हिंदी की जनपक्षधर कविता में मोहन मुक्त एक महत्वपूर्ण और हस्तक्षेपकारी कवि के रूप में स्थापित हो चुके हैं। उनकी कविताएं केवल सौंदर्य या भावनात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक संरचनाओं, सत्ता-तंत्र और वर्चस्ववादी मानसिकता पर तीखा प्रहार करती हैं। ‘वर्चस्व की सत्ता’ का प्रश्न उनकी कविताओं में उपस्थित है, जहां सत्ता केवल राजनीतिक संस्था नहीं, बल्कि जाति, वर्ग, पितृसत्ता, संस्कृति और भाषा के माध्यम से कार्य करने वाली व्यापक संरचना के रूप में सामने आती है। मोहन मुक्त की कविताएं इसी स्वाभाविक बना दी गई असमानता को अस्वाभाविक सिद्ध करती हैं।
हजारों सालों की गुलामी को झेल रहे तमाम पिछड़े, दलित, स्त्री, आदिवासी आदि जिन्हें अब अपने हक और अधिकार के लिए आवाज उठाना होगा और उसके लिए लड़ाई लड़नी होगी। जीवन तो एक ही है किसी भी इंसान का कोई पुनर्जन्म नहीं होता है, जो भी आदमी को दुख या सुख भोगना होता है वो यही ही उसे भोगना होता है। सवाल यह है कि कोई इंसान या तो गुलामी की जिंदगी स्वीकार कर आजीवन वह दुख और तकलीफ के सहारे जिंदा रहे या फिर विद्रोह करके अपनी आजाद भरी जिंदगी जिये। अपने हक और अधिकार के लिए एवं अपनी आजादी की जिंदगी जीने के लिए उसे लड़ाई करने की जरूरत है क्योंकि ब्राह्मणवादी संस्कृति ने सदियों से गुलाम बनाकर रखा है तथा यह निरंतर गुलाम बनाए रखने की साजिश में वह लगा हुआ है। इसलिए मोहन मुक्त कहते हैं कि दुश्मन को पहचानने की आवश्यकता है और यह भी कि असली सवाल क्या है। वे कहते हैं–
वक़्त कम है, ज़िन्दगी एक है/चुनो सही लड़ाई,/ जिंदा करो स्थगित युद्ध/ पहचानो मुख्य दुश्मन /असल गुलामी राजनैतिक नहीं / सांस्कृतिक है / असल वंचना राजनैतिक नहीं / सांस्कृतिक है / असल जंग राजनैतिक नहीं / सांस्कृतिक है।[1]
फिर वे जंग को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि इंसान विरोधी संस्कृति के खिलाफ इंसान होना महत्त्वपूर्ण है–
जंग जिसमें,/ इंसान विरोधी संस्कृति के ख़िलाफ / इंसान होना पर्याप्त है / देखने वाला, तड़पने वाला /बोलने वाला इंसान / निश्चित ही इंसान / ये जंग जीत जायेगा…[2]
ब्राह्मणवादी और सामंतवादी ताकतें कमजोर और निर्बल जनता का हमेशा उपयोग करना चाहती हैं। वे यह भी चाहते हैं कि जनता हमेशा उनकी गुलाम और पोषक बनी रहे। वह न तो अपने अतीत को याद करे और न भविष्य की कल्पना करे। कवि तानाशाह अपराधी को पहचान कर उसे जड़ से खत्म करने का प्रेरणा लेते हैं, क्योंकि जब तक समाज में ब्राह्मणवाद और सामंतवाद रहेगा तब तक इन निर्धन जनता का कभी भी भला या विकास नहीं हो सकता है। इसलिए मोहन मुक्त लिखते हैं–
मेरी स्मृतियों के साथ / मेरी जिंदगी और अस्तित्व के साथ / की गयी है ज़बरदस्ती / मुझे कुछ खूबसूरत याद करने से रोका जा रहा है /मैं जानता हूं कि कौन है ये स्मृतियों का तानाशाह / मैं अपने अपराधी को पहचानता हूं / बात हिंसक लगेगी / लेकिन मैं उसे मार डालूंगा… माफ करना कोई विकल्प ही नहीं है / हत्या भी उसके अपराध की एक छोटी सज़ा होगी / क्योंकि बर्फ … दिल … चुंबन / सारी स्मृतियां ऐसे ही मेरे साथ चलेंगी / मेरी मौत तक… / या…,मेरी हत्या हो जाने तक…[3]
भारतीय समाज के साथ-साथ अन्य देशों में भी नाजीवादी और उनके विचार मौजूद हैं, जो जनता का शोषण करने के लिए हमेशा कोई न कोई नई चाल चलते रहते हैं। यह विचार भारतीय समाज में ब्राह्मणवादी पितृसत्ता और सामंतवाद के रूप में है। इसे कवि ने पहचान किया है और उन्होंने लिखा है–
नाज़ी मर्द होते हैं, नाज़ी ब्राह्मण होते हैं / नाज़ी कमांडर होते हैं, नाज़ी श्वेत होते हैं / नाज़ी पुरोहित होते हैं, नाज़ी ज्योतिष होते हैं / नाज़ी व्यापारी होते हैं, नाज़ी अमीर होते हैं।[4]
अपनी इस कविता में कवि इंसान को बचाने की बात करते हैं। आज पूरी दुनिया में मनुष्यता खतरे में दिखाई देती है। खतरे में दिखाई देने का मतलब है कि कोई अपना वर्चस्व स्थापित कर रहा है, जिससे मानवता खतरे में दिखाई दे रही है। इस वर्चस्व को हमें समझना पड़ेगा वह वर्चस्व या तो धार्मिक रूप में है या राजनीतिक रूप में है या फिर तानाशाही आदि के रूप में। मोहन मुक्त इनकी पहचान कर इंसान को प्राथमिकता देते हैं, मानवता को सर्वोपरि मानते हैं–
मेरी पहली और गहरी दिलचस्पी / इंसानों में है / मेरा पहला और आख़िरी मानक इंसान है।[5]
सदियों से पुरुषों ने अपने सुविधा अनुसार फैसला लिया है और उस फैसले में औरतों के अहमियत को कोई स्थान नहीं दिया है। हमें देखने को मिलता है कि राम ने सीता की अग्नि परीक्षा ली थी और गांधी ने ब्रह्मचर्य को अपनाया था। एक और घटना देखते हैं कि बुद्ध ने भी पत्नी को बगैर बताए घर छोड़ दिया था। इन सभी ने अपनी-अपनी पत्नियों काे हुए दुख और तकलीफ के बारे में जरा भी नहीं सोचा होगा। अगर सोचते तो न गांधी ब्रह्मचर्य को अपनाते, न राम अग्नि परीक्षा लेते और न बुद्ध घर का परित्याग करते। मोहन मुक्त इस दृष्टि को सामने रखते हैं कि ये पुरुष पितृसत्ता के पोषक रहे–
सीता और कस्तूरबा ने कुछ पूछा भी होगा / तो हम कभी जान नहीं सकते / क्योंकि औरत अगर सवाल करे / तो सारे ‘नायक’ धूल हो जायेंगे / संस्कृतियां नायक विहीन हो जाएंगी / संस्कृतियां… महान संस्कृतियां… हुंह।[6]
समाज में और इतिहास में हमें देखने को मिलता है कि कैसे सामंतवादी-ब्राह्मणवादी विचार के लोग क्रांति के नाम पर दलित-पिछड़ों और स्त्रियों को ठगने का काम किया है। कवि उनकी क्रांति की भी पहचान करते हैं और कहते हैं कि उनकी क्रांति से दलितों, स्त्रियों और आदिवासियों के जीवन में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं आया। वह लिखते हैं–
अंतर था/गहरा और आधारभूत अंतर / समझ का नहीं ज़रूरत का अंतर / क्रांति तुम्हारी समझ थी/और मेरी ज़रूरत / तुम्हारी समझदारी बदल जाने से / मेरी ज़रूरत नहीं बदलती / लेकिन फिर भी हम दोनों एक ही रास्ते पर हैं / तुम अपनी समझदारी को दुरुस्त करने / वापस लौट रहे हो / मैं अपनी ज़रूरत पूरी करने आगे जाऊंगा।[7]
हम धर्मशास्त्रों में देखते हैं कि द्रोणाचार्य अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए और अपने शिष्य अर्जुन की महिमा गाथा को बनाए रखने के लिए एकलव्य का अंगूठा कटवा लेता है और वह अपने आप को उसके मुंह से युग का सर्वश्रेष्ठ गुरु की उपाधि पा लेता है और सर्वश्रेष्ठ योद्धा की उपाधि अर्जुन को दिलवा देता है। वर्चस्व की यही सत्ता कहीं-न-कहीं आज हम शिक्षण संस्थानों में देखते हैं कि कैसे दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के छात्रों का अंगूठा नंबर कम देकर काट लिया जाता है। अंगूठा काट लेने का यहां रूप बदल गया है मगर प्रक्रिया वही है जो चली आ रही है। मोहन मुक्त इसे इस प्रकार लिखते हैं–
सुनो एकलव्य… / वो केवल तुम्हारे धनुष की बात नहीं थी / वो तुम्हारे और तुम्हारे पुरखों के अस्तित्व की बात थी / इंसान अंगूठे के बिना इंसान ही नहीं होता / जानवर और इंसान के बीच सीधा खड़ा रहता है अंगूठा / अंगूठे पर चढ़कर ही बंदर इंसान बने हैं / अंगूठा ही पकड़ता है स्वर्ग से टपके सारे फलों को / अंगूठा तुम्हारी तस्दीक होता है / वो गवाही होता है पहचान होता है कि तुम इंसान हो।[8]

इतिहास के पन्ने को अगर पलटें तो हम पाते हैं कि कैसे वर्चस्ववादी, ब्राह्मणवादी और सामंतवादी ताकतों ने पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों का किस तरह से शोषण किया तथा प्रताड़नाएं दीं। इनसे मनमाना टैक्स लिया गया, मनमाने ढंग से सूद वसूला, पढ़ने नहीं दिया गया और धन नहीं रखने दिया। यहां तक कि मनुष्यता के लिए आवश्यक बुनियादी चीजों से भी दूर रखा। कवि मोहन मुक्त अपने महान पुरखों को याद करते हैं, जिन्होंने किसी का उत्पीड़न नहीं किया, किसी के साथ कोई अत्याचार नहीं किया। वे लिखते हैं–
मेरे पुरखों / आप की ही तरह मेरी भी कोई इच्छा नहीं है / साम्राज्य बना लेने की / मैं तो बस कुछ दीवारों को तोड़ डालूंगा / मेरे पुरखो आपका शुक्रिया / कि आपके कारण ही मैं यहां हूं, मैं खुश हूं / मैं यहां हूं क्योंकि मुझे कुछ तोड़ना है / मेरे पुरखो आपका शुक्रिया / आपके कारण ही मेरे शरीर में भैंसे की ताकत है।[9]
कवि मोहन मुक्त पलायन के विषय से भी टकराते हैं। वे कहते हैं कि पलायन करने के कारण को हमें समझना पड़ेगा कि लोग क्यों अपनी उस जगह से पलायन करते हैं, जहां उन्होंने जन्म लिया, पले-बढ़े और कई वर्षों तक जीवन जिया? वे लिखते हैं–
अपने ही गांव में लोगों के लिए सरहद बना देना बुरा है / विस्थापन बुरा है, निर्वासन बुरा है / शरण इतनी बुरी नहीं, बुरा है जिंदगी भर के लिये शरणार्थी रह जाना / परदेसी होना बुरा नहीं/बेमुल्क होना बुरा है / जगहों से पलायन बुरा नहीं/प्रश्नों से पलायन बुरा है / जगहों से पलायन रोकना है / तो प्रश्नों से पलायन मत कीजिये।[10]
इस तरह कवि पाठकों को एक नई दृष्टि देते हैं। वे स्त्रियों से आह्वान करते हैं कि वे फूल न रहें, फूलन बनें। इसकी वजह बताते हुए वे लिखते हैं–
फूल, तुम्हें कुचला जायेगा / तुम खुशबू हो जाना, इत्र की नहीं / बारूद की खुशबू / फूल तुम्हें कोई कुचल नहीं पाएगा फूल / तुम फूल न रह जाना, तुम फूलन हो जाना।[11]
जातिभेद, वर्णभेद, लिंगभेद आदि से टकराते हुए मोहन मुक्त अपनी लगभग हर कविता में एक संदेश देते हैं। वे इसका खुलासा करते हैं कि ब्रह्मणवादियों और सामंतवादियों ने अपने वर्चस्व कायम रखने के लिए कई शब्द गढ़े हैं, कई साजिशें रची हैं ताकि पिछड़े, दलित, आदिवासी और महिलाओं को गुलाम बनाकर उनका निरंतर शोषण किया जा सके। लेकिन ‘हम खत्म करेंगे’ शीर्षक कविता में वे उद्घोष करते हैं–
जो हमें कहे, है हिंसक वो ही/हम हैं जाग्रत, हम विद्रोही / कवियो-बिंबों की मनमानी / ध्वस्त करेंगे हमने ठानी / इंसानी आंखों का पानी/आग भरी आंखें इंसानी / हिंसक हमको ठहराये जो/हर उस किताब को भस्म करेंगे / हिंसक इस दुनिया की हिंसा/हम अछूत ही ख़त्म करेंगे, / हिंसक इस दुनिया की/हिंसा हम अछूत ही ख़त्म करेंगे।[12]
मोहन मुक्त सांस्कृतिक वर्चस्व को सत्ता का सबसे चालाक रूप मानते हैं। वे कहते हैं कि मिथक, परंपरा, धर्म और भाषा के ज़रिए शोषण को पवित्र बना दिया है। उनकी कविताएं ‘संस्कृति’ के उस चेहरे को बेनकाब करती है जो असमानता को नैतिक और स्वाभाविक ठहराती है। वे यह भी दिखाते हैं कि साहित्य और भाषा पर भी प्रभुत्वशाली वर्गों का कब्ज़ा है, जहां हाशिए की आवाज़ों को या तो अनदेखा किया जाता है या ‘अशिष्ट’ कहकर खारिज कर दिया जाता है। वे सवाल करते हैं–
कैसे बनता है राष्ट्र/क्या चाहिए? /क्या क्या चाहिए? / ज़मीन, लोग, भाषा, संस्कृति? / नहीं… इनमें से कुछ नहीं/राष्ट्र के निर्माण के लिए / चाहिए एक देवता… ताकतवर/और एक कमज़ोर दुश्मन / लीजिए… खाकर देखिए…/आपका राष्ट्र तैयार है।[13]
मोहन मुक्त की हर कविता सत्ता के हर रूप को प्रश्नांकित करने वाली कविता है। वे सत्ता को अदृश्य, स्वाभाविक और पवित्र मानने की प्रवृत्ति को तोड़ते हैं और पाठक को प्रतिरोध की चेतना से लैस करते हैं। उनकी कविताएं केवल साहित्यिक पाठ नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप हैं, जो लोकतंत्र, समानता और मानवीय गरिमा के पक्ष में खड़ी दिखाई देती हैं।
संदर्भ :
[1] मोहन मुक्त, हिमालय दलित है, समय साक्ष्य, देहरादून, 2022, पृष्ठ 45
[2] वही
[3] वही, पृष्ठ 48
[4] वही, पृष्ठ 50
[5] वही, पृष्ठ 66
[6] वही, पृष्ठ 68
[7] वही, पृष्ठ 95
[8] वही, पृष्ठ 103
[9] वही, पृष्ठ 112
[10] वही, पृष्ठ 125
[11] वही, पृष्ठ 136
[12] मोहन मुक्त, हम खत्म करेंगे, संभावना प्रकाशन, हापुड़, 2024, पृष्ठ 127
[13] वही, पृष्ठ 244
(संपादन : नवल/अनिल)
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