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मध्य प्रदेश : छोटे किसानों की बदहाली के मायने

सूबे में सीमांत एवं लघु किसानों की संख्या सबसे अधिक है जो कि अपनी आजीविका के लिए केवल कृषि पर निर्भर हैं। ग्रामीण किसानों की ऐसी पिछड़ी स्थिति क्षेत्रीय स्तर पर भी देखी जा सकती है। सीमांत एवं लघु किसानों की सामाजिक स्थिति भी कमजोर होती है। बता रही हैं शिवानी सूर्यवंशी

कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है। लेकिन देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि का योगदान निरंतर कम होता जा रहा है। वर्तमान में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान लगभग 16 प्रतिशत हैं। लेकिन आज भी लगभग 55 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि कृषि ग्रामीण आबादी के लिए आजीविका एक महत्वपूर्ण स्रोत है। ऐसे में सवाल उठता है कि जीडीपी में कृषि के योगदान में निरंतर होती कमी सरकार के लिए चिंता का विषय नहीं है?

कुछ दिनों पहले जब मैं मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के एक गांव बिसखान में सर्वेक्षण कर रही थी। यह गांव जिला मुख्यालय से करीब 17 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वहां लघु एवं सीमांत किसान आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण बारिश की बुवाई के लिए कड़ी धूप में पारंपरिक यंत्रों से जमीन तैयार कर रहे थे। वे इसके लिए बैलों का उपयोग कर रहे थे।

इक्कीसवीं सदी में भी बैलों के उपयोग के बाबत पूछने पर किसानों ने बताया कि वे पारंपरिक कृषि यंत्रों की मदद से मेहनत कर अपनी लागत को कम करने का प्रयास कर रहे हैं। उनके मुताबिक, आधुनिक तकनीक महंगी पड़ती है। वे कृषि के आधुनिक यंत्रों की स्थायी व्यवस्था नहीं कर सकते हैं। इसलिए जुताई के लिए बैल व हल का प्रयोग करते है। इसके अलावा लोग अपने परिवार के साथ मिलकर कृषि के अन्य कार्य करते हैं। महिलाएं घर के काम निबटाने के बाद खेतों में काम करने जाती हैं। उनके बच्चे भी विद्यालय से छुट्टी के पश्चात खेती में मदद करने जाते हैं।

सीमांत तथा लघु किसान किसी भी तरह अपनी लागत को कम करना चाहते हैं। यही कारण है कि वे बोने के लिए पूरी तरह हाईब्रिड बीज का उपयोग नहीं कर पाते हैं। लागत कम करने के लिए कुछ घर के यानी स्वयं तैयार किए गए बीजों का भी इस्तेमाल करते है। हालांकि धीरे-धीरे कृषि कार्य की पद्धति बदल रही है सीमांत एवं लघु किसान भी उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से बड़े किसानों को देख आधुनिक कृषि तकनीक का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन उनकी जोत का आकार छोटा होने के कारण आधुनिक मशीनों, यंत्रों का प्रयोग करने से अधिक लागत आ जाती है। कुछ किसान ऋण लेकर हाईब्रिड बीजों का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन ऐसे किसानों की संख्या अभी कम है।

मध्य प्रदेश में सीमांत एवं लघु किसानों की आर्थिक स्थिति अत्यंत पिछड़ी हुई है। सूबे में सीमांत एवं लघु किसानों की संख्या सबसे अधिक है जो कि अपनी आजीविका के लिए केवल कृषि पर निर्भर हैं। ग्रामीण किसानों की ऐसी पिछड़ी स्थिति क्षेत्रीय स्तर पर भी देखी जा सकती है। सीमांत एवं लघु किसानों की सामाजिक स्थिति भी कमजोर होती है।

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के बिसखान गांव में बैलों से खेत की जुताई करता एक युवा किसान

इन किसानों के लिए उचित नीतियां बनाने के लिए इसका बहुत सावधानीपूर्वक विश्लेषण करने और समझने की आवश्यकता है। अन्यथा बढ़ती जीडीपी और देश की प्रतिव्यक्ति आय को जमीनी हकीकत से नहीं जोड़ा जा सकेगा। प्रति व्यक्ति आय के आधार पर आर्थिक विकास का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। जैसा कि आंकड़ों से पता चलता है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था का सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 16 प्रतिशत का योगदान कृषि क्षेत्र का है, जबकि देश की आधी से ज्यादा आबादी सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए कृषि पर निर्भर है। बढ़ती प्रति व्यक्ति आय तथा बढ़ती जीडीपी का कृषकों की आय से कोई तालमेल ही नहीं है। इस स्थिति में कृषि का विकास करना अत्यंत आवश्यक हो जाता हैं, इसके लिए ग्रामीण लघु एवं सीमांत किसान की स्थिति को जानना आवश्यक है।

सीमांत एवं लघु किसानों की कृषि जोत का आकार बहुत छोटा होता है और जो आधुनिक कृषि यंत्र (ट्रैक्टर, हार्वेस्टर इत्यादि) है वह केवल बड़ी जोत के लिए उपयोगी साबित होते हैं। इस कारण छोटी जोत में उपयोग में लाने पर किसानों को कई तरह के नुकसान का सामना करना पड़ता है। आज किसान अधिक लागत का सामना कर रहा है। आधुनिक तकनीक महंगी पड़ रही है। किसानों की इस स्थिति के लिए शासन जिम्मेदार है। सरकार द्वारा ग्रामीण किसानों के कौशल विकास करने और सरकारी नीतियों के संबंध में किसानों में जागरूकता लाने के लिए कोई ध्यान नहीं दिया जाता। ग्रामीण किसानों की शिक्षा का स्तर भी निम्न होता है। अधिकांश किसान अशिक्षित या कम पढ़े-लिखे होते हैं। शिक्षा के अभाव के कारण ग्रामीण किसान सरकारी योजनाओं का भी पूरा लाभ नहीं उठा पाते हैं। किसानों को अपनी फसल का सही दाम नहीं मिलता है। उदाहरण के रूप में अगर मक्के की बात करें तो किसान का उत्पादित मक्का 20 रूपए किलो बिकता है। इसमें भी उसे कई तरह के नुकसान का सामना करना पड़ता है। लेकिन अगर किसान बोने के लिए मक्का खरीदता है तो उसे 300 से 400 रुपए किलो मिलता है।

किसानों को पर्याप्त बिजली नहीं मिल पाती है। ग्रामीण स्तर पर बिजली विभाग की भी लापरवाही देखने को मिलती है। खेतों की बिजली तार में अगर कोई खराबी आ जाती है तो कम से कम 8-10 दिन के बाद ही ठीक करने के लिए बिजली विभाग के कर्मचारी आते हैं। इस स्थिति में किसान स्वयं बिजली को ठीक करने का प्रयास करते हैं, जिससे कई बार उन्हें जान से भी हाथ धोना पड़ता है। बिजली विभाग की इस लापरवाही के कारण किसान पंप के द्वारा सिंचाई आदि कार्य नहीं कर पाते हैं और उन्हें भारी नुकसान सहना पड़ता हैं। सीमांत एवं लघु कृषक आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा उपलब्ध नहीं करा पाते हैं, जिस कारण बच्चे शिक्षा के क्षेत्र में भी पीछे रह जाते हैं। और वे केवल दिहाड़ी मजदूर बनकर रह जाते हैं, जिससे परिवार के जीवन स्तर में सुधार नहीं हो पाता है और आर्थिक विकास में पीछे छूट जाता है।

बिसखान गांव में खेत में बीज डालता एक किसान परिवार

इसमें सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठता है। भारत सरकार के इस वित्तीय वर्ष के बजट के संबोधन में कहा गया कि “देश सिर्फ भूमि नहीं, बल्कि इसके लोग है।” गरीब, युवा, अन्नदाता और नारी को विकास के केंद्र बिंदु के रूप में लिया गया है। कहा गया कि इसका उद्देश्य किसानों को भी सशक्त बनाना है। लेकिन फसल बीमा योजना के लिए बजट निर्धारण संशोधित बजट 2024-25 में 15864 करोड़ निर्धारित किया गया था जो कम करके बजट 2025-26 में 12242 करोड़ निर्धारित किया गया है। ऐसे ही पीएम किसान सम्मान निधि के माध्यम से किसानों को 6000 रुपए प्रति एकड़ प्रत्येक वर्ष प्रदान किए जाते हैं। लेकिन यह किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का कोई स्थायी उपाय नहीं है।

हालांकि मध्य प्रदेश में किसानों को खाद व बीज खरीदने के लिए सब्सिडी (अनुदान) प्रदान करने के लिए कई योजनाएं हैं। जैसे कि खाद-बीज अनुदान योजना। इस योजना का मुख्य उद्देश्य लघु एवं सीमांत किसानों को कृषि आदानों (जैसे खाद, बीज) पर सब्सिडी देकर सशक्त बनाना है। लेकिन सभी किसान इस योजना का लाभ नहीं ले पाते। उन्हें इसकी जानकारी नहीं होती है कि इस योजना का लाभ कैसे लिया जाए। वजह यह कि सामान्य तौर पर ग्रामीण किसानों की शिक्षा का स्तर निम्न होता है। इस कारण उन्हें अधिक लागत का सामना करना पड़ता है और अधिक लागत के कारण किसानों को बचत नहीं हो पाती है।

ऐसे में सरकार को चाहिए की ग्रामीण सीमांत एवं लघु किसानों को ध्यान में रखकर नीतियों का निर्माण करे व उन योजनाओं की जानकारी ग्रामीण किसानों तक पहुंचाए। ग्रामीण कृषि के विकास के साथ ही जीडीपी में कृषि के योगदान को बढ़ाया जा सकता है तथा किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया जा सकता है।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

शिवानी सूर्यवंशी

लेखिका गर्ल्स कॉलेज, छिंदवाड़ा में एम.ए. (अर्थशास्त्र) की छात्रा हैं

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