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आरएसएस का सीएमसी, वेल्लोर जैसा अस्पताल क्यों नहीं? कांचा काइतैय्या के जीवन से सबक

स्वाधीनता के बाद अगर किसी हिंदुत्ववादी ताकत का हमारे देश पर राज कायम हो गया होता और उसने सीएमसी को बंद करवा दिया होता तो कांचा काइतैय्या अकाल मृत्यु का शिकार हो जाते। हाल में दिवंगत हुए अपने बड़े भाई के अंधविश्वासमुक्त जीवन व समकालीन समाज के बारे में बता रहे हैं कांचा आइलैय्या शेपर्ड

कांचा काइतैय्या का जन्म 1948 में पापैय्या पेट नामक जंगल में बसे एक छोटे-से गांव में हुआ था, जो आज के तेलंगाना के चेन्ना राव पेट मंडल का हिस्सा था। पास के एक कस्बे से 11वीं क्लास पास करने के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। फिर उनकी शादी हो गई और वे अपने परिवार के नक्शेकदम पर चलते हुए किसान और चरवाहा बन गए।

सन् 1976 में उन्हें दिल की एक गंभीर बीमारी हो गई। हैदराबाद के डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि उनके दिल के दो वॉल्व काम नहीं कर रहे हैं और उनका बचना मुश्किल है।

सीएमसी वेल्लोर

पता चला कि वॉल्व बदलने का काम यदि कहीं हो सकता है तो वह केवल तमिलनाडु के वेल्लोर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (सीएमसी) अस्पताल में। तत्कालीन संयुक्त आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद में उस समय एक भी पूर्ण रूप से प्रशिक्षित हृदय रोग विशेषज्ञ नहीं था। वहां ईकोकार्डियोग्राम तक नहीं होता था।

काइतैय्या हिम्मत हारने वाले आदमी नहीं थे। उन्होंने पैसे जुटाए और सीएमसी, वेल्लोर पहुंच गए। अपने छोटे भाई (इस लेखक), जिसे उन्होंने हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय से एमए तक की पढ़ाई करवाई थी, की मदद से उन्होंने इलाज के लिए आर्थिक मदद मांगते हुए निज़ाम ट्रस्ट को दरखास्त दी।

उस समय ट्रस्ट दिल के गंभीर रोगियों को आर्थिक मदद देता था। काइतैय्या को 8 हजार रुपए की मदद दी गई। यह उनका पहला आर्थिक सहारा था। सीएमसी में पता चला कि उनके दिल के माईट्रल वॉल्व को बदलने की ज़रूरत है और यह किया जा सकता है। उनकी ज़िंदगी बदलने वाले उस अस्पताल में उनका एडमिशन नंबर 912829 था। पूरे ऑपरेशन पर उनके परिवार ने करीब 50 हजार रुपए खर्च किए, जिसका अधिकांश हिस्सा कर्ज था।

उन्हें बताया गया था कि उनकी मौत करीब है। सीएमसी ने उन्हें ज़िंदगी दी। 17 दिसंबर, 1979 को उनका ऑपरेशन हुआ। उसके बाद वे 46 साल और जिए और अभी हाल में 77 साल की उम्र में हैदराबाद के अपने घर में उनकी मृत्यु हुई।

विज्ञान का स्रोत

प्रश्न यह है वाॅल्व बदलने का यह काम एक ईसाई मिशनरी अस्पताल में क्यों हुआ, हिंदुत्व मिशनरी अस्पताल में क्यों नहीं? वर्तमान में देश की सत्ता पर काबिज आरएसएस-भाजपा का दावा है कि प्राचीनकाल से लेकर अब तक भारत ही सारे वैज्ञानिक ज्ञान का स्रोत रहा है और हमें पश्चिम से कुछ भी सीखने की ज़रूरत नहीं है।

पश्चिम में विज्ञान ने ईसाई धर्म के दकियानूसी विचारों से लोहा लेकर प्रगति की। मगर भारत में ब्राह्मण बुद्धिजीवियों – जो संपूर्ण ज्ञान के संरक्षक थे – ने मध्यकाल में कभी हिंदू रूढ़िवादिता को चुनौती नहीं दी। शूद्र, दलित और आदिवासी, जो भारत की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा हैं, और जिनके हिंदू होने का वे दावा करते हैं, को हिंदू रूढ़ियों को जानने-समझने और उन्हें चुनौती देने का मौका ही नहीं दिया गया। उन्हें हिंदू धर्म की भाषा – संस्कृत – सीखने की इज़ाज़त भी नहीं दी गई। हिंदू धर्म से कभी कोई गैलीलियो या कॉपरनिकस नहीं निकला।

अतीत की कमजोरियां

जो लोग आज हिंदुत्ववादियों को गोलबंद करने की कवायद कर रहे हैं, वे अतीत की अपने कमजोरियों को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। वे अपनी कमजोरियों को अपनी ताकत बताते हैं। वे अंधविश्वास को विज्ञान ठहराते हैं।

और इसी दृष्टिकोण के चलते भारतीय विश्वविद्यालय और शोध संस्थाएं, विशेषकर चिकित्सा संस्थान, खतरे में हैं। वे भारतीय युवकों को ऐसी संस्कृत पुस्तकें पढ़ने पर मजबूर कर रहे हैं जो अंधविश्वासों को धर्म और विज्ञान का दर्जा देती हैं।

इसमे कोई संदेह नहीं कि धर्म और विज्ञान के बीच एक गूढ़ और सूक्ष्म रिश्ता है। इस सृष्टि को किसी शक्ति ने सृजित किया या वह क्रमगत विकास से अस्तित्व में आई – यह मुद्दा धर्म और विज्ञान के बीच टकराव का सबब रहा है और इस पर लंबे समय से इतिहास बरअक्स आध्यात्मिकता विमर्श चलता आ रहा है। ईश्वर का विचार भी मनुष्य की कल्पना की उपज है।

मगर हिंदू धर्म का कर्म का सिद्धांत और ईसाई धर्म का आदम और हव्वा के मूल पाप (ओरिजिनल सिन) के सिद्धांत आदि अंधविश्वास की श्रेणी में आते हैं। अंधविश्वास और विज्ञान का कोई मेल नहीं है। चिकित्सा एक विज्ञान है और अस्पताल इस विज्ञान के संस्थागत केंद्र हैं।

इस्लाम, जो भारत में मध्यकाल में आया, के अपने अंधविश्वास हैं, जिनमें से एक यह है कि अल्लाह ही सारे रोग ठीक करता है। भारत में इस्लाम धर्मावलंबियों ने सीएमसी की टक्कर का कोई अस्पताल नहीं बनाया।

काइतैय्या जीवनपर्यंत अंधविश्वास के खिलाफ संघर्षरत रहे

दिल का मरीज़ बनने से बहुत पहले काइतैय्या को यह अहसास हो गया था कि अंधविश्वास ग्रामीणों की खुशहाली की राह में एक बड़ी बाधा है। इससे उनकी आर्थिक तकलीफें बढ़तीं हैं। अपने माता-पिता की मृत्यु के बाद काइतैय्या ने अपने घर में अंधविश्वासों पर आधारित रस्मों-रिवाजों को प्रोत्साहित नहीं किया। उन्होंने अपने पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी निभाई।

उस समय गांवों में अंधविश्वास का बोलबाला था। लोग तंत्र-मंत्र और गांव व आसपास के मंदिरों और पुरोहितों पर काफी धन खर्च करते थे। काइतैय्या अपनी स्कूली शिक्षा समाप्त करते-करते अंधविश्वासों के जाल से मुक्त हो चुके थे।

क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल द्वारा जारी रोगी पंजीकरण पत्र व इनसेट में कांचा काइतैय्या की तस्वीर

कोई भी व्यक्ति जब किसी गंभीर रोग से ग्रस्त हो जाता है तब वह अक्सर देवी-देवताओं और पुरोहित-साधुओं की शरण में चला जाता है। वेल्लोर जाते समय काइतैय्या कुछ समय के लिए तिरुपति में रुके। जब उनके तीमारदार भाई ने उनसे पूछा कि क्या वे देवदर्शन के लिए जाना चाहेंगे तो उन्होंने कहा, “अगर जो सर्जन मेरा ऑपरेशन करेगा वह अच्छा होगा, तो मेरी जान बच जाएगी। और उसके बाद जो डॉक्टर मेरे लिए दवाएं लिखेगा, वह अच्छा होगा तो मैं लंबे समय तक जिंदा रह सकूंगा। देवदर्शन से इस स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ेगा।”

और उन्होंने एक वॉल्व के सहारे 45 साल और 6 महीने तक जीवित रहकर यह साबित किया कि वे सही थे।

वैज्ञानिक नेहरूवाद और विज्ञान-विरोधी आरएसएस

भारत अंधविश्वासों का देश है। आरएसएस, हिंदू महासभा और बजरंग दल जैसे संगठनों के लगातार चलाए गए अभियान के चलते, शिक्षित महिलाएं और पुरुष भी अंधविश्वासों के वाहक बन गए हैं। यह नेहरूवादी वैज्ञानिक चेतना के खिलाफ है, जिसने ईसाई मिशनरी अस्पतालों और स्कूलों को प्रोत्साहित किया।

आरएसएस ने न तो नागपुर में और ना ही कहीं और सीएमसी की टक्कर का अस्पताल स्थापित किया। जहां ईसाई मिशनरीज ने सीएमसी की स्थापना की, वहीं हिंदुत्ववादी संगठन कुंभ मेलों, दुर्गा पूजा, मंदिरों की यात्राओं आदि में उलझे रहे। उन्होंने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान पर कभी फोकस नहीं किया। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को ब्रिटिश औपनिवेशिकता से जोड़ा गया और यह मान लिया गया कि वह प्राचीन, देशी आयुर्वेद के खिलाफ है। मगर आयुर्वेद में उस तरह की प्रगति नहीं हुई, जिस तरह की प्रगति ‘अंग्रेजी दवाई’ में हुई। वे इस पद्धति को हमेशा बुरा-भला कहते रहे और विज्ञान और औपनिवेशिकता में फर्क नहीं कर सके।

तेलंगाना में भी लोगों को यह मानने के लिए मजबूर कर दिया गया कि गंगा (अक्सर जिसका अर्थ घर के नज़दीक का कोई तालाब होता था) में डुबकी लगाने से वे रोगमुक्त हो जाएंगे। वे धर्म और अंधविश्वास में अंतर नहीं कर सके।

स्टार एडवर्ड स्टील वॉल्व

अब काइतैय्या की बात एक बार फिर। वे किसी भी स्थिति में जिंदा रहना चाहते थे। सीएमसी में उनका ऑपरेशन हुआ और उनके दिल का एक वॉल्व बदल दिया गया। कुल खर्च था 50 हजार रुपए, जिसका अधिकांश हिस्सा कर्ज लेकर इकट्ठा किया गया। सन् 1979 में यह एक बहुत बड़ी रकम थी।

उनका ऑपरेशन डॉ. स्टेनली जॉन ने किया और उनके हृदय में जो नया स्टार एडवर्ड स्टील वॉल्व लगाया गया, वह अमरीका के बाजार में कुछ ही समय पहले आया था। उनका इलाज डॉ. जॉर्ज चेरियन ने किया। जो वाल्व उनके हृदय में लगाया गया वह दुनिया का पहला कृत्रिम वॉल्व था। उसने चार दशकों तक बढ़िया काम किया और अभी पिछले माह उसके काम बंद कर देने के कारण काइतैय्या की मृत्यु हो गई।

नेहरूवादी राष्ट्रवाद ने देश में सीएमसी जैसे ईसाई मिशनरी अस्पतालों और भाभा परमाणु शोध केंद्र जैसे उच्च स्तरीय संस्थानों की स्थापना होने दी।

सीएमसी की स्थापना अमरीकी मिशनरी डॉ. आयडा सोफिया स्कडर ने मामूली इलाज और प्रसूति के लिए क्लिनिक बतौर की थी। आज यह देश का एक बड़ा विश्वस्तरीय अस्पताल है। विदेशी मिशनरियों के दान और मरीजों द्वारा चुकाए गए शुल्क की मदद से यह अस्पताल इतना बड़ा बन सका है। दिल्ली में बैठी सरकार ने उसे विदेशों से मिलने वाले धन पर कोई रोक न लगाकर उसकी उन्नति में मदद की।

विज्ञान-विरोधी

कल्पना कीजिए की स्वाधीनता के बाद कांग्रेस की जगह देश में पहली सरकार आरएसएस-भाजपा की बनती। हो सकता है कि वह सरकार सीएमसी पर ताले डलवा देती। वे उसे ‘धर्म परिवर्तन का केंद्र’ और ‘बीफ परोसने वाला अस्पताल’ बताते। सीएमसी की कैंटीन में काफी सस्ती दरों पर मरीजों और तीमारदारों दोनों के लिए बीफ उपलब्ध था, ताकि उन्हें पर्याप्त प्रोटीन मिल सके। काइतैय्या जैसे मरीजों को डॉक्टर बीफ खाने के लिए कहते थे। मगर किसी को जबरदस्ती कोई चीज नहीं खिलाई जाती थी।

विज्ञान और अंधविश्वास परस्पर-विरोधी हैं। विचार और आचरण दोनों दृष्टियों से। आरएसएस अंधविश्वास फैलाता है, जो ना तो विज्ञान से संगत है और ना ही धर्म से। इसीलिए भारत में अंधविश्वास के खिलाफ कानूनों की जरूरत है। अपने इलाज पर बड़ी रकम खर्च करने के बाद भी हृदय और अन्य गंभीर रोगों से ग्रस्त कई मरीज अंधविश्वासों पर आधारित आचरण के चलते अपनी जान खो बैठते हैं।

लोगों के दिमाग में अंधविश्वास लगातार भरा गया है ताकि वे जातिवाद और ब्राह्मणवाद के गुलाम बने रहें।

जाति

आरएसएस के चिंतकों के पूर्वजों ने जिन संस्थाओं का निर्माण किया उनमें से एक महत्वपूर्ण संस्था थी जाति। जातिप्रथा ने अधिकांश भारतीयों के दिमाग को अंधविश्वास पूर्ण विचारों से भर दिया है। जाति कोई धार्मिक संस्था नहीं है। वह तो एक अंधविश्वास है।

अगर आरएसएस (जो अपने आपको सामाजिक संगठन बताता है) की तरह की कोई राजनीतिक ताकत स्वाधीनता के बाद सत्ता में आ जाती और सीएमसी को बंद करवा देती तो काइतैय्या की आज से 46 साल पहले मौत हो चुकी होती। इसके बजाय नेहरू, जिन्होंने नए स्वतंत्र भारत का कार्यभार संभाला और काइतैय्या भारत बल्कि शायद पूरी दुनिया में कृत्रिम वाल्व के सहारे लंबे समय तक जिंदा रहने का रिकार्ड बनाया।

हम जानते हैं कि दुनिया में चिकित्सा विज्ञान बहुत आगे बढ़ चुका है। रोज नई खोजें हो रही हैं। मगर इस क्षेत्र में भारत पिछड़ा हुआ है और आरएसएस/भाजपा की विज्ञान-विरोधी और अंग्रेजी-विरोधी मानसिकता हमें पिछड़ा ही बनाए रखेगी। भारत में आज वैज्ञानिक चेतना और वैज्ञानिक सोच पर कोई बात नहीं होती।

(यह आलेख पूर्व में वेब पोर्टल ‘दी फेडरल’ द्वारा अंग्रेजी में प्रकाशित है। यहां लेखक की अनुमति से हिंदी में प्रकाशित। अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कांचा आइलैय्या शेपर्ड

राजनैतिक सिद्धांतकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता कांचा आइलैया शेपर्ड, हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के सामाजिक बहिष्कार एवं स्वीकार्य नीतियां अध्ययन केंद्र के निदेशक रहे हैं। वे ‘व्हाई आई एम नॉट ए हिन्दू’, ‘बफैलो नेशनलिज्म’ और ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ शीर्षक पुस्तकों के लेखक हैं।

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