूबी होता है। डॉ. सिंह तो मानते हैं कि “कबीर को ओबीसी की श्रमशील जातियों से बेहद लगाव था।” इतना ही नहीं वे बताते हैं कि बुद्ध और कबीर के बीच दो हजार वर्षों के अंतर के बावजूद कबीर की साखियों में अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण स्पष्टतः देखा जा सकता है।

ऐसे भी साहित्य का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य की गरिमा, स्वतंत्रता और समानता की स्थापना है। उनका लेखन वंचित, उपेक्षित और श्रमशील समाज की आकांक्षाओं तथा संघर्षों का प्रतिनिधित्व करता है। वे भी मनुष्य को मनुष्य समझने के पक्षधर हैं। वे भी महावीर प्रसाद द्विवेदी की तरह मानते हैं कि मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है। इसलिए वे वंचितों एवं उपेक्षितों के साथ हर जगह खड़े नजर आते हैं।

उनकी चर्चित कृति ‘ओबीसी साहित्य-विमर्श’ हिंदी साहित्य में ओबीसी साहित्य के साथ-साथ बहुजन साहित्य की अवधारणा को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली कृति है।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की प्रकाशित कृतियां भाषा-विज्ञान, साहित्यालोचना, इतिहास-बोध, लोकसंस्कृति तथा बहुजन विमर्श के विविध आयामों को अपने आप में समेटी हुईं हैं। वे बौद्ध चेतना, बहुजन साहित्य विमर्श तथा सामाजिक न्याय की वैचारिकी को समृद्ध करने वाले एक महत्त्वपूर्ण बौद्धिक हस्ताक्षर हैं। उनके लेखन ने हिंदी साहित्य में बहुजन साहित्यिकी को वैचारिक दृढ़ता, अकादमिक आधार प्रदान किया है। उनके कार्यों का यह प्रभाव रहा है कि भाषा, साहित्य और इतिहास को परखने का, उसे मापने का जो औजार या दृष्टिकोण उनके द्वारा विकसित किया है, उससे साहित्य और इतिहास में हुए घालमेल को आसानी से न केवल समझा जा सकता है, बल्कि उससे उत्पन्न हुई वैचारिक विपन्नता जो अंततः साहित्य और इतिहास के लिए हानिकारक सिद्ध हुई हैं। प्रमाण के साथ बद्धमूल भी किया जा सकता है।

संदर्भ :

  1. सिंह, राजेंद्र प्रसाद (2004), भाषा का समाजशास्त्र, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
  2. सिंह, राजेंद्र प्रसाद (2009), हिन्दी साहित्य का सबाल्टर्न इतिहास, गौतम बुक सेंटर, दिल्ली
  3. सिंह, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, कुमारी, डॉ. शशिकला (2026), नए औजार से कबीर की खुदाई, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली
  4. सिंह, डॉ. राजेंद्र प्रसाद (2022), छिपाए रैदास बाहर आए, सम्यक प्रकाशन- नई दिल्ली
  5. सिंह, डॉ. राजेंद्र प्रसाद (2017), इतिहास का मुआयना, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली
  6. सिंह, ललन प्रसाद (2011), प्रगतिवादी आलोचना : विविध प्रसंग, किशोर विद्या निकेतन, भदैनी, वाराणसी
  7. सिंह, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, (2026), हिस्ट्री ऑन ट्रायल, अनुवाद : हर्ष राज,सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली
  8. सिंह, डॉ. राजेंद्र प्रसाद (2014), ओबीसी साहित्य विमर्श, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली
  9. कुमार, अरविंद सं. (2009), भोजपुरी-हिन्दी-इंग्लिश लोकशब्द, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा
  10. सिंह, डॉ. हरेराम, संपादक (2021), डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह : नए साहित्य और इतिहास की खोज, नोशन प्रेस, चेन्नई
  11. सिंह, डॉ. राजेंद्र प्रसाद (2023), सम्राट असोक का सही इतिहास, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली
  12. सिंह, डॉ. राजेंद्र प्रसाद (2018), खोए हुए बुद्ध की खोज, कौटिल्य बुक्स, नई दिल्ली
  13. सिंह, डॉ. हरेराम (2019), डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की वैचारिकी, संस्मरण एवं साक्षात्कार, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

हरेराम सिंह

शिक्षक व लेखक डॉ. हरेराम सिंह के लेखन के केंद्र में बहुजन वैचारिकी रही है। इनकी प्रकाशित कृतियों में ‘हाशिए का चांद’, ‘रात गहरा गई है’, ‘मुक्ति के गीत’, ‘जामुन का पेड़’, ‘वैशाली की पूनो’, ‘मां, प्रेम और अंधेरा’ (सभी काव्य संग्रह), ‘ओबीसी साहित्य का दार्शनिक आधार’ और ‘ओबीसी साहित्य की आलोचना पद्धति’ आदि शामिल हैं। साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए इन्हें साहित्य साधना सम्मान, अशोक रत्न सम्मान, डॉ. अभय साहित्य पुरस्कार, कविवर पोद्दार रामावतार ‘अरुण’ सम्मान, डॉ. राम प्रसाद सिंह अंतर्राष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार एवं आचार्य रामचंद्र शुक्ल सम्मान प्रदान किए गए हैं।

संबंधित आलेख

‘पीली छतरी वाली लड़की’ की जाति
अगर विश्वविद्यालय में दिखाई देने वाला जातिवाद आसमान से नहीं टपका है, बल्कि यह समाज में मौजूद जातिवाद का ही विस्तार है, तो फिर...
खड़ी बोली की कविता जगत को चुनौती देतीं राजेश पाल की कविताएं
कवि सवाल करता है कि ‘फिर चमारीखेड़ा के नाम में ऐसा क्या चुभ गया, जो लोगों को रास नहीं आता’। तथाकथित ऊंची जाति वालों...
आदिवासी स्त्रियों के साथ होने वाले शोषण की दास्तान
जसिंता केरकेट्टा की बीस कहानियों का संग्रह ‘औरत का घर’ इस विरोधाभास को बख़ूबी उजागर करता है कि एक ओर आदिवासी समाज ‘दिक्कू’ व्यवस्था...
दो महात्माओं की कहानी
इस पुस्तक का केंद्रीय संदेश यही है कि महात्मा की उपाधि से अधिक महत्वपूर्ण यह देखना है कि वह मनुष्य किसके पक्ष में खड़ा...
वर्चस्ववादी विमर्शों के खिलाफ प्रति-विमर्श बयान करता एक लघु उपन्यास
‘हड़प्पा: गॉड्स सिटी ऑफ़ सिविलाईजेशन’ – कांचा आइलैय्या शेपर्ड का कथा साहित्य के क्षेत्र में प्रवेश एक साहसिक कदम है। यह एक उद्घोषणा है...