बीते 8 फरवरी, 2026 को बिहार की राजधानी पटना के गांधी संग्रहालय सभागार में पत्रकारों की महफिल थी। मौका था पूर्व राज्यसभा सांसद व पत्रकार अली अनवर की सद्य प्रकाशित किताब ‘बिहार का चौथा खंभा’ के लोकार्पण का। इस मौके पर दक्षिणपंथी और वामपंथी दोनों तरह के पत्रकार व लेखक जुटे थे। सभी ने इस मौके पर अपने-अपने अनुभव साझा किए। पत्रकारिता के क्षेत्र में दलित, पिछड़े, आदिवासी और महिलाओं की भागीदारी को लेकर भी चर्चा हुई। इस क्रम में कई सवाल उठे और एक तरह से जवाब तलाशने की कोशिश भी की गई।
मसलन, वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन ने अपने संबोधन में कहा कि “मीडिया में लड़कियों और ओबीसी के आने से उसका चरित्र काफी कुछ बदला है। जब ये लोग किसी मुद्दे की कवरेज करते हैं तो उनकी रिपोर्टिंग का दृष्टिकोण अलग और संवेदनशील होता है। आज कैमरे के सामने ही नहीं, बल्कि कैमरे के पीछे भी लड़कियां सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। हम जानते हैं कि कैमरा संचालन और फिल्ड रिपोर्टिंग शारीरिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण काम हैं, लेकिन लड़कियों की बढ़ती भागीदारी ने इस क्षेत्र की पारंपरिक धारणाओं को तोड़ा है। लड़कियां इस बदलाव को एक मोड़ दे रही हैं। यह बदलाव सामाजिक स्तर पर भी हुआ है। लेकिन मीडिया में दलित और आदिवासी आज भी बहुत कम हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि “बिहार के अखबारों को देखकर निराशा होती है। यहां से निकलने वाले अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर पलायन की कोई खबर नहीं होती।” बताते चलें कि अली अनवर ने अपनी किताब में बिहार के या बिहार में पत्रकारिता करने वाले 25 हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारों के जीवन संघर्ष, उनके अनुभव और पत्रकारिता की यात्रा को बातचीत के आधार पर संकलित किया गया है। इन पत्रकारों में उत्तम सेनगुप्ता, हेमेंद्र नारायण, संतोष सिंह, राजकुमार सरीखे अंग्रेजी पत्रकारों के साथ ही उर्मिलेश, सुरेंद्र किशोर, हेमंत, श्रीकांत, नवेंदु, अनिल चमड़िया, पुरुषोत्तम, हेमंत कुमार, मणिमाला, निवेदिता और इंदु भारती के अलावा कार्टूनिस्ट पवन भी शामिल हैं। इनमें अनेक वे पत्रकार हैं, जिन्होंने 1980 के दशक में भी सक्रिय थे।
अभियान सांस्कृतिक मंच, पटना द्वारा आयोजित इस लोकार्पण कार्यक्रम की अध्यक्षता फिल्मकार व वरिष्ठ पत्रकार प्रबल महतो ने की। समारोह में पुस्तक के लेखक अली अनवर, अरविंद मोहन, राजकुमार, गुंजन सिन्हा, निवेदिता, हेमंत कुमार, पुरुषोत्तम, संतोष सिंह, अभय कुमार और अनीश अंकुर आदि वक्ताओं ने अपने-अपने अनुभव साझा किये और बिहार के कई कालखंड की पत्रकारिता के उजले व स्याह पक्षों को अपने-अपने वक्तव्यों के माध्यम से सामने रखा। कार्यक्रम का संचालन युवा संस्कृतिकर्मी जयप्रकाश ने किया।
अपने संबोधन में वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन ने बिहार में पत्रकारिता के इतिहास की भी चर्चा की। उन्होंने कहा “अखबारों के निकलने का क्रम उर्दू, अंग्रेजी और हिंदी माध्यम से आरंभ हुआ। सरकार से टकराव और लड़ने-भिड़ने की परंपरा यहां काफी ऊपर रही है। उन्होंने कहा कि बंगाल से बिहार के लिए अलग प्रांत के गठन के लिए हुए आंदोलन के क्रम में बिहार से सच्चिदानंद सिन्हा सिंह आदि कई नेताओं ने अखबार निकाले। फिर आजादी की लड़ाई बिहार के चंपारण से शुरू की गई तो पीर मोहम्मद मूनीश जैसे पत्रकारों ने नए तरह की पत्रकारिता की। बाद में इसी परंपरा में ‘सर्चलाइट’, ‘प्रदीप’, ‘आर्यावर्त’ और ‘इंडियन नेशन’ जैसे अखबार आए। इन सब की औपनिवेशिक सत्ता और सत्ता से लड़ाई में ऐतिहासिक भूमिका रही। लेकिन आजादी मिलते ही हम जातियों और मजहब से घिर गए। आरंभ में मुसलमानों और कायस्थ लोगों ने अपने-अपने अखबार निकाले। धीरे-धीरे यहां की अन्य प्रभावशाली जातियां भी इस अभियान का हिस्सा बनीं। यहां कई और बड़े और नए तरह के अखबार आये, लेकिन वह समय के हिसाब से बदलने को तैयार नहीं थे। ऐसा भी समय आया जब अंग्रेजी अखबारों का दबदबा कम हुआ। यह बदलाव सर्कुलेशन का भी था।”
अरविंद मोहन ने माना कि आज बिहार में बहुत तीव्रता से मीडिया के क्षेत्र में बदलाव आया है, लेकिन यह भी सच है कि लोगों तक सच्चाई की पहुंच बढ़ी है। इसको यहां तक लाने में सोशल मीडिया और लेखकों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। अली अनवर की लोकार्पित पुस्तक की चर्चा करते हुए अरविंद मोहन ने कहा कि इन्होंने जिन लोगों का चयन कर उनके महत्व को रेखांकित किया है, वे स्पेशल लोग हैं, जिन्होंने एक खास समय में बिहार की अगुवाई की है। इस तरह की और लिस्ट बननी चाहिए, जिसमें अलग-अलग जाति मजहब के लोगों के योगदान का भी सम्यक मूल्यांकन हो। इनकी यह किताब बदलाव के दौर का दस्तावेज है।

पत्रकारों की इस जुटान को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के संतोष सिंह ने रेखांकित करते हुए कहा कि हम पत्रकारों के लिए बहुत कम ऐसे मौके होते हैं जब हम एक-दूसरे को सेलिब्रेट करने के लिए उपस्थित होते हों।
वहीं अंग्रेजी अखबार के पत्रकार राजकुमार ने कहा कि जब मैं ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ से जुड़ा तो उस समय उत्तम सेन गुप्ता संपादक हुआ करते थे। यहां मैंने 26 साल पत्रकारिता की और इस अवधि में अनेक तरह के रिपोर्टिंग की, जो हमारे लिए जान जोखिम में डालने वाला था। नौगछिया बलात्कार कांड और दनवार बिहटा नरसंहार कांड से जुड़े अनुभव को साझा किया और अली अनवर का विशेष आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अपनी पुस्तक में जगह दी।
वरिष्ठ पत्रकार निवेदिता ने कहा कि आज हम पत्रकारिता के सबसे काला दौर से गुजर रहे हैं, जहां लिखने-पढ़ने की आजादी नहीं है। आज लेखक, पत्रकार और आंदोलनकारी जेलों में बंद हैं। उन्होंने माना कि आज से पहले की कलम ज्यादा आजाद थी। पत्रकारिता में समाज की तरह ही विभेद है। वहां दलित, आदिवासी की आवाज कम है और लैंगिक और धार्मिक विभेद का बोलबाला है। उन्होंने कहा कि यह विभेद खबरों की पूरी प्रकृति में नजर आता है। उन्होंने सवाल उठाया कि ‘चार बच्चों की मां अपने प्रेमी संग फरार’ के जैसे खबर ‘विवाहेत्तर संबंध में फरार पति’ शीर्षक के साथ क्यों नहीं बनाया जाता है? निवेदिता ने कहा कि इस विभेद का लंबे समय तक वह भी शिकार रहीं। उन्होंने कहा कि ‘आज’ अखबार के सामने किसी चाय अड्डे पर मैं जाती तो लोगों को आश्चर्य होता यह यहां क्यों आ गई, किसी पुरुष साथी से हाथ मिलाने की कोशिश करती तो लोगों को बुरा लगता, लेकिन यह गैप अब कुछ कम हुआ है। अली अनवर की चर्चा करते हुए निवेदिता ने कहा कि इनको पढ़ते हुए मैं बड़ी हुई हूं। किताब में छपे अनुभव की चर्चा करते हुए निवेदिता ने माना कि अली अनवर के सवाल निजी थे। अगर वह सवाल हमारे दौर की पत्रकारिता पर होते तो अनुभव में और गहराई आती। उन्होंने कहा कि पहले पत्रकार यूनियनें भी मजबूत थीं, अब वह बात नहीं, लेकिन फिर भी पत्रकारिता एक आवाज बना रहेगा।
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कुमार ने हाल ही में दरभंगा के कुशेश्वरस्थान से वायरल हुई खबर की चर्चा की, जिसमें पूरे गांव के ब्राह्मणों पर एससी-एसटी एक्ट में एफआईआर करने की बात फैलाई गई है। उन्होंने जोर देकर कहा कि खबर को वास्तविकता से काटकर उसे एससी-एसटी एक्ट के विरोध में प्रचारित किया जा रहा है। इसके जरिए मीडिया का जातिवादी, दलित और न्याय विरोधी चेहरा एक बार फिर से उजागर हुआ है। उन्होंने कहा कि एपस्टिन फाइल पर चर्चा हो रही है, लेकिन अपने इर्द-गिर्द घटित हो रही भयावह घटनाओं पर कोई कुछ नहीं बोल रहा है। हमलावरों को बचाने के लिए खबर की प्रस्तुति कमजोर की गई। मूल घटना को पृष्ठभूमि में डाल दिया गया। एक राजमिस्त्री द्वारा मजदूरी के बकाया रुपये मांगने को लेकर हुए विवाद में पूरे पासवान टोला पर हमला किया गया। घरों में घुसकर, किवाड़ तोड़कर नाबालिग लड़की, महिलाओं और पुरुषों के साथ जमकर मारपीट की गई। उनका सिर फोड़ दिया गया। घर तहस-नहस कर दिया। नगदी, जेवर लूट लिया गया। जख्मी लोगों की हालत गंभीर है। दरभंगा में इलाज चल रहा है। लेकिन पूरी खबर को ऐसे गढ़ा गया है कि जैसे बेचारे ब्राह्मणों को ही फंसा दिया गया है। एक कथित एनजीओ भी सामने आ गया है जो कह रहा है कि बिहार से बाहर रह रहे लोगों का नाम केस में डाल दिया गया है, जबकि वहां के डीएसपी के बयान से भी साबित हो रहा है कि यह एक संगठित जातिवादी हमला था, जिसका मकसद दलितों को सबक सिखाना और ब्राह्मणों का दबदबा कायम करना था।
हेमंत ने कहा कि बिहार की पत्रकारिता जातिवादी, सांप्रदायिक और स्त्री विरोधी है। जब दलित, स्त्री, मुसलमान आएंगे तो वहां दिक्कत ही दिक्कत होती है। खुद की पत्रकारिता जर्नी की चर्चा करते हुए हेमंत ने कहा कि वह एक्सीडेंटल पत्रकार हैं। मुझे सुकांत जी ने रचा-गढा और अरुण अशेष और अविनाश चंद्र मिश्र ने पत्रकारिता में आना सुनिश्चित किया। मैं तब भाकपा (एमएल) से जुड़ा था और प्रेस विज्ञप्ति बनाता था। मेरी प्रेस नोट में प्रकाशनार्थ को हटाकर शीर्षक के साथ छाप दिया जाता था। उन्होंने जोर देकर कहा कि मुझे जिन लोगों ने प्रेरित किया या फिर मेरी सहायता की, यह उनका व्यक्तिगत योगदान था, सांस्थानिक नहीं, क्योंकि किसी पत्रकारिता संस्थान की संरचना में यह बात कहीं नहीं है कि दलित, महिलाएं और आदिवासी इस स्पेस में आएं।
वरिष्ठ पत्रकार गुंजन सिन्हा ने कहा कि सच की पहुंच बढ़ी है तो झूठ की पहुंच उससे कहीं ज्यादा तीव्र हुई है। उन्होंने कहा कि कॉर्पाेरेट बाजार और व्यक्ति का संघर्ष नया नहीं है। यह संघर्ष पत्रकारिता ही नहीं व्यक्ति और बाजार के बीच भी हमेशा से रहा है। हमने ‘नवभारत टाइम्स’ ज्वाइन किया था तो हमारे संपादक राजेंद्र माथुर कहते थे कि यह तुम पर निर्भर करता है कि अपने विचारों को बाजार के मायाजाल के बीच कैसे पहुंचा सकते हो। उन्होंने पत्रकारिता में जारी विभेद की प्रवृत्ति का काउंटर करते हुए कहा कि इसमें किसी स्त्री के आने की मनाही नहीं थी। श्री सिन्हा ने सुरेंद्र सोरेन नामक एक आदिवासी पत्रकार का उदाहरण दिया कि जिस संस्थान के लिए उसकी परीक्षा ली गई थी, उसमें उसका प्रदर्शन बहुत खराब था। इंटरव्यू बोर्ड ने जब उससे जानना चाहा कि वह पत्रकारिता ही क्यों करना चाहता है, कहीं नौकरी के लिए कोशिश क्यों नहीं करता तो उसकी इच्छा थी कि वह अपने समाज के लिए जो करना चाहता है, उसका माध्यम पत्रकारिता ही हो सकता है। हालांकि लंबे समय तक उसका प्रदर्शन खराब रहा। जब हम लोगों ने उसका मनोबल बढ़ाया तो उसने एक आईएएस अधिकारी नटराजन के द्वारा आदिवासी लड़की के दैहिक शोषण को एक्सपोज किया।
गुंजन सिन्हा ने माना कि जब तक आप सामने वाले के बैकग्राउंड को समझेंगे नहीं, उनको सहारा नहीं देंगे तो वह आगे नहीं बढ़ पाएगा। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में काम करना बहुत कठिन है। पत्रकारों के लिए किसी तरह का पेंशन नहीं है। बावजूद इसके हम भीड़ के लोग हैं और भीड़ की तरह ही नागरिक समाज की आवाज बुलंद करना हमारा काम है।
रिसर्च स्कॉलर और टेकारी कॉलेज, गया में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक अभय कुमार ने कहा कि अली अनवर आवाम की जुबान में लिखते हैं। वे अल्पसंख्यक समाज के मुद्दों को हिंदू मुस्लिम के चश्मे से नहीं देखते, क्योंकि उन्हें मालूम है कि अगर वह ऐसा करेंगे तो प्रतिगामी शक्तियां उसे बुलडोजर की तरह इस्तेमाल करेंगी।
अनीश अंकुर ने कहा कि बिहार की पत्रकारिता में एक बड़ी संख्या में पत्रकार कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट आंदोलन के कारण आए। उन्होंने जोखिम उठाकर जिस तरह की पत्रकारिता की, उनमें से कुछ के जीवन को अली अनवर की इस किताब में गहराई से उल्लेखित किया गया है।
वहीं, इस मौके पर राज्यसभा के पूर्व सदस्य एवं पुस्तक के लेखक अली अनवर ने कहा कि दो अवधि तक सांसद रहते मैं देश-विदेश में कई जगहों पर गया। हमने अनुभव किया कि पत्रकारिता के पेशे में बहुत गिरावट आयी है। हालांकि यह भी सच है कि इस अवधि में अपनी अभिव्यक्ति के कारण कई पत्रकारों की हत्याएं की गईं, लेकिन बिहार के पत्रकारों जैसी खुद्दारी मैंने कहीं नहीं देखी। यहां के पत्रकारों ने काफी जोखिम लेकर पत्रकारिता की। इनके इस रूप में निखारने में हमारे डेस्क के पत्रकारों की बड़ी भूमिका रही। इन रिपोर्टरों को इन डेस्क पत्रकारों ने जौहरी की तरह तराशा। अगर ये न होते तो रिपोर्टर इतने निपुण नहीं होते। हमने इस ख्याल से इस किताब को तैयार किया।
अपने अध्यक्षीय संबोधन प्रबल महतो ने ‘नवभारत टाइम्स’ के दौर से आज तक के अपने पत्रकारीय अनुभव को साझा किया। उन्होंने कहा कि ‘नभाटा’ अखबार के बंद होने के बाद मैं सिंंहभूम चला गया और वहां झारखंड आंदोलन से जुड़ा जहां सीताराम सिंह और वीरभारत तलवार जैसे लोग काम कर रहे थे। तब पटना के अखबार ‘आर्यावर्त’, और ‘इंडियन नेशनल’ में झारखंड आंदोलन की खबरें नहीं छपती थीं। हमने ‘सिंहभूमि’ नामक साप्ताहिक अखबार चाईबासा से शुरू किया। गांव की हाट में लोगों के बीच वह अखबार जाती थी। उसमें न्यूनतम मजदूरी की दर कितनी हो, और इसी तरह अन्य स्थानीय जरूरी खबरें छपती थीं। श्री महतो ने कहा कि हम राजेंद्र माथुर की आभारी हैं जिन्होंने चीजों को देखने की दृष्टि पैदा की। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के बाद मैं डाक्यूमेंट्री फिल्में बनाने लगा। मेरी जेहन में यह बात लगातार कौंधती थी कि खबराें की उम्र तो एक दिन की होती हैं, क्यों नहीं ऐसा काम किया जाए जिसका महत्व स्थायी हो, और जो लोगों को प्रभावित करे। अपनी इसी सोच के कारण फिल्म निर्माण में लग गया। पहली फिल्म बनाई डायन हत्या पर जिसे वर्ष 1993 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि अभी गांव में रहता हूं और अपनी मर्जी से फिल्में बनाता हूं।
इस अवसर पर संजीव चंदन, कुमार मुकुल, संजय कुमार कुंदन, कृष्ण समिद्ध, विजय कुमार सिंह, चंद्रविंद आदि शहर के कई लेखक, पत्रकार एवं नागरिक समाज के लोग उपस्थित थे।
(संपादन : नवल/अनिल)
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