h n

नाथ पंथ और मछन्दरनाथ

वैचारिक स्तर पर सिद्धों और नाथों में काफी समानताएं हैं। दोनों ने लोक भाषा में काव्य-रचना की है। दोनों का जोर सहज अथवा नैसर्गिक जीवन पर था। दोनों ने ब्राह्मणवाद और वर्णव्यवस्था का खंडन किया है। दोनों ने मन की शुद्धि और स्थिरता की बात कही है। योग, ध्यान और समाधि दोनों के साधन हैं। दोनों ही बौद्ध-परंपरा में हैं। बता रहे हैं कंवल भारती

सिद्धों का समय 800 से 1200 ई. तक माना जाता है। ये 84 सिद्ध माने जाते हैं। इन 84 सिद्धों से ही नाथ पंथ निकला है, जिसने 12वीं से 14वीं सदी तक संत-काव्य धारा को प्रभावित किया था। अतः हम कह सकते हैं कि सिद्धों के समय में ही नाथ पंथ भी अस्तित्व में था। दूसरे शब्दों में सिद्ध और नाथ समकालीन थे। किन्तु सिद्धों की सूची बनाने वालों ने नाथों को भी सिद्धों में ही रखा है। स्वयं नाथों ने भी अपने को सिद्ध ही कहा है।

84 सिद्धों में 46वें सिद्ध जालन्धरपाद हैं, जिन्हें नाथ पंथ का प्रवर्तक माना जाता है। उन्हें आदिनाथ भी कहा गया है। अन्य सिद्धों में मीनपा, नागार्जुन, कण्हपा, चर्पटीपा और कंतालीपा भी नाथपंथी माने जाते हैं।

पूरा आर्टिकल यहां पढें : नाथ पंथ और मछन्दरनाथ

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

संबंधित आलेख

स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ का आदि-हिंदू आंदोलन और नवजागरणकालीन संपादकों का नजरिया
औपनिवेशिक भारत में जब स्वामी अछूतानंद ने पांच करोड़ अछूतों की हिंदू धर्म से अलग पहचान का दावा पेश किया तो हिंदी लेखक उनका...
फुले दंपति की विरासत और मौजूदा दौर में संघर्ष व चुनौतियां
आज अनेक अवसरों पर फुले दंपति के नाम और व्यक्तित्व का सम्मान किया जाता है, लेकिन उनके मनुस्मृति-विरोधी, जाति-विरोधी और ब्राह्मणवादी ज्ञान-सत्ता की आलोचना...
मंगू राम मुगोवालिया, आद धर्म आंदोलन और रविदास पंथ का उदय
यद्यपि पंजाब के अछूत समुदाय में पहले से ही गुरु रविदास (रैदास) के प्रति गहन श्रद्धा भाव था मगर आद धर्म आंदोलन ने अत्यंत...
जब दयानंद सरस्वती के विरोधियों के सामने खड़े हो गए फुले
विभिन्न लेखकों द्वारा दिए गए विवरणों से पता चलता है कि दयानंद के जुलूस की तैयारी कर रहे रानाडे जैसे सुधारवादी नेताओं ने जुलूस...
‘किसान का कोड़ा’ : फुले की वह कृति, जिसकी प्रासंगिकता आज भी है
फुले की इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अपने समय से बहुत आगे की सोचती है। वे केवल किसानों की...